Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5

प्रश्न 1.
रोकड़ प्रवाह विवरण क्या है ? इसे कैसे तैयार किया जाता है ?
उत्तर:
रोकड़ प्रवाह विवरण रोकड़ बहाव का एक ऐसा विवरण है जो रोकड़ बहाव व्यावसायिक संस्था के अंदर एवं बाहर रोकड़ की गति को दर्शाता है। रोकड़ आगमन रोकड़ के साधन के रूप में और रोकड़ बहिर्गमन रोकड़ के प्रयोग के रूप में माना जाता है। यह विवरण उन कारकों पर भी प्रकाश डालता है जिसके कारण रोकड़ का आगमन एवं बहिर्गमन होता है। इस प्रकार रोकड़ प्रवाह विवरण एक ऐसा विवरण है, जिसे दो चिट्ठों की तिथियों के मध्य रोकड़ स्थिति में हुए परिवर्तन व उसके कारकों पर प्रकाश डालने के लिए तैयार किया जाता है। करीब-करीब इसकी प्रकृति एवं चरित्र रोकड़ प्राप्ति एवं रोकड़ भुगतान की भाँति ही होती है।

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट्स ऑफ इण्डिया ने रोकड़ प्रवाह विवरण तैयार करने के लिए लेखांकन मानक (प्रमाप)-3 संशोधित रूप में जारी किया है जिसे संक्षेप में AS-3 revised कहते हैं। ये तो लेखांकन मानक-3 (संशोधित) 01-4-1947 को जारी किया गया था। पर कछ विशेष संस्थाओं के लिए यह 1 अप्रैल, 2001 को या इसके बाद प्रारम्भ होने वाली लेखांकन अवधियों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है। लेखांकन मानक-3 (संशोधित) के अनुसार रोकड़ प्रवाह विवरण बनाते समय विभिन्न क्रियाकलापों को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है जो इस प्रकार है-

  • संचालन क्रियाएँ-संचालन क्रियाएँ व्यावसायिक उपक्रम की मुख्य आगम उत्पन्न करने वाली क्रियाएँ होती हैं। उनके आधार पर लाभ-हानि का निर्धारण होता है।
  • निवेश क्रियाएँ-निवेश क्रियाओं में दीर्घकालीन सम्पत्तियों तथा अन्य निवेश जो रोकड़ सममूल्य में शामिल नहीं होती है, के क्रय-विक्रय को शामिल किया जाता है।
  • वित्तीय क्रियाएँ-वित्तीय क्रियाएँ वे क्रियाएँ हैं जो स्वामी की पूँजी तथा उपक्रम के ऋणों के आकार एवं संरचना में परिवर्तन करती हैं।
    सभी क्रियाओं को इन तीन वर्गों में विभाजित करने से रोकड़ प्रवाह विवरण प्रयोग करने वाले को यह सूचना मिल जाती है कि इन क्रियाओं का रोकड़ एवं रोकड़ मूल्यों पर क्या प्रभाव हुआ।

प्रश्न 2.
संचालन अनुपात की विवेचना करें।
उत्तर:
संचालन अनुपात (Operating Ratio)- यह अनुपात कुल संचालन व्यय अर्थात् बेची गयी वस्तु की लागत, विक्रय एवं वितरण व्यय, प्रशासन व्यय एवं वित्तीय व्यय आदि का शुद्ध बिक्री से सम्बन्ध स्थापित करती है। इस अनुपात के आधार पर वस्तु को बनाने एवं विक्रय में किये गए खर्चों की मात्रा एवं सीमा का माप किया जा सकता है। अन्य शब्दों में, इस अनुपात द्वारा लागत संरचना (Cost structure) के विषय में ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इस अनुपात की गणना विधि अंकित है :
Operating Ratio = \(\frac{\text { Cost of Sales + Operating Expenses } \times 100}{\text { Sales }}\)

यदि यह अनुपात ऊँचा होता. है तो उसे अच्छा नहीं कहा जा सकता क्योंकि उस दशा में संचालन लाभ की मात्रा इतनी पर्याप्त नहीं होती है कि ब्याज, लाभांश तथा अन्य स्थायी माँगों को पूरा किया जा सके। वस्तुतः इस अनुपात में वृद्धि होने पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि व्यापारिक क्षमता में कमी आ गयी है। अतः यह अनुपात जितना ही कम होता है, उतना ही अच्छा माना जाता है।

यदि विगत कुछ वर्षों में लगातार इस अनुपात में कमी हो रही है तो इससे स्पष्ट होता है कि संस्था प्रति इकाई में वृद्धि पर संचालन व्यय में बचत कर रही है ।

संचालन अनुपात के आधार पर केवल पूरे व्यवसाय की क्षमता का अध्ययन हो पाता है । कभी-कभी यह आवश्यक होता है कि उत्पादन लागत व संचालन व्यय के प्रत्येक पहलू का विश्लेषण करके यह पता लगाया जाए कि संस्था विभिन्न खर्चों में कितनी बचत या अतिव्यय कर रही है। इसके लिए व्यक्ति खर्चों का शुद्ध बिक्री से सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। व्यक्तिगत संचालन व्यय व शुद्ध बिक्री के बीच सम्बन्ध को ज्ञात करने के लिए निम्न अनुपात ज्ञात किये जा सकते हैं-
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 1

उदाहरण :
इन्दु एण्टरप्राइजेज ने तीन वर्ष के लिए निम्न आय विवरण प्रस्तुत किया है-
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 2

संचालन अनुपात और उसके सहायक अनुपातों को ज्ञात कीजिए। समीक्षा भी प्रस्तुत कीजिए।
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 3
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 4

उपर्युक्त आँकड़ों से पता चलता है कि संस्था की संचालन क्षमता में वृद्धि हुई है। संचालन अनुपात लगातार कम हो रहा है। यद्यपि 2003 की अपेक्षा. 2004 में बेची गयी वस्तु की लागत में वृद्धि हुई है। परन्तु विक्रय व्यय में प्रशासन व्यय पर नियन्त्रण के कारण संचालन अनुपात 83.3 प्रतिशत से घटकर 81 प्रतिशत हो गया है। 2005 में संस्था ने न केवल बेची गयी वस्तु की लागत नियन्त्रित की है। बल्कि विक्रय व्यय में (2003 की तुलना में) एवं प्रशासन व्यय में बचत लाकर संचालन क्षमता में वृद्धि की है।

प्रश्न 3.
हेमा लि. की पुस्तकों से निम्न सूचनाएँ प्राप्त की गयी हैं :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 5
आपको (i) प्रति समता अंश आय, (ii) मूल्य अर्जन अनुपात, (iii) पूँजीकरण अनुपात, (iv) समता अंशों पर लाभांश प्रतिफल तथा (v) भुगतान अनुपात का आकलन करना है।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 6
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 7

प्रश्न 4.
A, B और C साझेदार हैं जो लाभ-हानि को बराबर-बराबर बाँटते हैं। उन्होंने 30 दिसंबर, 2016 को फर्म को विघटित किया जिस तिथि को फर्म की स्थिति निम्न थी-
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 8
सभी संपत्तियों का पुस्तकीय मूल्य से 10% कम प्राप्त हुए। लेनदार को पूर्ण भुगतान कर दिया गया। वसूली के व्यय 500 हुए। वसूली खाता, साझेदारों के पूँजी खाता तथा नकद अथवा बैंक खाता तैयार कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 9
Working Notes :
(1) Payment of contingent liabilites Rs. 500
(2) Assets Realised:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 10
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 11

प्रश्न 5.
निम्न सूचना के आधार पर संचालन लाभ अनुपात ज्ञात करें-
बिक्री – 4,10,000 ₹
विक्रय वापसी – 10.000 ₹
सकल लाभ – 1.50.000 ₹
उत्तर:
Operating Profit = Gross Profit – Other operating expenses
= 1,50,000 – 41,000
= 1,09,000
Revenue from operation = Sales – Sales Return (Net Sales)
= 4,10,000 – 10,000
= 4,00,000 (Net Sales)
Operating Profit Ratio = \(\frac{1,09,000}{4,00,000}\) × 100 = 27.25%

प्रश्न 6.
रोकड़-बहाव विवरण से आप क्या समझते हैं ? इसके तकनीकों का वर्णन करें।
उत्तर:
रोकड़-बहाव विवरण रोकड़-बहाव’ का एक ऐसा विवरण है जो रोकड़-बहाव व्यावसायिक संस्था के अन्दर एवं बाहर रोकड़ की गति को दर्शाता है। रोकड़-आगमन रोकड़ के साधन के रूप में और रोकड़ बहिर्गमन रोकड़ के प्रयोग के रूप में माना जाता है। यह विवरण उन कारकों पर भी प्रकाश डालता है, जिनके कारण रोकड़ का आगमन एवं बहिर्गमन होता है। इस प्रकार रोकड़-बहाव विवरण एक ऐसा विवरण है, जिसे दो चिट्ठों की तिथियों के मध्य रोकड़ स्थिति में हुए परिवर्तन व उसके कारकों पर प्रकाश डालने के लिए तैयार किया जाता है । करीब-करीब इसकी प्रकृति एवं चरित्र रोकड़ प्राप्ति एवं रोकड़ भुगतान की भाँति ही होती है, हालाँकि आधारभूत सूचनाएँ जिनके आधार पर इन दोनों को तैयार किया जाता है, अलग-अलग अभिलेखों से प्राप्त की जाती हैं । अन्य शब्दों में, रोकड़ प्राप्ति एवं भुगतान का विवरण दो तिथियों के चिट्ठों से नहीं तैयार हो सकता है, जबकि रोकड़-बहाव विवरण दो चिट्ठों एवं अन्य सूचनाओं के आधार पर ही तैयार किया जाता है।

रोकड़-बहाव विवरण की तकनीक (Technique of Cash-Flow Statement) रोकड़-बहाव विवरण की प्रकृत्ति एवं उपयोगिता पर प्रकाश डालने से पहले यह लाभप्रद होगा कि हम उसे तैयार करने की विधि पर विचार करें। रोकड़-बहाव विवरण में व्यवसाय के अन्तर्गत रोकड़ के आगमन एवं बहिर्गमन पर प्रकाश डाला जाता है और एक तरफ उन तमाम साधनों को दर्शाया जाता है जिनसे रोकड़ व्यवसाय के अन्तर्गत आती हैं और दूसरी ओर उन मदों को दिखाया जाता है जिन पर नकद धन प्रयोग किया गया होता है। अतः रोकड़-बहाव विवरण बनाने के लिए यह आवश्यक है कि रोकड़-आगमन (Inflow of Cash) के विभिन्न स्रोतों एवं रोकड़-भुगतान (Outflow of Cash) के विभिन्न मदों के विषय में सैद्धान्तिक ज्ञान प्राप्त कर लें।

1. रोकड़-आगमन के साधन (Sources of Cash)-व्यवसाय के अन्तर्गत जिन लेन-देनों से रोकड़ का आगमन होता है, उन्हें मुख्यतः दो उपवर्गों में रखा जा सकता है-(अ) चालू संचालन सम्बन्धी क्रियाएँ; (ब) वित्तीय क्रियाएँ (लेन-देन) । इन दोनों क्रियाओं के अन्तर्गत भी अनेक उप-क्रियाओं को वर्गीकृत किया जा सकता है । संक्षेप में, रोकड़-आगमन के विभिन्न आगमन स्रोतों को निम्न रूप में सारांशित किया जा सकता है-

(अ) चालू संचालन सम्बन्धी क्रियाएँ-

  • वस्तुओं एवं सेवाओं का नकद विक्रय;
  • क्षय, उपोत्पाद एवं रद्दी माल का नकद विक्रयः
  • ग्राहकों से वसूली-देनदारों से प्राप्ति एवं प्राप्त बिलों की प्राप्ति;
  • किराये पर उठायी गयी सम्पत्तियों से प्राप्त किराया;
  • विनियोगों पर प्राप्त नकद ब्याज और नकद लाभांश और अन्य कोई रकम;
  • आय कर की वापसी (Refund);
  • स्थायी सम्पत्तियों एवं अस्थायी विनियोगों की नकद बिक्री।

(ब) वित्तीय लेन-देन-

  • प्राप्त बिलों का बैंक से डिस्काउण्ट कराना;
  • ऋणपत्रों का निर्गमन नकद, रूप में;
  • ऋणों के लिए देय बिल का निर्गमन;
  • अंशों का निर्गमन नकद धन के लिए।

2. रोकड़-बहिर्गमन की मदें (Items of Outlow of Cash)- व्यवसाय के अन्तर्गत जिन-जिन क्रियाओं के सम्बन्ध में नकद धन का प्रयोग किया जाता है, उन्हें मुख्यतः संचालन क्रियाओं, स्थायी सम्पत्ति क्रय सम्बन्धी क्रियाओं एवं वित्तीय क्रियाओं के अन्तर्गत शामिल कर सकते हैं। इन क्रियाओं के अन्तर्गत भी अनेक उप-क्रियाओं का वर्गीकरण किया जा सकता है। संक्षेप में एक व्यवसाय के अन्तर्गत रोकड़ प्रयोग की विभिन्न मदें इस प्रकार हैं :

(अ) चालू संचालन सम्बन्धी क्रियाएँ-

  • मजदूरी, उत्पादन व्यय व अन्य संचालन व्ययों का नकद भुगतान;
  • कच्चे माल का नकद क्रय;
  • लेनदारों और देय बिलों का नकद भुगतान;
  • ब्याज का नकद भुगतान;
  • आय कर का भुगतान;
  • नकद लाभाश;
  • किसी कानून निर्णय के अन्तर्गत देय राशि का भुगतान।

(ब) सम्पत्तियों का क्रय-

  • स्थायी सम्पत्तियों का नकद रूप में क्रय;
  • यन्त्र एवं अन्य साधनों के सम्बन्ध में असाधारण मरम्मत पर व्यय;
  • अस्थायी विनियोगों का क्रय।

(स) वित्तीय लेन-देन-

  • दीर्घकालीन ऋणों, ऋणपत्रों आदि का भुगतान;
  • अंश पूँजी को लौटाना एवं शोधन।

व्यवहार में रोकड़-बहाव विवरण के निर्माण के लिए जिन सूचनाओं को प्राप्त किया जाता है, उनमें गैर-नकद लेन-देन (Non-cash transactions) की मदें शामिल हो सकती हैं, जिन्हें अलग करना आवश्यक होता है, क्योंकि इन लेन-देनों का रोकड़-आगमन एवं रोकड़-बहिर्गमन पर प्रभाव नहीं पड़ता है। अत: यह आवश्यक है कि गैर-नकद लेन-देन के विषय में भी जानकारी प्राप्त कर लें । इस प्रकार के गैर-नकद लेन-देनों के अन्तर्गत निम्नलिखित को शामिल करते हैं-

  • सम्पत्तियों के मूल्यों में होने वाली ह्रास, कमी एवं क्षय की मान्यता;
  • पूर्वदत्त व्ययों का लेखा;
  • मूल्यहीन एवं अप्राप्त प्राप्तियों एवं सम्पत्तियों का अपलेखन;
  • कमाये गये लाभ का नियोजनः
  • स्थायी सम्पत्तियों के पुनर्मूल्यांकन के कारण मूल्य में वृद्धि या कमी;
  • स्थायी सम्पत्तियों के अपलेखन का लेखा;
  • अमूर्त सम्पत्तियों का अपलेखन;
  • संचितियों का सृजन ।

उपर्युक्त के अलावा यह भी आवश्यक हो जाता है कि अदत्त खर्चों एवं प्राप्त आयों के सम्बन्ध में किये गये समायोजन लेखों को ध्यान में रखते हुए ऐसा समायोजन किया जाए कि नकद धन के आधार पर चालू खर्चों आयों के विषय में सही एवं शुद्ध ज्ञान प्राप्त हो सके । स्कन्ध, देनदार, प्राप्त बिल, लेनदार व देय बिल में हुए परिवर्तनों की जाँच व विश्लेषण इस प्रकार से करना चाहिए कि नकद धन पर पड़ने वाले उनके प्रभाव को आँका जा सके।

रीति एवं कार्यविधि (Method and Procedure)- एक आन्तरिक विश्लेषक रोकड़-प्राप्ति एवं रोकड़-भुगतान के जर्नल से एक सारांश तैयार कर सकता है और उस सारांश के आधार पर रोकड़-बहाव विवरण बना सकता है। परन्तु इस रीति एवं कार्यविधि में समय अधिक लग सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति की व्यवसाय की प्रारम्भिक लेखे की पुस्तकों तक पहुँच भी नहीं पाती है। अन्य रीतियों के लिए निम्न प्रकार के आँकड़े एवं सूचनाएँ आवश्यक होती हैं :
(अ) संस्था, के तुलनात्मक चिट्ठ;
(ब) वर्ष के लिए लाभ-हानि खाता या आय विवरण;
(स) आधिक्य या नियोजन खाता;
(द) वर्ष के दौरान किये गये गैर-नकद लेन-देनों की सूची।

इन प्रलेखों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर रोकड़-बहाव विवरण की रचना निम्न में से किसी भी एक रीति द्वारा की जा सकती है :
I. विवरणात्मक कार्य-चिट्ठा (Work-Sheet) बनाकर;
II. आय विवरण को रोकड़ आधार पर परिवर्तित करके;
III. फण्ड-बहाव विवरण के सिद्धान्त के आधार पर;
IV. प्राप्ति एवं भुगतान खाता बनाकर;
V. ‘ली’ (Lee) द्वारा प्रतिधारित गणितीय सत्र द्वारा:
VI. रोकड़ सम-स्तर चार्ट द्वारा (Cash Break-even Chart)।
यहाँ पर हम केवल III व IV रीतियों का ही वर्णन करेंगे।

