Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 18 भारतीय राजनीति : एक बदलाव

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 18 भारतीय राजनीति : एक बदलाव

→ 1990 के दशक में विभिन्न राजनीतिक दलों में बड़ी अफरा-तफरी हुई! सन् 1991 में मध्यावधि चुनाव हुए और कांग्रेस इस बार अपना आँकड़ा सुधारते हुए सत्ता में आई। बहरहाल, सन् 1989 में ही इस परिघटना की समाप्ति हो गयी थी जिसे राजनीति विज्ञानी अपनी विशेष शब्दावली मे ‘कांग्रेस प्रणाली’ कहते हैं।

→ 1990 के दशक में एक बड़ा बदलाव राष्ट्रीय राजनीति में ‘मण्डल मुद्दे का उदय था। सन् 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा की नई सरकार ने मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू किया। इन सिफारिशों में प्रावधान किया गया कि केन्द्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिया जाएगा। अन्य पिछड़ा वर्ग को मिले आरक्षण के समर्थक और विरोधियों के बीच चले विवाद को ‘मण्डल मुद्दा’ कहा जाता है।

→ अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद का ढाँचा गिराने की घटना दिसम्बर 1992 में हुई।

→ मई 1991 में राजीव गांधी (तत्कालीन प्रधानमन्त्री) की हत्या कर दी गई। इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने नरसिम्हा राव को प्रधानमन्त्री चुना।

→ इस दौर में कांग्रेस के दबदबे की समाप्ति के साथ बहुदलीय शासन प्रणाली का युग शुरू हुआ।

→ सन् 1996 में बनी संयुक्त मोर्चे की सरकार में क्षेत्रीय पार्टियों ने मुख्य भूमिका निभाई।

→ सन् 1996 के चुनावों में भाजपा एक गठबन्धन के रूप में सत्ता में आई और सन् 1998 के मई से सन् 1999 के जून तक सत्ता में रही। फिर सन् 1999 के अक्टूबर में इस गठबन्धन ने पुनः सत्ता हासिल की। राजग की इन दोनों सरकारों में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमन्त्री बने।

→ इस तरह सन् 1989 के चुनावों से भारत में गठबन्धन की राजनीति के एक लम्बे दौर की शुरुआत हुई। इसके बाद से केन्द्र में 9 सरकारें बनीं। ये सभी या तो गठबन्धन की सरकारें थीं अथवा दूसरे दलों के समर्थन पर टिकी अल्पमत की सरकारें थीं जो इन सरकारों में शामिल नहीं हुए।

→ राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया। इससे अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीति को सुगठित रूप से सहायता मिली। नौकरी में आरक्षण के सवाल पर तीखे वाद-विवाद हुए तथा इन विवादों से ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ अपनी पहचान को लेकर ज्यादा सजग हुआ।

→ नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के सरकार के फैसले से उत्तर भारत के कई शहरों में हिंसक विरोध का स्वर उमड़ा। इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती दी गयी और यह प्रकरण ‘इन्दिरा साहनी केस’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

→ सन् 1978 में ‘बामसेफ’ का गठन हुआ। इस संगठन ने ‘बहुजन’ यांनी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक सत्ता की जबरदस्त तरफदारी की।

→ बामसेफ का परवर्ती विकास ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समिति’ है जिससे बाद के समय में ‘बहुजन समाज पार्टी’ का उदय हुआ। इस पार्टी का नेतृत्व कांशीराम ने किया।

→ जनता पार्टी के पतन और बिखराव के बाद भूतपूर्व जनसंघ के समर्थकों ने सन् 1980 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बनाई।

→ ‘हिन्दुत्व’ शब्द को वी०डी० सावरकर ने गढ़ा था और इसको परिभाषित करते हुए उन्होंने इसे भारतीय राष्ट्र की बुनियाद बताया।

→ अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद को लेकर दशकों से विवाद चला आ रहा था। बाबरी मस्जिद का निर्माण अयोध्या में मीर बाकी ने करवाया था।

→ दिसम्बर 1992 में राममन्दिर निर्माण के लिए ‘कार-सेवा’ का आयोजन किया गया।

→ सन् 1989 के बाद की अवधि को सामान्यतया कांग्रेस के पतन और भाजपा के अभ्युदय की भी अवधि कहा जाता है।

→ सन् 2004 के चुनावों में कांग्रेस भी पूरे जोर से गठबन्धन में शामिल हुई। राजग की हार हुई और संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (संप्रग) की सरकार बनी। इस गठबन्धन का नेतृत्व कांग्रेस ने किया।

→ सन् 2004 तथा सन् 2009 के चुनावों में एक हद तक कांग्रेस का पुनरूत्थान हुआ।

→ वर्तमान में गरीबी, विस्थापन, न्यूनतम मजदूरी, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा के मसले जन-आन्दोलनों के माध्यम से राजनीतिक एजेण्डे के रूप में सामने आ रहे हैं। ये आन्दोलन राज्य को उसकी जिम्मेदारियों के प्रति सचेत कर रहे हैं। इसी तरह लोग जाति, लिंग, वर्ग और क्षेत्र के सन्दर्भ में न्याय तथा लोकतन्त्र के मुद्दे उठा रहे हैं।

→ कांग्रेस प्रणाली-सन् 1991 में एक बार फिर मध्यावधि चुनाव हुए और कांग्रेस इस बार अपना आँकड़ा सुधारते हुए सत्ता में आई। बहरहाल, सन् 1989 में ही उस परिघटना की समाप्ति हो गई थी, जिसे राजनीति विज्ञानी अपनी विशिष्ट शब्दावली में ‘कांग्रेस प्रणाली’ कहते हैं।

→ मण्डल मुद्दा–सन् 1990 में मण्डल आयोग की सिफारिशों में प्रावधान किया गया कि केन्द्र सरकार
की नौकरियों में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को आरक्षण दिया जाएगा। सरकार के इस फैसले से देश के विभिन्न भागों में मण्डल विरोधी हिंसक प्रदर्शन हुए। अन्य पिछड़ा वर्ग को मिले आरक्षण के समर्थक और विरोधियों के बीच चले विवाद को ‘मण्डल मुद्दा’ कहा जाता है।

→ इन्दिरा साहनी केस-पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती दी गई और यह प्रकरण ‘इन्दिरा साहनी केस’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

→ बामसेफ-सन् 1978 में ‘बामसेफ’ (बैकवर्ड एण्ड माइनोरिटी क्लासेज एम्पलाईज फेडरेशन) का गठन हुआ। यह सरकारी कर्मचारियों का कोई साधारण-सा ट्रेड यूनियन नहीं था। इस संगठन ने बहुजन यानी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यकों की राजनीतिक सत्ता की जबरदस्त तरफदारी की।

→ बहुजन समाज पार्टी का उदय-बामसेफ का परवर्ती विकास ‘दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति’ है, जिसके बाद के समय में बहुजन समाज पार्टी का उदय हुआ। इस पार्टी का नेतृत्व कांशीराम ने किया।

→ वी०पी० सिंह-दिसम्बर 1989 से नवम्बर 1990 तक वाम मोर्चा और भाजपा के समर्थन से बनी राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के प्रधानमन्त्री रहे। इन्होंने मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू किया।

→ चन्द्रशेखर-नवम्बर 1990 से जून 1991 तक कांग्रेस के समर्थन से देश के प्रधानमन्त्री रहे।

→ कांशीराम-बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक। इन्होंने उत्तर भारत के राज्यों में दलित राजनीति को संगठित किया।

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Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 17 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 15 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

→ 1980 के दशक को स्वायत्तता की माँग के दशक के रूप में देखा जा सकता है। भारत सरकार ने लोगों की मांगों को दबाने के लिए जवाबी कार्रवाई की।

→ भारत ने विविधता के प्रश्न पर लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण अपनाया। लोकतन्त्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति की अनुमति है और लोकतन्त्र क्षेत्रीयता को राष्ट्र विरोधी नहीं मानता।

→ स्वतन्त्रता के तुरन्त बाद जम्मू-कश्मीर का मसला सामने आया। यह केवल भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष का मामला नहीं था। कश्मीर घाटी के लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं का सवाल भी इससे जुड़ा हुआ है।

→ अलगाव के आन्दोलनों के अलावा देश में भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की माँग करते हुए जन-आन्दोलन चले। मौजूदा आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात ऐसे ही आन्दोलनों वाले राज्य हैं।

→ जम्मू-कश्मीर में जारी हिंसा के कारण अनेक लोगों की जान गई और सैकड़ों परिवारों का विस्थापन हुआ। कश्मीर मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच एक बड़ा मुद्दा रहा है।

→ सन् 1947 से पहले जम्मू एवं कश्मीर में राजशाही थी। इसके हिन्दू शासक हरिसिंह भारत में शामिल नहीं होना चाहते थे और इन्होंने अपने स्वतन्त्र राज्य के लिए भारत और पाकिस्तान के साथ समझौता करने की कोशिश की। अन्ततः कश्मीर का भारत में विलय हुआ।

→ भारत जम्मू एवं कश्मीर की स्वायत्तता को बरकरार रखने पर सहमत हो गया। इसे संविधान की धारा-370 का प्रावधान करके संवैधानिक दर्जा दिया गया। उस समय से जम्मू-कश्मीर की राजनीति सदैव विवादग्रस्त एवं संघर्षयुक्त रही।

→ धारा-370 में जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले ज्यादा स्वायत्तता दी गई है। जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना संविधान है। भारतीय संविधान की सारी व्यवस्थाएँ इस राज्य में लागू नहीं होतीं। संसद द्वारा पारित कानून राज्य में उसकी सहमति के बाद ही लागू होता है।

→ जम्मू-कश्मीर में सन् 1987 के विधानसभा चुनाव के बाद फारुख अब्दुल्ला मुख्यमन्त्री बने।

→ 1980 के दशक में पंजाब में कई बड़े परिवर्तन आए। बाद में इसके कुछ हिस्सों से हरियाणा और हिमाचल प्रदेश नामक राज्य बनाए गए। सन् 1966 में पंजाबी-भाषी प्रान्त का निर्माण हुआ।

→ 1970 के दशक में अकालियों के एक वर्ग ने पंजाब के लिए स्वायत्तता की माँग उठाई।

→ जून 1984 में भारत सरकार ने ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चलाया। यह अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में की गई सैन्य कार्रवाई का कूट नाम था।

→ तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी की हत्या उन्हीं के अंगरक्षकों ने उनके आवास के बाहर 31 अक्टूबर, 1984 को कर दी। ये अंगरक्षक सिक्ख थे और ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला लेना चाहते थे। इस घटना के बाद भारत के उत्तरी भाग में सिक्ख समुदाय के विरुद्ध हिंसा भड़क उठी।

→ पूर्वोत्तर में क्षेत्रीय आकांक्षाएँ 1980 के दशक में एक निर्णायक मोड़ पर आ गई थीं। पूर्वोत्तर क्षेत्र में सात राज्य हैं जिन्हें ‘सात बहनों के नाम से जाना जाता है।

→ नागालैण्ड को सन् 1960 में; मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा को सन् 1972 में तथा अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम को सन् 1987 में राज्य का दर्जा दिया गया।

→ सन् 1986 में राजीव गांधी और लालडेंगा के बीच एक शान्ति समझौता हुआ। समझौते में मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और उसे कुछ विशेष अधिकार दिए गए। लालडेंगा मुख्यमन्त्री बने।

→ सन् 1979 से सन् 1985 तक चला असम आन्दोलन बाहरी लोगों के विरुद्ध चले आन्दोलनों का सबसे अच्छा उदाहरण है।

→ क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतान्त्रिक राजनीति का अभिन्न अंग है।

→ क्षेत्रीय आकांक्षाएँ-क्षेत्रीय आकांक्षाएँ, लोकतन्त्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की अनुमति है और लोकतन्त्र क्षेत्रीयता को राष्ट्र-विरोधी नहीं मानता। विभिन्न दल और समूह क्षेत्रीय पहचान, आकांक्षा अथवा किसी विशेष क्षेत्रीय समस्या को आधार बनाकर लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

