Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता

Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Home Science Solutions Chapter 17 कार्याचर या कार्य नैतिकता

Bihar Board Class 11 Home Science कार्याचर या कार्य नैतिकता Text Book Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भारत जैसे विकासशील देश की सकल राष्ट्रीय आय (Gross National Income) कम हो जाती है – [B.M.2009A]
(क) समय पर न पहुंचने के कारण
(ख) कार्य का सैद्धांतिक जानकारी (Theoretical knowledge और व्यवहारिक जानकारी (Pratical knowledge) न होने के कारण
(ग) कार्य अवधि में अपने कार्य स्थान पर उपलब्ध न रहना
(घ) उपर्युक्त में सभी
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त में सभी

प्रश्न 2.
टीम की भावना दर्शाता है – [B.M.2009A]
(क) विकास का
(ख) सहयोग का
(ग) अवकाश का
(घ) अपात का
उत्तर:
(क) विकास का

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प्रश्न 3.
किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रथम आईना है – [B.M.2009A]
(क) व्यवहार
(ख) भाषा
(ग) आवाज
(घ) संस्कार
उत्तर:
(ख) भाषा

प्रश्न 4.
एक अच्छे ‘व्यक्तित्व की प्रथम पहचान है – [B.M.2009A]
(क) विनम्र भाषा
(ख) कटु भाषा
(ग) तुनकता
(घ) उग्र भाषा
उत्तर:
(क) विनम्र भाषा

प्रश्न 5.
हल्का श्रम के अंतर्गत कौन-सा कार्य आता है ? [B.M.2009A]
(क) फर्श साफ करना
(ख) कपड़े धोना
(ग) प्रेस करना
(घ) बुनाई करना
उत्तर:
(घ) बुनाई करना

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
किसी भी कार्य स्थिति के लिए श्रमिक, कार्य उपकरण व कार्य स्थान के कौन-कौन-से तीन महत्त्वपूर्ण संघटक हैं ?
उत्तर:
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प्रश्न 2.
कार्याचार (Work Ethics) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कार्याचार से अभिप्राय है कार्य के समय व्यक्ति का आचार या व्यवहार। कार्याचार या कार्य नैतिकता किसी भी कार्य को आनंदित ढंग से पूर्ण करने के लिए आवश्यक है। कार्याचार से कार्य करने तथा करवाने वाले दोनों को आदर तथा सम्मान का भाव मिलता है।

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प्रश्न 3.
कार्य नैतिकता (Work Ethics) से संबंधित कोई पांच आदतें लिखें।
उत्तर:

  • कार्य के प्रति संपूर्ण निष्ठा।
  • कार्य के प्रति नियमित व समयनिष्ठ होना।
  • कार्य को सही रूप में समझना।
  • अपने सहकर्मियों के साथ नम्र व सादर भाषा में बोलना।
  • अपने साधनों का उचित प्रबंध व उपयोग करना।

प्रश्न 4.
कार्य स्थान पर अनुशासन रखने के लिए दो महत्त्वपूर्ण तथ्य लिखिए।
उत्तर:
1. समयनिष्ठा (Punctuality)।
2. नियमितता (Regularity)।

प्रश्न 5.
नम्र व मृदु व्यवहार (Calm & Soft behaviour) कार्यक्षमता को बढ़ाता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कार्यालय में मधुर और प्रसन्न वातावरण बनाए रखने में मधुर व नम्र भाषा का प्रयोग बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि ऊँची आवाज में बोला जाए तो लोगों में कड़वाहट उत्पन्न होती है, झगड़ा-फसाद हो जाता है और बहसबाजी में न केवल समय व्यर्थ जाता है परन्तु हमारी शान्ति भी व्यर्थ जाती है। परिणामस्वरूप हमारी कार्यक्षमता में कमी आ जाती है।