प्रश्न 7.
ख्याति से क्या आशय है ? इसकी गणना किस प्रकार की जाती है ?
उत्तर:
ख्याति किसी व्यवसाय की प्रसिद्धि का ऐसा मूल्य है जिससे कि वह उस व्यवसाय में लगी हुई अन्य इकाइयों द्वारा अर्जित किए गए सामान्य लाभ की दर की अपेक्षा अधिक लाभ अर्जित करती है। सरल शब्दों में, फर्म की ख्याति संभावित अधिक आय का वर्तमान मूल्य है।

साझेदारी संलेख में साझेदारी फर्म की ख्याति का मूल्यांकन करने की विधि का स्पष्ट उल्लेख रहता है। व्यवहार में ख्याति का मूल्यांकन व्यापार के रीति-रिवाजों के आधार पर किया जाता है। ख्याति का मूल्यांकन करने के निम्नलिखित विधियाँ हैं-
1. औसत लाभ विधि :
औसत लाभ विधि के अंतर्गत ख्याति की गणना (i) साधारण औसत लाभ विधि तथा (ii) भारित औसत लाभ विधि के द्वारा की जाती है।

(i) साधारण औसत लाभ विधि- इस विधि के अंतर्गत पिछले कुछ वर्षों के औसत लाभ को उल्लिखित ‘वर्ष क्रय’ (Years Purchase) से गुणा करके ख्याति का मूल्यांकन किया जाता है। यह विधि इस मानक पर आधारित है कि नया व्यापार अपने संचालन के प्रारंभिक कुछ वर्षों में संतोषजनक लाभ कमाने की स्थिति में नहीं होता है। इस कारण, कार्यरत व्यापार को खरीदने वाले व्यक्ति को उस रकम के बराबर ख्याति की राशि देनी होगी जो कि वह प्रारंभिक कुछ वर्षों में लाभ के रूप में व्यापार से प्राप्त कर सकता है। इसी कारण पिछले औसत लाभ को उल्लेखित निश्चित संख्या (जैसे-दो वर्षों के क्रय के बराबर या तीन वर्षों के क्रय के बराबर आदि) से गुणा करके ख्याति की राशि की गणना की जाती है।

(ii) भारित औसत लाभ विधि- यह विधि साधारण औसत लाभ विधि का संशोधित रूप है। इस विधि के अंतर्गत गुणनफले को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक वर्ष के लाभ को उससे संबंधित भार की संख्या (जैसे- 1, 2, 3, 4, 5 आदि) से गुणा किया जाता है। इसके बाद भारित औसत लाभ निकालने हेतु भारित औसत लाभ को क्रय किये गये वर्षों की संख्या से गुणा कर दिया जाता है।

उदाहरण 1.
पिछले पांच वर्षों के औसत लाभ के आधार पर वर्षों के क्रय मूल्य पर ख्याति की गणना कीजिए। पिछले पाँच वर्षों के लाभ 40,000 रु., 50,000 रु., 60,000 रु., 50,000 रु. तथा 60,000 रु. थे।
हल :
Total profits for five years = Rs. 40,000 + Rs. 50,000 + Rs. 60,000 + Rs. 50,000 + Rs. 60,000 = Rs. 2,60,000
Now Goodwill = \(\frac{\text { Total Profits }}{\text { No. of years }}\) × No. of Years’ purchase
= \(\frac{2,60,000}{5}\)
= Rs. 52,000 × 4 = Rs. 2,08,000

2. अधिलाभ विधि- ख्याति की गणना करने में औसत लाभ (साधारण या भारित) विधि की आधारभूत मान्यता यह है कि यदि एक नया व्यापार स्थापित किया जाता है तो वह अपने प्रारंभिक वर्षों में कोई लाभ कमाने के योग्य नहीं होगा। इस कारण एक स्थापित व्यापार खरीदने वाले व्यक्ति की ख्याति के रूप में प्रथम ‘कुछ वर्षों’ में संभावित कुल लाभ के बराबर राशि देनी चाहिए। लेकिन यहाँ यह भी स्मरणीय है कि व्यापार खरीदने वाले व्यक्ति का वास्तविक लाभ कुल लाभ में सन्निहित नहीं होता है, बल्कि उसी समान व्यवसाय करने वाले व्यापार की विनियोजित पूँजी पर सामान्य प्रत्याय की दर से अधिक का होता है। इस कारण, यह औचित्यपूर्ण है कि ख्याति का निर्धारण आधिक्य लाभों पर किया जाए न कि वास्तविक लाभों पर। कोई व्यापार सामान्य लाभ (Normal profit) से जितना अधिक वास्तविक लाभ (Actual profit) कमाता है उसे अधि
लाभ (Super profit) कहते हैं। इस अधिलाभ से प्रश्न में उल्लेखित निश्चित संख्या (जैसे-दो . वर्षों के क्रय के बराबर या तीन वर्षों के क्रय के बराबर, आदि) से गुणा करके ख्याति की राशि निकाल ली जाती है।

उदाहरण 2.
A, B, C फर्म का भविष्य में अनुमानित शुद्ध लाभ 36,000 रु. प्रतिवर्ष है। फर्म के द्वारा व्यापार में औसत विनियोजित पूँजी 2,00,000 रु. है। इस प्रकार के व्यापार में यह आशा की जाती है कि विनियोजित पूँजी पर 10% लाभ होता है। साझेदारों का अनुमानित पारिश्रमिक 6,000 रु. है। अधिलाभ के दो वर्ष के क्रय मूल्य के आधार पर ख्याति का मूल्य निकालिए।
हल :
Actual Profit = Rs. 36,000 – Rs. 6,000
= Rs. 30,000
Normal Profit = Rs. 2.00,000 × \(\frac {10}{100}\) = Rs. 20,000
Super Profit = Rs. 30.000 – Rs. 20,000 = Rs. 10,000
Goodwill == Super profit × No. of years purchase
= Rs. 10,000 × 2 = Rs. 20,000

(3) पूँजीकरण विधि :
इस विधि से ख्याति का मूल्यांकन दो प्रकार से किया जाता है-
(अ) औसत लाभों का पूँजीकरण विधि (Capitalisation of Average Profits Method) और
(ब) अधिलाभ का पूँजीकरण विधि (Capitalisation of Super Profits Method)

(अ) औसत लाभों का पंजीकरण विधि (Capitalisation of Average Profits Method)- इस विधि में ख्याति का मूल्य प्रतिफल की सामान्य दर के आधार पर औसत लाभ के पूँजीकृत मूल्य से व्यवसाय में विनियोजित वास्तविक पूँजी (निबल परिसम्पत्तियों) को घटाकर निर्धारित किया जाता है। इसमें निम्न चरण सम्मिलित हैं :
(i) पिछले कुछ वर्षों के कार्य सम्पादन के आधार पर औसत लाभ निश्चित करें।
(ii) प्रतिफल की सामान्य दर के आधार पर औसत लाभ का पूँजीगत मूल्य निम्न प्रकार ज्ञात करें :
Capitalised value of Average profits = \(\frac{\text { Average Profit } \times 100}{\text { Normal Rate of Return }}\)
(iii) कुल परिसम्पत्तियों (ख्याति को छोड़कर) में से बाह्य दायित्व घटाकर व्यवसाय में विनियोजित वास्तविक पूँजी (निबल परिसम्पत्तियाँ) ज्ञात करें।
Capital Employed = Total Assets (Excluding Goodwill) – Outside Liabilities
(iv) औसत लाभों के पूँजीकृत मूल्य में से निबल परिसम्पत्तियों को घटाकर ख्याति के कुल मूल्य की गणना करें अर्थात् (ii)-(iii)
Goodwill = Capital value of Average Profits – Capital Employed

(ब) अधिलाभों का पूँजीकरण विधि (Capitalisation of Super Profits Method)- ख्याति का निर्धारण अधिलाभों का पूँजीकरण करके सीधे ज्ञात किया जाता है। इस विधि के अंतर्गत औसत लाभों का पंजीकरण करने की आवश्यकता नहीं है। इसके अंतर्गत निम्न चरण आते हैं-
(i) फर्म की विनियोजित पूँजी (शुद्ध सम्पत्ति) ज्ञात करें। इसे कुल परिसम्पत्तियों (ख्याति को छोड़कर) में से बाह्य दायित्वों को घटाकर प्राप्त किया जाता है।
Capital Employed = Total Assets (Excluding Goodwill) – Outside Liabilities
(ii) विनियोजित पूँजी पर सामान्य लाभ की गणना करें।
Normal Profits = \(\frac{\text { Capital Employed } \times \text { Normal Rate of Return }}{100}\)
(iii) दिए गए गत वर्षों के औसत लाभ की गणना करें।
(iv) औसत लाभ में से सामान्य लाभ की राशि को घटाकर अधिलाभ की राशि की गणना करें।
Super Profits = Actual/Average Profits – Normal Profits
(v) अधिलाभ की राशि को प्रतिफल की सामान्य दर गुणांक से गुणा करें अर्थात्
Goodwill = \(\frac{\text { Super Profit } \times 100}{\text { Normal Rate of Return }}\)

दूसरे शब्दों में, ख्याति के मूल्य को अधिलाभ पर पूँजीकृत किया जाता है। इस विधि से ख्याति की राशि की गणना उसी प्रकार से की जाती है जैसा कि औसत लाभों को पूँजीकृत करके किया जाता है।

उदाहरण के लिए, उपर्युक्त उदाहरण में दी गई संख्याओं के प्रयोग करने पर औसत लाभ 1,00.000 रु. “है तथा सामान्य लाभ 82,000 रु. (82.000 रु. का 10%) होगा; अधिलाभ 18,000 रु. (1,00,000 रु. – 82,000 रु.) निकलेगा, ख्याति 18,000 × \(\frac {100}{10}\) = 1,80,000 रु. होगी।

उदाहरण 3.
एक व्यवसाय पिछले कुछ वर्षों में 1,00,000 रु. का औसत लाभ अर्जित करता है और इसी प्रकार के व्यवसाय में प्रतिफल की सामान्य दर 10% है। यदि व्यवसाय की निबल परिसम्पत्तियों का मूल्य 8,20,000 रु. दिया है तो पूँजीगत औसत लाभ विधि द्वारा ख्याति के कुल मूल्य का निर्धारण करें।
हल :
Capitalised value of Average Profit
= Rs. 1,00,000 × \(\frac {100}{10}\) = Rs. 10,00,000
Goodwill = Capitalised Value – Net Assets
= Rs. 10,00,000 – Rs. 8,20,000 = Rs. 1,80,000

प्रश्न 8.
निम्नलिखित सूचनाओं के आधार पर 31 दिसम्बर, 2016 को समाप्त होने वाले वर्ष का आय एवं व्यय खाता बनाइए :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 12
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 13

प्रश्न 9.
A और B का निम्नलिखित चिट्ठा है जो लाभ-हानि में बराबर के साझेदार हैं-
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 14
उन्होंने फर्म के विघटन का निर्णय लिया। सम्पत्तियों से निम्नांकित वसूली हुई :
मशीनरी पर उसके पुस्तकीय मूल्य से 20% कम, प्लाण्ट पर उसके पुस्तकीय मूल्य से 10% कम, देनदार पर 2,000 रु., लेनदारों को 10% की कसौटी पर भुगतान किया गया। विघटन के सम्बन्ध में आवश्यक खाते यह मानकर खोलिए कि विघटन व्यय 500 रु. है।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 15
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 16

प्रश्न 10.
साझेदारी फर्म का विघटन किन परिस्थितियों में हो सकता है ?
उत्तर:
साझेदारी फर्म का विघटन न्यायालय के आदेश से या न्यायालय के हस्तक्षेप के बिना भी हो सकता है। भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 40 से 44 तक में साझेदारी फर्म के विघटन के विभिन्न ढंग/तरीकों का वर्णन किया गया है।

1. ‘समझौते द्वारा विघटन (धारा 40)-फर्म का विघटन निम्न परिस्थितियों में हो सकता है-
(अ) सभी साझेदारों की सहमति द्वारा या
(ब) साझेदारों के मध्य अनुबंध के अनुसार।

2. अनिवार्य विघटन (धारा 41)- फर्म का अनिवार्य विघटन निम्न परिस्थितियों में होता है:
(अ) जब कोई एक साझेदार या सभी साझेदार दिवालिया हो जाएं, या किसी अनुबंध को करने में अक्षम हो जाए;
(ब) जब फर्म का व्यवसाय गैर-कानूनी हो जाए अथवा
(स) जब कोई ऐसी स्थिति पैदा हो जाए कि साझेदारी फर्म का व्यवसाय गैर-कानूनी हो जाए, उदाहरणार्थ जब एक साझेदार ऐसे देश का नागरिक हो जिसका भारत के साथ युद्ध घोषित हो जाए।

3. किसी घटना के घटने की स्थिति में (धारा 42)-साझेदारों के बीच अनुबंध की स्थिति में फर्म का विघटन-
(अ) यदि एक निर्धारित अवधि के लिए गठित है तो उस अवधि के समापन पर,
(ब) यदि एक या अधिक उपक्रम के लिए गठित है तो उसके पूरा होने पर।
(स) साझेदारी की मृत्यु पर।
(द) साझेदार के दिवालिया घोषित होने पर होता है।

प्रश्न 81.
निम्नलिखित संचालन क्रियाओं से आपको रोकड़ प्रवाह की गणना करनी है :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 17
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 18

प्रश्न 12.
एक कम्पनी की चालू सम्पत्तियाँ 15,00,000 रु. है। उसका चालू अनुपात 3.00 तथा तरलता अनुपात 1.25 है। उसकी चालू देयताएँ, तरल सम्पत्तियाँ तथा स्टॉक (माल सूची) की गणना कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 19
Liquid (Quick) Assets = 5,00,000 × 1.25 = 6,25,000
Inventory = Current Assets – Quick Assets
= 15,00,000 – 6,25,000 = 8,75,000

प्रश्न 13.
31.03.2015 तथा 31.03.2016 को ललिता लिमिटेड के निम्न चिट्ठों से रोकड़ प्रवाह विवरण बनाइए।
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 20
अतिरिक्त व्यय (i) वर्ष 2015-16 के लिए स्थायी संपत्तियों पर हास 14,700 है।
(ii) वर्ष के दौरान अंशधारियों को 7,000 रु० अंतरिम लाभांश दिया गया है।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 21
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 22
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 23

प्रश्न 14.
1 अप्रैल, 2012 को प्रकाश इण्डस्ट्रीज ने 4,00,000 ₹ के 9% प्रत्येक 100 र वाले ऋण पत्र 6% प्रीमियम पर निर्गमित किए जो 31 मार्च, 2016 को 10% प्रीमियम पर शोधन होते हैं। ऋणपत्रों का देय तिथि पर शोधन कर दिया गया। केवल ऋण पत्र के शोधन की जर्नल प्रविष्टियाँ कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 5, 24

प्रश्न 15.
वित्तीय विवरण की सीमाएँ बताएँ।
उत्तर:
यद्यपि वित्तीय विवरण विभिन्न व्यक्तियों के लिए महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ प्रदान करते हैं, परन्तु इन्हीं सूचनाओं के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष अंतिम एवं शुद्ध नहीं माने जा सकते हैं। साथ ही इन खातों की कुछ निजी सीमाएँ एवं मर्यादाएँ होती हैं और यह नितांत आवश्यक होता है कि इस विवरणों द्वारा प्रदत्त सूचनाओं का प्रयोग करते समय इन मान्यताओं एवं सीमाओं को ध्यान में रखा जाए। वित्तीय विवरण केवल सूचना प्रदान करते हैं और वह भी अंकों के रूप में। ये आवश्यक सूचनाएँ व्यवसाय के लिए गुणों या दोषों पर प्रकाश डालती हैं, इसकी खोज करना विश्लेषक या प्रयोगकर्ता का कार्य है।

सामान्यतया वित्तीय विवरणों का प्रयोग (निर्वाचन के उद्देश्य से) करते समय निम्नांकित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-
(i) वित्तीय विवरणों द्वारा प्रदत्त सूचनाएँ सुतथ्य (Precise) नहीं होती हैं। चूँकि वित्तीय विवरणों की रचना लेखा विधि पेशा के कई वर्षों के आधार पर प्रतिपादित एवं प्रयोगमुक्त व्यावहारिक विधियों एवं नियमों के आधार पर की जाती है, अतः इनसे प्राप्त सूचनाओं को सुतथ्यतापूर्वक मापा नहीं जा सकता है।

(ii) वित्तीय विवरण व्यापारिक संस्था की सही वित्तीय स्थिति को नहीं दर्शाते हैं। एक संस्था की वित्तीय स्थिति अनेक कारणों आर्थिक, सामाजिक एवं वित्तीय से प्रभावित होती है; परन्तु वित्तीय स्थिति में केवल वित्तीय कारणों का ही लेखा हो पाता है, आर्थिक व सामाजिक कारणों का उनमें समावेश नहीं हो पाता है। अतः वित्तीय विवरणों द्वारा प्रदर्शित वित्तीय स्थिति सही एवं शुद्ध न होकर वास्तविकता से परे होती है। जब तक आर्थिक एवं सामाजिक घटनाओं के संदर्भ में वित्तीय स्थिति का अध्ययन न किया जाय, उसके संबंध में वास्तविक स्थिति का ज्ञान नहीं हो पाता है।