→ नेशनल कॉन्फ्रेंस-नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू एवं कश्मीर की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी है। शेख मुहम्मद अब्दुल्ला इसके प्रमुख नेता थे। नेशनल कॉन्फ्रेंस एक धर्मनिरपेक्ष संगठन था और इसका कांग्रेस के साथ काफी समय तक गठबन्धन रहा।

→ धारा-370 का प्रावधान-कश्मीर को संविधान में धारा-370 के अन्तर्गत विशेष दर्जा दिया गया है। धारा-370 के तहत जम्मू एवं कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक स्वायत्तता दी गई है। राज्य का अपना संविधान है। भारतीय संविधान की समस्त व्यवस्थाएँ इस राज्य में लागू नहीं होती। संसद द्वारा पारित कानून राज्य में उसकी सहमति के बाद ही लागू हो सकते हैं।

→ आजाद कश्मीर-सन् 1947 में जम्मू एवं कश्मीर राज्य में पाकिस्तान ने कबायली हमला करवाया था इसके फलस्वरूप राज्य का हिस्सा पाकिस्तानी नियन्त्रण में आ गया। भारत ने दावा किया कि यह क्षेत्र का अवैध अधिग्रहण है। पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को ‘आजाद कश्मीर’ कहा।

→ अकाली दल-सिक्खों की राजनीतिक शाखा के रूप में 1920 के दशक में अकाली दल का गठन हुआ था। मास्टर तारा सिंह अकाली आन्दोलन के प्रमुख नेता थे। अकाली दल को पंजाब के हिन्दुओं के बीच कुछ विशेष समर्थन हासिल नहीं था। सन् 1980 में अकाली दल ने पंजाब तथा पड़ोसी राज्यों के बीच पानी के बँटवारे के मुद्दे पर एक आन्दोलन चलाया।

→ ऑपरेशन ब्लू स्टार-जून 1984 में भारत सरकार ने ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चलाया। यह अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में की गई सैन्य कार्रवाई का कूट नाम था। इस सैन्य अभियान में सरकार ने उग्रवादियों को सफलतापूर्वक मार भगाया लेकिन सैन्य कार्रवाई से ऐतिहासिक स्वर्ण मन्दिर को भी क्षति पहुंची।

→ राजीव गांधी-लोंगोवाल समझौता-अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष हरचन्द सिंह लोंगोवाल के साथ जुलाई 1985 में एक समझौता हुआ। इसे राजीव गांधी-लोंगोवाल अथवा पंजाब समझौता कहा जाता है। समझौता पंजाब में शान्ति स्थापित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था।

→ पूर्वोत्तर के सात राज्य अथवा सात बहनें-पूर्वोत्तर में सात राज्य हैं-अरुणाचल प्रदेश, असम, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा। इन राज्यों को ‘सात बहनें’ कहा जाता है।

→ ई० वी० रामास्वामी नायकर-पेरियार के नाम से प्रसिद्ध। इन्होंने द्रविड़ कणकन की स्थापना की तथा हिन्दी व उत्तर भारतीय वर्चस्व का विरोध किया।

→ शेख मुहम्मद अब्दुल्ला–भारत में विलय के बाद जम्मू-कश्मीर के प्रधामन्त्री बने। इन्होंने जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता एवं धर्म-निरपेक्षता का समर्थन किया।

→ मास्टर तारा सिंह-सिक्खों के प्रमुख धार्मिक एवं राजनीतिक नेता। इन्होंने स्वतन्त्रता के बाद अलग पंजाब राज्य के निर्माण का समर्थन किया तथा अकाली आन्दोलन का नेतृत्व किया।

→ लालडेंगा-मिजो नेशनल फ्रंट के संस्थापक व नेता। इन्होंने भारत के विरुद्ध दो दशक तक सशक्त संघर्ष का नेतृत्व किया तथा नव-निर्मित मिजोरम राज्य के मुख्यमन्त्री बने।

→ अंगमी जाप फिजो-नागालैण्ड के स्वतन्त्रता आन्दोलन के नेता। इन्होंने भारत सरकार के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत की।

→ काजी लैंदुप दोरजी खांगसरपा–सिक्किम के लोकतन्त्र बहाली आन्दोलन के नेता। इन्होंने सिक्किम के भारत में विलय का समर्थन किया।

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Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 16 जन-आन्दोलन का उदय

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 16 जन-आन्दोलन का उदय

→ भारत के पर्यावरणीय आन्दोलनों में ‘चिपको आन्दोलन’ एक विश्वप्रसिद्ध आन्दोलन था। आन्दोलन की शुरुआत सन् 1973 के उत्तराखण्ड के दो-तीन गाँवों में हुई थी।

→ औपनिवेशिक दौर में सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर भी विचार मन्थन चला जिससे अनेक स्वतन्त्र सामाजिक आन्दोलनों का जन्म हुआ; जैसे-जाति प्रथा विरोधी आन्दोलन, किसान सभा आन्दोलन और मजदूर संगठन के आन्दोलन।

→ आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ भागों में किसान तथा खेतिहर मजदूरों ने मार्क्सवादी-लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में अपना विरोध जारी रखा।

→ दलित हितों की दावेदारी के लिए महाराष्ट्र में सन् 1972 में दलित युवाओं का संगठन ‘दलित पैंथर्स’ बना। आरक्षण के कानून तथा सामाजिक न्याय की ऐसी नीतियों का कुशलतापूर्वक क्रियान्वयन इनकी प्रमुख माँग थी।

→ भारतीय संविधान में छुआछूत की प्रथा को समाप्त कर दिया गया।

→ महाराष्ट्र के शेतकारी संगठन ने किसानों के आन्दोलन को ‘इण्डिया’ की ताकतों (शहरी औद्योगिक क्षेत्र) के खिलाफ ‘भारत’ (ग्रामीण कृषि क्षेत्र) का संग्राम घोषित किया।

→ सरकार पर अपनी मांगों को मानने के लिए दबाव डालने के क्रम में भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने रैली, धरना, प्रदर्शन और जेल भरो आन्दोलन का सहारा लिया।

→ 1980 के दशक के मध्यवर्ती वर्षों में आर्थिक उदारीकरण की नीति की शुरुआत हुई तो बाध्य होकर मछुआरों के स्थानीय संगठनों ने अपना एक राष्ट्रीय मंच बनाया।

→ आन्ध्र प्रदेश में महिलाओं ने शराब के खिलाफ लड़ाई छेड़ रखी थी। इसे राज्य में ‘ताड़ी-विरोधी आन्दोलन’ के रूप में जाना गया।

→ संविधान के 73वें और 74वें संशोधन में महिलाओं को स्थानीय राजनीतिक निकायों में आरक्षण दिया गया। इस व्यवस्था को राज्यों की विधान सभाओं तथा संसद में भी लागू करने की माँग की जा रही है।

→ नर्मदा नदी के बचाव के लिए नर्मदा बचाओ आन्दोलन चला। इस आन्दोलन ने बाँधों के निर्माण का विरोध किया।

→ जन आन्दोलनों का इतिहास हमें लोकतान्त्रिक राजनीति को ठीक ढंग से समझने में सहायता देता है।

→ जन आन्दोलनों द्वारा लामबन्द की जाने वाली जनता सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित तथा अधिकारहीन वर्गों से सम्बन्ध रखती है।

→ सूचना के अधिकार का आन्दोलन जन आन्दोलनों की सफलता का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

→ सन् 2002 में ‘सूचना की स्वतन्त्रता’ नाम का एक विधेयक पारित हुआ था। यह एक कमजोर अधिनियम था और इसे अमल में नहीं लाया गया। जून 2005 में ‘सूचना का अधिकार’ विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गयी।

→ जन आन्दोलन-ऐसे आन्दोलन जो दलगत राजनीति से दूर एवं जन सामान्य के हित में चलाए जाते हैं, उन्हें ‘जन-आन्दोलन’ कहा जाता हैजैसे—चिपको आन्दोलन, दलित पैंथर्स आन्दोलन, भारतीय किसान आन्दोलन आदि।

→ चिपको आन्दोलन-यह आन्दोलन पेड़ों या वनों की कटाई को रोकने वाला पर्यावरणीय सुधार आन्दोलन था। आन्दोलन सन् 1973 में उत्तराखण्ड राज्य के कुछ गाँवों में प्रारम्भ हुआ था। इसमें वृक्षों को काटने से बचाने के लिए महिलाएँ पेड़ों से चिपककर खड़ी हो जाती थीं।

→ दल आधारित आन्दोलन-ऐसे आन्दोलन जिन्हें शक्ति मुख्यतः राजनीतिक दलों से प्राप्त हो। उदाहरणार्थ-सन् 1885 से सन् 1947 तक का भारत का स्वाधीनता आन्दोलन।

→ सामाजिक आन्दोलन-ऐसे आन्दोलन जो मुख्य रूप से किसी भी संगठन द्वारा सामाजिक समस्याओं पर चलाए जाते हैं तथा इनसे समाज को एक नई दिशा मिलती है। उदाहरण सती प्रथा या नारी मुक्ति आन्दोलन, ताड़ी विरोधी आन्दोलन आदि।।

→ आर्थिक आन्दोलन-ऐसे आन्दोलन जो मुख्य रूप से किसी आर्थिक समस्या से जुड़े हुए हों; जैसे-किसान आन्दोलन, मजदूर आन्दोलन आदि।

→ दलित पैंथर्स-दलित हितों की दावेदारी के क्रम में महाराष्ट्र में सन् 1972 में दलित युवाओं का एक संगठन ‘दलित पैंथर्स’ बनाया गया।

→ भारतीय किसान आन्दोलन (बी०के०यू०) यह उत्तर प्रदेश और हरियाणा के किसानों का एक महत्त्वपूर्ण संगठन था। सरकार पर अपनी मांगों को मानने के लिए दबाव डालने के क्रम में बीकेयू ने रैली, धरना, प्रदर्शन और जेल भरो अभियान का सहारा लिया।

→ शेतकारी संगठन-महाराष्ट्र के शेतकारी संगठन ने किसानों के आन्दोलनों को ‘इण्डिया’ की ताकतों (शहरी औद्योगिक क्षेत्र) के खिलाफ ‘भारत’ (यानि ग्रामीण कृषि क्षेत्र) का संग्राम करार दिया।

→ ताड़ी विरोधी आन्दोलन (शराब विरोधी आन्दोलन) आन्ध्र प्रदेश में ग्रामीण महिलाओं ने शराब के खिलाफ लड़ाई छेड़ रखी थी। यह लड़ाई शराब माफिया और सरकार दोनों के खिलाफ थी।

→ संविधान का 73वाँ तथा 74वाँ संशोधन-इन संशोधनों के अन्तर्गत महिलाओं को स्थानीय राजनीतिक निकायों में आरक्षण दिया गया।

→ नर्मदा बचाओ आन्दोलन-नर्मदा नदी के बचाव में नर्मदा बचाओ आन्दोलन चला। इस आन्दोलन में बाँधों के निर्माण का विरोध किया गया।

→ ‘सूचना की स्वतन्त्रता’ विधेयक-सन् 2002 में ‘सूचना की स्वतन्त्रता’ नाम का एक विधेयक पारित हुआ था। यह एक कमजोर अधिनियम था और इसे अमल में नहीं लाया गया। जून 2005 में ‘सूचना के अधिकार’ के विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त हुई।

→ महेन्द्र सिंह टिकैत-भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के अध्यक्ष थे।

→ नामदेव दसाल-ये एक प्रसिद्ध कवि (मराठी भाषा) हैं। इनकी ‘गोलपीठ की मराठी कविता’ प्रसिद्ध है।

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Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 15 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 15 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

