Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Short Answer Type Part 5

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Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Short Answer Type Part 5

प्रश्न 1.
What are the methods of Redemption of Debentures ?
(ऋणपत्र शोधन की क्या विधियाँ हैं ?)
उत्तर:
ऋणपत्र के शोधन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं-

  • एक निश्चित अवधि के बाद ऋणपत्रों की समस्त राशि का एक साथ भुगतान करके शोधन।
  • ऋणपत्रों का किश्तों में लॉटरी विधि द्वारा कुछ वर्षों में शोधन।
  • ऋणपत्रों को अंशों में परिवर्त्तिन करके शोधन।
  • खुले बाजार में अपने ही ऋणपत्रों का क्रय करके शोधन।

प्रश्न 2.
आगम एवं शोधन खाते की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
आगम एवं शोधन खाते की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार है-

  • आगम एवं शोधन खाता एक वास्तविक खाता है।
  • यह खाता रोकड़ आधार पर बनाया जाता है।
  • इस खाते का डेबिट पक्ष अधिक रहने पर अन्तर की राशि अंतिम रोकड़ शेष या क्रेडिट पक्ष अधिक रहने पर अंतर की राशि बैंक अधिविकर्ष है।

प्रश्न 3.
What is Ratio analysis ?
(अनुपात विश्लेषण क्या है ?)
उत्तर:
अनुपात एक ऐसा संख्यात्मक सम्बन्ध प्रदर्शित करता है जो वित्तीय विवरणों के दो या दो से अधिक मदों के बीच मापा जाता है। हंट, विलियम तथा डोनाल्डसन के अनुसार, “अनुपात वित्तीय विवरणों या लेखांकन से प्राप्त संख्याओं के सम्बन्ध अंकगणितीय रूप में प्रदर्शित करने का साधन मात्र है।”

प्रश्न 4.
How are the various activities classified according to AS- 3 (Revised) While preparing cash flow Statements ?
(रोकड़ बहाव विवरण बनाते समय लेखांकन मानक-3 (संशोधित) के अनुसार विभिन्न क्रियाकलापों का किस प्रकार वर्गीकरण किया जाता है?)
उत्तर:
लेखांकन मानक-3 (संशोधित) के अनुसार रोकड़ बहाव विवरण बनाते समय विभिन्न क्रियाकलापों का वर्गीकरण निम्न प्रकार है-

  1. परिचालन क्रियाओं से रोकड़ बहाव
  2. विनियोजन क्रियाओं से रोकड़ बहाव
  3. वित्तपूर्ति क्रियाओं से रोकड़ बहाव।

प्रश्न 5.
What is Reserve Capital ? Does it differ from Capital Reserve ?
(आरक्षित पूँजी किसे कहते हैं ? क्या यह पूँजी संचय से भिन्न होती है ?)
Or, Differentiate between Reserve Capital and Capital Reserve.
अथवा, (आरक्षित पूँजी और पूँजीगत संचय में अन्तर स्पष्ट करें।)
उत्तर:
आरक्षित पूँजी व माँगी हुई पूँजी का वह भाग है जो समापन के अतिरिक्त अन्य किसी भी दशा में मंगाया नहीं जाएगा। आरक्षित पूँजी और पूँजीगत संचय में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित है-

  • अनिवार्य- आरक्षित पूँजी का निर्माण करना अनिवार्य नहीं है जबकि पूँजीगत लाभ हो तो इसका निर्माण करना अनिवार्य है।
  • विशेष प्रस्ताव- आरक्षित पूँजी के निर्माण के लिए कम्पनी द्वारा विशेष प्रस्ताव पास किया जाना चाहिए जबकि पूँजीगत संचय के निर्माण के लिए कोई प्रस्ताव पास करने की आवश्यकता नहीं होती है।
  • स्थिति विवरण में लेखा- आरक्षित पूँजी स्थिति विवरण में नहीं दिखाया जाता है जबकि . पूँजीगत संचय स्थिति विवरण के दायित्व पक्ष में संचय तथा आधिक्य शीर्षक के अन्तर्गत दिखाया जाता है।
  • प्रयोग- आरक्षित पूँजी का प्रयोग कम्पनी के समापन की दशा में ही किया जा सकता है जबकि पूँजीगत संचय का प्रयोग कम्पनी के जीवन काल में ही पूँजीगत हानियों को पूरा करने में अथवा बोनस अंशों के निर्गमन में किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
Write the characteristics of Company.
(कम्पनी की विशेषताओं को लिखें।)
उत्तर:
कम्पनी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. पृथक् बैधानिक अस्तित्व (Separate Legal Entity)- कम्पनी एक कानूनी व्यक्ति है और इसका अस्तित्व इसके सदस्यों से पृथक् होता है। कम्पनी अपने नाम से सम्पत्तियों का क्रय-विक्रय कर सकती है, इसके अलावा अपने नाम से बैंक में खाता खोल सकती है। इस प्रकार कम्पनी की विशेषता पृथक् वैधानिक अस्तित्व है।

2. सार्वमुद्रा (Common Seal)- कम्पनी का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता है। अतः यह अपने एजेन्टों के माध्यम से कार्य करती है, जिन्हें संचालक (Director) कहते हैं। संचालक द्वारा तैयार किए गए सभी प्रलेखों पर कम्पनी की सार्वमुद्रा अंकित होनी चाहिए।

3. अंशों की हस्तान्तरणीयता (Transferability of Shares)- कम्पनी की पूँजी हिस्से में विभाजित होती है और प्रत्येक हिस्से को अंश कहते हैं। यह अंश कुछ शर्तों के अन्तर्गत स्वतंत्र रूप से हस्तान्तरणीय होती है।

4. सीमित दायित्व (Limited Liability)- कम्पनी के अंशधारी का दायित्व उसके अंश के अदत्त मूल्य तक ही सीमित होता है।