(iii) आर्थिक चिट्ठा एक स्थिर प्रलेख माना जाता है और वह कम्पनी की स्थिति को केवल एक निश्चित क्षण पर दर्शाता है अर्थात् इससे यह पता चलता है कि कम्पनी ने एक निश्चित क्षण’ पर साधनों का किस प्रकार प्रयोग किया है और इस दृष्टिकोण से आर्थिक चिट्ठे को एक तात्कालिक चित्र (Instantaneous photograph) कह सकते हैं। कम्पनी की वास्तविक स्थिति दिन-प्रतिदिन परिवर्तित हो सकती है। इस सीमा के कारण आर्थिक चिट्ठे में दिखावटीपन (Window-dressing) की प्रवृत्ति पायी जाती है।

(iv) आर्थिक चिट्ठा कोई मूल्यांकन विवरण नहीं है अर्थात् इसमें प्रदर्शित मूल्य सम्पत्तियों का उचित मूल्य नहीं होता है। लेखा-विधि के सिद्धांतों के अनुसार आर्थिक चिट्ठे में स्थायी सम्पत्तियों को कालिक लागत (Historical cost) पर दिखाया जाता है, अर्थात् सम्पत्तियों की मूल लागत में से ह्रास की रकम घटाकर दिखाया जाता है। ह्रास की रकम चाहे कितने ही वैज्ञानिक ढंग से क्यों न आकलित की गयी हो, एक अनुमान मात्र होती है। इस प्रकार आर्थिक चिट्ठे में प्रदर्शित सम्पत्तियों का मूल्य वह मूल्य नहीं होता है जिस पर सम्पत्तियों को बेचा जा सकता हो। स्पष्ट है कि इस दशा में व्यवसाय की वास्तविक स्थिति का ज्ञान नहीं हो पाता है।

(v) लाभ-हानि खाते द्वारा प्रदर्शित लाभ वास्तविक लाभ नहीं होता है। किसी वर्ष के लिए लाभ-हानि खाते द्वारा दिखाया गया लाभ कभी भी गणितीय ढंग या आर्थिक दृष्टिकोण से शुद्ध . नहीं होता है क्योंकि लाभ-हानि खाते में प्रदर्शित बहुत-सी मदें अनुमान के आधार पर निकाली गयी होती हैं।

(vi) वित्तीय विवरणों द्वारा प्रदत्त-सूचनाएँ मूक होती हैं। यह भी ध्यान देने योग्य हैं कि वित्तीय विवरणों के निर्वचन में मानव निर्णय (Human Judgement) निहित होता है और सूचनाएँ अपने आप कुछ नहीं कहती हैं। प्रयोग करने वाला जुबान देता है। प्रायः ऐसा शायद ही संभव हो कि वित्तीय विवरणों के प्रयोग करने वाले विभिन्न व्यक्ति लेखा संबंधी किसी आँकड़े पर एक ही राय रखते हों। प्रत्येक प्रयोगकर्ता अपनी कुशलता एवं अनुभव के आधार पर एक ही सूचना का भिन्न-भिन्न अर्थ लगा सकता है।

(vii) वित्तीय विवरणों की निर्माण तिथि में अंतर होने के कारण उनके द्वारा प्रदत्त सूचनाएँ तुलना योग्य नहीं हो सकती हैं। साथ ही लेखा-विधि एवं व्यवसाय की प्रकृति में अंतर होने के कारण भी दो संस्थाओं के वित्तीय विवरणों का तुलनात्मक अध्ययन संभव नहीं होता है। दो संस्थाएँ लेखे की अलग-अलग विधि अपना सकती हैं या दोनों के यहाँ अंतिम खाते बनाने की तिथि अलग हो सकती है या दोनों के व्यवसायों में भिन्नता हो सकती है। इन दशाओं में दोनों संस्थाओं की उनके विवरण के आधार परं तुलनात्मक जाँच नहीं की जा सकती है।

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4

प्रश्न 1.
S Ltd. issued 5,000 shares of Rs. 100 each at a premium of Rs. 10 each payable as follows :
On Application – Rs. 30
On Allotment – Rs. 40 (including premium)
On First & Final Call – Rs. 40
All the shares were applied for and instalments received on due dates with the exception of the Allotment and First & Final Call on 100 shares, these shares were forfeited and re-issued as fully paid @ Rs. 105 per share.
Pass necessary Journal Entries in the books of the Company.
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 1
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 2
संकेत 1: हरण किए गए 100 अंशों पर आवंटन राशि प्राप्त नहीं हुई है और प्रीमियम क्योंकि आवंटन पर देय है, अतः इन अंशों पर प्रीमियम भी प्राप्त नहीं हुआ होगा। अतः हरण की प्रविष्टि में प्रीमियम को डेबिट किया जाएगा।

प्रश्न 2.
अ ब लि० ने 1,00,000; 12% पूर्वाधिकार अंशों के लिए आवेदन आमन्त्रित किए। पूर्वाधिकार अंशों का मूल्य 100 रु. प्रति अंश तथा उन्हें 10% के बट्टे पर निर्गमित किया गया था। अंश राशि निम्न प्रकार से देय थी।
आवेदन पर – 30 रु०
आवंटन पर – 20 रु०
प्रथम तथा अन्तिम याचना पर शेष
1,50,000 अंशों के लिए आवेदन प्राप्त हुए। 30,000 अंशों के लिए आवेदनों को रद्द कर दिया गया तथा शेष आवेदकों को आनुपातिक आधार पर अंशों का आवंटन किया गया। सभी याचनाएँ माँग ली गई तथा कुमार के 1,000 अंशों को छोड़ कर सभी याचनाएँ प्राप्त हो गईं। कुमार ने प्रथम तथा अन्तिम याचना का भुगतान नहीं किया, उसके अंशों को जब्त कर लिया गया। जब्त किए गए अंशों में से 700 अंशों को 120 रु० प्रति अंशों की दर से पूर्ण प्रदत्त पुनः निर्गमित कर दिया गया।
अ ब लि० के रोजनामचे में आवश्यक रोजनामचा प्रविष्टियाँ कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 3
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 4

प्रश्न 3.
गोविन्द लिमिटेड ने 100 रु० वाले 5,000, 12% ऋणपत्र सममूल्य पर निर्गमित किए जिनका भुगतान इस प्रकार होना चाहिए था, 20 रु० आवेदन पर, 20 रु० आवंटन पर, 30 रु० प्रथम याचना पर और शेष 30 रु० अन्तिम याचना पर। जनता ने 6,000 ऋणपत्रों के लिए आवेदन-पत्र भेजे। 4500 ऋणपत्रों के आवेदन-पत्रों को सम्पूर्ण आवंटन कर दिया गया। 800 ऋणपत्रों के आवेदन पत्रों को 500 ऋणपत्र दे दिए गए और 700 ऋणपत्रों के आवेदन-पत्रों को अस्वीकृत कर दिया गया। आवेदन-पत्रों के साथ प्राप्त आधिक्य राशि को आवंटन में प्रयोग किया गया।
जर्नल प्रविष्टियाँ कीजिए, यह मानते हुए कि 200 ऋणपत्रों पर अन्तिम याचना को छोड़कर सभी राशियाँ यथासमय प्राप्त हो गयीं।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 5

प्रश्न 4.
Tirupati Ltd. issue 20,000, 11% Debenture of Rs. 100 each, payable as follows: Rs. 25 on application; Rs. 35 on allotment and Rs. 40 on first and final call.
All the debentures were applied. A, the holder of 500 debentures paid the entire amount on his holding on allotment and B, the holder of 100 debentures failed to pay the allotment and final call. Pass Journal entries.
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 6
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 7

प्रश्न 5.
Journalise the following transaction :
(a) A Debenture issued at Rs. 95, repayable at Rs. 100
(b) A Debenture issued at Rs. 95, repayable at Rs. 110
(c) A Debenture issued at Rs. 100, repayable at Rs. 110
(d) A Debenture issued at Rs. 106, repayable at Rs. 100
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 8
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 9

प्रश्न 6.
अपोलो लिमिटेड ने 1 अप्रैल, 2002 को 100 रू० वाले 2,000, 12% ऋणपत्र निर्गमित : किए जिनका तीन वर्ष बाद सममूल्य पर शोधन (भुगतान) किया जाना है। इनके शोधन. के लिए एक शोधन कोष (Sinking fund) की स्थापना का निश्चय किया गया। विनियोगों पर 4% ब्याज प्राप्त होने की सम्भावना है। शोधन कोष तालिका दर्शाती है कि 0.320348. रु० प्रति वर्ष विनियोग करने पर 4% वार्षिक की दर से 3 वर्ष में 1 रु० बन जाता है।
31 मार्च, 2005 को विनियोगों को सममूल्य पर बेच दिया गया और ऋणपत्रों का भुगतान कर दिया गया। जर्नल प्रविष्टियाँ तथा खाते बनाइए। ऋणपत्रों पर ब्याज से सम्बन्धित प्रविष्टियाँ बनाने की आवश्यकता नहीं है।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 10
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 11
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 12
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 13

नोट 1. अगले वर्ष की जर्नल प्रविष्टियाँ बनाने से पहले पिछले वर्ष का ‘Sinking Fund Investments A/c बना लेना चाहिए क्योंकि प्रत्येक वर्ष ब्याज की गणना ‘Sinking Fund Investments A/c के प्रारम्भिक शेष पर की जाती है ।
2. अन्तिम वर्ष में सिकिंग फंड के वार्षिक प्रावधान की राशि को 34 पैसे से बढ़ा दिया गया है जिससे कि सिकिंग फंड खाते का जोड़ 2.00,000 रु० हो जाए ।
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 14
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 15
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 16
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 17
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 18

प्रश्न 7.
31 मार्च, 2014 को मोदी. रबड़ लि0 की पुस्तकें निम्न सूचनाएँ उपलब्ध कराती थीं :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 19
31 मार्च, 2015 तथा 2016 को समाप्त होने वाले वर्ष में ऋणपत्र शोधन खाते में अंशदान 1,30,800 रु० प्रति वर्ष था । ऋणपत्र, भुगतान के लिए 31 मार्च, 2016 को देय हुए।
कम्पनी की पुस्तकों में उपयुक्त खाते खोलिए यह मानते हुए कि प्रतिभूतियों से 31 मार्च, 2016 को 13,52,000 रु० प्राप्त हुए और प्रतिभूतियों को ब्याज तुरंत विनियोजित कर दिया जाता था।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 20
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 21
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 22

प्रश्न 8.
31 मार्च, 2014 को समाप्त होने वाले वर्ष का मैत्री क्लब का प्राप्ति एवं भुगतान खाता रु० 25,000 चंदे से प्राप्त राशि दिखाता है। अतिरिक्त सूचनाएँ निम्न प्रकार हैं-
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 23
वर्ष 2014-15 के लिए चंदे से प्राप्त आय की गणना कीजिए तथा चंदे से संबंधित आवश्यक मदों की प्रारंभिक तथा अंतिम स्थिति विवरण में दिखाइए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 24

प्रश्न 9.
रोकड़ प्रवाह विवरण का एक अनुमानित प्रारूप तैयार कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 25
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 4, 26

प्रश्न 10.
निम्न सूचना से (i) पूँजीकरण विधि एवं (ii) अधिलाभों के 3 वर्षों के क्रय पर ख्याति की गणना कीजिये
(i) कुल परिसम्पत्तियाँ – ₹ 10,00,000
(ii) बाह्य दायित्व – ₹ 1,80,000
(iii) सामान्य प्रत्याय की दर – 10%
(iv) गत पाँच वर्षों का औसत शुद्ध लाभ – ₹ 1,00,000
उत्तर:
Average Profit = Rs. 1,00,000 Total Assets = Rs. 10,00,000
External Liabilities = Rs 1,80,000
Therefore, Capital Exployead = Total Assests – External liabilities
Capital Employeed = Rs. 10,00,000 – 1,80,000 = Rs. 8,20,000
Normal Profit = Rs. 8,20,000 × \(\frac {10}{100}\) = Rs. 82,000
Super Profit = Average Profit – Normal Profit
= Rs. 1,00,000 – 82,000 = Rs. 18,000

(i) Good will by Capitalization Method = \(\frac{\text { Super Profit } \times 100}{\text { Normal Rate of Return }}\)
= \(\frac{18,000 \times 100}{10}\) = Rs. 1,80.000
(ii) Good will by super Profit method = Super Profit × No of P.Y.
= 18,000 × 3 = 54,000

प्रश्न 11.
विश्लेषण की विभिन्न विधियों की विवेचना करें।
उत्तर:
वित्तीय विवरण के विश्लेषण का इतिहास वर्तमान शताब्दी से प्रारम्भ हुआ है। पाश्चात्य देशों में इस पद्धति का प्रयोग साख विश्लेषण के लिए प्रारम्भ हुआ था। सन् 1914 ई० तक साख प्रदान करने वाले केवल वित्तीय विवरणों की वस्तु-स्थिति पर विश्वास करके साख प्रदान करते थे। परन्तु धीरे-धीरे इन विवरणों में प्रदत्त समंकों का विश्लेषण महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा और इनके लिए अनेक विधियों का विकास हुआ । वर्तमान में निर्वचन एवं विश्लेषण की मुख्य विधियाँ निम्न हैं : (अ) अनुपात विश्लेषण (Ratio Analysis), (ब) तुलनात्मक विवरणों को तैयार करना (Preparation of Comparative Statements), (स) फण्ड-बहाव विवरण (Fund Flow Statement), (द) रोकड़-बहाव विवरण (Cash Flow Statement), (य) प्रवृत्ति विश्लेषण (Trend Analysis)।

(अ) अनुपात विश्लेषण- वित्तीय विवरणों में प्रदत्त व्यावसायिक तथ्यों का व्यक्तिगत रूप में कोई महत्त्व नहीं होता है। वे आपस में एक-दूसरे से सम्बन्धित होते हैं। अतः उनके आधार पर कोई भी उचित निष्कर्ष उस समय तक नहीं निकाला जा सकता है, जब तक कि विभिन्न मदों के बीच कोई सम्बन्ध स्थापित न किया जाए। दो या दो से अधिक मदों के बीच एक तर्कयुक्त व नियमबद्ध पद्धति के आधार पर सम्बन्ध स्थापना का परिणाम ही ‘अनुपात’ कहलाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अनुपात एक ऐसा संख्यात्मक सम्बन्ध प्रदर्शित करता है, जो वित्तीय विवरणों की दो या दो से अधिक मदों के बीच पाया जाता है। इस सम्बन्ध को अनुपात के रूप में, दर के रूप में या प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।

अनुपात विश्लेषण से अनेक उद्देश्यों की पूर्ति हो सकती है। प्रमुख रूप में प्रबन्ध के आधारभूत कार्य योजना, समन्वय, नियन्त्रण, संवहन एवं पूर्वानुमान के कार्य में सहायता पहुँचाना ही अनुपात विश्लेषण का उद्देश्य होता है। अनुपात विश्लेषण की तकनीक में (i) लेखांकन अनुपातों का निर्धारण, (ii) अनुपातों की गणना, (iii) निकाले गए अनुपातों की प्रमाणित अनुपातों से तुलना, (iv) अनुपातों का निर्वचन तथा (v) अनुपातों के आधार पर प्रक्षेपित वित्तीय विवरण तैयार करना शामिल होता है। .