→ सन् 1967 के पश्चात् से भारतीय राजनीति में इन्दिरा गांधी एक मजबूत नेता के रूप में उभरी थीं तथा उनकी लोकप्रियता अपने उच्चतम स्तर पर थी। इस दौर में दलगत प्रतिस्पर्धा कहीं अधिक तीखी व ध्रुवीकृत हो चली थी।

→ सन् 1971-72 के बाद के वर्षों में भी देश की सामाजिक-आर्थिक दशा में कुछ विशेष सुधार नहीं हुआ। बंगलादेश के संकट से भारत की
अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ा था। लगभग 80 लाख शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से भारत आ गए थे। ।

→ सन् 1972-73 के वर्ष में मानसून असफल रहा। इससे कृषि पैदावार में कमी आई। आर्थिक स्थिति की बदहाली को लेकर पूरे देश में असन्तोष का माहौल था। इस स्थिति में गैर-कांग्रेसी पार्टियों ने बड़े कारगर ढंग से जन विरोध का नेतृत्व किया।

→ इस अवधि में कुछ मार्क्सवादी समूहों की सक्रियता भी बढ़ी। इन समूहों ने वर्तमान राजनीतिक प्रणाली तथा पूँजीवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए हथियार उठाए व राज्य विरोधी तकनीकों का सहारा लिया। ये समूह मार्क्सवादी-लेनिनवादी (अब माओवादी) या नक्सलवादी के नाम से जाने गए।

→ गुजरात और बिहार दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। गुजरात में जनवरी 1974 में छात्रों ने खाद्यान्न, खाद्य तेल तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती हुई कीमत तथा उच्च पदों पर जारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन छेड़ दिया।

→ मोरारजी देसाई अपने कांग्रेस के दिनों में इन्दिरा गांधी के प्रमुख विरोधी रहे थे।

→ मार्च 1974 में बढ़ती हुई कीमतों, खाद्यान्न के अभाव, बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ बिहार के छात्रों ने भी आन्दोलन छेड़ दिया। आन्दोलन के क्रम में इन्होंने जयप्रकाश नारायण (जेपी) को बुलावा भेजा। आन्दोलन का प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ना प्रारम्भ हुआ।

→ सन् 1975 में जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने जनता के ‘संसद मार्च’ का नेतृत्व किया। जयप्रकाश नारायण को भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी जैसे गैर-कांग्रेसी दलों का समर्थन प्राप्त था।

→ सन् 1974 में रेलवे कर्मचारियों के संघर्ष से सम्बन्धित राष्ट्रीय समन्वय समिति ने जॉर्ज फर्नाडिस के नेतृत्व में रेलवे कर्मचारियों की एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।

→ केशवनन्द भारती के विख्यात केस में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि संविधान का एक बुनियादी ढाँचा है और संसद इन ढाँचागत विशेषताओं में संशोधन नहीं कर सकती है।

→ सन् 1973 में सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके इनसे कनिष्ठ न्यायमूर्ति ए०एन० रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। यह निर्णय राजनीतिक रूप से विवादास्पद बन गया।

→ 25 जून, 1975 के दिन सरकार ने घोषणा की कि देश में गड़बड़ी की आशंका है और इस तर्क के साथ उसने संविधान के अनुच्छेद-352 को
लागू कर दिया। इस अनुच्छेद में प्रावधान किया गया है कि बाहरी या आन्तरिक गड़बड़ी की आशंका होने पर सरकार आपातकाल लागू कर सकती है।

→ आपातकाल की घोषणा के साथ ही शक्तियों के बँटवारे का संघीय ढाँचा व्यावहारिक तौर पर निष्प्रभावी हो जाता है और समस्त शक्तियाँ केन्द्र सरकार के हाथ में चली जाती हैं। दूसरे, सरकार चाहे तो ऐसी स्थिति में किसी एक अथवा मौलिक अधिकारों पर रोक लगा सकती है अथवा इनमें कटौती कर सकती है।

→ आपातकालीन प्रावधानों में प्राप्त अपनी शक्तियों पर अमल करते हुए सरकार ने प्रेस की आजादी पर रोक लगा दी।

→ सरकार ने निवारक नजरबन्दी को बड़े पैमाने पर प्रयोग किया। इस प्रावधान में लोगों को गिरफ्तार इसलिए नहीं किया जाता कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है बल्कि इसके विपरीत, इस प्रावधान में लोगों को इस आशंका से गिरफ्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं।

→ मई 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री जे० सी० शाह की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया। इस आयोग का गठन 25 जून, 1975 के दिन घोषित आपातकाल के दौरान की गयी कार्रवाई तथा सत्ता के दुरुपयोग, अतिचार और कदाचार के विभिन्न आरोपों के विविध पहलुओं की जाँच के लिए किया गया था।

→ आपातकाल की घोषणा के कारण का उल्लेख करते हुए संविधान में बड़े सादे ढंग से ‘अन्दरूनी गड़बड़ी’ जैसे शब्द का व्यवहार किया गया है।

→ राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और प्रेस पर लगी पाबन्दी के अलावा आपातकाल का बुरा प्रभाव आम लोगों को भुगतना पड़ा।

→ 18 महीने के आपातकाल के बाद जनवरी 1977 में सरकार ने चुनाव कराने का फैसला किया।

→ सन् 1977 के चुनावों को जनता पार्टी ने आपातकाल के ऊपर जनमत संग्रह का रूप दिया।

→ चुनाव के अन्तिम परिणामों ने सभी को चौंका दिया। स्वतन्त्रता के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हार गयी।

→ मोरारजी देसाई देश के प्रधानमन्त्री बने, लेकिन इससे जनता पार्टी के भीतर सत्ता की खींचतान समाप्त नहीं हुई। इस सरकार ने 18 माह में ही अपना बहुमत खो दिया। कांग्रेस पुन: सत्ता में आई।

→ सन् 1980 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को विजय प्राप्त हुई एवं इन्दिरा गांधी प्रधानमन्त्री बनीं।

→ आपातकाल और इसके आस-पास की अवधि को हम संवैधानिक संकट की अवधि के रूप में भी देख सकते हैं। संसद और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को लेकर छिड़ा संवैधानिक संघर्ष भी आपातकाल के मूल में था।

→ आपातकाल-विकट स्थिति का समय। सन् 1973 से 1975 के बीच आए बदलावों की परिणति देश में ‘आपातकाल’ लागू कराने के रूप में हुई। सन् 1975 में जून माह में देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गयी। आपातकाल से हमारे मन में युद्ध और आक्रमण या प्राकृतिक आपदा की तस्वीर सामने आती है लेकिन अपने देश में आपातकाल की यह घोषणा अन्दरूनी अव्यवस्था की आशंका को ध्यान में रखते हुए की गयी थी।

→ सम्पूर्ण क्रान्ति–जयप्रकाश नारायण ने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दायरे में ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ का आह्वान किया ताकि उन्हीं के शब्दों में ‘सच्चे लोकतन्त्र’ की स्थापना की जा सके।

→ गुरिल्ला युद्ध-थोड़े से लोगों द्वारा बड़ी सैन्य शक्ति के विरुद्ध छुपकर लड़ने की युद्ध नीति को गुरिल्ला युद्ध कहा जाता है। मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी ने क्रान्ति करने के लिए गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई।

→ प्रेस सेंसरशिप-आपातकालीन प्रावधानों के अन्तर्गत प्राप्त अपनी शक्तियों पर अमल करते हुए सरकार ने प्रेस की आजादी पर रोक लगा दी। समाचार-पत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना आवश्यक है। इसे ‘प्रेस सेंसरशिप’ के नाम से जाना जाता है।

→ मौलिक अधिकार–नागरिकों के सर्वांगीण विकास हेतु मौलिक अधिकार आवश्यक हैं। भारत के
संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का प्रावधान है। भारतीय संविधान में नागरिकों को छह मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। इनका उल्लंघन होने पर नागरिक न्यायालय की शरण ले सकता है। इन अधिकारों को आपातकाल के दौरान प्रतिबन्धित किया जा सकता है।

→ निवारक नजरबन्दी-आपातकाल के दौरान सरकार ने निवारक नजरबन्दी का व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल किया। इस प्रावधान में लोगों को गिरफ्तार इसलिए नहीं किया जाता कि उन्होंने कोई अपराध किया है बल्कि इसके विपरीत, इस प्रावधान में लोगों को इस आशंका से गिरफ्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं।

→ बन्दी प्रत्यक्षीकरण–व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के लिए यह लेख सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। यह उस व्यक्ति की प्रार्थना पर जारी किया जाता है जो यह समझता है कि उसे अवैध रूप से बन्दी बनाया गया है। इस तरह अनुचित एवं गैर-कानूनी रूप से बन्दी बनाए गए व्यक्ति बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख के आधार पर स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं। दोनों पक्षों की बात सुनकर न्यायालय इस बात पर निर्णय करता है कि नजरबन्दी वैध है अथवा अवैध।

→ शाह जाँच आयोग-मई 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य
न्यायाधीश श्री जे० सी० शाह की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया। इस आयोग का गठन ’25 जून, 1975 के दिन घोषित आपातकाल के दौरान की गई कार्यविधि तथा सत्ता के दुरुपयोग, अतिचार और कदाचार के विभिन्न आरोपों के विविध पहलुओं की जाँच के लिए किया गया था।

→ चारु मजूमदार-कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी एवं नक्सली नेता। इन्होंने क्रान्तिकारी हिंसा का नेतृत्व किया। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की स्थापना करने वाले मजूमदार की पुलिस हिरासत में मौत हो गयी।

→ लोकनायक जयप्रकाश नारायण-जेपी के नाम से प्रसिद्ध। सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के नायक। बिहार आन्दोलन के नेता। इन्होंने आपातकाल का विरोध किया।

→ मोरारजी देसाई-भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री। स्वतन्त्रता सेनानी एवं गांधीवादी नेता के रूप में प्रसिद्ध।

→ चौधरी चरणसिंह-मोरारजी देसाई के बाद देश के प्रधानमन्त्री बने। इन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम में अपना योगदान दिया।

→ जगजीवन राम-स्वतन्त्रता सेनानी तथा बिहार के कांग्रेसी नेता। देश के उप-प्रधानमन्त्री रहे।

Bihar Board Class 12th Political Science Notes

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 14 कांग्रेसी प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 14 कांग्रेसी प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

→ 27 मई, 1964 को नेहरू जी की मृत्यु के बाद उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर कई अनुमान लगाए जा रहे थे।

→1960 के दशक को ‘खतरनाक दशक’ कहा जाता है क्योंकि गरीबी, असमानता, साम्प्रदायिक और क्षेत्रीय विभाजन आदि के सवाल भी अनसुलझे थे। जिस कारण लोकतन्त्र के असफल होने अथवा देश के बिखरने की सम्भावना व्यक्त की जा रही थी।

→ देश के द्वितीय प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्री (1964 से 1966) बने।

→ शास्त्री जी को निम्नलिखित दो कठिनाइयों का सामना करना पड़ा
(1) भारत-चीन युद्ध, एवं (2) सूखे की समस्या।

→ शास्त्री जी की मृत्यु के बाद कांग्रेस के सामने पुन: राजनीतिक उत्तराधिकारी का सवाल उठ खड़ा हुआ।

→ शास्त्री जी ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया।

→ भारत के राजनीतिक व चुनावी इतिहास में 1967 के वर्ष को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।

→ सन् 1967 के चुनावों में गठबन्धन की परिघटना सामने आई।

→ सन् 1967 से देश की राजनीति में ‘दल-बदल’ तथा ‘आयाराम गयाराम’ की राजनीति प्रारम्भ हुई। बाद के समय में दल-बदल रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया गया।

→’सिंडिकेट’ ने इन्दिरा गांधी को प्रधानमन्त्री बनवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

→ सिंडिकेट और इन्दिरा गांधी के बीच की गुटबाजी सन् 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव के समय खुलकर सामने आ गई।