प्रश्न 7.
What is forfeiture of share when and how the share of a company can be Forfeited ?
(अंशों को सब्न करने का ध्या अर्थ है ? अंशों को कब और कैसे जब्त किया जा सकता है ?)
उत्तर:
जब कोई अंशधारी आवंटन (Allotment) या किसी याचना की राशि का भुगतान नहीं करता है तो कम्पनी को ऐसे अंशधारी के अंशों को जब्त करने का अधिकार होता है। अंशों को जब्त करने से पूर्व कम्पनी उस अंशधारी को एक नोटिस भेजती है कि वह अपने अंशों पर बकाया राशि एक निश्चित समय के अन्दर ब्याज सहित भुगतान कर दे। इस सूचना में यह भी स्पष्ट लिखा होना चाहिए कि निर्धारित तिथि तक भुगतान न करने पर उसके अंशों का हरण कर लिया जाएगा। भुगतान करने के लिए सूचना में जो तिथि निर्धारित की जाए वह अंशधारी को सूचना मिलने के कम-से-कम 14 दिन बाद की होनी चाहिए। यदि नोटिस में निर्धारित तिथि तक भी भुगतान प्राप्त नहीं होता है तो उसके अंशों को जब्त कर लिया जाता है।

अंशों, को जब्त करते समय कम्पनी को अपने अन्तर्नियमों में वर्णित नियमों का ठीक पालन करना चाहिए। यदि अन्तर्नियमों में हरण के सम्बन्ध में नियम नहीं दिए हुए हैं तो कम्पनी अधिनियम की तालिका. ‘अ’ (Table A) में दिए हुए नियमों का पालन किया जाना चाहिए।

अंशं के जब्त होने पर अंशधारी द्वारा उन अंशों पर अब तक चुकाई गई राशि कम्पनी जब्त कर लेती है और इसे अंश अपहरित खाते (Share forfeiture A/c) में क्रेडिट कर देती है।

प्रश्न 8.
What is a debenture ? What are the types of debenture?
(ऋणपत्र किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?)
उत्तर:
भारतीय कम्पनी अधिनियम की धारा 2 (12) के अनुसार, “ऋणपत्र में ऋणपत्र स्टॉक, बॉण्ड या कम्पनी द्वारा जारी की गई ऐसी और कई प्रतिभूतियाँ सम्मिलित हैं, चाहे उनसे कम्पनी की सम्पत्तियों पर प्रभार उत्पन्न होता है या नहीं”। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कम्पनी द्वारा निर्गमित किया गया ऋणपत्र एक सर्टीफिकेट के प्रारूप में होता है जिस पर कम्पनी की सार्वमुद्रा (Common seal) अंकित होती है। अतः ऋणपत्र कम्पनी द्वारा लिये गये ऋण का एक लिखित प्रमाण है क्योंकि यह कम्पनी की सार्वमुद्रा के अधीन निर्गमित किये जाते हैं। ऋणपत्र में निश्चित तिथि पर मूलधन के भुगतान की शर्ते और निश्चित दर से ब्याज के भुगतान की शर्ते भी लिखी हुई होती हैं। ऋणपत्र को कई भागों में बाँटा गया है, जो निम्नलिखित हैं-

  • रंक्षित ऋणपत्र
  • अरक्षित ऋणपत्र
  • रजिस्टर्ड ऋणपत्र
  • वाहक ऋणपत्र
  • शोध्य ऋणपत्र
  • अशोध्य ऋणपत्र
  • परिवर्तनशील ऋणपत्र।

प्रश्न 9.
What is Debenture Sinking fund and why is it created ?
(ऋणपत्र शोधन कोष क्या है और क्यों बनाया जाता है ?)
उत्तर:
ऋणपत्रों का शोधन करने के लिए काफी बड़ी मात्रा में धन राशि की आवश्यकता होती है। जिस वर्ष ऋणपत्रों का शोधन करना है उस वर्ष इतनी बड़ी राशि जुटाने में कम्पनी को काफी कठिनाई हो सकती है, अतः एक कम्पनी के लिए यह उचित रहता है कि वह ऋणपत्रों के शोधन के लिए लाभों से एक निश्चित राशि बचाती रहे। इसके लिए कम्पनियाँ ऋणपत्रों के निर्गमन के वर्ष से ही लाभों से एक निश्चित राशि ऋणपत्रों के भुगतान के लिए एक अलग रिजर्व में रखना शुरू कर देती है। इस रिजर्व को Sinking fund या ऋणपत्र शोधन कोष भी कहते हैं। Sinking fund की राशि को या तो व्यापार में ही प्रयोग किया जा सकता है या इसे व्यापार के बाहर किसी अन्य कम्पनी की प्रतिभूतियों को खरीदने के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

यदि इस कोष को अपने ही व्यापार में प्रयोग कर लिया जाए तो यह राशि कम्पनी की सम्पत्तियों, मशीनरी स्टॉक आदि में लग जाता है और बाद में ऋणपत्रों के शोधन के समय फिर नकद धनराशि इकट्ठा करना कठिन हो जाता है, अतः प्रायः कम्पनियाँ इस राशि को व्यवसाय के बाहर विक्रय योग्य प्रतिभूतियों में विनियोग कर देती हैं। इस प्रकार कम्पनियाँ प्रतिवर्ष एक निश्चित धनराशि लाभों में से निकाल कर व्यवसाय के बाहर प्रतिभूतियाँ खरीदने में विनियोग करती रहती हैं और इन प्रतिभूतियों पर जो प्रतिवर्ष ब्याज प्राप्त होता है उसे भी दुबारा प्रतिभूतियों में विनियोग कर दिया। जाता है।