(ब) तुलनात्मक विवरण- तुलनात्मक वित्तीय विवरण किसी व्यवसाय की वित्तीय स्थिति के इस प्रकार बनाये गये विवरण होते हैं जो विभिन्न तत्त्वों पर विचार करने के लिए समय परिप्रेक्ष्य को दृष्टिगत रखते हुए किये जाते हैं। विश्लेषण हेतु तुलनात्मक विवरणों को तैयार करते समय इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि किसी संस्था के जितने समय के वित्तीय इतिहास का अध्ययन किया जाता हो, उस समय के दौरान समंकों एवं सूचनाओं के एकत्रीकरण की विधियों ‘में भिन्नता न हो।

विश्लेषण एवं निर्वचन के लिए तैयार किये जाने वाले तुलनात्मक विवरणों में तुलनात्मक चिट्ठा, उत्पादन लागत का तुलनात्मक विवरण, तुलनात्मक लाभ-हानि खाता, कार्यशील पूँजी का तुलनात्मक विवरण आदि महत्त्वपूर्ण है। इन तुलनात्मक विवरणों में वित्तीय आँकड़ों एवं सूचनाओं को निम्न प्रकार से दिखलाया जा सकता है :
(i) निरपेक्ष अंकों (मुद्रा मूल्य) के रूप में, (ii) निरपेक्ष अंकों में वृद्धि या कमी के रूप में, (iii) निरपेक्ष अंकों में हुई वृद्धि या कमी के प्रतिशत के रूप में तथा (iv) समान आकार वाले विवरणों के रूप में ।

वित्तीय विवरणों को तुलनात्मक रूप में प्रस्तुत. करके दो वित्तीय अवधियों में हुए परिवर्तनों की जानकारी तथा वित्तीय स्थिति एवं संचालन के परिणामों की दिशा ज्ञात की जा सकती है ।

(स) फण्ड-बहाव विवरण- फण्ड-बहाव विवरण सारांश रूप में तैयार किया गया एक ऐसा विवरण है, जो दो तिथियों पर तैयार किये गये आर्थिक चिट्ठे के वित्तीय मदों में हुए परिवर्तन को दर्शाता है। इसके लिए फण्ड से तात्पर्य कार्यशील पूँजी से लगाया जाता है और बहाव से तात्पर्य फण्ड के निर्माण एवं उत्पत्ति से होता है। इस प्रकार फण्ड-बहाव विवरण एक निश्चित अवधि में कार्यशील पूँजी में हुए परिवर्तनों एवं अन्य वित्तीय मदों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने हेतु तैयार किया जाता है। इससे न केवल संस्था की वित्तीय दशा की सुदृढ़ता के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है, बल्कि प्रबन्ध की वित्तीय नीतियों के सफल क्रियान्वयन के विषय में भी जानकारी मिलती है। यह प्रबन्ध की उस उच्च दक्षता को भी दर्शाता है जिसके सहारे प्रबन्धकीय निर्णय लिये गये होते हैं। यह उन जटिल प्रश्नों का भी सहज उत्तर प्रदान करता है, जिसे वित्तीय विवरणों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह संस्था की प्रगति के मूल्यांकन में, इसकी वित्तीय आवश्यकताओं एवं उनके अनुकूलतम वित्तीय प्रबन्धन के निर्धारण में भी सहायता देता है । इस विवरण की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए ए. आई. सी. पी. ए. ने मत प्रकट किया है, “वार्षिक रिपोर्ट में भली-भांति से चित्रित तुलनात्मक फण्ड-बहाव विवरण सम्मिलित करना एक सामान्य प्रथा बन जानी चाहिए ।” हालांकि फण्ड-बहाव विवरण के अनेक उपयोग हैं और यह वित्तीय विश्लेषण का महत्त्वपूर्ण यंत्र है, फिर भी इसकी अनेक सीमाएँ व मर्यादाएँ हैं, जिन्हें इसका प्रयोग करते समय अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।

(द) रोकड़-बहाव विवरण-रोकड़-बहाव विवरण रोकड़-बहाव का एक विवरण है और रोकड़-बहाव व्यावसायिक संस्था के अन्दर एवं बाहर रोकड़ की गति को दर्शाता है। रोकड़ आगमन रोकड के साधन के रूप में और रोकड बहिर्गमन रोकड के प्रयोग के रूप में माना जाता है। यह विवरण उन कारकों पर भी प्रकाश डालता है, जिनके कारण रोकड़ का आगमन व बहिर्गमन होता है। इस प्रकार रोकड़-बहाव विवरण एक ऐसा विवरण है, जिसे दो चिट्ठों की तिथियों के मध्य रोकड़ स्थिति में हुए परिवर्तन एवं उसके कारकों पर प्रकाश डालने के लिए तैयार किया जाता है। रोकड़-बहाव विवरण संस्था के अल्पकालीन वित्तीय परिवर्तनों के जाँच की एक तकनीक है। यह संस्था की वित्तीय नीतियों और वर्तमान रोकड़ स्थिति के मूल्यांकन में सहायक होता है। भावी अवधि के लिए तैयार किये जाने पर यह प्रबन्ध को संस्था के वित्तीय कार्यकलापों के नियोजन एवं समन्वय में भी सहायक होता है। इस विवरण की सहायता से संस्था का रोकड़ बजट भी तैयार किया जा सकता है।

(य) प्रवृत्ति विश्लेषण-वित्तीय विवरणों के निर्वचन में प्रवृत्ति विश्लेषण का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रवृत्ति सामान्य रूप में एक साधारण रुख को कहते हैं। व्यावसायिक तथ्यों की प्रवृत्ति का विश्लेषण प्रवृत्ति अनुपात या प्रतिशत एवं बिन्दुरेखीय पत्र या चार्ट पर अंकित करके किया जा सकता है। इसके अन्तर्गत लाभ-हानि खाते या चिट्टे के किसी भी मद के सम्बन्ध में उसकी प्रवृत्ति ज्ञात की जा सकती है, अर्थात् तीन-चार वर्षों के अन्तर्गत उस मद में क्या परिवर्तन हुए हैं, अर्थात् उसमें प्रति वर्ष कमी हुई है अथवा वृद्धि हुई, इसको प्रवृत्ति विश्लेषण के द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, पिछले छः वर्षों के विक्रय की राशि को एक जगह रखकर यह देख सकते हैं कि प्रति वर्ष उसमें कितनी वृद्धि या कमी हो रही है और उसके आधार पर अगले वर्ष के लिए विक्रय का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।

प्रश्न 12.
वित्तीय लेखा अनुपात से आप क्या समझते हैं ? इसके उद्देश्यों एवं महत्त्व की व्याख्या करें।
उत्तर:
अनुपात एक ऐसा संख्यात्मक सम्बन्ध प्रदर्शित करता है। जो वित्तीय विवरणों के दो या दो से अधिक मदों के बीच मापा जाता है। हंट, विलियम तथा डोनाल्डसन के अनुसार “अनुपात वित्तीय विवरणों या लेखाकन से प्राप्त संख्याओं के सम्बन्ध को अंकगणितीय रूप में प्रदर्शित करने का साधन मात्र है ।”

अनुपात विश्लेषण का उद्देश्य (Objective of Ratio Analysis)- प्रमुख रूप में प्रबंध के आधारभूत कार्य, योजना, समन्वय; नियंत्रण, संवहन एवं पूर्वानुमान के कार्य में सहायता पहुँचाना ही अनुपात विश्लेषण का उद्देश्य होता है और इसका आधार पर भावी घटना के विषय में घोषणा की जाती है-(1) भूतकालीन अनुपात द्वारा लागत, विक्रय, लाभ और अन्य सम्बन्धित तथ्यों की प्रवृति के विषय में ज्ञान प्राप्त हो सकता है और उनके आधार पर भावी घटना के विषय में घोषणा की जाती है। (2) ‘आदर्श अनुपातों’ (Ideal Ratios) की रचना की जा सकती हैं और प्रमुख अनुपात के बीच पाये जाने वाले सम्बन्ध को ‘इच्छित समन्वय’ के लिए प्रयोग किया जा सकता है। (3) विक्रय-नियंत्रण एवं लागत-नियंत्रण में भी अनुपातों की सहायता ली जा सकती है। (4) अनुपात के प्रयोग द्वारा संवहन का कार्य सरल हो जाता है । इसके आधार पर सरलतापूर्वक बताया जाता है कि दो अवधियों कि दो अवधियों के बीच क्या हुआ है। (5) चूँकि अनुपात द्वारा वित्तीय समंकों में एकरूपता आ जाती है, अतः अन्तर्घमंडल तुलना (inter-firm comparison) सम्भव हो जाती है।

अनुपातों का महत्त्व एवं सीमाएँ (Singnificance and Limitations of Ratios)- वित्तीय विवरणों के निर्वचन में अनुपात विश्लेषण का महत्त्व ही अधिक होता है । अनुपातों के आधार पर विश्लेषक अंकों की सतह तक पहुँच सकता है। जिस रूप में संख्याएँ वित्तीय विवरणों में प्रस्तुत की गयी होती हैं, उस रूप में उनका न कोई महत्व होता है। और न वे किसी उद्देश्य को ही पूरा कर सकती है। वस्तुतः मूल रूप में वे मौन होती हैं। अनुपातों का प्रयोग उन्हें बोलने की शक्ति प्रदान करता हैं। इसी प्रकार व्यक्तिगत मदों से सम्बन्धित समंक अपने-आप में थोड़ा या कुछ भी माने नहीं रखते हैं। उनकी पूर्णतया योग्यता अन्य मदों के सम्बन्ध पर ही निर्भर करती हैं। उदाहरण के लिए, आर्थिक चिट्ठे में प्रदर्शित नकद धन का निरपेक्ष मूल्य अपने-आप में महत्त्वहीन होता है। लेकिन जब उसका सम्बन्ध चालू दायित्वों से स्थापित किया जाता है, तो उसका महत्त्व बढ़ जाता है। इस प्रकार अनुपात विश्लेषण के आधार पर अनेक वित्तीय मामलों के सम्बन्ध में जाँच एवं निर्णय लिये जा सकते हैं।

नि:संदेह अनुपात प्रबंध के लिए अमूल्य औजार होते हैं, परन्तु उनका महत्त्व उनके उचित प्रयोग पर ही निर्भर करता है। अनुपातों का गलत प्रयोग प्रबंध को या प्रयोगकर्ता को गुमराह कर सकता है और उनके आधार पर निकाला गया निष्कर्ष गलत हो सकता है। साधारणतया एक एकल अनुपात का सीमित मूल्य या महत्त्व होता है। क्योंकि विश्लेषण में प्रवृति का स्थान अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। केनेडी एवं मैक्समूलर का कथन है, “एक अकेला अनुपात अपने आप में अर्थहीन होता है, वह सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत नहीं करता है। (A single ratio in itself is meaningless; it does not furnish a complete picture.) इसी प्रकार एक अमुक अनुपात में हुआ परिवर्तन तभी महत्त्वपूर्ण दिखाई दे सकता है, जब उसका अध्ययन अन्य अनुपातों के सम्बन्ध में किया जाए।

अनुपात का प्रयोग करते समय यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि प्रयोगकर्ता उन संस्थाओं के विषय में पूर्ण ज्ञान रखता हो, जिनके विवरणों के आधार पर अनुपात की गयी है। साथ ही अनुपातों की गणना लक्ष्य नहीं बल्कि लक्ष्य की प्राप्ति का साधन मात्र होता है। अतः यह पूर्णतया प्रयोगकर्ता के ऊपर निर्भर करता है कि वह इन अनुपातों के आधार पर कैसा निष्कर्ष निकालता है। अनुपातों का प्रयोग करते समय यह भी समस्या है कि किस अनुपात का ‘प्रमाप’ के रूप में माना जाए, ताकि उसके आधार पर वास्तविक अनुपातों की तुलना की जा सके। साधारणतया ऐसा कोई प्रमाप अनुपात नहीं हो सकता है, जिसका तुलनात्मक अध्ययन में प्रयोग किया जा सके। व्यवहार में एक संस्था की परिस्थितियाँ दूसरी संस्था से भिन्न होती हैं और प्रत्येक उद्योग की प्रकृति में भी भिन्नता होता है। फलस्वरूप प्रत्येक उद्योग के लिए प्रमाप अनुपात भी भिन्न-भिन्न होते हैं।

इन सामान्य बातों के अलावा अनुपातों का प्रयोग करते समय निम्न सावधानियां बरतना आवश्यक होता है-
1. प्रयोगकर्ता में यह गुण होना चाहिए कि वह लेखा समंकों की प्रकृति को अच्छी तरह परख सके। यदि लेखा समंकों में एकरूपता, विशेषतः परिभाषात्मक एकरूपता का अभाव हो, तो उनके आधार पर निकाला गया अनुपात भ्रमात्मक हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि एक संस्था शुद्ध बिक्री की रकम को ज्ञात करने के लिए छूट, उपहार आदि घटा देती है और दूसरी. संस्था इस मद को लाभ-हानि खाते में चार्ज करती है, तो दोनों की विक्रय का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए संशोधन करना आवश्यक हो जाता है। जब तक प्रयोगकर्ता लेखा-संबंधी तकनीकों में गूढ ज्ञान नहीं रखेगा, इस प्रकार के समंकों की अतुलनीयता की खोज नहीं कर सकता है।

2. अनुपातों की गणना एवं सम्बन्धित व्यक्तियों को उनके संवहन के बीच समय को अन्तर आवश्यकता से अधिक नहीं होना चाहिए। जो व्यक्ति संस्था में रुचि रखता हो और कुछ विशिष्ट-उद्देश्यों के लिए अनुपातों का विश्लेषण करना चाहता हो तो अनुपातों की उसके लिए उपयोगिता तभी होगी, जब ये अनुपात उचित समय पर और उचित ढंग से उसके पास गमित कर , दिए जाएँ।

3. अनुपातों की उपयोगिता बहुत कुछ प्रस्तुतीकरण के ढंग पर भी निर्भर करती है। प्रस्तुतीकरण की समस्या दो रूपों में महत्त्वपूर्ण होता है। प्रथम, केवल वही अनुपात प्रस्तुत किये जायें, जो प्रत्यक्ष रूप में विचाराधीन समस्या से सम्बन्धित हों। द्वितीय, अनुपात उन्हीं व्यक्तियों के समक्ष प्रस्तुत किए जाएँ, जो विचाराधीन समस्या से सम्बन्धित हो। उदाहरण के लिए, विक्रय क्षमता की जाँच करने के लिए विक्रय प्रबन्धक के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए, क्योंकि ‘विक्रय’ का क्षेत्र उसी के अधीन होता है।

4. गत कई वर्षों के अनुपातों का अध्ययन करने एवं उद्योग में लगी हुई अन्य संस्थाओं के अनुपातों को ध्यान में रखते हुए, प्रत्येक प्रमुख समस्या के सम्बन्ध में एक ‘प्रमाप अनुपात’ निश्चित कर लेना चाहिए। इस ‘प्रमाप’ से ‘वास्तविक’ अनुपात की तुलना अधिक लाभप्रद सूचना दे सकती है।

5. अनुपात में सत्यता की मात्रा उतनी ही होती है जितनी कि वित्तीय विवरणों में प्रदत्त समंकों की, जिनके आधार पर अनुपात की गणना की जाती है । यदि वित्तीय विवरणों में प्रदत्त निरपेक्षीय समंक अविश्वसनीय हैं तो अनुपात भी अविश्वसनीय होते हैं।

6. जब दो संस्थाओं के तुलनात्मक अध्ययन में अनुपात का प्रयोग किया जा रहा हो, तो यह ध्यान में रखना चाहिए कि दोनों संस्थाओं में प्रयुक्त लेखांकन योजना (Accounting Plan)। एवं आधारभूत सिद्धांतों में भिन्नता न हो।

7. मूल-स्तर में परिवर्तन होने के कारण गत कई वर्षों के आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन जटिल एवं भ्रमात्मक हो सकता है।

8. कभी भी ऐसी दो संस्थाओं के आँकड़ों का अनुपात द्वारा विश्लेषण नहीं करना चाहिए, जो आपस में सम्बन्धित न हो या तुलना-योग्य न हों। इस दशा में अनुपातों का प्रयोग सदैव गलत निष्कर्ष प्रदान करता है।

9. अनुपात विश्लेषण निर्वचन एवं निष्कर्ष को कई विधियों में से एक विधि है। इस आधार पर निष्कर्ष निकालते समय अन्य सम्बन्धित तथ्यों एवं कारणों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

प्रश्न 13.
वित्तीय विवरण के विश्लेषण का महत्व क्या है ?
उत्तर:
वित्तीय विवरणों का विश्लेषण और निर्वचन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिससे प्रबंधक, बैंक, ऋणदाता, अंशधारी तथा विनियोक्ता सभी उपयोगी निष्कर्ष निकालते हैं। संक्षेप में, वित्तीय विवरणों के विश्लेषण का निम्नलिखित महत्व इस प्रकार है-

(i) वैज्ञानिक निर्णय (Scientific Decision)- निर्णयकर्ता के मन पर सहज ज्ञान के आधार पर निर्णय लेते समय जो विभिन्न प्रभाव पड़ते हैं, उनके बहुत अधिक सीमा तक त्रुटिपूर्ण एवं भ्रामक होने की संभावना रहती है लेकिन वित्तीय विवरणों के विश्लेषण से जो निर्णय प्राप्त होते हैं। वे तथ्यों पर आधारित होने के कारण वैज्ञानिक माने जाते हैं।

(ii) पक्षपात रहित निर्णय (Unbiased Decision)- किसी विषय पर निर्णयकर्ता के व्यक्तिगत अनुभव और स्वभाव का उसके द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है लेकिन वित्तीय विवरणों के विश्लेषण के आधार पर लिए गए निर्णय इन दोषों से मुक्त होते हैं।

(iii) प्रबंधकीय दृष्टि महत्व (Importance with view point of Management)- वित्तीय विवरणों के विश्लेषण व निर्वचन का महत्व- प्रबंधकीय दृष्टि से बहुत अधिक है। प्रबंधन इस तकनीक का प्रयोग निम्नलिखित कार्यों के लिए कर सकता है-

  • व्यवसाय के उत्पादन, विक्रय एवं मूल्य नीतियों की सफलता के मूल्यांकन के लिए।
  • विभागों, प्रक्रियाओं आदि की सापेक्षिक कुशलता निर्धारित करने के लिए।
  • व्यावसायिक क्रियाओं पर नियंत्रण और अपव्यय को रोकने के लिए।
  • विभिन्न व्यावसायिक क्रियाओं के तुलनात्मक अध्ययन पूर्वानुमान के लिए तथा
  • समस्त व्यावसीयक क्रिया की सफलता-असफलता के मूल्यांकन के लिए ताकि कमजोरियों को दूर करने के उपाय किये जा सके इत्यादि।

(iv) बाह्य पक्षों के लिए महत्व (Importance for Outside parties)- व्यवसाय के बाह्य पक्षों में लेनदार विनियोजक सरकार, अंकेक्षक, अर्थशास्त्री आदि आते हैं। इनकी दृष्टि से वित्तीय विवरणों के विश्लेषण एवं निर्वचन का अपना अलग महत्व है जो इस प्रकार है-

  • व्यवसाय के लेनदार, बैंकर्स आदि इस तकनीक के प्रयोग से संस्था की वित्तीय स्थिति और ऋण परिशोधन क्षमता का मूल्यांकन करते हैं। इस मूल्यांकन के आधार पर ही व्यावसायिक संस्थाओं को साख प्रदान करते हैं।
  • सरकार वित्तीय विवरण के समंकों का प्रयोग कम्पनी के नियम और प्रशासन के लिए करती है।
  • अर्थशास्त्री वित्तीय विवरणों के विश्लेषण से वर्तमान व्यावसायिक दशाओं की समः। करते हैं तथा पूर्वानुमान करते हैं।
  • कम्पनी के अंकेक्षक इस तकनीक का प्रयोग अंकेक्षण कार्यक्रम की योजना बनाने तथा संचालक मण्डल से अंकेक्षण प्रतिवेदन के विवेचन में करते हैं।