→ सन् 1969 के नवम्बर तक सिंडिकेट की अगुवाई वाले कांग्रेस खेमे को कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन) और इन्दिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेसी खेमे को कांग्रेस (रिक्विजिनिस्ट) कहा जाने लगा। इन दोनों दलों को क्रमश: ‘पुरानी कांग्रेस’ और ‘नई कांग्रेस’ कहा जाता था।

→ इन्दिरा गांधी ने ‘प्रिवीवर्स’ को समाप्त करने जैसी बड़ी नीति की घोषणा की।

→ सभी बड़ी गैर-साम्यवादी और गैर-कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों ने एक चुनावी गठबन्धन बना लिया था। इसे ‘ग्रैण्ड अलायंस’ कहा गया। इससे इन्दिरा गांधी के लिए स्थिति और कठिन हो गई।

→ इन्दिरा गांधी ने लोगों के सामने एक सकारात्मक कार्यक्रम रखा तथा इसे अपने प्रसिद्ध नारे ‘गरीबी हटाओ’ के जरिए स्वरूप प्रदान किया।

→ ‘गरीबी हटाओ’ का नारा और इससे जुड़ा हुआ कार्यक्रम इन्दिरा गांधी की राजनीतिक रणनीति थी।

→ इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस प्रणाली को पुनर्स्थापित जरूर किया, लेकिन कांग्रेस . प्रणाली की प्रकृति को बदलकर।

→ खतरनाक दशक-1960 के दशक को ‘खतरनाक दशक’ कहा जाता है क्योंकि गरीबी, असमानता, साम्प्रदायिक और क्षेत्रीय विभाजन आदि के सवाल अभी अनसुलझे थे।

→ जय जवान जय किसान-शास्त्री जी सन् 1964 से सन् 1966 तक देश के प्रधानमन्त्री रहे। इस छोटी अवधि में देश ने दो बड़ी चुनौतियों का सामना किया। ये चुनौतियाँ युद्ध व सूखा थीं। शास्त्री जी ने ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा दिया, ताकि इन दोनों चुनौतियों से निपटा जा सके।

→ गैर-कांग्रेसवाद-कांग्रेस की विरोधी पार्टियों ने महसूस किया कि उनके वोट बँट जाने के कारण ही कांग्रेस सत्तासीन है। इन दलों को लगा कि इन्दिरा गांधी की अनुभवहीनता और कांग्रेस की अन्दरूनी उठा-पटक से उन्हें कांग्रेस को सत्ता से हटाने का एक अवसर हाथ लगा है। समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने इस रणनीति को ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का नाम दिया।

→ राजनीतिक भूकम्प–सन् 1967 के चुनाव परिणामों से कांग्रेस को राष्ट्रीय और प्रान्तीय स्तर पर गहरा धक्का लगा। कांग्रेस को जैसे-तैसे लोकसभा में बहुमत तो मिल गया था, लेकिन उसको प्राप्त मतों के प्रतिशत तथा सीटों की संख्या में भारी गिरावट आई थी। तत्कालीन अनेक राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने चुनाव परिणामों को ‘राजनीतिक भूकम्प’ की संज्ञा दी।

→ दल-बदल की राजनीति—कोई जनप्रतिनिधि किसी खास दल के चुनाव चिह्न को लेकर चुनाव लड़े और जीत जाए तथा चुनाव जीतने के बाद उस दल को छोड़कर किसी दूसरे दल में शामिल हो जाए, तो इसे दल-बदल कहते हैं।

→आयाराम-गयाराम-विधायकों द्वारा तुरत-फुरत पार्टी छोड़कर दूसरी-तीसरी पार्टी में शामिल होने की घटना से राजनीतिक शब्दकोश में ‘आयाराम-गयाराम’ का मुहावरा शामिल हुआ। किंगमेकर-राजा/सम्राट या प्रधानमन्त्री आदि नेताओं के पदों पर बिठाने वाले प्रभावशाली नेतागणों को ‘किंगमेकर’ की संज्ञा दी जाती है।

→ दस सूत्री कार्यक्रम-इन्दिरा गांधी द्वारा सन् 1967 में कांग्रेस की लोकप्रियता को पुनर्स्थापना के लिए घोषित पार्टी द्वारा अपनाया गया आर्थिक-सामाजिक दस सूत्री कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में बैंकों पर सामाजिक नियन्त्रण, आम बीमा के राष्ट्रीयकरण, भूमिक सुधार आदि प्रावधान शामिल थे।

→ प्रिवीपर्स देसी रियासतों का विलय भारतीय संघ में करने से पहले सरकार ने यह आश्वासन दिया था कि रियासतों के तत्कालीन शासक परिवार को निश्चित मात्रा में निजी सम्पत्ति रखने का अधिकार होगा। साथ ही सरकार की तरफ से उन्हें कुछ विशेष भत्ते भी दिए जाएंगे। इस व्यवस्था को ‘प्रिवीपर्स’ कहा गया।

→ ग्रैण्ड अलायंस-सन् 1971 के पाँचवें आम चुनावों में सभी बड़ी गैर-साम्यवादी और गैर-कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों ने एक चुनावी गठबन्धन बना लिया था। इसे ‘ग्रैण्ड अलायंस’ कहा गया।

→ गरीबी हटाओ का नारा-‘गरीबी हटाओ’ के नारे से इन्दिरा गांधी ने वंचित वर्गों, विशेषकर भूमिहीन किसान, दलित और आदिवासी अल्पसंख्यक, महिला और बेरोजगार नौजवानों के बीच अपने समर्थन का आधार तैयार करने की कोशिश की।

→ के० कामराज-के० कामराज एक प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी तथा कांग्रेसी नेता थे। सन् 1963 में इन्होंने प्रस्ताव रखा कि सभी वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को इस्तीफा दे देना चाहिए ताकि अपेक्षाकृत युवा पार्टी कार्यकर्ता कमान सँभाल सकें। यह प्रस्ताव ‘कामराज योजना’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

→ लालबहादुर शास्त्री-पं० जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद देश के दूसरे प्रधानमन्त्री बने। इन्होंने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया था। 10 जनवरी, 1966 को इनका ताशकन्द में अचानक निधन हो गया।

→ इन्दिरा गांधी-पं० जवाहरलाल नेहरू की पुत्री। लालबहादुर शास्त्री के अचानक निधन के बाद देश की प्रधानमन्त्री बनीं। इन्होंने प्रिवीपर्स की समाप्ति की एवं गरीबी हटाओ का नारा दिया। 31 अक्टूबर, 1984 को इनकी हत्या कर दी गयी।

→ राम मनोहर लोहिया–स्वतन्त्रता सेनानी, समाजवादी नेता एवं विचारक। ये गैर-कांग्रेसवाद के रणनीतिकार थे। इन्होंने पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिए जाने का समर्थन किया।

→ एस० निजलिंगप्पा-संविधान सभा के सदस्य रहे। इन्हें ‘आधुनिक कर्नाटक का निर्माता’ माना जाता है।

→ कर्पूरी ठाकुर–स्वतन्त्रता सेनानी व समाजवादी नेता। बिहार के मुख्यमन्त्री रहे एवं अंग्रेजी भाषा के प्रयोग का विरोध किया।

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Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 13 भारत के विदेश संबंध

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 13 भारत के विदेश संबंध

→ भारत को स्वतन्त्रता कठोर एवं चुनौतीपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में प्राप्त हुई थी।

→ उपनिवेशवाद की समाप्ति के बाद नए देशों के सामने लोकतन्त्र बनाए रखने की तथा लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना करने की दोहरी चुनौती थी।

→ एक राष्ट्र के रूप में भारत का जन्म विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में हुआ था। ऐसे में भारत ने अपनी विदेश नीति में अन्य सभी देशों की सम्प्रभुता का सम्मान करने व शान्ति कायम करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य सामने रखा।

→ द्वितीय विश्वयुद्ध के तुरन्त बाद के दौर में अनेक विकासशील देशों ने ताकतवर देशों की इच्छानुसार अपनी विदेश नीति बनायी क्योंकि उन्हें इन देशों से अनुदान या कर्ज मिल रहा था। इस कारण से दुनिया के विभिन्न देश दो गुटों में बँट गए—(1) संयुक्त राज्य अमेरिका का गुट एवं (2) सोवियत संघ का गुट।

→ सुभाषचन्द्र बोस ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ‘इण्डियन नेशनल आर्मी’ (आई०एन०ए०) का गठन किया था।

→ भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय एजेण्डा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाई। प्रधानमन्त्री और विदेशमन्त्री के रूप में सन् 1946 से 1964 तक इन्होंने भारत की विदेश नीति की रचना और उसके क्रियान्वयन पर गहरा प्रभाव डाला।

→ भारत अपने आप को दोनों ही गुटों से दूर रखना चाहता था। सन् 1956 में जब ग्रेट ब्रिटेन ने स्वेज नहर के मामले को लेकर मिस्र पर आक्रमण किया तो भारत ने इस नव-औपनिवेशिक हमले के विरुद्ध विश्वव्यापी विरोध का नेतृत्व किया था।

→ भारत ने नेहरू के नेतृत्व में मार्च 1947 में एशियाई सम्बन्ध सम्मेलन का आयोजन किया।

→ इण्डोनेशिया के शहर बाण्डंग में एफ्रो-एशियाई सम्मेलन सन् 1955 में हुआ। आमतौर पर इसे ‘बाण्डुंग सम्मेलन’ के नाम से जाना जाता है। अफ्रीका और एशिया के नव-स्वतन्त्र देशों के साथ भारत के बढ़ते सम्पर्क का यह चरम बिन्दु था।

→ बाण्डुंग सम्मेलन में ही गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की नींव पड़ी।

→ गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का प्रथम सम्मेलन सितम्बर 1961 में बेलग्रेड में सम्पन्न हुआ। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना में नेहरू जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी।

→ पाकिस्तान के साथ अपने सम्बन्धों के विपरीत स्वतन्त्र भारत ने चीन के साथ अपने रिश्तों की शुरुआत बड़े मित्रतापूर्ण ढंग से की।

→ सन् 1949 की चीनी क्रान्ति के बाद भारत, चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने वाला प्रथम देश
था।

→ शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धान्तों (जिन्हें पंचशील के नाम से जाना जाता है) की घोषणा भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू व चीन के प्रमुख चाऊ एन लाई ने संयुक्त रूप से 29 अप्रैल, 1954 में की। दोनों देशों के मध्य मजबूत सम्बन्धों की दिशा में यह एक अच्छा कदम था।

→ चीन ने सन् 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया। तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा ने भारत से । राजनीतिक शरण माँगी और सन् 1950 में भारत ने उन्हें शरण दे दी।

→ सन् 1954 में भारत और चीन के बीच पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर हुए।

→ चीन ने ‘स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र’ बनाया है और इस क्षेत्र को वह चीन का अभिन्न अंग मानता है। तिब्बती जनता चीन के इस दावे को नहीं मानती कि तिब्बत, चीन का अभिन्न अंग है।

→ सन् 1962 में चीन ने सीमा विवाद को लेकर भारत पर अचानक हमला कर दिया और नेफा एवं लद्दाख में एक बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।

→ भारत-चीन युद्ध से भारतीय राष्ट्रीय स्वाभिमान को गहरी चोट पहुंची।

→ भारत-चीन संघर्ष का प्रभाव विपक्षी दलों पर भी हुआ। इस युद्ध से चीन-सोवियत संघ के बीच बढ़ते मंतभेद से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के अन्दर बड़ी उठा-पटक मची। सोवियत संघ का पक्षधर गुट भाकपा में ही रहा और उसने कांग्रेस के साथ नजदीकियाँ बढ़ाईं।

→ दूसरा गुट कुछ समय के लिए चीन का पक्षधर रहा तथा यह गुट कांग्रेस के साथ किसी भी प्रकार की नजदीकी के खिलाफ था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सन् 1964 में टूट गई। इस पार्टी के भीतर जो गुट चीन का पक्षधर था उसने मार्क्सवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बनाई।