प्रश्न 10.
What do you mean by issue of debenture at premium?
(ऋणपत्रों का प्रीमियम पर निर्गमन से आप क्या समझते हैं ?)
उत्तर:
जब कोई कम्पनी अपने ऋणपत्र अंकित मूल्य से अधिक पर निर्गमित करती है तो इस अधिक मूल्य को प्रीमियम कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि एक 100 रु. का ऋणपत्र 110 रु० में निर्गमित किया जाए तो 10 रु. प्रीमियम कहा जाएगा। ऐसा प्रीमियम पूँजीगत लाभ होता है क्योंकि यह कम्पनी की सामान्य व्यावसायिक क्रियाओं से अर्जित नहीं किया गया है। प्रीमियम खाते का उपयोग पूँजीगत हानियों जैसे अंशों एवं ऋणपत्रों के निर्गमन पर दी गई छूट, ऋणपत्रों के शोधन पर दिए गए प्रीमियम, प्रारम्भिक व्ययों, ख्याति, पेटेंट आदि को अपलिखित करने में किया जाता है।

अंश प्रीमियम खाते (Share Premium A/c) का नाम परिवर्तित होकर प्रतिभूति प्रीमियम खाता (Securities Premium A/c) हो चुका है। क्योंकि ऋणपत्र भी प्रतिभूति है अतः ऋणपत्र प्रीमियम को भी प्रतिभूति प्रीमियम खाते में क्रेडिट किया जाना चाहिए।

‘प्रतिभूति प्रीमियम खाते (Securities Premium A/c)’ को चिट्ठे के दायित्व पक्ष में रिजर्व तथा आधिक्य (Reserve and Surplus) शीर्षक के अन्तर्गत दिखाया जाता है।

प्रश्न 11.
What do you mean by issue of Debenture at discount?
(ऋणपत्रों का कटौती पर निर्गमन से आप क्या समझते हैं ?)
उत्तर:
जब किसी कम्पनी द्वारा अपने ऋणपत्र अंकित मूल्य से कम पर निर्गमित किए जाते हैं तो इसे कटौती पर निर्गमन कहते हैं। कम्पनी अधिनियम में ऋणपत्रों पर दी जाने वाली अधिकतम छूट पर कोई प्रतिबंध नहीं है। कटौती की राशि पूँजीगत हानि (Capital Loss) है। अत: इसे कम्पनी के चिट्ठे में सम्पत्ति पक्ष में ‘विविध व्यय’ (Miscellaneous) शीर्षक के अन्तर्गत दिखाया जाता है। कटौती की इस राशि को ऋणपत्रों के जीवन काल में ही पूँजीगत लाभों अथवा लाभ-हानि खाते से अपलिखित करना आवश्यक है।

कटौती क्योंकि हानि है, अतः कम्पनी की पुस्तकों में इसके लेखा “Discount on Debentures A/c” को डेबिट करके किया जाता है। कटौती का लेखा प्रायः आवंटन की प्रविष्टि में ही किया जाता है।

प्रश्न 12.
What do you mean by financial statement of a Company ?
(कम्पनी के वित्तीय विवरण से आप क्या समझते हैं ?)
उत्तर:
वित्तीय विवरणों से आशय दो.विवरणों से होता है, एक आय विवरण या लाभ-हानि खाता तथा दूसरा स्थिति विवरण या आर्थिक चिट्ठा। आय विवरण हानि या लाभ को प्रदर्शित करता है। जबकि स्थिति विवरण या आर्थिक चिट्ठा व्यापार की सम्पत्तियों, दायित्व तथा पूँजी को प्रदर्शित करता है।

वित्तीय विवरण से तात्पर्य किसी भी मौलिक विवरण से हो सकता है, जो किसी व्यवसाय या उद्योग के सम्बन्ध में आवश्यक वित्तीय सूचनाओं को प्रदर्शित करता हो। परन्तु वर्तमान काल में ‘वित्तीय विवरण’ के अन्तर्गत दो खातों या विवरणों को सम्मिलित किया जाता है जिन्हें लेखापालक किसी निश्चित अवधि के अन्त में तैयार करती है। ये दो विवरण हैं-आर्थिक चिट्ठा (जिसे वित्तीय स्थिति का विवरण भी कहते हैं) और लाभ-हानि खाता या आय विवरण (Income Statement) हाल ही में, व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा एक तीसरा विवरण भी तैयार किया जाने लगा है जिसे ‘आधिक्य ‘विवरण’ या ‘बचत लाभ विवरण’ के नाम से पुकारते हैं। पाश्चात्य देशों में एक चौथा विवरण भी तैयार किया जाने लगा है जिसे वित्तीय स्थिति में परिवर्तन का विवरण कहते हैं।

प्रश्न 13.
State the Meaning of Balance Sheet.
(आर्थिक चिट्ठा के अर्थ को बतलायें।)
उत्तर:
साधारण बोलचाल में, आर्थिक चिट्ठा को एक सन्तुलन-पत्र कहा जा सकता है जिसके अन्तर्गत एक तरफ सम्पत्तियों के मूल्यों और दूसरी तरफ दायित्वों एवं स्वामी-फण्ड (Owner’s fund) के मूल्यों को प्रदर्शित करके सन्तुलन (equality) लाया जाता है। हॉवर्ड (Howard) और अप्टन (Upton) के अनुसार, “The Balance Sheet is a statement which reports the property’s value owned by the enterprise and the claims of the creditors and owners against these properties.”