प्रश्न 6.
कार्य में दक्षता (Efficiency in work) का कार्यपूर्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
अपने कार्य को सफलतापूर्वक करने हेतु उस कार्य में दक्षता हासिल करना अति आवश्यक है। कार्य दक्षता हासिल करने से न केवल कार्य समय पर पूरे होते हैं अपितु आत्मिक सन्तुष्टि भी प्रदान करती है। किसी भी कार्य को रुचिपूर्वक करते रहने हेतु सन्तुष्टि की प्राप्ति (Job satisfaction) अति आवश्यक है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कार्य नैतिकता का क्या अर्थ है तथा इसके क्या लाभ हैं ?
उत्तर:
कार्य नैतिकता (Work ethics): का अर्थ सदाचार तथा गलत-सही अनुभूति होना है, कार्य नैतिकता कार्य करने की मानक स्थिति है। व्यक्ति की अच्छे-बुरे की सही और गलत अवधारणा ही उसके कार्य पर प्रभाव डालती है।

लाभ (Advantages):
किसी भी कार्य को पूरी लगन से करने के निम्नलिखित लाभ हैं –

  • कार्य करने वाले व्यक्ति तथा कार्य करवाने वाले व्यक्ति को सन्तुष्टि होती है और आनन्द प्राप्त होता है।
  • व्यक्ति को कार्य करने का उचित उद्देश्य मिलता है और वह उद्देश्यहीन होकर कार्य को केवल कार्य करने के लिए नहीं करता है।
  • पूरी लगन से कार्य करने पर व्यक्ति अपने द्वारा अपने अधिकारियों द्वारा बनाए लक्ष्यों की प्राप्ति सरलतापूर्वक करता है।
  • कार्य पूर्ण होने अथवा लक्ष्य प्राप्ति से व्यक्ति को प्रोत्साहन मिलता है जो उसे भविष्य के लिए प्रेरित करता है।
  • व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह भविष्य में कार्यों को और अच्छे ढंग से करने का प्रयास करता है।

प्रश्न 2.
कार्य स्थल पर अनुशासन (Discipline) क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
अनुशासन-व्यवस्था का एक हथियार (Discipline as a Tool of Management): अनुशासन लक्ष्य की सफलता को प्राप्त करने के लिए व्यवस्था का एक अस्त्र है। अनुशासन एक प्रकार का दबाव है जिसके द्वारा लक्ष्य प्राप्ति के लिए बनाए गए निर्देशों तथा नियमों का पालन कराया जाता है। यह संस्था या समूह के सामान्य कार्यकलापों के लिए उत्तरदायी है। व्यवस्था को उपर्यक्त दोनों प्रकार की विधियों के आवश्यकतानसार प्रयोग द्वारा बनाए रखना चाहिए। इससे एक अच्छे कार्यकर्ता को अभिप्रेरणा मिलती है तथा कर्तव्यों से विमुख कार्यकर्ता को सजा।

इससे अच्छे कार्यकत्तओं की उपलब्धियों को देखकर दूसरे के मन में इसकी इच्छा जागती है तथा वह भी अधिक मेहनत करता है। परन्तु इसका दूसरा पहलू यह भी है कि उस वर्ग के व्यक्तियों को जिनके पास ये सभी अधिकार हैं, उन्हें पहले स्वयं उ.वेत आदर्श व्यवहार प्रस्तुत करना चाहिए अर्थात् अपने अधीन काम करने वाले कार्यकर्ताओं को आदेश देने से पूर्व उन्हें उन नियमों एवं सिद्धान्तों को स्वयं अमल में लाना चाहिए, जिसका पालन वे दूसरों से करवाना चाहते हैं। तभी सही अनुशासन कायम हो पाएगा।

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प्रश्न 3.
कार्यस्थल पर नैतिकता का पालन करने के नियमों का उल्लेख करें।
उत्तर:
अपने कार्यस्थल पर नैतिकता का पालन करना अति आवश्यक है ताकि कार्य सफलतापूर्वक किया जा सके। ये नियम निम्न हैं –