→ भारत-चीन युद्ध के बाद नागालैण्ड को राज्य का दर्जा दिया गया।

→ कश्मीर मामले को लेकर पाकिस्तान के साथ बँटवारे के तुरन्त बाद ही संघर्ष छिड़ गया था। सन् 1947 में ही कश्मीर में भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच एक छद्म युद्ध छिड़ गया था। यह संघर्ष पूर्ण रूप से व्यापक युद्ध का रूप न ले सका।

→ विश्व बैंक की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के मध्य नदी जल में हिस्सेदारी को लेकर चला आ रहा एक लम्बा विवाद सुलझा लिया गया। नेहरू और जनरल अयूब खान ने सिन्धु नदी जल सन्धि पर सन् 1960 में हस्ताक्षर किए।

→ भारतीय प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री तथा पाकिस्तान के जनरल अयूब खान के बीच सन् 1966 में ताशकन्द समझौता हुआ। सोवियत संघ ने इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाई।

→ भारत ने मई 1974 में परमाणु परीक्षण किया। भारत का कहना था कि भारत अणु शक्ति का प्रयोग केवल शान्तिपूर्ण उद्देश्यों के लिए करेगा।

→ सन् 1999 में भारत-पाकिस्तान के मध्य ‘कारगिल संघर्ष’ हुआ।

→ भारत ने मई 1998 में परमाणु परीक्षण (द्वितीय) किया।

→ भारत की परमाणु नीति ने सैद्धान्तिक तौर पर यह बात स्वीकार की कि भारत अपनी रक्षा के लिए परमाणुहथियार रखेगा लेकिन वह हथियारों का प्रयोग पहले नहीं करेगा।

→ सन् 1971 में पाकिस्तान से जंग के बाद इन्दिरा गांधी की लोकप्रियता में चार चाँद लग गए।

→ 3 जुलाई, 1972 को इन्दिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला समझौते पर हस्ताक्षर हुए और इससे अमन की बहाली हुई।

→ भारत और पाकिस्तान के मध्य विश्वास की कमी और सुरक्षा की दुविधा है। दोनों के बीच आपसी सौहार्द की कमी है।

→ उपनिवेशवाद-कई विदेशी शक्तियों ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए अन्य देशों पर कब्जा करके उन्हें अपना उपनिवेश बनाया।

→ सम्प्रभुता-यह किसी राष्ट्र का अनिवार्य तत्त्व है। सम्प्रभुता का अर्थ यह है कि भारत अपनी आन्तरिक व विदेश नीति का निर्धारण स्वयं करेगा।

→ गुटनिरपेक्षता की नीति-गुटनिरपेक्षता का तात्पर्य है किसी भी गुट में शामिल न होना तथा किसी भी गुट या राष्ट्र के कार्य की सराहना या आलोचना, बिना सोचे-समझे न करना।

→ इण्डियन नेशनल आर्मी (I.N.A.)-नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आजाद हिन्द फौज (आई० एन० ए०) का गठन किया था।

→ नाटो (NATO)-नाटो (NATO) का पूरा नाम ‘उत्तर अटलाण्टिक सन्धि संगठन’ है। यह एक सैन्य गुट है।

→ वारसा पैक्ट-सोवियत संघ ने ‘वारसा पैक्ट’ नामक सन्धि संगठन बनाया था। इसकी स्थापना सन् 1955 में हुई थी। इसका मुख्य कार्य नाटो में सम्मिलित देशों का यूरोप में मुकाबला करना था।

→ पंचशील के सिद्धान्त-पंचशील का अर्थ है-पाँच सिद्धान्त। ये सिद्धान्त भारतीय विदेशी नीति के मूलाधार हैं। इन पाँच सिद्धान्तों के लिए ‘पंचशील’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 24 अप्रैल, 1954 को किया गया। पंचशील के ये पाँच सिद्धान्त विश्व में शान्ति स्थापित करने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

→ ताशकन्द समझौता-सन् 1965 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष का अन्त संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तक्षेप से हुआ। तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के जनरल अयूब खान के बीच सन् 1966 में ताशकन्द समझौता हुआ। सोवियत संघ ने इसमें मध्यस्थ की भूमिका निभाई।

→ विदेश नीति-विदेश नीति से अभिप्राय उस नीति से है जो एक देश द्वारा अन्य देशों के प्रति अपनाई जाती है।

→ शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व-शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का अर्थ है-बिना किसी मनमुटाव के मैत्रीपूर्ण ढंग से एक देश का दूसरे देश के साथ रहना।

→ निःशस्त्रीकरण-नि:शस्त्रीकरण के द्वारा ही विश्व शान्ति को बनाए रखा जा सकता है तथा अणु शक्ति का प्रयोग केवल मानव कल्याण के लिए होना चाहिए।

→ पं० जवाहरलाल नेहरू-स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री। इन्होंने 29 अप्रैल, 1954 को चीन के प्रमुख चाऊ एन लाई के साथ संयुक्त रूप से शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धान्तों (पंचशील) पर हस्ताक्षर किए।

→ सी० राजगोपालाचारी–स्वतन्त्र भारत के प्रथम एवं अन्तिम भारतीय गवर्नर। इन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया।

→ दलाई लामा–तिब्बत के धार्मिक नेता। तिब्बत पर चीनी आधिपत्य के विरुद्ध तिब्बत में असफल सशस्त्र विद्रोह होने के पश्चात् भारत में शरण ली।

→ वी० के० कृष्ण मेनन-पं० जवाहरलाल नेहरू सरकार में रक्षामन्त्री रहे। इन्होंने सन् 1962 में . भारत-चीन युद्ध के पश्चात् पद से त्यागपत्र दे दिया।

→ लाल बहादुर शास्त्री-पं० जवाहरलाल नेहरू के पश्चात् भारत के प्रधानमन्त्री बने। इन्होंने सन् 1966 में पाकिस्तान के जनरल अयूब खान के साथ ताशकन्द समझौता किया।

→ इन्दिरा गांधी-पं. जवाहरलाल नेहरू की पुत्री जो लाल बहादुर शास्त्री के बाद भारत की प्रधानमन्त्री बनीं। इन्होंने 3 जुलाई, 1972 को पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए।

Bihar Board Class 12th Political Science Notes

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 12 नियोजित विकास की राजनीति

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 12 नियोजित विकास की राजनीति

→ लौह-अयस्क के अधिकांश भण्डार ओडिशा राज्य के आदिवासी बहुल जिलों में हैं जिनका दोहन होना अभी शेष है।

→ इस्पात की विश्वव्यापी माँग बढ़ने से निवेश की दृष्टि से ओडिशा एक महत्त्वपूर्ण स्थान के रूप में उभरा है।

→ ओडिशा सरकार ने अन्तर्राष्ट्रीय इस्पात-निर्माताओं व राष्ट्रीय स्तर के इस्पात-निर्माताओं के साथ सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर किए। आदिवासियों को डर था कि यदि यहाँ उद्योग स्थापित हो गए तो उन्हें अपने घर से विस्थापित होना पड़ेगा और आजीविका छिन जाएगी।

→ विकास से जुड़े फैसलों में एक सामाजिक समूह के हितों को दूसरे सामाजिक समूह के हितों की तुलना में तौला जाता है। साथ ही वर्तमान पीढ़ी के हितों और आने वाली पीढ़ी के हितों को भी लाभ-हानि के तराजू पर तौलना पड़ता है।

→ स्वतन्त्रता के बाद देश में कई फैसले लिए गए। सभी फैसले परस्पर आर्थिक विकास के एक मॉडल या ‘विजन’ से जुड़े हुए थे।

→ भारत के विकास का अर्थ आर्थिक संवृद्धि तथा आर्थिक सामाजिक-न्याय ही है। इस बात पर भी सहमति थी कि इस मामले को व्यवसायी, उद्योगपति तथा किसानों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार को इस मसले पर महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करना था।

→ स्वतन्त्रता से पूर्व ‘विकास’ की बात आते ही ‘विकास’ का पैमाना पश्चिमी देशों को मानते थे। विकास का अर्थ था-अधिक-से-अधिक आधुनिक होना तथा आधुनिक होने का अर्थ था–पश्चिमी औद्योगिक देशों के समान होना।

→ स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत के समक्ष विकास के दो मॉडल थे पहला उदारवादी पूँजीवादी मॉडल था। यूरोप के अधिकांश देशों और संयुक्त राज्य अमेरिका में यही मॉडल अपनाया गया था। दूसरा समाजवादी मॉडल था जिसे सोवियत संघ ने अपनाया था। इन दोनों महाशक्तियों (सोवियत संघ व संयुक्त राज्य अमेरिका) के बीच ‘शीत युद्ध’ का दौर चल रहा था।

→ स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान यह बात स्पष्ट हो गई थी कि गरीबी को समाप्त करने व सामाजिक-आर्थिक पुनर्वितरण के कार्य का प्रमुख दायित्व सरकार का होगा।

→ अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए नियोजन के विचार को 1940 और 1950 के दशकों में सम्पूर्ण विश्व में जनसमर्थन प्राप्त हुआ था।

→ सन् 1944 में भारत में उद्योगपतियों का एक समूह एकजुट हुआ। इस समूह ने देश में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया, जिसे ‘बॉम्बे प्लान’ के नाम से जाना जाता है। इस प्लान की मुख्य बात यह थी कि सरकार औद्योगिक व अन्य आर्थिक निवेश के क्षेत्रों में बड़े कदम उठाए।

→ सोवियत संघ की तरह भारत के योजना आयोग ने भी पंचवर्षीय योजनाओं के विकल्प का चयन किया।

→ सन् 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना का प्रारूप जारी हुआ तथा इसी वर्ष नवम्बर में इस योजना का वास्तविक दस्तावेज जारी किया गया।

→ पहली पंचवर्षीय योजना में सर्वाधिक बल कृषि-क्षेत्र पर दिया गया था।

→ योजनाकारों का मूलभूत लक्ष्य राष्ट्रीय आय के स्तर को ऊँचा करना था। यह तभी सम्भव था, जब लोगों की बचतें उनके खर्चों से अधिक हों।

→ दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956) में भारी उद्योग के विकास पर जोर दिया गया। पी० सी० महालनोबिस के नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों के एक दल ने यह योजना तैयार की।

→ औद्योगीकरण पर दिए गए बल से भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास को नया आयाम मिला।

→ जे० सी० कुमारप्पा जैसे गांधीवादी अर्थशास्त्रियों ने एक वैकल्पिक योजना का प्रारूप प्रस्तुत किया था जिसमें ग्रामीण औद्योगीकरण पर बल दिया गया था।

→ चौधरी चरणसिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था के नियोजन में कृषि को केन्द्र में रखने की बात अत्यन्त सुविचारित और सशक्त ढंग से उठाई थी।

→ कई लोगों का मत था कि औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर को तीव्र किए बिना गरीबी से छुटकारा नहीं मिल सकता।

→ भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ कहा जाता है।

→ नियोजित विकास के इसी दौर में भारत के आगामी आर्थिक विकास की बुनियाद पड़ी। भारत के इतिहास की कुछ सबसे बड़ी विकास परियोजनाएँ इसी अवधि में प्रारम्भ हुईं; जैसे-भाखड़ा-नांगल परियोजना व हीराकुड परियोजना।

→ सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ भारी उद्योग; जैसे—इस्पात संयन्त्र, तेलशोधक कारखाने, विनिर्माण इकाइयाँ, रक्षा उत्पादन आदि इसी अवधि में प्रारम्भ हुए।

→ भारत में सरकार ने खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कृषि की एक नई रणनीति अपनाई। सरकार ने उन क्षेत्रों पर ज्यादा संसाधन स्थापित करने का फैसला किया जहाँ सिंचाई सुविधा उपलब्ध थीं। सरकार ने उच्च गुणवत्ता के बीज, उर्वरक, कीटनाशक तथा बेहतर सिंचाई सुविधा बड़े अनुदानित मूल्य पर उपलब्ध कराना शुरू किया। यही उस घटना की शुरुआत थी जिसे ‘हरित क्रान्ति’ के नाम से जाना जाता है।