उपर्युक्त परिभाषा में प्रयुक्त ‘मूल्यों’ (values) की रकम वही होती है, जो प्रत्येक मद के व्यक्तिगत खातों की खतौनी और बाकी निकालने के बाद शेष बचती हैं। कुछ लोगों की यह मान्यता है कि लेखा-विधि की ‘जमा’ (Credit) ‘नाम’ (Debit) के बराबर होती है। इस सिद्धांत के कारण ही आर्थिक चिट्ठे के दोनों तरफ का योग बराबर होता है। परन्तु यह भावना भ्रमात्मक है। ऋण एवं दायित्व की तरह स्वामी फण्ड की रकम जड़ (rigid) प्रकृति की नहीं होती है। चूंकि सम्पत्तियों और ऋण एवं दायित्वों का अन्तर ही स्वामी-फण्ड के रूप में माना जाता है।

अतः इसका मूल्य सम्पत्तियों और ऋणपत्रों के मूल्यों के आधार पर परिवर्तित होता रहता है। इस प्रकार आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष के योग के बराबर दायित्व पक्ष के योग को लाने के लिए स्वामी-फण्ड का मूल्य घटता-बढ़ता रहता है। इस रूप में आर्थिक चिट्ठा व्यवसाय की सम्पत्तियों की प्रकृति एवं रकम, सभी दायित्वों की प्रकृति एवं रकम और शेष को स्वामी-फण्ड के रूप में उसकी किस्म एवं रकम को दर्शाता है।

प्रश्न 14.
What is Current Assets ?
(चालू सम्पत्तियाँ क्या हैं ?)
उत्तर:
चालू सम्पत्तियाँ (Current Assets)- एक सामान्य व्यावसायिक संस्था में चालू सम्पत्तियाँ वे सम्पत्तियाँ होती हैं, जो व्यवसाय में कार्यशील रूप में प्रयोग की जाती हैं और जिन्हें अल्पकाल में संचालन के दौरान नकद धन में परिवर्तित किया जा सकता है। अन्य शब्दों में, नकद धन से प्राप्त की गयी वे सम्पत्तियाँ, जिन्हें पुनः नकद धन में परिवर्तित किया जा सकता है, चालू सम्पत्तियाँ कहलाती हैं। साधारणतया यह चक्र (cycle) (नकद धन-सम्पत्ति-नकद धन) पूरा होने में एक वर्ष से अधिक समय नहीं लगता है। कुछ दशाओं में इससे अधिक समय भी लग सकता है। इस चक्र में चाहे कितना भी समय क्यों न लगे, हमेशा सम्पत्ति प्रयोग के आधार पर ही चालू सम्पत्तियों के रूप में वर्गीकरण करना चाहिए, न कि समय के आधार पर। एक विश्लेषक साधारणतया निम्नलिखित को चालू सम्पत्तियों के अन्तर्गत शामिल करता है-

  • रोकड़ हाथ में एक बैंक में
  • स्कन्ध
  • पुस्तकीय ऋण (Book Debts)
  • सरकारी प्रतिभूतियों में विनियोग
  • प्राप्य बिलं (Bills Receivable)
  • अग्रिम भुगतान

प्रश्न 15.
What do you mean by fixed Assets and Intangible Assets ?
(स्थायी सम्पत्तियाँ और अमूर्त सम्पत्तियाँ से आप क्या समझते हैं ?)
उत्तर:
स्थायी सम्पतियाँ (Fixed Assets)- स्थायी सम्पत्तियों से आशय उन सम्पत्तियों से होता है, जिनका क्रय व्यवसाय-संचालन में प्रयोग के लिए किया जाता है, न कि पुनर्विक्रय करके नकद धन प्राप्त करने के लिए। इस प्रकार की सम्पत्तियों का प्रयोग करके ही आय हेतु उत्पादन या वितरण का कार्य किया जाता है। स्थायी सम्पत्तियों में शामिल होने वाली कुछ प्रमुख सम्पत्तियाँ निम्न प्रकार हैं-

  • भूमि
  • भवन
  • यन्त्र
  • फर्नीचर एवं फिक्सचर्स।

अमूर्त सम्पत्तियाँ (Intangible Assets)- जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो रहा है कि सम्पत्तियाँ अमूर्त व अदृश्य होती हैं। इनको न देखा जा सकता है और न स्पर्श किया जा सकता है। इस प्रकार की सम्पत्तियों का वास्तविक मूल्य व्यवसाय की लाभार्जन शक्ति पर निर्भर होता है। इस प्रकार सम्पत्तियों के मूल्यांकन के सम्बन्ध में लेखापालक, वकील और प्रबन्धक मतभेद रखते हैं और विश्लेषण के ऊपर एक भारी बोझ पड़ता है। अमूर्त सम्पत्तियों में निम्न को शामिल करते हैं :

  • पेटेण्ट्स तथा ट्रेड मार्क्स (Patents and Trade Marks)
  • मुद्रण-अधिकार, सूत्र एवं लाइसेंस (Copyright, Formula and License)
  • ख्याति (Goodwill)

प्रश्न 16.
State the object of Analysis of Financial Statement.
(वित्तीय विवरणों के विश्लेषण के उद्देश्य को बतलायें।)
उत्तर:
यूँ तो प्रत्येक प्रयोगकर्ता अपने निजी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए वित्तीय विवरणों का विश्लेषण करता है, फिर भी विश्लेषण के कुछ सामान्य उद्देश्य निम्नलिखित हो सकते हैं-

  • आय सम्बन्धी विवरणों की सहायता से विभिन्न व्यावसायिक क्रियाओं की क्षमता एवं अर्जन शक्ति की जाँच करना।
  • एक व्यावसायिक संस्था के प्रबन्ध द्वारा निजी कार्यक्षमता एवं निष्पादन क्षमता का अनुमान लंगाना।
  • स्थिति विवरण की सहायता से व्यवसाय की अल्पकालीन व दीर्घकालीन शोधन-क्षमता का निर्धारण करना।
  • ऋण लेने वाली व्यावसायिक संस्था की वित्तीय स्थिति एवं देय क्षमता के विषय में ज्ञान प्राप्त करना।
  • व्यवसाय की भावी प्रगति एवं लाभार्जन शक्ति का निर्धारण करना।
  • संस्था की भावी सम्भावनाओं का अन्वेषण करना। .
  • समकक्ष उद्योग में कार्यरत अन्य इकाइयों के साथ संचालन-क्षमता सम्बन्धी तुलनात्मक अध्ययन करना।