  • कार्य के प्रति निष्ठा रखना।
  • कार्य में दक्षता हासिल करना।
  • संसाधनों का सुव्यवस्थित ढंग से प्रयोग करना अर्थात् अपना समझ कर प्रयोग करना।
  • सुनियोजित व नियमित ढंग से कार्य करना।
  • अपने स्थान पर उपलब्ध रहना व कार्यरत रहना।
  • मधुर व नम्र भाषा का प्रयोग करना।
  • संगठन व सहयोग की भावना से कार्य करना।
  • अपने कार्य से सम्बन्धित नई जानकारी प्राप्त करते रहना तथा अपने ज्ञान को विशेष कार्यक्रमों द्वारा आधुनिक बनाना।

उपर्युक्त नियमों का पालन करने से ही वांछित परिणाम मिल सकते हैं अन्यथा उत्तम कार्यस्थल व उपकरण लेने के बाद भी सफलता असम्भव है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कार्यस्थल पर अनुशासन में रहने के लिए किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए ? विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
कार्य चाहे घर अथवा बाहर का हो, हमें निम्नलिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है –
1. अनुशासन (Discipline): किसी भी कार्य को करने के लिए अनुशासन के नियमों का पालन करना आवश्यक है। कोई भी कार्य यदि अनुशासित ढंग से न किया जाए तो वह सफलतापूर्वक सम्पन्न नहीं होता और उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होती है। अनुशासन बनाए रखने के लिए प्रत्येक कार्यालय अथवा घर में कुछ नियम बनाए जाते हैं, जैसे कार्यालय में समय पर पहुँचना, अपने से बड़े पद के अधिकारी का सम्मान करना, सौंपे गए कार्य को उचित ढंग से पूरा करना आदि।

घर में विभिन्न परिवार के सदस्यों के लिए भिन्न-भिन्न नियम होते हैं, जैसे बच्चों को शाम को निश्चित समय तक घर लौटना, समय पर पढ़ना तथा खेलना, समय पर स्कूल में पहुंचने के लिए समय पर प्रात:काल उठना व तैयार होना आदि। अनुशासन के अभाव में कोई भी कार्य सन्तोषजनक रूप से पूर्ण नहीं होता है। अनुशासनहीन व्यक्ति का व्यक्तित्व बिखरा हुआ होने के कारण कार्य के परिणामों में भी इसकी स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

कार्यस्थल पर अनुशासन निम्न दो प्रकार से लाया जा सकता है –
(क) सकारात्मक विधि (Positive Method)
(ख) नकारात्मक विधि (Negative Method)

(क) सकारात्मक विधि-इस विधि द्वारा व्यक्ति का कार्य के प्रति अच्छा दृष्टिकोण, उसमें अच्छी आदतों का विकास, उसका प्रोत्साहन तथा उसकी प्रशंसा द्वारा कार्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाया जाता है जिससे वह कार्य को पूरी लगन से करे और उसे अपने पर बोझ न समझे।

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(ख) नकारात्मक विधि-इस विधि द्वारा व्यक्ति को दंड व जुर्माने के डर से अनुशासित किया जाता है जिससे वह कार्य को बोझ समझकर करता है और सदैव कार्यप्रणाली को दोषी ठहराता है।

2. समय पर कार्य करना (Working in time): उचित समय पर कार्य करना आवश्यक है। प्रत्येक कार्य के लिए एक उचित समय होता है और वह समय हाथ से निकलने के पश्चात् दोबारा वापस नहीं आता है। यहाँ पर समय पर कार्य करने से अभिप्राय कार्यस्थल में समय पर पहुँचना भी है। यदि कार्यस्थल में पहुंचने का कोई निश्चित समय नहीं होगा तो वहाँ कार्य करने वाले सभी अपनी सुविधा एवं इच्छानुसार पहुंचेंगे और दूसरों के लिए असुविधा का कारण बनेंगे।

प्रत्येक व्यक्ति को यह अवश्य समझ लेना चाहिए कि जो असुविधा एवं खिन्नता उन्हें दूसरों का इन्तजार करने में होती है शायद वही असुविधा एवं खिन्नता दूसरों को भी उनके देर से पहुंचने पर होगी। उदाहरण के लिए बैंक अथवा किसी अन्य कार्यालय में किसी अधिकारी के देर से आने पर यदि कार्य देर से शुरू हो तो वहाँ पर इन्तजार कर रहे व्यक्तियों को किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, यह उस व्यक्ति से अच्छा और कोई नहीं जान सकता।