→ हरित क्रान्ति से देश में खाद्यान्न की उपलब्धता में वृद्धि हुई।

→ सन् 1969 में 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।

→ सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में बढ़ते भ्रष्टाचार व अकुशलता तथा नौकरशाही द्वारा आर्थिक विकास में अधिक सकारात्मक भूमिका नहीं निभाने के कारण जनता का विश्वास टूट गया। फलस्वरूप देश के नीति-निर्माताओं ने सन् 1980 के दशक के बाद से अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को कम कर दिया।

→ पंचवर्षीय योजनाओं का क्रम चलता रहा लेकिन 1961-66 की तीसरी पंचवर्षीय योजना के बाद अड़चनें आने लगीं। यही कारण है कि तीन वर्ष की अवधि का विराम आया, फिर एकवर्षीय योजनाएँ चलती रहीं, इसको ‘नियोजन अवकाश’ कहा गया।

→ वामपन्थ-‘वामपन्थ’ में मुख्यत: उन लोगों की तरफ संकेत किया जाता है जो गरीब और पिछड़े सामाजिक समूह को महत्त्व प्रदान करते हैं तथा इन वर्गों को लाभ पहुंचाने वाली सरकारी नीतियों का समर्थन करते हैं।

→ दक्षिणपन्थ-‘दक्षिणपन्थी’ रुझान वाली विचारधारा से उन लोगों की ओर संकेत किया जाता है जो यह मानते हैं कि खुली प्रतिस्पर्धा और बाजारमूलक अर्थव्यवस्था के द्वारा ही प्रगति हो सकती है।

→ विजन-विजन से तात्पर्य नजरिया या दृष्टिकोण से है।

→ विकास-विकास का अर्थ अधिकाधिक आधुनिक होना और आधुनिक होने का अर्थ था पश्चिमी औद्योगिक देशों के समान होना।

→ नियोजन-नियोजन का अर्थ कम-से-कम व्यय द्वारा उपलब्ध साधनों का प्रयोग करते हुए पूर्व निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करने से है।

→ पूँजीवाद-पूँजीवाद शब्द से तात्पर्य उस आर्थिक प्रणाली से है जिसमें कारखानों एवं खेतों पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व होता है तथा वे संगृहीत पूँजी का उपयोग अपने लिए करते हैं।

→ उदारवाद-प्रशासकीय नियन्त्रणों को कम करके स्वतन्त्र व्यापार की नीतियों को अपनाना उदारवाद कहलाता है।

→ समाजवाद-समाजवादी आर्थिक प्रणाली में उत्पत्ति के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व न होकर सामाजिक स्वामित्व होता है।

→ समाजवादी प्रणाली में केन्द्रीय नियोजन का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। उत्पादन के साधनों पर राज्य का नियन्त्रण होता है।

→ औद्योगीकरण–औद्योगीकरण के अन्तर्गत प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण प्रणाली के माध्यम से अन्य रूपों में परिवर्तित किया जाता है।

→ शीतयुद्ध-दोनों महाशक्तियों (सोवियत संघ एवं संयुक्त राज्य अमेरिका) के मध्य विचारधाराओं का युद्ध ‘शीतयुद्ध’ कहलाता है।

→ योजना आयोग-योजना आयोग की स्थापना मार्च 1950 में भारत सरकार द्वारा की गई। यह एक सलाहकार की भूमिका निभाता है।

→ बॉम्बे प्लान-सन् 1944 में भारत में उद्योगपतियों का एक वर्ग बम्बई (वर्तमान मुम्बई) में एकत्रित
हुआ। इस समूह ने देश में नियोजित अर्थव्यवस्था को चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया। इसे ‘बॉम्बे प्लान’ कहा जाता है। इस प्लान की इच्छा थी कि सरकार औद्योगिक व अन्य आर्थिक निवेश के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए।

→ बजट-सरकारी आय-व्यय का वार्षिक वितरण बजट कहलाता है।

→ गैर-योजना व्यय-गैर-योजना व्यय में वार्षिक आधार पर दैनंदिनी मदों पर खर्च किया जाता है। यह केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के बजट का हिस्सा होता है।

→ योजना व्यय-केन्द्र सरकार और सभी राज्य सरकारों के बजट का दूसरा हिस्सा योजना व्यय का होता है। योजना में तय की गई प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए इसे पाँच वर्ष की अवधि में खर्च किया जाता है।

→ केरल मॉडल केरल में विकास और नियोजन के लिए जो रास्ता चुना गया उसे ‘केरल मॉडल’ कहा जाता है। इस मॉडल में शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि सुधार, कारगर खाद्य वितरण तथा गरीबी उन्मूलन पर बल दिया जाता है।

→ हरित क्रान्ति-हरित क्रान्ति से आशय कृषि उत्पादन में होने वाली उस भारी वृद्धि से है जो कृषि की नयी नीति अपनाने के कारण हुई। ‘हरित क्रान्ति’ में सरकार ने उच्च गुणवत्ता के बीज, उर्वरक, कीटनाशक तथा बेहतर सिंचाई सुविधा बड़े अनुदानित मूल्य पर उपलब्ध कराना प्रारम्भ किया।

→ मिश्रित अर्थव्यवस्था-इस अर्थव्यवस्था में पूँजीवादी व समाजवादी अर्थव्यवस्था के गुणों का समावेश होता है। भारत की अर्थव्यवस्था ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ है।

→ ऑपरेशन फ्लड-सन् 1970 में ऑपरेशन फ्लड के नाम से एक ग्रामीण विकास कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ था। ऑपरेशन फ्लड में सहकारी दुग्ध उत्पादकों को उत्पादन और विपणन के एक राष्ट्रव्यापी तन्त्र को जोड़ा गया।

→ वर्गीज कुरियन–’मिल्कमैन ऑफ इण्डिया’ के नाम से प्रसिद्ध वर्गीज कुरियन ने ‘गुजरात सहकारी दुग्ध एवं विपणन परिसंघ’ के विकास में मुख्य भूमिका निभाई और अमूल की स्थापना की।

→ पी० सी० महालनोबिस–अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के विख्यात वैज्ञानिक एवं सांख्यिकीविद्। इन्हें भारत की दूसरी पंचवर्षीय योजना का योजनाकार माना जाता है। ये तीव्र औद्योगीकरण एवं सार्वजनिक क्षेत्र की सक्रिय भूमिका के समर्थक थे।

→ जे० सी० कुमारप्पा-इन्होंने गांधीवादी आर्थिक नीतियों को लागू करने की कोशिश की तथा योजना आयोग के सदस्य के रूप में योजना प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लिया।

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Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 11 एक दल के प्रभुत्व का दौर

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 11 एक दल के प्रभुत्व का दौर

→ स्वतन्त्र भारत का जन्म अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में हुआ था। देश के समक्ष प्रारम्भ से ही राष्ट्र-निर्माण की चुनौती थी।

→ देश को राष्ट्र-निर्माण की चुनौती के साथ-साथ लोकतन्त्र की स्थापना की चुनौती का सामना भी करना पड़ रहा था।

→ भारतीय राजनेताओं ने लोकतन्त्र की स्थापना हेतु समाज के विभिन्न समूहों में पारस्परिक एकता की भावना को विकसित करने का प्रयास किया।

→ देश में संविधान का निर्माणं 26 नवम्बर, 1949 को हुआ था तथा यह संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ।

→ जनवरी 1950 में देश के चुनाव आयोग का गठन किया गया जिसका कार्य देश में यथाशीघ्र प्रथम आम चुनाव कराना था। सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त बने।

→ प्रथम आम चुनाव में 17 करोड़ मतदाताओं द्वारा 3200 विधायकों तथा लोकसभा के लिए 489 सांसदों को चुना जाना था। इन मतदाताओं में केवल 15 प्रतिशत ही साक्षर थे। अतः इनको मतदान के विषय में जानकारी देना एक महत्त्वपूर्ण समस्या थी।

→ प्रथम आम चुनाव अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 के मध्य सम्पन्न हुए।

→ प्रथम आम चुनाव को सन् 1952 का चुनाव भी कहा जाता है क्योंकि देश के अधिकांश भागों में मतदान सन् 1952 में ही हुआ था।

→ भारत ने सम्पूर्ण विश्व को यह दिखा दिया कि लोकतान्त्रिक ढंग से चुनाव निर्धनता एवं अशिक्षा के वातावरण में भी कराए जा सकते हैं।

→ प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस को आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त हुई।

→ कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा के चुनावों में भी भारी जीत प्राप्त की।

→ देश का प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू को बनाया गया।

→ हमारे देश की चुनाव प्रणाली में ‘सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत’ के तरीके को अपनाया गया है।

→ कांग्रेस का जन्म सन् 1885 ई० में हुआ था।

→ कांग्रेस ने एक जनव्यापी राजनीतिक पार्टी का रूप ले लिया और राजनीतिक व्यवस्था में इसका वर्चस्व स्थापित हुआ।

→ कांग्रेस पार्टी में क्रान्तिकारी व शान्तिवादी, कंजरवेटिव व रेडिकल, गरमपन्थी व नरमपन्थी, दक्षिणपन्थी व वामपन्थी के साथ-साथ प्रत्येक
धारा के मध्यमार्गी शामिल थे।

→ कांग्रेस ने सबको साथ लेकर चलने के स्वभाव के कारण एक असाधारण शक्ति प्राप्त की।

→ चुनावी प्रतिस्पर्धाओं के प्रथम दशक में कांग्रेस ने शासक दल के साथ-साथ विपक्ष की भी भूमिका का निर्वाह किया। इस कारण भारतीय राजनीति के इस कालखण्ड को ‘कांग्रेस प्रणाली’ कहा जाता है।

→ स्वतन्त्रता के बाद के शुरुआती वर्षों में कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेताओं के मध्य पारस्परिक सम्मान का गहरा भाव था जो दलगत प्रतिस्पर्धाओं के तीव्र होने के कारण लगातार कम होता चला गया।

→ सन् 1957 के आम चुनाव में केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी। सम्पूर्ण विश्व में यह पहला अवसर था जब लोकतान्त्रिक चुनावों के माध्यम से कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी।

→ कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन सन् 1934 में कांग्रेस के भीतर युवा नेताओं की एक टोली ने किया था। कांग्रेस से सन् 1948 में अलग हुई यह पार्टी समाजवादी, लोकतान्त्रिक एवं समाजवाद की विचारधारा में विश्वास करती थी।

→ भारतीय जनसंघ का गठन सन् 1951 में हुआ। यह अपनी विचारधारा एवं कार्यक्रमों के कारण अन्य दलों से अलग था। यह दल ‘एक देश, एक संस्कृति व एक राष्ट्र’ के विचार पर बल देता था।

→ लोकतन्त्र-शासन की वह प्रणाली जिसमें जनता स्वयं प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से अपने प्रतिनिधियों द्वारा सम्पूर्ण जनता के हित को दृष्टि में रखकर शासन करती है। इसे प्रजातन्त्र या जनतन्त्र भी कहा जाता है।

→ नायक पूजा-नायक पूजा चापलूसी का वह रूप है जिसमें किसी व्यक्ति विशेष योग्यता के न होते हए भी उसकी पूजा की जाती है।

→ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस-सन् 1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लोक प्रचलित नाम कांग्रेस पार्टी था और इस पार्टी को स्वाधीनता संग्राम की विरासत हासिल थी।

→ हित समह-समाज के किसी विशेष हिस्से अथवा समह को बढावा देने वाले संगठन।

→ राजनीतिक दल राजनीतिक दल लोगों का समूह होता है जो चुनाव लड़ने एवं सरकार में राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से कार्य करता है।

→ इतिहास का सबसे बड़ा जुआ-भारत में सार्वभौम वयस्क मताधिकार पर प्रारम्भ हुआ यह कार्य अपने आप में एक बड़ा जोखिम भरा प्रयोग था। इसी कारण एक भारतीय सम्पादक ने इसे ‘इतिहास का सबसे बड़ा जुआ’ करार दिया।