प्रश्न 17.
वित्तीय विवरण क्या है ?
उत्तर:
वित्तीय विवरण प्रबन्धकीय निष्पादन की अच्छाई या बुराई बताते हैं अथवा प्रबन्ध कीय कुशलता की हीनता या श्रेष्ठता दर्शाते हैं या भावी उन्नति के विषय में संकेत देते हैं या सुदृढ़ वित्तीय स्थिति के प्रतीक हैं या असफलता के सूचक हैं-इन सभी तथ्यों का निर्माण करना प्रयोगकर्ता का कार्य होता है। वित्तीय विवरण संस्था से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्यों को अंकात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। ये अंकात्मक तथ्य मूल होते हैं; अपने आप किसी निष्कर्ष को नहीं बताते हैं। इसके लिए आवश्यक होता है कि रचना की तरह किसी वैज्ञानिक विधि का प्रयोग करके इन अंकात्मक तथ्यों से कहलाया जाए। जब प्रयोगकर्ता ऐसा प्रयास करता है तो उस क्रिया को ‘वित्तीय विवरण का निर्वचन’ कहते हैं।

प्रश्न 18.
रोकड़ प्रवाह विवरण क्या है ?
उत्तर:
रोकड़ प्रवाह विवरण एक ऐसा विवरण है जो रोकड तथा रोकड तुल्य में हए परिर्वतन को दर्शाता है। यह विवरण निर्धारित अवधि में निम्नलिखित को दर्शाता है-

  • परिचालन क्रियाओं से शुद्ध रोकड़ प्रवाह
  • निनियोग क्रियाओं से शुद्ध रोकड़ प्रवाह
  • वित्त-पूर्ति क्रियाओं से शुद्ध रोकड़ प्रवाह
  • रोकड़ प्रवाह एवं रोकड़ में शुद्ध परिवर्तन।

प्रश्न 19.
वसूली खाता तथा पूनर्मूल्यांकन खाता में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
वसूली खाता और पुनर्मूल्यांकन खाता में निम्नलिखित अन्तर है-
वसूली खाता:

  • फर्म के विघटन पर सबसे पहला काम फर्म की सम्पतियों का विक्रय तथा वसूली व दायित्वों का भुगतान करना होता है। इस कार्य के लिए फर्म की पुस्तकों में एक वसूली खाता खोला जाता है।

पुनर्मूल्यांकन खाता:

  • पुनर्मूल्यांकन खाता एक अवास्तविक खाता है जो सम्पतियों व दायित्वों के मूल्य में हुए परिवर्तन के कारण लाभ-हानि को दिखाता है।

प्रश्न 20.
अंशों के अधि-अभिदान क्या है ?
उत्तर:
प्रायः अच्छी कम्पनियों में जितने अंश आबंटन के लिए होते हैं उनसे अधिक आवेदन पत्र आ जाते हैं। इस स्थिति को अधि-अभिदान (Over subscription) कहते हैं। ऐसी दशा में कम्पनी को आवश्यकता से अधिक आवेदन राशि प्राप्त हो जाती है।

प्रश्न 21.
लाभ प्राप्ति अनुपात तथा त्याग अनुपात में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
लाभ प्राप्ति अनुपात और त्याग अनुपात में निम्नलिखित अन्तर है-
लाभ-प्राप्ति अनुपात:

  • लाभ-प्राप्ति अनुपात में परिवर्तन के परिणाम स्वरूप वर्तमान साझेदारें में से एक अथवा अधिक साझेदार अन्य साक्षेदारों के त्याग के हिस्से का कुछ हिस्सा प्राप्त (gain) कर लेते हैं। लाभ प्राप्ति के ऐसे अनुपात को लाभ-प्राप्ति अनुपात कहा जाता है।

त्याग अनुपात:

  • त्याग अनुपात की गणना का उद्देश्य क्षतिपूर्ति की वह राशि ज्ञात करना है जो लाभ-प्राप्ति करने वाला साझेदार अर्थात वह साझेदार जिसके हिस्से में परिवर्तन के फलस्वरूप वृद्धि हो गयी है। त्याग करने वाले साझेदार (अर्थात वह साझेदार जिसके हिस्से में परिवर्तन के फलस्वरूप कमी हो गयी है। को देगा। क्षति की ऐसी राशि ख्याति की आनुपातिक राशि के आधार पर दी जाती है।

प्रश्न 22.
अंशों की जब्ती क्या है ?
उत्तर:
जब कोई अंशधारी आवंटन या किसी याचना की राशि का भुगतान नहीं करता है तो कम्पनी को ऐसे अंशधारी के अंशों को जब्त करने का अधिकार होता है। अंशों को जब्त करने से पूर्व कम्पनी उस अंशधारी के अंशों को जब्त करने का अधिकार होता है। अंशों को जब्त करने से पूर्व कम्पनी उस अंशधारी को एक नोटिस भेजती है कि वह अपने अंशों पर बकाया राशि एक निश्चित समय के अंदर ब्याज सहित भुगतान कर दें। इस सूचना में यह भी स्पष्ट लिखा होना चाहिए कि निर्धारित तिथि तक भुगतान न करने पर उसके अंशों का हरण (जब्त) कर लिया जाएगा।