कई कार्य स्थल तो ऐसे हैं जहाँ पर यदि देर से पहुँचा जाए तो कार्य में विलम्ब तो होगा ही उसके साथ-साथ हम अनेक व्यक्तियों के लिए एक गलत उदाहरण बनेंगे। उदाहरण के लिए स्कूल, कॉलेज आदि में यदि शिक्षक देर से पहुँचेंगे तो वह विद्यार्थियों के लिए क्या उदाहरण बनाएँगे। इस प्रकार कुछ व्यक्तियों की लापरवाही के कारण अनेक विद्यार्थी अनजाने ही समय की पाबन्दी को अपना जीवन मूल्य नहीं बना पाते हैं।

3. पूर्ण समय तक कार्यालय में उपस्थित रहना (Full time duty at work place): कई व्यक्ति प्रायः यह समझते हैं कि कार्यालय में समय पर पहुँचकर अपनी उपस्थिति लगाने से उनका काम पूरा हो गया है। यह धारणा एकदम गलत है क्योंकि कार्यालय के समय के अनुसार पूरे समय अपनी जगह पर बैठना तथा कार्य करना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि कार्यालय में समय पर पहुँचना तथा समय से बाहर निकलना।

प्रत्येक कर्मचारी के लिए यह आवश्यक है कि वह पूरे दिन में सम्पन्न किए जाने वाले कार्यों की सूची बना ले और इस बात का प्रयत्न करे कि जो कार्य उसे आज पूरा करना है वह उसे कल के लिए न छोड़े। प्रत्येक कर्मचारी चाहे वह अधिकारी हो या क्लर्क हो अथवा किसी मिल में मजदूर हो या मालिक हो, अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से इस आदत को डाल ले तो कार्यक्षमता बढ़ने के साथ-साथ देश की उन्नति होगी और देखते ही देखते भारत की गिनती विकासशील देशों से विकसित देशों में हो जाएगी।

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4. कार्य में निपुणता होना (Efficiency in work): किसी भी कार्य को सफलता से करने के लिए कार्य में निपुणता होना अति आवश्यक है। आप इस बात को भली प्रकार से जानते हैं कि बीमार होने पर यदि हम दवाई किसी प्रशिक्षित डॉक्टर की अपेक्षा नीम हकीम से लें तो बीमारी ठीक होने के स्थान पर अधिक उग्र भी हो सकती है। प्रायः कार्य का पूर्ण ज्ञान न होने पर कार्य कुशलता तो कम होगी ही अपितु कार्य के परिणाम भी उत्तम नहीं होंगे।

किसी अधिकारी को अपने कार्य का पूर्ण ज्ञान न होने पर या तो उसे हर समय अन्य साथियों से पूछना पड़ेगा या फिर जैसे-तैसे गलत-सही कार्य को सम्पन्न करना पड़ेगा। इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने काम को भली प्रकार जानता है वह कम समय में ही कार्य को भली प्रकार सम्पन्न करके दूसरों के लिए उदाहरण बन सकता है।

5. शिष्ट भाषा का प्रयोग करना (Use of disciplined language): प्रत्येक व्यक्ति को सदैव शिष्ट भाषा का प्रयोग करना चाहिए। शिष्ट भाषा का प्रयोग न केवल कार्यस्थल में अपितु घर, परिवार में व साथियों में करना भी वांछनीय है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रथम आईना उसकी भाषा है। कोई चाहे कितना भी. शिक्षित हो, ऊँचे से ऊँचे पद पर हो या आयु में बड़ा हो, वह एक शिष्ट व्यक्ति तभी माना जाएगा जब उसमें अन्य वांछित गुणों के साथ-साथ शिष्टतापूर्वक विनम्र भाषा में बोलने का गुण हो।