→ विरोधी दल-विपक्षी/विरोधी दल से आशय सत्तारूढ़ दल के बाद दूसरे मुख्य दल से है। यह अस्थायी रूप से ही अल्पमत में होता है।

→ मुक्ति संघर्ष—सन् 1957 में केरल में सत्ता से बेदखल होने से कांग्रेस पार्टी ने निर्वाचित सरकार के खिलाफ ‘मुक्ति संघर्ष’ छेड़ दिया। वहाँ कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी थी।

→ गठबन्धन-जब किसी बहुदलीय व्यवस्था में अनेक पार्टियाँ चुनाव लड़ने एवं सत्ता में आने के लिए आपस में हाथ मिला लेती हैं तो इसे गठबन्धन कहते हैं।

→ सत्तारूढ़ दल-वह राजनीतिक दल जिसकी सरकार होती है।

→ बोल्शेविक क्रान्ति-रूस में ‘रशियन सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी’ मतभेद हो जाने के कारण दो गुटों में विभक्त हो गई। बहुसंख्यक गुट ‘बोल्शेविक’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। बोल्शेविकों के नेता लेनिन थे।

→ मौलाना अबुल कलाम आजाद-ये स्वतन्त्र भारत के प्रथम शिक्षाशास्त्री थे। इन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतिपादन किया।

→ राजकुमारी अमृतकौर-स्वतन्त्र भारत की प्रथम स्वास्थ्य मन्त्री। इन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लिया।

→ आचार्य नरेन्द्र देव-कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक। इन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लिया तथा कई बार जेल भी गए।

→ पं. जवाहरलाल नेहरू-स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री। इनके नेतृत्व में ही कांग्रेस ने प्रथम आम चुनाव में विजय प्राप्त की थी।

→ बाबा साहब भीमराव रामजी अम्बेडकर-संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्षा इन्होंने दलितों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष किया।

→ दीनदयाल उपाध्याय-भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य। इन्होंने समग्र मानवतावाद का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

→ सी० राजगोपालाचारी-कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व साहित्यकार। ये स्वतन्त्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल रहे।

→ श्यामाप्रसाद मुखर्जी-भारतीय जनसंघ के संस्थापक। स्वतन्त्रता के बाद नेहरू के प्रथम मन्त्रिमण्डल में मन्त्री रहे।

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Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 10 राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 10 राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ

→ 14-15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को भारत स्वतन्त्र हुआ।

→ स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने इस रात (14-15 अगस्त, 1947) संविधान सभा के एक विशेष सत्र को सम्बोधित किया था। उनके द्वारा दिया गया यह प्रसिद्ध भाषण ‘भाग्यवधू से चिर-प्रतीक्षित भेंट’ या ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ के नाम से जाना जाता है।

→ स्वतन्त्रता प्राप्ति के साथ ही देश का विभाजन दो राष्ट्रों-भारत और पाकिस्तान में हुआ।

→ स्वतन्त्र भारत के समक्ष निम्नलिखित चुनौतियाँ (बाधाएँ) थीं –

  1. भारत की क्षेत्रीय अखण्डता को बनाए रखना,
  2. लोकतान्त्रिक व्यवस्था को सफलतापूर्वक लागू करना,
  3. आर्थिक विकास तथा गरीबी को समाप्त करने हेतु नीति-निर्धारित करना,
  4. शरणार्थियों का पुनर्वास करना।

→ स्वतन्त्रता के तुरन्त पश्चात् राष्ट्र-निर्माण की चुनौती सबसे प्रमुख चुनौती थी। अत: राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा का प्रश्न सबसे प्रमुख चुनौती के रूप में उभरकर सामने आया।

→ खान अब्दुल गफ्फार खाँ जिन्हें ‘सीमान्त गांधी’ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त थी, पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त के निर्विवाद नेता थे तथा ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त’ के विरोध में थे।

→ ‘ब्रिटिश इण्डिया’ के मुस्लिम बहुल प्रान्त पंजाब और बंगाल के अनेक हिस्से बहुसंख्यक गैर-मुस्लिम आबादी वाले थे। अत: फैसला हुआ कि इन दोनों प्रान्तों में भी विभाजन धार्मिक बहुसंख्यकों के आधार पर होगा। पंजाब और बंगाल का विभाजन देश के बँटवारे की सबसे बड़ी त्रासदी साबित हुआ।

→ पहले जिसे पूर्वी बंगाल कहा जाता था, वही आज बंगलादेश है। इसी कारण वर्तमान में भारत के बंगाल को ‘पश्चिमी बंगाल’ कहा जाता है।

→ अल्पसंख्यकों की समस्या विभाजन की सबसे बड़ी कठिनाई थी। सीमा के दोनो तरफ ‘अल्पसंख्यक’ थे।

→ विभाजन के परिणामस्वरूप एक स्थान की आबादी दूसरे स्थान पर जाने को मजबूर हुई। आबादी का यह स्थानान्तरण आकस्मिक,अनियोजित तथा त्रासदी से पूर्ण था। मानव इतिहास के अब तक ज्ञात स्थानान्तरणों में से यह एक था।

→ बँटवारे के फलस्वरूप शरणार्थियों की समस्या उत्पन्न हो गयी। लाखों लोग बेघर हो गए एवं लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत आए जिनको पुनर्वास की समस्या का सामना करना पड़ा।

→ बँटवारे के परिणामस्वरूप विरासत के रूप में हमें जो दूसरी सबसे बड़ी समस्या मिली थी, वह थी रजवाड़ों (रियासतों) का स्वतन्त्र भारत में विलय करना।

→ स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व भारत दो भागों में विभक्त था। एक भाग में ब्रिटिश प्रभुत्व वाले भारतीय प्रान्त थे – तथा दूसरे भाग में देसी रजवाड़े।

→ ब्रिटिश सरकार ने भारतीय उपमहाद्वीप की 565 देसी रियासतों को यह अधिकार प्रदान कर दिया था कि वे भारत अथवा पाकिस्तान में स्वेच्छा से शामिल हो जाएँ या अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रखें।

→ देसी रियासतों की जनता संविधान सभा में प्रतिनिधित्व एवं राजनीतिक अधिकारों की आकांक्षा प्रकट कर रही थी, कुछ देसी रियासतों के शासक महत्त्वांकाक्षी थे, जो अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रखने के लिए कृत संकल्प थे।

→ पाकिस्तान राष्ट्र के निर्माता मुहम्मद अली जिन्ना देसी रियासतों को पाकिस्तान में मिलने के लिए प्रलोभित कर रहे थे। ऐसी विषम परिस्थितियों में अन्तरिम सरकार के गृहमन्त्री सरदर वल्लभभाई पटेल ने साहस व धैर्य के साथ भारत के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया।

→ सरदार पटेल ने देसी रियासतों की भौगोलिक, आर्थिक स्थिति एवं प्रजा की इच्छाओं को दृष्टि में रखकर नीतिगत कार्य किया और अपनी कुशल व शीघ्र कार्यशैली के फलस्वरूप 15 अगस्त, 1947 से पूर्व ही कश्मीर, हैदराबाद एवं जूनागढ़ को छोड़कर अन्य सभी देसी रियासतों को भारत में शामिल होने के पक्ष में कर लिया।

→ जूनागढ़ रियासत का शासक पाकिस्तान में शामिल होना चाहता था, परन्तु जूनागढ़ रियासत की जनता भारत में शामिल होने के पक्ष में थी। ऐसी स्थिति मे जनता के डर से जूनागढ़ का शासक पाकिस्तान भाग गया तथा जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय हो गया।

→ हैदराबाद का शासक (निजाम) अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रखना चाहता था। भारत सरकार ने हैदराबाद पर बल प्रयोग किया। अन्तत: हैदराबाद के निजाम ने विवश होकर सन् 1948 में भारतीय संघ में अपने को सम्मिलित कर लिया।

→ कश्मीर रियासत के राजा हरिसिंह ने भी प्रारम्भ में अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रखने का निश्चय किया,परन्तु पाकिस्तान ने जब बलात् कश्मीर पर अधिकार करने का प्रयास किया और पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया तो महाराज हरिसिंह ने भारतीय संघ में सम्मिलित होने एवं सैन्य सहायता की माँग भारत सरकार से की।

→ अन्तत: 26 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने औपचारिक रूप से भारतीय संघ में अपने को शामिल कर लिया।

→ भारतीय प्रान्तों की आन्तरिक सीमाओं को तय करने की चुनौती भी देश के समक्ष थी। केन्द्र सरकार ने भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया।

→ सन् 1953 में केन्द्र सरकार ने राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया। इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर सन् 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित किया गया। इस आधार पर 14 राज्य व 6 केन्द्रशासित प्रदेश बनाए गए। इस अधिनियम में राज्यों के पुनर्गठन का आधार भाषा को बनाया गया।

→ ट्रिस्ट विद डेस्टिनी-स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने 14-15 अगस्त,
1947 की मध्यरात्रि को संविधान सभा के एक विशेष सत्र को सम्बोधित किया था। उनका यह प्रसिद्ध भाषण ‘भाग्यवधू से चिर-प्रतीक्षित भेंट’ या ‘ट्रिस्ट विद् डेस्टनी’ के नाम से जाना जाता है।

→ लोकतान्त्रिक संविधान-लोकतान्त्रिक संविधान में उन नियमों का संग्रह किया जाता है जिनके आधार . पर समस्त नागरिकों के साथ समानता का व्यवहार किया जाता है।

→ राज्य के नीति-निदेशक सिद्धान्त-राज्य के नीति-निदेशक सिद्धान्त संविधान के चौथे भाग में वर्णित हैं। ये सिद्धान्त संघ और राज्यों की सरकार के लिए शासन के सिद्धान्त निश्चित करते हैं। इन सिद्धान्तों का उद्देश्य भारत में आर्थिक व सामाजिक लोकतन्त्र की स्थापना करना है।

→ द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त-द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त की बात मुस्लिम लीग ने की थी। इस सिद्धान्त के अनुसार भारत किसी एक कौम (जाति) का नहीं बल्कि ‘हिन्दू’ और ‘मुसलमान’ नाम की दो कौमों का देश था और इसी कारण मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए एक अलग देश अर्थात् पाकिस्तान की मांग की थी।

→ साम्प्रदायिकता-अपने सम्प्रदाय को दूसरे से ऊँचा समझना तथा दूसरे सम्प्रदाय वालों से घृणा करना एवं येन-केन प्रकारेण हानि पहुँचाना साम्प्रदायिकता कहलाता है।

→ धर्मनिरपेक्ष राज्य-धर्मनिरपेक्ष राज्य से आशय एक ऐसे राज्य से है जो धर्म के आधार पर नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं करता तथा उसका दृष्टिकोण सर्वधर्म समभाव होता है। भारतीय संविधान द्वारा देश में धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की गयी।

→ रजवाड़ा/रियासत-ब्रिटिश इण्डिया में छोटे-बड़े आकार के कुछ और राज्य थे। इन्हें रजवाड़ा या रियासत कहा जाता था। रजवाड़ों पर राजाओं का शासन था।

→ अलगाववाद-जब एक समुदाय या सम्प्रदाय संकीर्ण भावना से ग्रस्त होकर अलग एवं स्वतन्त्र राज्य बनाने की माँग करे तो उसे अलगाववाद कहा जाता है।

→ सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से तात्पर्य मतदान करने की ऐसी प्रणाली से है जिसमें एक निश्चित अवस्था प्राप्त करने पर बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक नागरिक को चुनाव में मत देने का अधिकार दिया जाता है। भारत में वयस्क मताधिकार की आयु 18 वर्ष है।

→ महात्मा गांधी-सत्य-अंहिसा के पुजारी, भारत को अंग्रेजी दासता से स्वतन्त्र कराने में उल्लेखनीय योगदान दिया। 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे द्वारा दिल्ली में गोली मारकर इनकी हत्या कर दी गयी।