‘भुगतान करने के लिए सूचना में जो तिथि निर्धारित की जाए वह अंशधारी को सूचना मिलने के कम-से-कम 14 दिन बाद की होनी चाहिए। यदि नोटिस में निर्धारित तिथि तक भी भुगतान प्राप्त नहीं होता है तो उसके अंशों को जब्त कर लिया जाता है। अंशों को जब्त करते समय कम्पनी को अपने अंतर्नियमों में वर्णित नियम का ठीक-ठाक पालन करना चाहिए।

प्रश्न 23.
प्रविवरण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
प्रविवरण का आशय ऐसे प्रपत्र से है जो कम्पनी के अंशों या ऋण-पत्रों के अभिदान अथवा क्रय करने के लिए जनता से प्रस्तावित आमंत्रित करता है। प्रविवरण में कम्पनी के व्यवसाय की लाभप्रदता और सुदृढ़ता का वर्णन होता है जिसके आधार पर जनता अंश खरीदने का प्रस्ताव करती है। प्रविवरण कम्पनी तथा अंशधारियों के मध्य होने वाले समझौते का आधार होता है। अंशधारी प्रविवरण के आधार पर ही अंशों को खरीदते हैं।

यदि प्रविवरण में उन्हें भ्रमित किया जात है अथवा गलत तथ्यों को छिपाया जाता है तो वे उन हानियों के लिए संचालकों को उत्तरदायी ठहरा सकते हैं। जो उन्हें उठानी पड़ती है तथा अंशों को खरीदने संबंधी संविदा को भंग किया जा सकता है। अतः प्रविवरण को सही तथ्यों के साथ तैयार किया जाना चाहिए।

प्रश्न 24.
आयगत लाभ एवं पूँजीगत लाभ में अन्तर बतावें।
उत्तर:
ऐसे लाभ जो स्थायी या पूँजीगत प्रकृति की होती है, उन्हें पूँजीगत लाभ कहा जाता है, उदाहरण के लिए वसीयत, आजीवन सदस्य शुल्क, भवन निर्माण के लिए या टूर्नामेंट के लिए दान आदि।

ऐसे लाभ जिनकी प्राप्ति बार-बार एवं छोटी राशि की होती है, आयगत लाभ कहलाती है। जैसे-चंदे, बैंक जमा पर ब्याज, स्कूल फीस आदि। पूँजीगत लाभ दायित्व होती है और आयगत लाभ आय या आगम होती है।

अतः पूँजीगत लाभ और आयगत लाभ का तुलनात्मक अध्यन करने से इस बात की जानकारी होती है कि इन दोनों की प्रकृति और लक्षण अलग-अलग होते हैं। इसलिए इन दोनों में अन्तर पाया जाता है।

प्रश्न 25.
रोकड़ बही तथा प्राप्ति एवं भुगतान खाता में अन्तर बतावें।
उत्तर:
प्राप्ति और भुगतान खाता तथा रोकड़ बही में निम्नलिखित अंतर है-
प्राप्ति और भुगतान खाता:

  • इसके लेखे तारीखदार नहीं होते हैं।
  • यह खाता व्यापारिक संस्थाओं में खोला जाता है।
  • यह एक निश्चित अवधि के बाद बनाया जाता है।
  • यह रोकड़ पुस्तक का सार होता है।
  • इसे रोकड़ पुस्तक के आधार पर बनाया जाता है यदि कोई रोकड़ पुस्तक रखी गई हो।

रोकड़ बही:

  • इसके सभी लेखे तारीखदार होते हैं।
  • यह खाता व्यापारिक संस्थाओं में भी नहीं खोला जाता है।
  • जैसे-जैसे प्राप्तियाँ और भुगतान होते जाते हैं वैसे-वैसे इनका लेखा इनमें किया जाता है।
  • यह आगम-शोधन खाते का सार नहीं होता है।
  • इसे आगम-शोधन के आधार पर नहीं बनाया जाता है।

प्रश्न 26.
State the five objectives of Ratio Analysis.
(अनुपात विश्लेषण के पाँच उद्देश्यों को बतलायें।)
उत्तर:
अनुपात विश्लेषण का उद्देश्य (Objective of Ratio Analysis)- प्रमुख रूप में प्रबंध के आधारभूत कार्य, योजना, समन्वय, नियंत्रण, संवहन एवं पूर्वानुमान के कार्य में सहायता पहुँचाना ही अनुपात विश्लेषण का उद्देश्य होता है। इसका प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है-

  1. भूतकालीन अनुपात द्वारा लागत, विक्रय, लाभ और अन्य सम्बन्धित तथ्यों की प्रवृत्ति के विषय में ज्ञान प्राप्त हो सकता है और उनके आधार पर भावी घटना के विषय में घोषणा की जाती है।
  2. ‘आदर्श अनुपातों’ (Ideal ratios) की रचना की जा सकती है और प्रमुख अनुपात के बीच पाये जाने वाले सम्बन्ध को ‘इच्छित समन्वय’ के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
  3. विक्रय-नियंत्रण एवं लागत-नियंत्रण में भी अनुपातों की सहायता ली जा सकती है।
  4. अनुपात के प्रयोग द्वारा संवहन का कार्य सरल हो जाता है। इसके आधार पर सरलतापूर्वक बताया जा सकता है कि दो अवधियों के बीच क्या हुआ है।
  5. अनुपातों का प्रयोग ‘क्षमता’ के माप के रूप में भी किया जा सकता है। चूंकि अनुपात द्वारा वित्तीय समंकों में एकरूपता आ जाती है, अतः अन्तर्घमंडल तुलना (inter-firm comparison) सम्भव हो जाती है।

प्रश्न 27.
वित्तीय विश्लेषण क्या है?
उत्तर:
वित्तीय विवरण किसी संस्था की वित्तीय स्थिति संबंधी सूचना प्रदान करने वाले साधन हैं। वित्तीय विवरण के विश्लेषण का अर्थ किसी संस्था की आर्थिक और लाभ कमाने की स्थिति का पता लगाने के लिए विवरणों के तथ्यों को इस प्रकार वर्गीकृत करना है जिसमें इनका एक-दूसरे से संबंध स्थापित किया जा सके।