(v) अंशधारियों की दृष्टि से महत्व (Importance with view point of share-holders)- व्यवसाय के वर्तमान एवं सम्भावित अंशधारी कम्पनी के अंशों को क्रय करने बेचने या उन्हें रखने के संबंध में निर्णय वित्तीय विवरणों का विश्लेषण करके ही करते हैं। यह विश्लेषण उन्हें वर्तमान, लाभांश दर, अंशों के वर्तमान मूल्य, भावी लाभांश दर, विनियोग की सुरक्षा आदि के संबंध में आवश्यक जानकारी प्राप्त करने में सहायक होता है।

प्रश्न 14.
अनुपातों का वर्गीकरण प्रस्तुत करें।
उत्तर:
अनुपातों का वर्गीकरण (Classification of Ratios)- अनुपातों का वर्गीकरण विभिन्न रूपों में किया जा सकता है। कुछ सम्भावित वर्गीकरण निम्न प्रकार है
1. विवरण के आधार पर वर्गीकरण (Classification by Statement)- यह वर्गीकरण उन विवरणों के ऊपर आधारित है, जिनमें प्रदत्त सूचनाओं के आधार पर अनुपात निकाले जाते है। चूँकि सम्बन्धी सूचनाएँ दो विवरणों (आर्थिक चिट्ठा एवं लाभ-हानि) से प्राप्त की जा सकती है, इसलिए इस वर्गीकरण के अन्तर्गत निम्न को शामिल कर सकते हैं।

(अ) आर्थिक चिट्ठा का अनुपात (Balance Sheet Ratio)- इसे कभी-कभी वित्तीय अनुपात (Financial ratios) भी कहते हैं । इसके अन्तर्गत निम्न अनुपातों को शामिल करते हैं:
(i) तरलता अनुपात (Liquidity Ratio), (ii) चालू अनुपात (Current Ratio), (iii) स्कन्ध अनुपात (Stock Ratio), (iv) स्वामित्व अनुपात (Proprietory Ratio)।

(ब) लाभ-हानि अनुपात (Profit and Loss Ratio)- इसे कभी-कभी संचालन अनुपात (Operating Ratios) भी कहते हैं। इसमें निम्नलिखित को शामिल करते हैं।
(i) आवर्त या बिक्री अनुपात (Turnover or Sales Ratio), (ii) खर्चा अनुपात (Expenses Ratio), (iii) आय अनुपात (Earning Ratio)।

(स) आर्थिक चिट्ठा एवं लाभ-हानि अनुपात (Balance Sheet and Profit & Loss Ratio)- इन अनुपातों की गणना आर्थिक चिट्ठा एवं लाभ-हानि खाता दोनों के प्रदत्त समंकों के आधार पर की जाती है। इन्हें कभी-कभी संयुक्त अनुपात भी कहते हैं। इसमें बहुधा निम्न को शामिल करते हैं-(i) विनियोजित पूँजी पर प्रत्याय (Return on Capital Employed), (ii) अंशधारी फण्ड पर प्रत्याय (Return on Sharcholders Fund), (iii) चालू सम्पत्ति आवर्त अनुपात (Current Assets Turnover Ratio), (iv) स्थायी सम्पत्तियों पर शुद्ध बिक्री का अनुपात (Ratio of Net Sales to Fixed Assets)।

2. प्रकृति के आधार पर वर्गीकरण (Classification by Nature)- इस वर्गीकरण के अन्तर्गत अनुपातों की प्रकृति को ध्यान में रखा जाता है । इस विधि के अन्तर्गत अनुपातों का वर्गीकरण निम्नलिखित रूप में कर सकते हैं।
(अ) तरलता, शोधन-क्षमता या कार्यशील पूँजी अनुपात (Liquidity, Solvency or Working Capital Ratio)
(ब) स्कन्ध अनुपात (Sales Ratio)
(स) देनदार एवं लेनदार अनुपात (Debtors and Creditors Ratios)
(द) विक्रय अनुपात (Sales Ratio)
(य) आय व लाभांश अनुपात (Earnings and Dividend Ratio)
(र) लागत अनुपात (Cost Ratio)

3. प्रयोगकर्ता के आधार पर (Classification by Users)-
(अ) प्रयोगकर्ता के आधार पर (Ratio for Management):
(i) संचालन अनुपात (Liquidity Ratio), (ii) विनियोजित पूँजी पर प्रत्याय (Return on Capital Employed), (iii) स्कन्ध आवर्त (Stock Turnover), (iv) देनदारों आवर्त (Debtors Turnover), (v) शोधन-क्षमता अनुपात (Solvency Ratio)

(ब) लेनदारों के लिए अनुपात (Ratios for Creditors) :
(i) चालू अनुपात (Current Ratio), (ii) शोधन अनुपात (Solvency Ratio), (iii) लेनदार आवर्त (Creditors Turnover), (iv) स्थायी सम्पत्ति अनुपात (Fixed Assets Ratio), (v) सम्पत्ति कवर (Assets Cover), (vi) ऋणी सेवा अनुपात (Debt Service Ratio)।

(स) अंशधारियों के लिए अनुपात (Ratios for Shareholders) :
(i) अंशधारियों के फण्ड पर प्रत्याय (Return on Shareholders Fund), (ii) पूँजी मिलान अनुपात (Capital Gearing Ratio), (iii) लाभांश कवर (Dividend Cover), (iv) प्रतिफल दर (Yield Rate), (v) स्वामित्व अनुपात (Proprietory Ratio), (vi) लाभांश दर (Dividend Rate), (vii) अंशों पर सम्पत्ति का कवर (Assets Cover of Shares)।

4. सापेक्षित महत्त्व के आधार पर वर्गीकरण (Classification by Relative Importance)-
(अ) प्राथमिक अनुपात (Primary Ratios) :
(i) विनियोजित पूँजी पर प्रत्याय (Return on Capital Employed), (ii) सम्पत्ति आवर्त (Assets Turnover), (iii) लाभ अनुपात (Profit Ratio)।

(ब) गौण निष्पादन अनुपात (Secondary Performance Ratios):
(i) कार्यशील पूँजी आवर्त (Working Capital Turnover), (ii) स्कन्ध का चल सम्पत्तियों पर अनुपात (Stock to Current Assets Ratio), (iii) चालू सम्पत्तियों की स्थायी सम्पत्तियों पर अनुपात (Current Assets to Fixed Assets Ratio), (iv) स्थायी सम्पत्तियों का कुल सम्पत्तियों पर अनुपात (Fixed Assets to Total Assets Ratio)।

(स) गौण साख अनुपात (Secondary Credit Ratios):
(i) लेनदार आवर्त (Creditors Turnover), (ii) देनदार आवर्त (Debtors Turnover), (iii) तरल अनुपात (Liquid Ratio), (iv) चालू अनुपात (Current Ratio), (v) औसत वसूली अवधि (Average Collection Period)।

(द) विकास अनुपात (Growth Ratios) :
(i) बिक्री में विकास दर (Growth Rate in Sales), (ii) शुद्ध सम्पत्तियों में विकास दर . (Growth Rate in Assets)

5. लेखाकंन महत्त्व के आधार पर वर्गीकरण(Classification by Accounting Significance)-
(अ) शोधन अनुपात (Solvency Ratios)
(ब) अर्जन अनुपात (Earning Ratios)
(स) पूँजीकरण अनुपात (Capitalisation Ratios)
(द) साख अनुपात (Creditor Ratios)
(य) प्रबन्ध अनुपात (Management Ratios)

6. उद्देश्य के अनुसार वर्गीकरण (Classification by Purpose)- जिन उद्देश्यों के लिए विश्लेषक अनुपातों का प्रयोग कर सकता है। उनके आधार पर भी अनुपातों का वर्गीकरण किया जा सकता है। सामान्यतः अनुपातों का प्रयोग किसी संस्था की लाभदायकता (Profitability) निष्पादन क्षमता (Activity of Operating Efficiency) या वित्तीय स्थिति की जाँच करने के लिए ही किया जाता है। इस प्रकार उद्देश्य के अनुसार अनुपात निम्न प्रकार के हो सकते हैं-
(अ) लाभदायकता अनुपात (Profitability Ratios)
(ब) निष्पादन अनुपात (Activity Ratios)
(स) वित्तीय स्थिति अनुपात (Financial Position Ratios)

प्रश्न 15.
लाभदायकता अनुपात से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
लाभदायकता अनुपात (Profitability Ratios)- प्रत्येक गावसयिक संस्था का उद्देश्य लाभ कमाना होता है। साथ ही प्रत्येक संस्था का यह प्रयत्न होता है कि प्राप्त लाभ की मात्रा न केवल निरपेक्ष रूप में (Absolute) अधिक हो, बल्कि सापेक्षिक दृष्टि से भी अधिक हो अर्थात् उस संस्था में प्रयुक्त पूँजी एवं साहस की तुलना में लाभ की मात्रा पर्याप्त हो। एक व्यावसायिक संस्था द्वारा उपलब्ध साधनों के अधिकतम प्रयोग अधिकतम लाभ कमाने की क्षमता को ही लाभदायकता कहते हैं। लाभदायकता की स्थिति में बिक्री की मात्रा, लागतों की प्रकृति एवं वित्तीय साधनों के समुचित प्रयोग पर निर्भर करती है। लाभदायकता के विश्लेषण के अन्तर्गत बिक्री का अध्ययन बिक्रीत वस्तु की लागत का विश्लेषण, बिक्री की कुल उपान्त (Gross Margin) का विश्लेषण, संचालन व्यय का विश्लेषण, संचालन लाभ का विश्लेषण एवं बिक्री एवं पूँजी की तुलना में शुद्ध आय का विश्लेषण आदि शामिल होता है। इस प्रकार के विश्लेषण में अनेक अनुपातों का प्रयोग किया जाता है जो निम्नलिखित है-

1. कुल लाभ अनुपात या बिक्री पर कुल लाभ का उपान्त (Gross Profit Ratio or Gross Margin to Net Sales)-शुद्ध बिक्री और बेची गयी वस्तु की लागत का अन्तर (कुल लाभ) बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। क्योंकि यह शुद्ध बिक्री पर कुल लाभ के उपान्त (Margin) को प्रदर्शित करता है। कुल लाभ का उपान्त इतना पर्याप्त होना चाहिए कि संचालन व्यय तथा अन्य व्यय को पूरा करने के बाद भी बिक्री व स्वामी इक्विटी की तुलना में शुद्ध आय पर्याप्त हो। कुल लाभ उपान्त का विश्लेषण करने के लिए कुल लाभ अनुपात या बिक्री पर कुल लाभ . . का उपान्त अनुपात की गणना की जाती है। इसे ज्ञात करने का सूत्र इस प्रकार है
Gross Profit Ratio = \(\frac{\text { Gross Profit } \times 100}{\text { Sales }}\)

नोट- यदि 100 में से कुल लाभ अनुपात घटा दें, तो बेची गयी वस्तु की लागत का बिक्री पर अनुपात ज्ञात हो जाएगा। इस प्रकार का अनुपात भी अप्रत्यक्ष ढंग से संस्था की कुल लाभ उपान्त पर ही प्रकाश डालता है।

सामान्यतया यह अनुपात जितना ही ऊंचा होता है अच्छा माना जाता है। यह अनुपात जितना  ही नीचा और कम होता है, संस्था की लाभदायकता उतनी ही कम मानी जाती है।

कुल लाभ अनुपात का विशद् गहन विश्लेषण करने के लिए वह आवश्यक हो जाता है कि ऐसा विवरण तैयार करें जिसमें उन सभी कारकों के अंकात्मक प्रभाव को दर्शाया जाए, जो कुल लाभ में परिवर्तन के लिए उत्तरदायी रहे हों। इस प्रकार के विवरण को ‘कुल उपान्त’ में विचरणांश के कारणों का विवरण (StatementAccounting for Variation of Gross Margin) कहते हैं। इस विवरण की रचना करने के लिए विवरणात्मक सूचना की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार की सूचना बाह्य विश्लेषक को नहीं प्राप्त हो पाती है। परन्तु आन्तरिक विश्लेषक सरलतापूर्वक इन सूचनाओं को प्राप्त कर सकता है। विशेषतः निम्न प्रकार की सूचनाएँ ज्ञात करनी चाहिए-

  • बेची गयी वस्तु की मात्रा में परिवर्तन,
  • विक्रय मूल्य (प्रति इकाई) में परिवर्तन
  • तैयार वस्तु की लागत (प्रति इकाई) में परिवर्तन।

दो निश्चित अवधियों के बीच कुल लाभ में हुआ परिवर्तन बिक्री आगम एवं बिक्री लागत में हुए परिवर्तन का शुद्ध परिणाम होता है। बिक्री आगम में परिवर्तन वस्तु की बिक्री मात्रा में परिवर्तन या मूल परिवर्तन या दोनों के सामूहिक परिवर्तन का परिणाम होता है। इसी प्रकार वस्तु की लागत में परिवर्तन बिक्री की मात्रा में परिवर्तन एवं प्रति इकाई लागत में परिवर्तन या दोनों के सामूहिक परिवर्तन का परिणाम होता है।

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3

प्रश्न 1.
निम्नलिखित सूचना से देनदार आवर्त अनुपात की गणना करें :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 1
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 2
Working Notes :
(1) Net Credit Sales = Total Sales – Cash Sales
4,00,000 – 80,000 (20% of 40,00,000) = 3,20,000
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 3

प्रश्न 2.
31 दिसम्बर, 2016 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए एक क्लब का आगम एवं शोधन सारांश निम्नांकित है। 31 दिसम्बर, 2016 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए एक क्लब का आय-व्यय बनाइए :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 4
प्रवेश शुल्क एवं जीवन सदस्यता शुल्क का पूँजीकरण करना है। 2016 के चन्दे के 300 रु० अभी प्राप्त नहीं हुए। दिसम्बर 2016 का 170 रु० वेतन देना बाकी है। विनियोगों पर ब्याज 200 रु० मिलना बाकी है। छपाई व स्टेशनरी के 20 रु० अदत्त हैं।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 5
Insurance premium is usually paid for one year, hence it is assumed that Rs. 360 premium is for one year from 30th June, 2016 to 30th June, 2017. Therefore half of Rs. 360 (i.e., Rs. 180) is treated as prepaid.

प्रश्न 3.
31 मार्च, 2017 को निम्न आगम एवं शोधन खाता और चिट्ठा के आधार पर आय-व्यय खाता तैयार करें।
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 6
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 7
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 8

प्रश्न 4.
From the following Particulars taken the Cash Book of a Health Club, prepare a Receipts and Payments Account.
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 9
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 10

प्रश्न 5.
भारतीय स्पोर्ट्स क्लब के आगम और शोधन खातों की सूचना के आधार पर 31 दिसम्बर, 2016 का आय और व्यय खाता तथा आर्थिक चिट्ठा तैयार करें।
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 11
अलग सूचना-31 दिसम्बर, 2015. का बकाया चन्दा 1,200 रुपया और 31 दिसम्बर 2016 का 3200 बकाया लॉकर्स किराया 31 दिसम्बर, 2016 का 250 रुपया । बकाया वेतन 31 दिसम्बर का 1000 ।
1 जनवरी 2016 का क्लब के लिए मकान 36000 रुपया, फर्नीचर 12000 रुपया, खेल सामग्री 17500 रुपया । ह्रास इस मद में 10% (क्रय सहित)।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 12a
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 13a
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 14

प्रश्न 6.
आय और व्यय खाता तथा आर्थिक चिंटा 31 दिसम्बर, 2016 का बनायें।
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 15
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 16
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 17
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 18

प्रश्न 7.
Rajesh and Mohit are partners there in a firmi sharing profits in the ratio 0f 2 : 1. Then admitted Suresh as a new partner for 1/5th share on April 1, 2016. The new profit sharing ratio of Rajesh, Mohit and Suresh will be 3 : 1 : 1 Suresh brought
Rs. 50,000 for his cupital and Rs. 12,000 as his share of premiun Record the necessury journal Entries for the treatment of goodwill premium in the book of the firm.
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 19
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 19a

प्रश्न 8.
राम और श्याम साझेदार हैं। उनका लाभ-अनुपात 3 : 2 हैं। मोहन ने लाभों के 11 भागं के लिए साझेदारी में प्रवेश किया (जिसका 2/3 राम से और 2/3 श्याम से प्राप्त होता है)। मोहन 15,000 रु० पूँजी के लिए तथा 6,000 रु० ख्याति के लिए लाता है। ख्याति की राशि का आधा भाग पुराने साझेदारों द्वारा निकाल लिया जाता है।
आवश्यक जर्नल प्रविष्टियाँ कीजिए, तथा नया लाभ-विभाजन अनुपात ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 20
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 21

प्रश्न 9.
A and B are partners sharing profits and losses in the ratio of 3 : 2. Their Balance Sheet on 31st December, 2016 stood as under:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 22
On this date they admitted C for 25% share in profits on following term :
(i) C brings in Rs. 14,000 for his share of goodwill and further cash to make his capital proportionate to his share of profit.
(ii) Depreciate furniture by 10%
(iii) Half of investments were to be taken over by A and B in their profit sharing ratio and remaining valued at Rs. 26,000.
(iv) New ratio will be 3 : 3 : 2.
Prepare Revaluation Account, Capital Accounts and Balance sheet after C’s admission.
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 23
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 24
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 25
Working Note:
1. C’s share of goodwill had been credited to A and B in their sacrificing ratio 9 : 1:
2. Capital brought in by C:
C’s share in profit = 25% or \(\frac { 1 }{ 4 }\)
For 3/4th share combined capital of A and B are C (Rs. 84,400 – Rs. 62,600) = Rs. 1,47,800
∴ Total Capital of firm = Rs. 1,47,000 × \(\frac { 3 }{ 4 }\) = Rs. 1,96,000
∴ C’s Share in total Capital = Rs. 1,96,000 × \(\frac { 1 }{ 4 }\) = Rs. 49,000
∴ Total Cash brought in by C: 14,000
C’s Capital Rs. 49,000 + Goodwill brought in Cash = 63,000