→ पं० जवाहरलाल नेहरू-स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री बने। इन्होंने 14-15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को संविधान सभा के एक विशेष सत्र को सम्बोधित किया। इनका यह प्रसिद्ध भाषण ‘ट्रिस्ट विद् डेस्टिनी’ के नाम से जाना जाता है।

→ सरदार वल्लभभाई पटेल-स्वतन्त्र भारत के प्रथम उप-प्रधानमन्त्री व प्रथम गृहमन्त्री। इनके नेतृत्व में ही देसी रियासतों का भारत में विलय हुआ।

→ मुहम्मद अली जिन्ना-पाकिस्तान के निर्माता। इन्होंने भारत विभाजन में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया।

→ खान अब्दुल गफ्फार खाँ-‘सीमान्त गांधी’ के नाम से प्रसिद्ध। द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त के विरोधी थे। ये पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त के निर्विवाद नेता थे।

→ फैज अहमद फैज-प्रसिद्ध कवि। विभाजन के बाद पाकिस्तान में ही रहे। ‘नक्शे फरियादी’, ‘दस्त-ए-सबा’ तथा ‘जिन्दानामा’ इनके प्रमुख कविता संग्रह थे।

→ अमृता प्रीतम-पंजाबी भाषा की प्रमुख कवयित्री और कथाकार। जीवन के अन्तिम समय तक पंजाबी की साहित्यिक पत्रिका ‘नागमणि’ का सम्पादन किया।

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Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 9 वैश्वीकरण

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 9 वैश्वीकरण

→ ‘वैश्वीकरण’ शब्द का प्रयोग अधिकांशतया सटीक अर्थों में नहीं होता।

→ एक अवधारणा के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात है—प्रवाह।

→ वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधारणा है। इसके राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक आयाम हैं।

→ वैश्वीकरण की प्रवृत्ति 20वीं सदी के अन्त में प्रबल हुई तथा 21वीं शताब्दी के प्रारम्भ में इसने वास्तविक आकार ग्रहण किया।

→ वैश्वीकरण प्रत्येक अर्थ में सकारात्मक नहीं होता विश्व में इसके दुष्प्रभाव भी दिखाई देते हैं।

→ इसका एक दुष्प्रभाव यह है कि वैश्वीकरण से राज्य की क्षमता में कमी आती है।

→ कुछ अर्थों में वैश्वीकरण के फलस्वरूप राज्य की शक्ति में वृद्धि भी हुई है।

→ वैश्वीकरण के आर्थिक प्रवाह को ‘आर्थिक वैश्वीकरण’ के नाम से जाना जाता है।

→ वैश्वीकरण के कारण विश्व के अलग-अलग भागों में वहाँ की सरकारों ने एक जैसी आर्थिक नीतियों को अपनाया है, लेकिन विश्व के विभिन्न भागों में इसके अलग-अलग परिणाम सामने आए हैं।

→ कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व के पुनः उपनिवेशीकरण की संज्ञा दी है।

→ आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं के समर्थकों का तर्क है कि इससे समृद्धि बढ़ती है, व्यापार में वृद्धि होती है जिनका सम्पूर्ण विश्व को लाभ मिलेगा।

→ वैश्वीकरण के मध्यमार्गी समर्थकों का मत है कि वैश्वीकरण ने हमारे समक्ष चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं जिनका सजग होकर पूरी तरह बुद्धिमानी से सामना करना चाहिए।

→ वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता लाता है, लेकिन इस सांस्कृतिक समरूपता में विश्व संस्कृति के नाम पर शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति थोपी जा रही है। वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव का सकारात्मक पक्ष यह है कि कभी-कभी बाहरी प्रभावों से हमारी पसन्द-नापसन्द का दायरा बढ़ता है तो कभी इनमें परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार भी होता है।

→ वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव के दो पहलू हैं-(1) सांस्कृतिक समरूपता, एवं (2) सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण।

→ भारत में सन् 1991 में वित्तीय संकट से उबरने एवं उच्च आर्थिक वृद्धि दर प्राप्त करने के लिए आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई।

→ भारत में वैश्वीकरण का विरोध अनेक क्षेत्रों में हो रहा है। इनमें वामपन्थी राजनीतिक दल, इण्डियन सोशल फोरम, औद्योगिक श्रमिक एवं किसान संगठन आदि शामिल हैं।

→ वैश्वीकरण-विचार, पूँजी, वस्तु.एवं सेवाओं का विश्वव्यापी प्रवाह वैश्वीकरण कहलाता है।

→ बहुराष्ट्रीय निगम-वह कम्पनी जो एक से अधिक देशों में एक-साथ अपनी आर्थिक गतिविधियाँ (पूँजी निवेश, उत्पादन, वितरण अथवा व्यापार इत्यादि) चलाती है।

→ सांस्कृतिक समरूपता-इसका तात्पर्य विश्व संस्कृति के नाम पर पश्चिमी संस्कृति थोपी जा रही है या शेष विश्व पर तीव्रता से अपना प्रभाव छोड़ रही है।

→ सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण-वैश्वीकरण से प्रत्येक संस्कृति अधिक अलग एवं विशिष्ट होती जा रही है। इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण कहते हैं।

→ मैकडोनाल्डीकरण-इसका तात्पर्य है कि संसार की विभिन्न संस्कृतियाँ अब अपने आप को प्रभुत्वशाली अमेरिकी ढर्रे पर ढालने लगी हैं।

→ संरक्षणवाद-वह विचारधारा जो उदारीकरण तथा वैश्वीकरण का विरोध करती है और देशी उद्योगों एवं उत्पादित वस्तुओं को विदेशी सामानों की प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए चुंगी तथा तटकर इत्यादि का पक्ष लेती है।

→ विश्व व्यापार संगठन—एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन जो विभिन्न देशों के मध्य व्यापार को प्रोन्नत करने हेतु गठित किया गया, जिसका उद्देश्य बिना किसी भेदभाव के समान रूप से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना है।

→ व्यापार-उत्पादकों से उपभोक्ताओं तक वस्तुओं का प्रवाह, व्यापार कहलाता है।

→ व्यापार सन्तुलन-किसी देश के कुल आयात तथा निर्यात मूल्यों का अन्तर व्यापार सन्तुलन है।

Bihar Board Class 12th Political Science Notes

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

Bihar Board Class 12th Political Science Notes Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

→ समकालीन विश्व राजनीति में पर्यावरण प्रदूषण के खतरे एवं उसके प्रभावों की वजह से पर्यावरण की चिन्ता प्रमुख मुद्दा है।

→ सम्पूर्ण विश्व में कृषि योग्य भूमि में अब कोई वृद्धि नहीं हो रही है बल्कि उर्वरता कम होती जा रही है।

→ पर्यावरण मुद्दों में ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन छिद्र की समस्या, समुद्र तटीय क्षेत्रों का प्रदूषण इत्यादि शामिल हैं।

→ प्राकृतिक वन से जलवायु व जल चक्र सन्तुलित बना रहता है।

→ सम्पूर्ण विश्व में समुद्र तटीय क्षेत्रों में प्रदूषण भी निरन्तर बढ़ रहा है जिससे समुद्री पर्यावरण की गुणवत्ता में निरन्तर गिरावट हो रही है।

→ विश्व राजनीति में पर्यावरण के मुद्दे ने 1960 के दशक में राजनीतिक स्वरूप हासिल किया, जिसके समाधान हेतु विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास हुए, जिनमें सन् 1992 का ‘पृथ्वी सम्मेलन’ प्रमुख है।

→ सन् 1992 में पृथ्वी सम्मेलन ब्राजील के रियो-डी-जेनेरियो में हुआ।

→ रियो सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता एवं वानिकी के सम्बन्ध में कई नियमों का निर्धारण किया गया। इसमें एजेण्डा-21 के तहत विकास के कुछ तौर-तरीके भी सुझाए गए।

→ विश्व के कुछ क्षेत्र किसी एक देश के सम्प्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं। इनका प्रबन्धन साझे तौर पर अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है। ऐसे क्षेत्रों में पृथ्वी का वायुमण्डल, अण्टार्कटिका, समुद्री सतह एवं बाह्य अन्तरिक्ष शामिल हैं।

→ वैश्विक सम्पदा की सुरक्षा के लिए कई समझौते हो चुके हैं जिनमें अण्टार्कटिका सन्धि (1959), माण्ट्रियल न्यायाचार (प्रोटोकॉल 1987)
एवं अण्टार्कटिका पर्यावरण न्यायाचार (1991) आदि हैं।

→ कार्बन डाइ-ऑक्साइड, मीथेन तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैसें वैश्विक ताप वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) में अहम भूमिका का निर्वाहन करती हैं।

→ विश्व में बढ़ते औद्योगीकरण के दौर को वर्तमान वैश्विक ताप वृद्धि एवं जलवायु परिवर्तन का जिम्मेदार माना जाता है।

→ भारत ने पर्यावरण सम्बन्धी क्योटो प्रोटोकॉल पर सन् 2002 में हस्ताक्षर कर दिए हैं।

→ भारत के अनुसार ग्रीन हाऊस गैसों के रिसाव की ऐतिहासिक एवं वर्तमान जवाबदेही विकसित देशों की है।

→ भारत में बाँधों के खिलाफ नर्मदा बचाओ आन्दोलन तथा वनों की रक्षा हेतु चिपको आन्दोलन प्रमुख हैं।

→ विश्व राजनीति में जल एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। विश्व के कुछ भागों में स्वच्छ जल की लगातार कमी होती जा रही है तथा विश्व के प्रत्येक भाग में स्वच्छ जल मौजूद नहीं है।

→ मूलवासियों का प्रश्न पर्यावरण, संसाधन एवं राजनीति को एक साथ जोड़ देता है।

→ संयुक्त राष्ट्र संघ की परिभाषा के अनुसार मूलवासी ऐसे लोगों के वंशज है जो किसी मौजूदा देश में बहुत दिनों से निवास करते हैं।

→ सन् 1975 में ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इण्डिजिनस पीपल’ का गठन किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सर्वप्रथम इस परिषद् को परामर्शदात्री परिषद् का दर्जा दिया गया।

→ पर्यावरण-आस-पास की परिस्थिति अथवा परिवेश जिसमें मानव रहता है, वस्तुएँ मिलती हैं तथा उनका विकास होता है। पर्यावरण में प्राकृतिक व सांस्कृतिक दोनों के तत्त्वों का समावेश होता है।

→ प्राकृतिक संसाधन-प्रकृति से प्राप्त उपजाऊ मिट्टी, अनुकूल जलवायु, वनस्पति, जल, खनिज एवं ईंधन, सौर ऊर्जा, मछली एवं वन्य प्राणी इत्यादि विभिन्न उपहार।

→ विश्व की साझी विरासत-वह प्राकृतिक प्रदेश अथवा भू-भाग या सम्पदा जिस पर सम्पूर्ण मनुष्य जाति या विश्व का अधिकार हो, उदाहरणार्थ-अण्टार्कटिका तथा पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्र तथा बाह्य अन्तरिक्षा

→ मूलवासी–जनता का वह भाग जो किसी वन प्रदेश अथवा अन्य भू-भाग में आदिकाल से निवास करते चले आ रहे हों, वह सम्बन्धित क्षेत्र के मूलवासी कहलाते हैं।

→ यू०एन०एफ०सी०सी०सी०-यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज, जिसका प्रकाशन सन् 1992 में हुआ। ये जलवायु के परिवर्तन से सम्बन्धित संयुक्त राष्ट्र संघ के नियम हैं।

→ संरक्षण-पर्यावरण के साथ-साथ उसका प्रभावी उपयोग तथा प्राकृतिक संसाधनों का बिना किसी बर्बादी के उपयोग करना संरक्षण कहलाता है।

→ प्रदूषण—यह वह तत्त्व है जो जीवित जीवों या उनके द्वारा निर्मित ढाँचों को हानि पहुँचाता ।

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