विनम्र भाषा एक अच्छे व्यक्तित्व की प्रथम पहचान है। एक अमिट छाप तभी छोड़ी जा सकती है जबकि आपकी भाषा व बोलचाल विनम्र एवं शिष्ट हो। विनम्रता से बोलने के लिए हमें किसी को भी कुछ नहीं देना पड़ता है परन्तु उससे हमें दूसरों से आदर, दोस्ती जैसी अमूल्य चीजें सहज ही मिल जाती हैं।ऐसे कार्यालय जहाँ प्रतिदिन हमें दूसरे व्यक्तियों का सामना करना पड़ता है वहाँ तो भाषा का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।

एक दुखी व्यक्ति जब कोई समस्या लेकर किसी अधिकारी के पास पहुँचता है तो चाहे वह अधिकारी उसका काम करे अथवा नहीं परन्तु उसके सहानुभूति भरे दो चार विनम्र शब्द ही उस व्यक्ति के आधे दुख को कम कर देते हैं। प्रायः रोगी जब डॉक्टर के पास पहुँचकर उसे रोग के बारे में बता देता है और डॉक्टर उसके रोग के बारे में सुनकर उसे प्यार भरे शब्दों में समझाता है तो रोगी का आधा रोग तो उसी समय दूर हो जाता है।

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प्रश्न 2.
कार्य करते समय किस प्रकार के कार्याचार का पालन करने की आवश्यकता होती है ?
उत्तर:
1. कार्य को भली-भांति समझना (Absolutely knowing the work): किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पहले उस कार्य को पूरी तरह जान लेना अति आवश्यक है। कार्य के बारे में पहले पूरी रूपरेखा बनानी चाहिए। उस रूपरेखा के अनुसार ही कार्य करना चाहिए। यह जानकारी प्राप्त करनी चाहिए कि इस कार्य को पूरा करने में क्या-क्या सामग्री की आवश्यकता पड़ेगी, किन-किन विधियों का प्रयोग किया जाएगा इत्यादि। यदि कार्य करने की सही विधि का चुनाव किया जाए तथा कार्य में प्रयोग आने वाली सामग्री पहले से ही प्राप्त कर ली जाए तो कार्य बड़ी कुशलता से और शीघ्र पूरा किया जा सकता है। इस प्रकार से किया गया कार्य कर्मी को प्रसन्नता तथा सन्तुष्टि देता है।

2. कार्य के समय में कार्य पूरी निष्ठा से करना (Devotion in work while working): कार्य नैतिकता का यह एक महत्त्वपूर्ण पद है। कर्मी को कार्य के समय पर पूरी निष्ठा से कार्य करना चाहिए बहुधा देखा गया है कि कर्मी या तो कार्यस्थल पर देर से आते हैं या अपनी जगह पर नहीं मिलते या अपने सहकर्मियों के साथ गप्पें मारते या चाय, सिगरेट इत्यादि पीते रहते हैं।

इस प्रकार के व्यवहार से न तो कार्य पूरा होता है और न ही कार्य की अधिकता के कारण उसमें कार्य के प्रति सन्तुष्टि की भावना रहती है। कार्यालय के अधिकारी भी ऐसे कर्मी को डाँट-डपट करते हैं जिससे उसमें अशान्ति पैदा हो जाती है। इसलिए यह बहुत ही आवश्यक है कि काम के समय कर्मी अपनी जगह मौजूद रहे और कार्य को पूरी लगन तथा निष्ठा से करे। ऐसा करने से उसे कार्य सन्तुष्टि (Work satisfaction) मिलती है।

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3. अनुशासनप्रिय होना (Discipline oriented): प्रत्येक कर्मी को अपने कार्यालय के नियमों का पालन करना ही अनुशासनप्रियता है। कार्यालय समय पर पहुँचना, कार्य के समय कार्य ही करना, कार्यालय में धूम्रपान न करना इत्यादि अनुशासन की कसौटियाँ हैं। परन्तु आमतौर पर देखा गया है कि कर्मी में बहुधा अनुशासनहीनता पायी जाती है जिसके कारण कार्यालय के कार्य उचित प्रकार से नहीं होते। इस प्रकार के कर्मचारियों को उचित प्रकार की प्रेरणा तथा दबाव-विधियों के प्रयोग से अनुशासित किया जाना चाहिए ताकि उस कार्यालय का कार्य सुचारु रूप से हो सके।