प्रश्न 10.
ए, बी और सी साझेदार हैं जो कि लाभ-हानि को 5 : 3 : 2 के अनुपात में बाँटते हैं। 1 जनवरी, 2016 को इनका चिट्ठा निम्नलिखित था।
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 26
सी उपर्युक्त तिथि को अवकाश ग्रहण करता है और साझेदारों में सहमति हुई कि :
1. ख्याति का मूल्यांकन गत चार वर्षों के औसत लाभ के आधार पर दो वर्षों का क्रय मूल्य के बराबर किया जाएगा । लाभ इस प्रकार थे : 2012 – 14,400 रु०, 2013 – 20,000 रु०, 2014 – 10,000 रु. (हानिः ), 2015 – 15,000 रु०।
2. संदिग्ध ऋणों के लिए आयोजन देनदारों पर 5% करना है।
3. रहतिया 10% से बढ़ाकर दिखाया जाएगा।
4. पेटेन्ट मूल्यरहित हैं।
5. भवन का मूल्य 20% से बढ़ाकर दिखाया जाएगा।
6. विविध लेनदारों को पुस्तक मूल्य से 2,000 रु० अधिक भुगतान करने पड़ेंगे।
जर्नल प्रविष्टियाँ बनाइए, पुनर्मूल्यांकन खाता, पूँजी खाते तथा नई फर्म का चिट्ठा तैयार
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 27
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 28
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 29
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 30
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 31
Working Note:
1. ख्याति की गणना :
= 14,400 रु० + 20,000 रु० – 10,000 रु० (हानि) + 15,600 रु० + 40,000 रु० 40,000
औसत लाभ = \(\frac{40,000}{4}\)रु० = 10,000 रु०, ख्याति = 10,000 × 2 = 2000 रु०
2. किसी सूचना के अभाव में अवकाश ग्रहण करने वाले साझेदार का व्यय राशि को उस साझेदार के ऋण खाते में हस्तांतरित कर दिया जाता है।
3. ‘प्रॉविडेन्ट फन्ड .की राशि को कभी भी साझेदारों में पूँजी खातों में हस्तांतरित नहीं किया जाता है क्योंकि ये फर्म के ऊपर वास्तविक दायित्व हैं।

प्रश्न 11.
A, B and C were partners sharing profits in the proportion of one-half, one-fourth and one-fourth respectively. Their Balance Sheei on 31st December, 2004 was as follows:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 32
A died on Ist January, 2015. The firm had affected an assurance of Rs. 10.000 on the joint lives of the three partners and the amount of the policy was realised on Ist Feb, 2015. According to the partnership agreement, the goodwill was to be calculated at two years purchase of averge profits of three completed years preceding the death or retirement of a partner. The deceased partner’s share of capital and goodwill etc. was paid out in cash on 1st March 2015 the available cash balance being supplemented by a loan from firm’s banker on the security of the frechold property. The net profits of the years 2012, 2013 and 2014 were Rs. 5,500, Rs. 4,800 and Rs. 6,500 respectively.

You are required to show the Journal entries, the ledger accounts to the partners and the Balance Sheet of B and C as it would stand after A’s share is paid out.
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 33
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 34
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 35
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 36
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 37

प्रश्न 12.
The following is the Balance Sheet of A and B as on 31st December 2016.
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 38
The firm was dissolved on 31st December 2016 on the following terms :
(a) A promised to pay Mrs. A’s loan and took away stock in trade at Rs. 4,000
(b) B took away half of the investments at 10% discount.
(c) Debtors realized Rs. 19,000
(d) Creditors and bills payable were due on an average basis on one month after 31st December, but they were paid immediated on 31st December 6% discount p.a.
(e) Plant realized Rs. 25,000 building Rs. 40,000 goodwill Rs. 6,000 and remaning invesments at Rs. 4,500.
(f) There was on old typewriter in the firm which had been written off completely from the books, it was estimated to realize Rs. 300, it was taken away by B at this estimated price.
You are required to prepare the (a) realisation A/c (b) partners’ capital A/c and (c) cash A/c to close books of the firm.
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 39
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 40
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 41
Note (1):
Calculation of discount on Creaditors and Bills Payable :
Creditors – 30,000 × \(\frac{1}{12} \times \frac{6}{100}\) = Rs. 150
Bills payable – 8,000 × \(\frac{1}{12} \times \frac{6}{100}\) = Rs. 40

प्रश्न 13.
Ram, Shyam and Mohan shared profits in the ration of 2 : 2 : 1 Following is their Balance Sheet on the date of dissolution :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 42
1. राम ने देनदारों को 10,000 रु० में, स्टॉक को 20% कम पर तय को 30,000. रु. में लिया ।
2. एक लेनदार ने कुछ पेटेन्ट, जिनका पुस्तक मूल्य 8,000 रु० था, 4,800 रु० निर्धारित मूल्य पर ले लिया। शेष लेनदारों को 1,200 रु० छूट पर भुगतान कर दिया गया ।
3. 20,000 रु० की एक संयुक्त जीवन बीमा पॉलिसी थी. (जो चिट्टे में नहीं दिखाई गई है) यह 10,000 रु० में समर्पण कर दी गई ।
4. एक्स कम्पनी के अंशों को श्याम 30 रु० प्रति अंश की दर से लेने को सहमत हो गया।
5. वाई कम्पनी के अंशों को मूल्यांकन 12,000 रु० पर किया गया । इन अंशों को सभी साझेदारों ने लाभ विभाजन अनुपात में बाँट लिया ।
6. शेष पेटेंट्स से पुस्तक मूल्य का 70% वसूल हुआ । आवश्यक खाते बनाइए ।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 43
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 44
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 45

प्रश्न 14.
A, B and C shared profits in the ratio of 3 : 2 : 1. They dissolved the firm, and appointed A to realise the assets. A is to receive 5% commission on the sale of assets (except cush) and is to bear all expenses of realisation. The position of the firm was as follows:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 46
Informations :
1. A realised the assets as follows :- Debtors Rs 30,000 Stock Rs.26,000; Investment at 75% value: Plant at Rs. 42,750. Expenses of realisation amounted to Rs. 4,100
2. Commission received in advance is retured to the customers after deducing Rs. 3,000 for work done.
3. Firm had to pay Rs.7,200 for outstanding salaries, not provided for carlied.
4. Compensation to employees paid by the firm amounted to Rs. 9,800. This liability was not provided for in the above balance sheet.
5. Rs. 25,000 had to be paid for provident Fund:
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 47
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 48
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 49
नोट : 1. वसूली व्ययों की कोई प्रविष्टि नहीं की जाएगी। क्योंकि इन्हें ए स्वयं सहन करेगा
2. सम्पत्तियों के विक्रय पर ए को जो कमीशन मिलेगा, उसकी निम्न प्रविष्टि होगी :
Realisation A/c …Dr.   5,500
To A’s Capital A/c      5,500

प्रश्न 15.
पवन लिमिटेड ने 10 रु० वाले 30.000 अंशों के लिए प्रार्थना पत्र आमन्त्रित किए। भुगतान निम्न प्रकार होना था- आवेदन पर 3 रु०, आवंटन पर रु०, प्रथम याचना पर 2रु० और अन्तिम याचना पर 2 रु०।
सभी अंशों के लिए प्रार्थना पत्र आए। यह मानते हुए कि आवंटन और याचनाओं पर देय सभी राशियाँ प्राप्त हो गई हैं, आप जर्नल प्रविष्टियाँ खाते तथा प्रारम्भिक स्थिति विवरण तैयार कीजिएं। अंशों के निर्गमन के व्यय 8,000 रु० हुए। प्रवर्तकों को उनकी सेवाओं के लिए 4,000 पूर्णदत्त अंशों का निर्गमन किया गया।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 50
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 51
टिप्पणी : 1. आवेदन राशि प्राप्त होने की प्रविष्टि को पहले बनाया गया है और इस अंश को पूँजी खाते (Share Capital A/c) में हस्तांतरित करके प्रविष्टि को इसके बाद बनाया गया है। इसका कारण यह है कि आवेदन के समय पहले राशि प्राप्त होती है।
2. आवेदन, प्रथम याचना और द्वितीय याचना के समय पहले अंश पूँजी खाते से हस्तांतरण की प्रविष्टि बनाई गई है तथा इसके पश्चात् ही राशि प्राप्त होने की प्रविष्टि बनाई जाती है। इसका कारण यह है कि इन राशियों के याचनाओं के समय ही हस्तांतरण को प्रविष्टि बने होते हैं जबकि राशि बाद में प्राप्त होती रहती है।
3. यदि अंशों का प्रकार (Type of Shares) स्पष्ट नहीं है. तो अंशों को हमेशा. समता अंश (Equity Shares) माना जाएगा।
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 52
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 53
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 54
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 55
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 56

प्रश्न 16.
Shiva Ltd. issued 20,000 shares of Rs. 10 cach at a discount of 10%. Payments were to be made as on Application Rs. 3 on Allotnient Rs. 4 and of First and Final Call Rs. 2.
Applications were received for 18,000 shares and all were accepted All money was duly received.
Pass necessary entries in the Books of Company and also show the Balance Sheet of the Company.
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 57
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 58

प्रश्न 17.
सनराइज लिमिटेड 4,00,000 रु० की पूँजी से समामेलित हुई। प्रत्येक अंश 100 रु० का है। इनमें से 2,000 अंश निर्गमित किए गए जिन पर आवेदन के साथ 25 रु प्रति अंश, आवंटन पर 25 रु०, प्रथम याचना पर 20 रु० तथा आवश्यकता पड़ने पर शेष राशि देय थी।
प्रार्थना-पत्र तथा आवंटन पर देय सभी राशियाँ यथासमय प्राप्त हुईं, परन्तु जब 20 रु० की प्रथम याचना मांगी गई थी तो एक अंशधारी जिसके पास 100 अंश थे, देय राशि नहीं दे पाया दूसरे अंशधारी ने जिसके पास 200 अंश थे, समस्त भुगतान कर दिया।
कम्पनी के जर्नल में इन लेन-देनों का लेखा कीजिए तथा कम्पनी का प्रारम्भिक स्थिति विवरण भी तैयार कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 59
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 60
संकेत : प्रश्न में द्वितीय याचना नहीं मँगाई गई है, अतः प्रश्न केवल प्रथम याचना तक ही करना है।

प्रश्न 18.
X Ltd invited application for 20,000 Shares of Rs. 10 each payable as follows: Rs. 3 on application. Rs. 2 on Allotment Rs. 2.50 on first Call and Rs. 2.50 on Second Call.
Public applied for 30,000 Shares and the allotment were made as under
To Applicants for 8,000 Share ………. full
To Applicants for 16,000 share …… 12,000 Share
To Applicants for 6,000 Share ………….. Nil
All money were duly received. Pass Journal Entry.
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 61
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 62

प्रश्न 19.
पवन लिमिटेड 5,00,000 रु० की अधिकृत पूँजी से समामेलित की गई जो कि 10 रु० प्रति अंश में विभाजित है। कम्पनी ने वाई से 2,00,000 रु० का एक भवन खरीदा जिसके बदले में वाई को कम्पनी के पूर्णदत्त अंश दे दिए गए। कम्पनी ने शेष 30,000 अंशों के लिए प्रार्थना-पत्र आमन्त्रित किए जो निम्न प्रकार देय थे-3रु प्रति अंश आवेदन पर, 3रु० प्रति अंश आवंटन पर, 2 रु० प्रति अंश प्रथम याचना पर और शेष 2 रु० अन्तिम याचना पर।
अंशोक, जिसको 500 अंश आवंटित किए गए थे, वह दोनों याचनाओं की राशि देने में असमर्थ रहा। उसके अंशों का हरण कर लिया गया और बाद में हरि को 9 रु० प्रति अंश पर, पूर्णदत्त में पुनः निर्गमन कर दिया। जर्नल में आवश्यक प्रविष्टियाँ बनाइए तथा कम्पनी का प्रारम्भिक स्थिति विवरण भी बनाइए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 63
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 64
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 65

प्रश्न 20.
A Ltd. makes an issue of 10,000 equity shares of Rs. 100 each, payable as follows. On application and allotment – Rs. 50
On first call – Rs. 25
On second call – Rs. 25
Members holding 400 shares did not pay the second call and the shares are duly forfeited, 300 of which are re-issued as fully paid at Rs. 80 per share. Pass Journal entries in the books of the company.
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 66
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 67
टिप्पणी : (1) पूँजी संचय (Capital Reserve) खाते में केवल उन्हीं अंशों का लाभ हस्तांतरित निजाता है, जिन्हें पुनः निर्गमित किया गया है । इस प्रश्न में केवल 300 अंशों का पुनः निर्गम ले । गया है । अत: 300 अंशों के लाभ को ही पूँजी संचय में हस्तांतरित किया जाएगा ज्ञात किया जाएगा :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 3, 68

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2

प्रश्न 1.
उर्वशी लि० ने एक स्थापित व्यवसाय को 50,000 रुपए में क्रय किया, रु० 15,000 नकद तथा शेष रु० 100 वाले 9% ऋणपत्रों के निर्गमन द्वारा 10% के बट्टे पर देय थे। उर्वशी लि० की पुस्तकों में जर्नल प्रविष्टि कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 1
Working Notes :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 2
388 ऋणपत्रों का मूल्य = 388 × 100 = 38,800 इसमें दिए जाने वाले ऋणपत्र दशमलव में आ रहे हैं। इसलिए इसका भुगतान नकद किया जाएगा।
नोट : चूँकि इस प्रविष्टि में Rs. 10 का अंतर है। इसलिए 10 को बट्टे में समायोजित कर दिया जाएगा।

प्रश्न 2.
किसी साझेदार के प्रवेश के समय क्या सम्पत्तियों और दायित्वों का पुनर्मूल्यांकन अवश्य करने की सलाह आप देंगे ? यदि ऐसा तो क्यों ? लेखाबहियों में इसके संव्यवहारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
साझेदारी संगठन में परिवर्तन होने पर जब फर्म में नये ‘साझेदार को सम्मिलित किया. जाता है तब यह आवश्यक हो जाता है कि फर्म की वर्तमान सम्पत्तियाँ और दायित्वों का सही-सही मूल्य बताएँ। सही मूल्य जानने के लिए सम्पत्तियों और दायित्वों का पूनर्मूल्यांकन किया जाता है। साझेदार के प्रवेश के समय इसका पुनर्मूल्यांकन करना न्यायसंगत भी प्रतीत होता है और एक दृष्टि से इससे पुराने साझेदार को भी लाभ होता है। पुनर्मूल्यांकन करने से नये साझेदार को यह संतोष हो जाता है कि जिस व्यापार में वह पूँजी लगा रहा है उस व्यापार की आर्थिक स्थिति वास्तव में मजबूत एवं ठोस है। पुराने साझेदार को यह लाभ होता है कि फर्म की वास्तविक स्थिति ज्ञात हो जाती है और पुनर्मूल्यांकन के फलस्वरूप सम्पत्ति की कीमतें बढ़ जाती हैं तो बढ़ी कीमत से उनकी पूँजी. में वृद्धि हो जाती है।

पुनर्मूल्यांकन का लेखा करने के लिए पुनर्मूल्यांकन खाता खोला जाता है। पुनर्मूल्यांकन के फलस्वरूप जो भी परिणाम प्राप्त होता है। उसे पुराने साझेदारों के खाते में उसके लाभ विभाजन के अनुपात में डेबिट या क्रेडिट कर दिया जाता है। इसे लाभ-हानि समायोजन खाता भी कहते हैं।

पुनर्मूल्यांकन के लेखे
1. सम्पत्ति का मूल्य बढ़ने पर
Assets A/c …Dr.
To revaluation A/c
(Being the increase in prices of Assets)

2. सम्पत्ति का मूल्य घटने पर
Revaluation A/c …Dr.
To Assets A/c
(Being the decrease in Prices of Assets)

3. दायित्व में कमी आने पर
Liabilities A/c …Dr.
To Revaluation A/c
(Being the decrease in liabilities)

4. दायित्व में वृद्धि होने पर
Revaluation A/c …Dr.
To Liabilities A/c
(Being the increase in liabilities)

5. पुनर्मूल्यांकन से लाभ होने पर
Revaluation A/c …Dr.
To old Partner’s Capital A/c
(Being Profit transferred to old partner’s Capital A/c)

6. पुनर्मूल्यांकन से हानि होने पर
Old Partner’s Capital A/c …Dr.
To Revaluation A/c
(Being the loss on revaluation transferred to old Partner’s capital A/c)

7. किसी संचय के बँटवारे पर
Reserve Fund A/c …Dr.
To old Partner’s Capital A/c
(Being reserve fund transferred to old Partner’s Capital A/c).