प्रश्न 28.
What do you mean by profitability Ratio ?
(लाभदायकता अनुपात से आप क्या समझते हैं ?)
उत्तर:
लाभदायकता अनुपात (Profitability Ratio)- प्रत्येक व्यावसायिक संस्था का उद्देश्य लाभ कमाना होता है। साथ ही प्रत्येक संस्था का यह प्रयत्न होता है कि प्राप्त लाभ की मात्रा न केवल निरपेक्ष रूप में (absolute) अधिक हो, बल्कि सापेक्षिक दृष्टि से भी अधिक हो अर्थात् उस संस्था में प्रयुक्त पूँजी एवं साहस की तुलना में लाभ की मात्रा पर्याप्त हो। एक व्यावसायिक संस्था द्वारा उपलब्ध साधनों के अधिकतम प्रयोग से अधिकतम लाभ कमाने की क्षमता को ही लाभदायकता कहते हैं।

लाभदायकता की स्थिति में बिक्री की मात्रा लागतों की प्रकृति एवं वित्तीय साधनों के समुचित प्रयोग पर निर्भर करती है। लाभदायकता के विश्लेषण के अन्तर्गत बिक्री का अध्ययन बिक्री वस्तु की लागत का विश्लेषण, बिक्री पर कुल उपान्त (Gross margin) का विश्लेषण, संचालन व्यय का विश्लेषण, संचालक लाभ का विश्लेषण एवं बिक्री एवं पूंजी की तुलना में शुद्ध आय का विश्लेषण आदि शामिल होता है। मूल्यांकन अवधि के बीच मूल्य-स्तर में हुए परिवर्तनों का विश्लेषण भी आवश्यक होता है । इस प्रकार के विश्लेषण में अनेक अनुपातों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 29.
कुल लाभ अनुपात से आप क्या समझते हैं ? इसकी गणना कैसे की जाती है?
उत्तर:
कुल लाभ अनुपात या बिक्री पर कुल लाभ का उपान्त (Gross Profit Ratio or Gross Margin to Net Sales)- शुद्ध बिक्री और बेची गयी वस्तु की लागत का अन्तर (कुल लाभ) बहुत ही महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह शुद्ध बिक्री पर कुल लाभ के उपान्त (margin) को प्रदर्शित करता है। कुल लाभ का उपान्त इतना पर्याप्त होना चाहिए कि संचालन व्यय तथा अन्य व्यय को पूरा करने के बाद भी बिक्री व स्वामी इक्विटी की तुलना में शुद्ध आय पर्याप्त हो। कुल लाभ उपान्त का विश्लेषण करने के लिए कुल लाभ अनुपात या बिक्री पर कुल लाभ का उपान्त अनुपात की गणना की जाती है। इसे ज्ञात करने का सूत्र इस प्रकार है-

Gross Profit Ratio = \(\frac{\text { Gross Profit } \times 100}{\text { Sales }}\)

नोट- यदि 100 में से कुल लाभ अनुपात घटा दें, तो बेची गयी वस्तु की लागत का बिक्री पर अनुपात ज्ञातं हो जाएगा। इस प्रकार का अनुपात भी अप्रत्यक्ष ढंग से संस्था की कुल लाभ उपान्त पर ही प्रकाश डालता है।

सामान्यतया यह अनुपात जितना ही ऊँचा होता है उतना ही अच्छा माना जाता है। यह अनुपात जितना ही नीचा और कम होता है, संस्था की लाभदायकता उतनी ही कम मानी जाती है ।

प्रश्न 30.
What is meant by fund ? State and two objective of preparing a Cash flow Statement. (कोष का क्या अर्थ है ? रोकड़ प्रवाह विवरण बनाने के कोई दो उद्देश्य बताइए।)
उत्तर:
कोष का आशय रोकड़ अथवा कार्यशील पूँजी अथवा समस्त वित्तीय स्रोतों से है। रोकड़ प्रवाह विवरण बनाने के दो प्रमुख उद्देश्य है-

  • उन विशिष्ट (परिचालन/विनियोजन/वित्तीय क्रियाएँ) उपयोगों का पता लगाना जिनके उपक्रम ने रोकड़ एवं रोकड़ तुल्य का सृजन किया है।
  • उन विशिष्ट (परिचालन/विनियोजन/वित्तीय क्रियाएँ) उपयोगों का पता लगाना जिनमें उपकम ने रोकड एवं रोकड तल्य का प्रयोग किया गया है।

प्रश्न 31.
ऋणपत्रों के शोधन के तरीकों का वर्णन करें।
उत्तर:
ऋणपत्रों के शोधन के तरीके ये हैं-

  • एक निश्चित अवधि के बाद ऋणपत्रों की समस्त राशि भुगतान करके शोधन।
  • ऋण पत्रों का किश्तों में लॉटरी विधि कुछ वर्षों में शोधन।
  • ऋण पत्रों को अंशों में परिवर्तन न करके शोधन।
  • खुले बाजार में अपने ही ऋण पत्रों का क्रय करके शोधन।

प्रश्न 32.
स्थायी प्रभार तथा चल प्रभार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
स्थायी प्रभार- जब प्रभार को कंपनी को निश्चित संपत्तियों के विरुद्ध सृजित किया जाता है तो इसे स्थिर प्रभार कहते हैं।
चल प्रभार- जब प्रभार को कम्पनी की सभी संपत्तियों (उन संपत्तियों को छोड़कर जोकि सुरक्षित लेनदारों को दी गयी है) के विरुद्ध सृजित किया जाता है तो इसे चल प्रभार कहते हैं।