4. अपने ज्ञान को आधुनिक बनाना (Making the knowledge modern): यह एक मनोवैज्ञानिक कहावत है कि मनुष्य जीवन भर सीखता रहता है। यह कहावत बिल्कुल सही है। यदि कोई व्यक्ति यह सोचता है कि उसे जितना सीखना था, वह सीख चुका है तो यह उसकी भ्रान्ति है। ऐसा सोचने से जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता, परन्तु दूसरी ओर कोई व्यक्ति इस कहावत के अनुसार अपने ज्ञान में वृद्धि करता है तो उसको अपने कार्य करने में सरलता तथा सुविधा का आभास होता है और वह कार्य को अच्छी तरह करके अपने अधिकारियों तथा कर्मचारियों से प्रशंसा प्राप्त करता है। जैसे कि आजकल कम्प्यूटर का बोलवाला है और बैंक का कार्य करने वाला कम्प्यूटर की सहायता से शीघ्र तथा ठीक प्रकार से खातों का चालन कर सकता है वनिस्पत उसके जिसे कम्प्यूटर का ज्ञान नहीं है। इसलिए प्रत्येक कर्मी को अपने कार्य को सकुशल पूरा करने के लिए अपने ज्ञान को आधुनिक बनाना अति आवश्यक है।

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5. अच्छा तथा मधुर व्यवहार (Good and soft behaviour): यदि आप चाहते हैं कि अन्य लोग आपके साथ अच्छा तथा मधुर व्यवहार करें, तो आपको उनके साथ भी अच्छा तथा मधुर व्यवहार करना होगा। कार्यालय का वातावरण अच्छा तथा मधुर बनाने के लिए आपको अपने सहकर्मी तथा आगन्तुकों के साथ मित्रतापूर्ण, सहयोगी तथा मधुर व्यवहार करना होगा। इस प्रकार का वातावरण नम्र भाषा के प्रयोग तथा सेवाभाव से बन सकता है। यदि आपके कार्यालय में वातावरण अच्छा, मधुर है तो आपको ऐसे वातावरण में काम करके सन्तुष्टि प्राप्त होगी और कार्य भी सुगमता से होगा। इसके विपरीत यदि कार्यालय का वातावरण खराब होगा तो उससे आपके तथा आपके अन्य सहकर्मियों की कार्यकुशलता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा तथा कार्य की गति भी धीमी होगी।

6. कार्य को सेवाभाव से करना (Working with devotion): आप चाहे किसी भी कार्यालय में कार्य कर रहे हों या जो भी कार्य कर रहे हों, वह किसी-न-किसी के हित में होता है। यदि कर्मी वह कार्य सेवाभाव से करे तो उसे उस कार्य को करके सन्तुष्टि प्राप्त होगी क्योंकि उसमें यह भावना आएगी कि मैंने इस कार्य को करके उस जरूरतमन्द व्यक्ति की सेवा की है, यह भावना अपने आप में सन्तुष्टि देती है। इसलिए यह अति आवश्यक है कि कर्मी किसी भी कार्य को करते समय सेवा भाव की भावना से प्रेरित हो तथा इसी भावना के अनुसार कार्य कों
पूरा करे।

7. टीम की भावना का होना (Team Spirit): किसी भी कर्मी को किसी समूह में कार्य करना होता है। उस समूह के यदि सभी कर्मी मिल-जुलकर कार्य करें तो कार्य शीघ्र हो जाएगा तथा उसमें उत्पन्न बाधाएँ भी शीघ्र ही दूर हो जाएंगी। यह सहयोग समूह के सभी सदस्यों की ओर से आना चाहिए चाहे वे समूह का मालिक हों या कार्यकर्ता। यदि टीम भावना से किया . जाता है तो इसमें कर्मियों की कमियाँ भी ढंक जाती हैं और कार्य भी पूरा हो जाता है।

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