नोट-(i) 5, 6 तथा 7 क्रमांक में किये गये लेखों में लाभ-हानि का बँटवारा पुराने साझेदारों में पुराने लाभ विभाजन अनुपात में होगा।
(ii) यदि पुनर्मूल्यांकन खाते के क्रेडिट पक्ष का योग डेबिट पक्ष के योग से अधिक हो तो लाभ होता है और कम होने पर हानि होती है। इस लाभ-हानि को पुराने साझेदारों में पुराने लाभ-हानि अनुपात में बाँटा जाता है।
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 3

प्रश्न 3.
सरिता लिमिटेड ने 100 रु, प्रति अंश वाले 2,000 अंश जनता को निर्गमित किए जो निम्न प्रकार देय थे : 20 रु. आवेदन पर, 40 रु, आबंटन पर और 40 रु. प्रथम और अन्तिम याचना पर। 2,500 अंशों के लिए आवेदन पत्रं आये थे। आवेदन की आधिक्य राशि का प्रयोग आबंटन के लिये किया गया था। सभी देय राशियाँ यथाविधि प्राप्त हो गयी थीं। सरिता लिमिटेड की पुस्तकों में रोजनामचा प्रविष्टियाँ कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 4

प्रश्न 4.
चालू अनुपास तथा त्वरित अनुपात 1 : 2 : 1 हैं। यदि कार्यशील पूँजी 80,000 रु. हो, तो चाल सम्यत्व एवं स्टॉक की गणना कीजिए।
उत्तर:
Let current liabilities be x working capital = CA – CL = 3x – x
2x = 1,80,000
CL = 90,000

x = 90,000
CA = 90,000 × 3 = 2,70,000
Liquid Ratio = 1 : 2 : 1
Liquid Ratio = \(\frac{\text { Liquid Assets }}{\text { Current Liabilities }}\)
Liquid Assets = 90,000 × 1.2 = 1,08,000
Stock = Current Assets – Liquid Assets = 2,70,000 – 1,08,000 = 1,62,000

प्रश्न 5.
पी० लिमिटेई ने प्रत्येक 10 रु० वाले 980 समता अंशों को जिन्हें 10% बट्टे पर निर्गमित किया गया था, अंतिम याचना के 2 रु० प्रति अंश की दर से भुगतान न होने पर जब्त कर लिया। इन अंशों को 13 रु० प्रति अंश की दर से पूर्ण प्रदत्त रूप में पुनः निर्गमित किया गया। आवश्यक जर्मल प्रविष्टियाँ कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 5

प्रश्न 6.
क्यू लिमिटेड ने 10 रू० वाले 200 समता अशों को जो 5 रू० प्रति अंश प्रीमियम पर निर्गमित किया गया था और आबंटन के साथ: देय थ, आबंटन राशि के 8 रु० प्रति अंश (प्रीमियम सहित) की दर से भुगतान न होने पर जब्त कर लिया। आवेदन की राशि 2 रू० प्रति अंश थी। जब्त किए गए अंशों को 20,000 रू० पूर्ण प्रदान रूप में पुनः निर्गमित किया गया। आवश्यक. जर्नल प्रविष्टियाँ कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 6
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 7

प्रश्न 7.
यदि एक कम्पनी के दायित्व 1,20,000 रु० है, इसका चालू अनुपात 3 : 1 और तरल अनुपात 1.25 : 1 है। चालू सम्पत्ति, तरल सम्पत्ति तथा व्यापारिक रहतिया के मूल्य की गणना कीजिए।
उत्तर:
Current Liabilities = Rs. 1,20,000
Current Ratio (Given) = \(\frac{\text { Current Assets }}{\text { Current Liabilities }}\) = 3 : 1
Or, 1,20,000 = 3/1
Therefore, Current Assets = Rs. 1.20,000 × 3 = Rs. 3,60,000
Liquid Ratio = \(\frac{\text { Liquid Assets }}{\text { Current Liabilities }}\) = 1.25 : 1
Therefore, Liquid Assets = Rs. 1,20,000 × 1.25 = 1,50,000
Stock = Current Assets – Liquid Assets
Or Stock = Rs. 3,60,000 – 1,50.000 = 2,10,000

प्रश्न 8.
अमित लि. के निम्नलिखित शेष थे :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 8
वर्ष के दौरान कम्पनी 25% विनियोग 9,000 रु० के लाभ पर बेचे थे। यदि कम्पनी ने वर्ष में 20,000 रु० का लाभ अर्जित किया है तो संचालन क्रियाओं और निवेश क्रियाओं से रोकड़ प्रवाह की गणना कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 9

प्रश्न 9.
समता अंश तथा पूर्वाधिकार अंश में अन्तर बताइए।
उत्तर:
समता अंश तथा पूर्वाधिकार अंश में निम्नलिखित अन्तर है-
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 10

प्रश्न 10.
निम्न सूचना के आधार पर स्कंध अनुपात ज्ञात करें।
बिक्री – 4,00,000 रु०
औसत रहतिया – 55,000 रु०
सकल हानि अनुपात – 10%
उत्तर:
Sales = 4,00,000
Gross Loss = 10% of 4,00,000 = 40,000
Cost of Goods Sold = 4,00,000 + 40,000 = 4,40,000
Stock Turnover Ratio = \(\frac{\text { Cost Goods Sold }}{\text { Average Stock }}\)
= \(\frac{4,40.000}{55.000}\) = 8 times

प्रश्न 11.
डालमिया सीमेण्ट कंपनी लिमिटेड ने 100 रु० वाले 2,000 ऋण-पत्र 105 रु० पर निर्गमित किए जिन पर 20 रु० आवेदन पर तथा 85 रु० आवेदन पर देय थे। रोजनामचा प्रविष्टियाँ कीजिए तथा कम्पनी का चिट्ठा यह मानते हुए बनाइए कि ऋण-पत्रों के निर्गमन पर 200 रु० व्यय हुए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 11
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 12
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 13

प्रश्न 12.
को रामा लि० की पुस्तकों ने निम्नलिखित शेष निकाले गए हैं।
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 14
कपनी अधिनियम 1956 की अनुसूची VI, खण्ड 1 के अनुसार, कंपनी का तुलन-पत्र (चिट्ठा) तैयार कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 15
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 16

प्रश्न 13.
दत्त : चलू अनुपात – 2 : 5 : 1, तरलता अनुपात – 1 : 5 : 1, चालू दायित्व – 50,000 रू फिर ज्ञात करें – 1. चालू सम्पत्तियाँ 2. तरल सम्पत्तियाँ 3. स्कन्ध
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 17
or, Liquid Assets = Rs. 50,000 × 1.5 = 75,000
Again (Stock) Inventory = Current Assets Liquid assets=Rs. 1,25,000 – 75,000
= Rs. 50,000

प्रश्न 14.
निम्नलिखित आँकड़ों से तुलनात्मक रूप में लाभों का विवरण तैयार कीजिए-
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 18
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 19
Working Notes:
(1) \(\frac{2,00,000 \times 100}{6,00.000}\) = 33.33
(2) \(\frac{60,000 \times 100}{4,20,000}\) = 14.29

प्रश्न 15.
एक्सल लिमिटेड ने जनता के अभिदान हेतु 10 रु० वाले 10,000 समता अंश 1 रु० प्रति अंश के बट्टे पर निर्गमित किये जिन पर 2 रु० प्रति अंश आवेदन पर, 4 रु० प्रति अंश आबंटन पर तथा बाकी याचना पर देय है। सभी अंशों की बिक्री हो गयी तथा 500 अंशों के संबंध में अन्तिम याचना को छोड़कर सभी किस्तों पर देय राशि का भुगतान मिल गया। लेन-देनों का जर्नल कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 20
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 21

प्रश्न 16.
राम, हरि एवं श्याम एक फर्म में साझेदार हैं तो 6 : 5 : 4 का अनुपात में लाभोलाभ को बाँटते हैं। अप्रैल, 2016 को उन्होंने फर्म को विघटित करने का निर्णय लिया। उक्त तिथि को उनका चिट्ठा निम्न था :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 22
सम्पत्तियाँ से निम्नवत् वसूली हुई : भवन 11,750 रु., विविध देनदार 20,625 रु.। राम ने मशीन को 18,750 रु. में ले लिया तथा हरि ने स्टॉक को 22,500 रु. में खरीद लिया। 375 रु. वसूली कर खर्च किये गये।
वसूली खाता, रोकड़ खाता तथा साझेदारों के पूंजी खाते बनाइए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 23
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 24
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 25

प्रश्न 17.
निम्नलिखित के लिए रोजनामचा प्रविष्टियाँ दीजिए :
(i) एक कम्पनी ने X लिमिटेड की सम्पत्तियाँ 2,00,000 रु० में क्रय की और भुगतान स्वरूप प्रत्येक 100 रु० वाले 6% ऋणपत्र निर्गमित किये।
(ii) एक कम्पनी ने Y लिमिटेड की 2,20,000 रु० मूल्य की सम्पत्तियाँ क्रय की। क्रयमूल्य का भुगतान 6% 100 रु० वाले ऋणपत्रों को 10 प्रीमियम पर निर्गत करके किया गया।
(iii) एक कम्पनी ने Z लिमिटेड की 1,80,000 रु० मूल्य की सम्पत्तियाँ क्रय की। कम्पनी ने इसके पूर्ण भुगतान 100 रु० वाले ऋणपत्रों को 10% कटौती परं निर्गत किया।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 26
Working Notes :
1. No. of New Debentures issued = \(\frac{2,20,000}{100+10}\) = 2,000
2. No. of New Debentures issued = \(\frac{1,80,000}{100-10}\) = 2,000

प्रश्न 18.
रोकड़ प्रवाह विवरण क्या है? इसके किसी चार उद्देश्यों को स्पष्ट करें।
उत्तर:
रोकड प्रवाह विवरण का अर्थ-सेकड़ प्रवाह विवरण एक विशेष अवधि के दौरान रोकड़ के स्रोतों एवं रोकड़ के प्रयोगों का सारांश है। यह दो तिथियों के मध्य व्यवसाय के रोकड़ शेष में हुए परिवर्तनों के कारणों की व्याख्या करता है। अत: रोकड़ प्रवाह विवरण एक विशेष अवधि के दौरान रोकड़ की प्रतियों तथा भुगतानों का विवरण है। रोकड़ प्रवाह विवरण में केवल उन्हीं मदों को शामिल किया जाता है जो रोकड़ को प्रभावित करती है, अतः इसे वित्तीय स्थिति . में हुए परिवर्तनों का विवरण रोकड़ आधार भी कहा जाता है।

रोकड़ प्रवाह विवरण के उद्देश्य-

  1. कोष प्रवाह विवरण बनाने का मूल उद्देश्य रोकड़ के स्रोतों तथा प्रयोगों की जानकारी प्राप्त करना।
  2. दो चिट्ठों की तिथियों के बीच रोकड़ एवं रोकड़ समतुल्यों में हुए परिवर्तन को ज्ञात करना।
  3. विभिन्न निवेश सम्बन्धी पस्यिोजनाओं में सेकड़ की आवश्यकताओं का निर्धारण करना।
  4. कम्पनी की वित्तीय स्थिति के कुशल प्रबन्धन में सहायता प्रदान करना।

प्रश्न 19.
वर्षों के लिए राहुल एण्ड कंपनी के चिट्टे निम्नलिखित हैं, रोकड़ प्रवाह विवरण तैयार कीजिए:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 27
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 28
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 29

प्रश्न 20.
31 दिसम्बर, 2016 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए गंगा क्लब का आगम-शोधन खाता निम्न है :
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 30
लॉकर का किराया 60 रु० 2016 के लिए है तथा 10 रु० अभी भी शेष हैं। किराये में 1,300 रु० 2016 में हैं तथा 1,300 रु० अभी भी शेष हैं; छपाई एवं लेखन-सामग्री का व्यय 312 रु० 2016 के लिए है तथा 364 रु० अभी बाकी हैं। 2017 के लिए अदत्त चन्दे 468 रु० राज्यपाल की पार्टी के विशेष चन्दे का 350 रु० मिलना शेष है। उपर्युक्त सूचना से आय-व्यय खाता बनाइए।
(Locker’s Rent includes Rs. 60 for 2016 and Rs. 90 all still due. Rent includes Rs. 1,300 for 2016 and Rs. 1,300 are still outstanding printing and stationery includes Rs. 312 for 2016 while Rs. 364 are still outstanding. Outstanding subscription for 2017 Rs. 468; Rs. 350 are still due and receivable for Governor’s special party, Prepare income and Expenditure Account with the help of above information).
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 31
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 2, 32

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1

प्रश्न 1.
प्राप्ति एवं भुगतात. खांतां से आय-व्यय खाता कैसे तैयार किया जाता है ? वर्णन करें।
उत्तर:
प्राप्ति एवं भुगतान खाते का आय-व्यय खाते में परिवर्तन करने के लिए निम्नलिखित कार्य-विधि अपनायी जाती है-

  • प्राप्ति एवं भुगतान खाने के प्रारम्भिक तथा अंतिम रोकड़ और बैंक. शेष छोड़ दिये जाते हैं।
  • सभी पूँजीगत प्राप्ति एवं भुगतान भी नहीं लिए जाते।
  • गत वर्ष से सम्बन्धित आय और व्यय तथा आगामी वर्ष से सम्बन्धित आय और व्यय के लिए निम्न समायोजन करना पडता है-
    (a) गत् वर्ष अथवा आगामी वर्ष से सम्बंन्धित आय को कुल आय की रकम में घटाकर दिखाना चाहिए।
    (b) गत् वर्ष अथवा आगामी वर्ष से सम्बन्धित व्ययों को कुल व्यय की रकम में से घटाकर दिखाना चाहिए।
  • उपार्जित किन्तु अप्राप्त आय (Income due but not received) को चालू वर्ष की आय में जोड़कर दिखाया जाता है।
  • अदत्त व्ययों (Outstanding Expenses) को चालू वर्ष के व्ययों में जोड़कर दिखाया जाना चाहिए।
  • मूल्य ह्रास (Depreciation) और संदिग्ध एवं अप्राप्य ऋण (Bad and Doubtful Debts) के लिए उचित ओयोजन करना चाहिए।

इस प्रकार उपरोक्त विधि से तैयार किया गया आय-व्यय खाता चालू वर्ष से संबंधित आयगत प्राप्तियों एवं व्ययों की पूरी-पूरी जानकारी देता है। इस खाते से आय का व्यय पर आधिक्य (Excess of Expenditure over Income) का ज्ञान हो जाता है। आधिक्य (Surplus) को हम स्थिति-विवरण में पूँजी-निधि में जोड़कर दिखाते हैं और जब कमी (Deficiency) होती है तो उसे पूँजी-निधि से घटाकर दिखाया जाता है। दूसरे शब्दों में, आय की अधिकता को पूँजी में जोड़ दिया जाता है और व्यय की अधिकता अथवा आय की कमी को पूँजी में से कम आय दिखाया जाता है।

प्रश्न 2.
जब अंश प्रीमियम पर निर्गमित किए जाए तो इसके लिए आवश्यक जर्नल की प्रविष्टियाँ कीजिए
उत्तर:
जब अंश प्रीमियम पर निर्गमित किए जाए. तो उसके लिए निम्नलिखित जर्नल की प्रविष्टियाँ की जाती हैं-
(A) जब आवदन के साथ प्रीमियम की राशि देय हो-
(i) Bank A/c                            …Dr.
To Share Application A/c
(for share application money received along with premium)
(ii) Share Application A/c   …Dr.
To Share capital A/c
To Securities premium A/C
(For application money transferred.)

(B) (i) जब प्रीमियम आबंटन पर देय हो-
Share Allotment A/c           ….Dr.
To Share Capital A/c
To Securities Premium A/c
(For allotment money due together with premium)
(ii) जब आबंटन की राशि प्राप्त हो-
Bank A/c                                ….Dr.
To Share Allotment A/c
(For allotment money received including premium.)

(C) (i) जब प्रीमियम याचना पर देय हो-
Share Call A/c                      …Dr.
To Share Capital A/c.
To Securities Premium A/c
(For call money due together with premium.)
(ii) जब याचना की राशि प्राप्त हो-
Bank A/c                               …Dr.
To Share Call A/c
(For call money received including premium.)