प्रश्न 33.
संचय और प्रावधान में अंतर बताएँ।
उत्तर:
संचय का तात्पर्य लाभ के एक भाग का व्यापार में भविष्य में होने वाले अज्ञात या ज्ञात दायित्व के लिए नियोजन है जबकि प्रावधान एक निश्चित राशि का एक ज्ञात दायित्व या विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया जाता है।

प्रश्न 34.
तुलनात्मक वित्तीय विवरण किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जब दो या दो से अधिक अवधियों के वित्तीय विवरणों की मदों को साथ-साथ इस प्रकार दिखाया जाए कि उनकी तुलना करके निष्कर्ष निकाला जा सके तो ऐसे विवरण को तुलनात्मक वित्तीय विवरण कहा जा सकता है।

प्रश्न 35.
अंशधारी और ऋणपत्रधारी में अंतर बताइए?
उत्तर:
अंशधारी वे व्यक्ति जो अंशदान करते हैं अथवा अंशों के स्वामी होते हैं कम्पनी के सदस्य या अंशधारी कहलाते हैं।
ऋणपत्रधारी ऋणपत्रधारी कम्पनी के लेनदार होते हैं। इन्हें प्रबंध संबंधी अधिकार नहीं होते हैं। फिर भी कभी-कभी ऋणपत्रधारी भी अपने हितों की सुरक्षा हेतु एकाध संचालक नियुक्त करने का अधिकार प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न 36.
रोकड़ प्रवाह विवरण क्यों तैयार किया जाता है ?
उत्तर:
रोकड़ प्रवाह विवरण तैयार करने के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  • रोकड़ प्रवाह विवरण बनाने का मूल उद्देश्य रोकड़ के स्रोतों तथा प्रयोगों की जानकारी प्राप्त करना है।
  • दो चिट्ठों की तिथियों के बीच रोकड़ एवं रोकड़ समतुल्यों में हुए परिवर्तन को ज्ञात करना।
  • विभिन्न निवेश संबंधी परियोजनाओं में रोकड़ की आवश्यकताओं का निर्धारण करना।
  • कम्पनी की बित्तीय स्थिति के कुशल प्रबंधन में सहायता प्रदान करना।
  • रोकड़ बजट के निर्माण में सहायता प्रदान करना।
  • वित्तीय नीतियों के निर्धारण में मदद करना।
  • अल्पकालीन वित्तीय नियोजन में सहायता प्रदान करना।
  • तरलता स्थिति को बेहतर ढंग से व्यक्त करना।
  • ऋणी की वित्तीय स्थिति के पुनरीक्षण में मदद करना।
  • लाभांश के भुगतान के संबंध में निर्णय लेने में सहायता प्रदान करना।

प्रश्न 37.
चालू अनुपात 2 : 1 है। कार्यशील पूँजी रु० 1,50,000 है। चालू संपत्ति एवं चालू दायित्व की राशियाँ ज्ञात करें।
उत्तर:
मान लिया कि चालू दायित्व (C.I.) = x
कार्यशील पूँजी (W.C.) = चालू संपत्तियाँ (C.A.) – चालू दायित्व (C.L.)
1,50,000 = 2x – x
1,50.000 = x
x = 1,50,000
C.I. = 1.50.000
C.A. = 1.50,000 × 2 = 3,00,000

प्रश्न 38.
लेखांकन अनुपात से आप क्या समझते हैं ? इसके क्या उद्देश्य हैं ?
उत्तर:
आर० एन० एन्थोनी के अनुसार, “लेखांकन अनुपात साधारणतया एक संख्या को दूसरी संख्या के संदर्भ में प्रकट करता है। यह एक संख्या को दूसरी संख्या से भाग देने पर जो अनुपात निकलता है उस अनुपात को लेखांकन. अनुपात कहा जाता है। लेखांकन अनपात के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  • संस्था की लाभदायकता की माप करना।
  • व्यवसाय की परिचालन कुशलता निर्धारित करना।
  • व्यवसाय की शोधन क्षमता का मूल्यांकन करना।
  • पूर्वानुमान एवं बजटन में सहायता प्रदान करना।
  • लेखांकन सूचनाओं को सरल बनाना एवं सारांशित करना।
  • तुलनात्मक विश्लेषण में सहायता प्रदान करना।
  • निर्णय लेने में प्रबंध को मदद करना।
  • वित्तीय नियोजन में सहायता प्रदान करना।

प्रश्न 39.
किन्हीं तीन उद्देश्यों का उल्लेख करें जिनके लिए अंश प्रीमियम का उपयोग किया जा सकता है।
उत्तर:
तीन उद्देश्य इस प्रकार है जिनके लिए अंश प्रीमियम का उपयोग किया जा सकता है-

  • कंपनी के प्रारंभिक व्ययों को अपलिखित करने के लिए।
  • विद्यमान अंशधारियों को पूर्णदत्त बोनस अंशों के निर्गमन के लिए।
  • अंशों या ऋणपत्रों के निर्गमन पर दी गयी कटौती को अपलिखित करने के लिए।

प्रश्न 40.
लाभों पर प्रभार तथा लाभों के बँटवारे में अन्तर करें।
उत्तर:
लाभों के प्रभार एवं लाभों के बँटवारे में अंतर निम्न हैं-
लाभ का प्रभार (Charge against profit)- लाभों के बँटवारे का अर्थ है कि पूँजी पर पूरा ब्याज दिया जाएगा, चाहे फर्म का लाभ हो या हानि।

लाभों का बँटवारा (Appropriation out of profit)- लाभों के बँटवारे का अर्थ है कि सभी प्रभारों (charges) एवं विनियोजनों (appropriations) के बाद शेष बची राशि अर्थात् ‘वितरण योग्य शुद्ध लाभ’ को साझेदारों में उनके लाभ हानि के अनुपात में विभाजन।

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