प्रश्न 3.
एक अवकाश ग्रहण करने वाले साझेदार को देय राशि की गणना आप किस प्रकार करेंगे?
उत्तर:
अवकाश ग्रहण करने वाले साझेदार को देय राशि की गणना निम्न प्रकार किया जा सकता है-
1. सम्पूर्ण मुद्रा रोकड़ में चुकता किया
(i) यदि कोष उपलब्ध हो
Entry :
Retiring Partner’s Capital A/c        …Dr.
To Cash A/c
(ii) यदि ऋण लिया गया हो
(a) Bank or Cash A/c                       …Dr.
To Bank Loan A/C
(b) Retiring partners capital A/C …Dr.
To Banker or Cash A/c

II. पूंजी शेष को साझेदारी के पूंजी खाते में हस्तांतरण कर-
Entry :
Retiring Partners A/c                     …Dr.
To Retiring Partners Loan A/c

III. आंशिक रोकंड़ एवं आंशिक ऋण में भुगतान
Entry :
Retiring Partners Capital A/c        …Dr.
To Cash A/C
To Retiring Partners Loan A/c

IV. अवकाश ग्रहण करने वाले साझेदारों के ऋण का किस्त भुगतान :
Entry:
(a) Interest A/c                                  …Dr.
To retiring Partners Loan A/c
(b) Retiring Partner’s Loan A/c      …Dr.
To Cash or Bank A/c
(c) Profit & Loss A/c                        …Dr.
To Interest A/c

प्रश्न 4.
ख्याति की औसत लाभ विधि तथा अधिलाभ विधि में अंतर बताइए।
उत्तर:
‘ख्याति गणना की औसत लाभ-विधि तथा अधिलाभ विधि में अन्तर इस प्रकार है-
औसत लाभ विधि (Average Profit Method)- इस विधि के अन्तर्गत पिछले कुछ वर्षों के लाभों का औसत ज्ञात करके एक निश्चित संख्या (जैसे दो वर्षों के क्रय के बराबर या तीन वर्षों के क्रय के बराबर आदि) से गुणा कर दिया जाता है और इस प्रकार जो राशि आती है वह ख्याति का मूल्य होता है। इसके लिए निम्नलिखित सूत्र की सहायता भी ली जा सकती है-
\(\frac{\text { Total Profits }}{\text { Number of years }}\) × No. of years for which the purchase is required.
यह विधि सरल एवं व्यावहारिक है इसलिए सबसे अधिक प्रयोग में आती है।

अधिलाभ विधि- ख्याति की गणना करने में औसत लाभ (साधारण या भारित) विधि की आधारभूत मान्यता यह है कि यदि एक नया व्यापार स्थापित किया जाता है तो वह अपने प्रारंभिक वर्षों में कोई लाभ कमाने के योग्य नहीं होगा । इस कारण एक स्थापित व्यापार खरीदने वाले व्यक्ति की ख्याति के रूप में प्रथम ‘कुछ वर्षों’ में संभावित कुल लाभ के बराबर राशि देनी चाहिए। लेकिन यहाँ यह भी स्मरणीय है कि व्यापार खरीदने वाले व्यक्ति का वास्तविक लाभ कुल लाभ में सन्निहित नहीं होता है, बल्कि उसी समान व्यवसाय करने वाले व्यापार की विनियोजित पूँजी पर सामान्य प्रत्याय की दर से अधिक का होता है। इस कारण, यह औचित्यपूर्ण है कि ख्याति का निर्धारण आधिक्य लाभों पर किया जाए न कि वास्तविक लाभों पर । कोई व्यापार सामान्य लाभ (Normal profit) से जितना अधिक वास्तविक लाभ (Actual profit) कमाता है उसे अधिलाभ (Super profit) कहते हैं। इस अधिलाभ से प्रश्न में उल्लेखित निश्चित संख्या (जैसे-दो वर्षों के क्रय के बराबर या तीन वर्षों के क्रय के बराबर आदि) से गुणा करके ख्याति की राशि निकाल ली जाती है।

प्रश्न 5.
A, B एवं C साझेदार हैं जो लाभों को 3 : 2 : 1 के अनुपात में बाँटते है। उन्होंने D को 1/6 भाग के लिए सम्मिलित किया। वह सहमति हुयी कि C का हिस्सा पूरा नहीं रहेगा। नए अनुपात की गणना कीजिए।
उत्तर:
Calculation of New profit ratio
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 1

प्रश्न 6.
P, Q एवं R साझेदार हैं जो 5 : 4 : 3 के अनुपात में लाभ-हानि विभाजित करते हैं। Q अवकाश ग्रहण करता है और उसके हिस्सा को P और R में बराबर-बराबर बाँट दिया गया। P और R का नया लाभ विभाजन अनुपात ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
Q’s share will be divided between P and R in the ratio of 1 : 1
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 2

प्रश्न 7.
साझेदारी के समापन और फर्म के समापन में अंतर बताइए।
उत्तर:
फर्म के समापन और साझेदारी के समापन में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित हैं-

  1. अर्थ (Meaning)- साझेदारी के समापन से आशय साझेदारों के मध्य वर्तमान ठहराव में परिवर्तन से है। जबकि फर्म के समापन से आशय फर्म के सभी साझेदारों के मध्य साझेदारी के समापन से है।
  2. व्यवसाय का चाल रहना (Continuation of the Business)- साझेदारी के समापन की दशा में फर्म का व्यवसाय चालू रहता है जबकि फर्म के समापन की दशा में फर्म का व्यवसायबंद हो जाता है।
  3. लेखा पस्तकें (Books of Account)- साझेदारी के समापन की दशा में लेखा पुस्तकें बंद करना आवश्यक नहीं है जबकि फर्म के समापन की दशा में लेखा पुस्तकें बंद करनी पड़ती हैं।
  4. प्रभाव (Effects)- साझेदारी फर्म के समापन पर यह अनिवार्य नहीं कि फर्म का भी समापन हो जाए जबकि फर्म के समापन पर साझेदारी का समापन भी अनिवार्य है।

प्रश्न 8.
A, B और C बराबर के साझेदार हैं। 1 अप्रैल, 2015 की उनकी स्थिर पूँजी थी, A रु० 10,000, B रु० 20,000, C रु० 30,000। वर्ष 2015-16 के लिए रु० 12,000 के लाभ को बाँटा गया। आवश्यक जर्नल प्रविष्टि कीजिए, यदि पूँजी पर समान 12% प्रति वर्ष के बदले 10% प्रति वर्ष की दर से क्रेडिट किया गया है।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 3
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 4

प्रश्न 9.
X, Y और Z 3 : 2 : 1 के अनुपात में एक फर्म में साझेदार हैं। 1 अप्रैल 2014 को उन्होंने भविष्य के लाभों को 7 : 5 : 4 के अनुपात में बाँटने का निर्णय लिया । इस तिथि को सामान्य संचय रु० 76,000 और संपत्तियों एवं दायित्वों के पुनर्मूल्यांकन पर स० 68,000 का लाभ है। यह निश्चय किया गया कि चिट्ठे के आंकड़ों को प्रभावित किए बिना समायोजन किया जाना चाहिए। एकल रोजनामचा प्रविष्टि द्वारा समायोजन कीजिए।
उत्तर:
चरण (i) : साझेदारों का त्याग/लाभ हिस्से की गणना
लाभ वाला हिस्सा = पुराना हिस्सा – नया हिस्सा
लाभ प्राप्ति हिस्सा = नया हिस्सा – पुराना हिस्सा
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 5

चरण (ii) : सामान्य संचय = 76,000
पुनर्मूल्यांकन का लाभ = 68,000
कुल मूल्य (Cr.) = 1,44,000
लाभ प्राप्ति वाले साझेदार का हिस्सा = 1,44,000 × \(\frac{4}{48}\) = 12,000
लाभ वाले साझेदारों का हिस्सा-
X : 1,44,000 × \(\frac{3}{48}\) = 9,000
Y: 1,44,000 × \(\frac{1}{48}\) = 3,000

चरण (iii):
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 6

प्रश्न 10.
किन्हीं तीन कार्यों का उल्लेख करें जिनके लिए प्रतिभूमि प्रीमियम का प्रयोग किया जा सकता है।
उत्तर:
भारतीय कम्पनी अधिनियम की धारा 78 के अनुसार प्रतिभूति प्रीमियम का प्रयोग निम्न का योग हो सकता है :

  1. सदस्यों को बोनस देने के लिए
  2. कम्पनी के प्रारंभिक कार्यों को अपलिखित करने के लिए
  3. अंशों या ऋणपत्रों के निर्गमन पर दी गई कटौती को अपलिखित करने के लिए।

प्रश्न 11.
क्रमश: 16.000 रु. तथा 12,000 रु. पूंजी के साथ X और Y साझेदार हैं। उन लोगों ने फर्म के लाभों में एक-चौथाई हिस्से के साथ को प्रवेश कराया है। Z अपनी पूँजी के रूप में 16,000 रु. लाता है। फर्म की ख्याति तथा Z के हिस्से की ख्याति की गणना कीजिए।
उत्तर:
Z का लाभ में हिस्सा = \(\frac{1}{4}\) = 16,000
फर्म की कुल पूँजी = 16,000 × 4= 64,000
तीनों साझेदारों की कुल पूँजी = 16000 + 12000 + 16000 = 44000
∴ फर्म की ख्याति = 64000 – 44000 = 20000
∴ Z की ख्याति = 20000 × \(\frac{1}{4}\) = 5000

प्रश्न 12.
अनिल और सुनील क्रमश. 40000 रु. तथा 30000 रु. लगाकर साझेदारी में सम्मिलित हुए और 3:2 के अनुपात में लाभ का बँटवारा करते हैं। सुनील को 4000 रु. वार्षिक वेतन देने की व्यवस्था है। वर्ष के दौरान अनिल ने 3000 रु, तथा सुनील ने 6000 रु. का आहरण किया जिस पर ब्याज क्रमश: 50 रु. तथा 70 रु. है। पूँजी पर 6% वार्षिक व्याज देने की व्यवस्था है। उपर्युक्त समायोजनाओं के पूर्व 10,580 रु. लाभ था। बताइये कि लाभ का बँटवारा कैसे किया जायेगा ?
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 7

प्रश्न 13.
A, B, C, D और E एक फर्म में क्रमश: 7 : 5 : 3 : 3 : 2 के अनुपात में लाभ विभाजन करते हुए साझेदार हैं। C साझेदारी से अवकाश ग्रहण करता है। A, B, D और E क्रमश: 7 : 5 : 3 : 2 के लाभ विभाजन अनुपात पर अपनी सहमति देते हैं। शेष साझेदारों का लाभ प्रतिशत अनुपात निकालिए।
उत्तर:
Calculation of Gaining Ratio :
Old Ratio & A, B, C, D, E = 7 : 5 : 3 : 3 : 2
Or, \(\frac{7}{20}: \frac{5}{20}: \frac{3}{20}: \frac{3}{20}: \frac{2}{20}\)
New ratio of A, B, D, E = 7 : 5 : 3 : 2
= \(\frac{7}{17}: \frac{5}{17}: \frac{3}{17}: \frac{2}{17}\)
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 8

प्रश्न 14.
A, B और C 2 : 2 : 1 के अनुपात में लाभों को बाँटते हुए साझेदार थे। B की 31 मार्च, 2010 को मृत्यु हो गयी। खाते 31 दिसंबर को बन्द किए जाते थे। वर्ष 2009 की कुल बिक्री 6,00,000 रु. थी और शुद्ध लाभ 60,000 रु. था। 1 जनवरी, 2010 से 31 मार्च, 2010 तक की कुल बिक्री 2,00,000 रु. थी। मृत साझेदार के हिस्से के लाभ की गणना कीजिए।
उत्तर:
कुल बिक्री = 6.00,000 रु.
पिछले वर्ष का लाभ (2009-10) = 60,000 रु.
लाभ का प्रतिशत = \(\frac{60,000}{6,00,000}\) × 100 = 10%
B की मृत्यु तक बिक्री = 2,00,000 रु.
31 मार्च तक कुल लाभ @ 10% = \(\frac{2,00,000}{100}\) × 10 = 20,000 रु.
अत: B का हिस्सा = 20,000 × \(\frac{2}{5}\) = 8,000 रु.

प्रश्न 15.
एक कम्पनी के संचालकों ने 100 रु. प्रति अंश वाले 5,000 अंशों को जिस पर 80 रु. याचना की गयी थी, जब्त कर लेने का निर्णय किया। इन अंशों का धारक प्रथम याचना पर 30 रु. प्रति और अंतिम याचना पर 20 रु. प्रति अंश का भुगतान नहीं किया। अंशों की जब्ती का रोजनामचा प्रविष्टि कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 9

प्रश्न 16.
X लिमिटेड ने 31 मार्च, 2016 को 96 रु. प्रत्येक की दर से 30,000 रु. नाममात्र मूल्य के 12% ऋणपत्रों को रद्द करने के लिए खरीदा। इन ऋणपत्रों पर ब्याज प्रतिवर्ष 30 जून और 31 दिसंबर को दिया जाता है। ऋणपत्रों का वास्तविक मूल्य निकालिए यदि मूल्य उद्धरण (i) ब्याज रहित और (ii) ब्याज-सहित है। ऋणपत्र का अंकित मूल्य 100 रु. हैं।
उत्तर:
(i) Calculation of the real price of the debenture without interest
Face value of debenture = 30,000 × 100 = 30,00,000
Nominal value of debenture = 30,000 × 96 = 28,80,000
(ii) Calculation of the real price of debenture with interest
Face value of debenture = 30,000 × 100 = 30,00,000
Nominal value of debenture = 30,000 × 96 = 28,80,000
Interest 12% on debenture from 1st April to 30 June
= \(\frac{28,80,000 \times 12 \times 3}{100 \times 12}\) =3,45,600 × \(\frac {3}{12}\) = 86,400
Interest 12% on debenture from 1st July to 31 Dec.
= \(\frac{28,80,000 \times 12 \times 3}{100 \times 12}\) = 3,45,600 × \(\frac {6}{12}\) = 1,72,800.
Total interest = 86,400 + 1,72,800 = 2,59,200

प्रश्न 17.
कोई चार परिस्थितियाँ बताइए जब फर्म का पुनर्गठन हो जाता है।
उत्तर:
साझेदारी फर्म का पुनर्गठन की चार परिस्थितियाँ निम्नलिखित हैं-

  • वर्तमान साझेदारों के लाभ-विभाजन अनपातों में परिवर्तन- साझेदार के बीच लाभ विभाजन अनुपात के परिवर्तन होने की दशा में पुनर्गठन होता है। उदाहरणार्थ, A और B लाभों को 2 : 1 के अनुपात में बाँटते हुए साझेदार हैं। उन्होंने निर्णय किया कि वे भविष्य में 3 : 1 के अनुपात में लाभ बाँटेंगे। यह फर्म का पुनर्गठन कहलाएगा।
  • नये साझेदार का प्रवेश साझेदारी व्यवसाय में अगर कोई अन्य व्यक्ति फर्म में साझेदार के रूप में प्रवेश करना चाहता है तो वैसी दशा में फर्म का पुनर्गठन हो सकता है।
  • वर्तमान साझेदार का अवकाश ग्रहण किसी साझेदारी फर्म के अंतर्गत अगर कोई साझेदार अवकाश ग्रहण करता है तो वैसी स्थिति में फर्म का पुनर्गठन हो सकता है।
  • साझेदार की मृत्यु- अगर साझेदारी फर्म के किसी साझेदार की मृत्यु हो जाती है तो वैसी स्थिति में साझेदारी फर्म का पुनर्गठन हो सकता है।

प्रश्न 18.
M और N 3 : 2 के अनुपात में लाभों को बाँटते हुए साझेदार थे। विघटन की तिथि को उनकी पूँजी थी। M : 7,650 रु., N : 4,300 रु.। लेनदार 27,500 रु. के थे। रोकड़ का शेष 760 रु. था। सम्पत्तियों से 25,430 रु. वसूल हुए। विघटन के व्यय 1,540 रु. थे। सभी साझेदार शोधक्षम्य थे।
वसूली खाता, पूँजी खाते और रोकड़ खाता बनाते हुए फर्म की पुस्तकों को बन्द कीजिए।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 10
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 11
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 12

प्रश्न 19.
वसूली खाता किसे कहते हैं ? वसूली खाता का प्रारूप बनाइए।
उत्तर:
वसूली खाता एक नाममात्र खाता है। इसे विशिष्ट जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार किया जाता है। इसके डेबिट पक्ष में विविध सम्पत्तियों को तथा क्रेडिट पक्ष में विविध बाहरी दायित्वों को दिखाया जाता है। सम्पत्तियों की बिक्री से प्राप्त राशि को इसके क्रेडिट पक्ष में तथा दायित्वों के भुगतान को डेबिट पक्ष में दिखाया जाता है। व्ययों के भुगतान को वसूली खाते के डेबिट पक्ष में दिखाया जाता है।

वसूली खाते के क्रेडिट पक्ष का डेबिट पक्ष पर आधिक्य लाभ को प्रदर्शित करता है और डेबिट पक्ष का क्रेडिट पक्ष पर आधिक्य हानि को दर्शाता है। वसूली खाते पर लाभ या हानि को साझेदारों के पूँजी/चालू खाते में हस्तांतरित कर दिया जाता है।
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 13
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 14

प्रश्न 20.
A, B और C क्रमश: 3 : 2 : 1 के अनुपात में लाभों और हानियों को बाँटते हुए साझेदार थे। फर्म ने सभी साझेदारों के जीवन पर अलग-अलग बीमा – A का 20,000 रु., B का 15,000 रु. तथा C का. 10,000 रु. कराया। प्रीमियम को लाभ-हानि खाता से प्रभारित किया गया था। 31 दिसम्बर, 2016 को प्रत्येक बीमा-पत्र का समर्पण मूल्य बीमित राशि का 50% था। आवश्यक रोजनामचा प्रविष्टियाँ दीजिए, यदि A की मृत्यु 31 दिसंबर, 2011 को हो जाती है और B तथा भविष्य में समान हिस्सा लेते हैं।
उत्तर:
Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Long Answer Type Part 1, 15

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions

Bihar Board 12th Pali सप्रसंग व्याख्या Important Questions

Bihar Board 12th Pali सप्रसंग व्याख्या Important Questions

प्रश्न 1.
न भिक्खवे, अन्नुञयातो मातापितूहि पुत्तों पब्यजितब्बो, यो पब्बाजेय्य आपत्ति, दुक्कटस्सा ति।
उत्तर:
व्याख्या – अवतरित गूढ वाक्य हमारी पाठ्य पुस्तक ‘पालि पाठ सङ्गहो’ के ‘राहुलकुमारस्य दायज्जदानं’ शीर्षक कहानी की महत्वपूर्ण पक्ति है। इसमें तथागत द्वारा भिक्षुसंघ को प्रव्रज्या के नियमों में संशोधन का आदेश दिया गया है।

राहुल कुमार अपने पिता तथागत से उत्तराधिकार की याचना करता है। अपने शास्ता अर्थात् भगवान बुद्ध के आदेशानुसार सारिपुत्र को प्रब्रजित कर लेते हैं। भगवान बुद्ध द्वारा राहुल कुमार को प्रबजित करने के लिए दिये गये आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सम्राट शुद्धोध न प्रव्रज्या के नियमों की कटु आलोचना एवं निन्दा करते हैं। वे भगवान बुद्ध के समक्ष अपना कारूण्य भाव प्रदर्शित करते हुए कहते हैं कि अपनी तथा नन्द की प्रब्रज्या से मुझे असह्य तथा असीम पीड़ा हुई, जिससे मेरे हृदय पर धक्का लगा। परन्तु, किसी प्रकार इस बालक (राहुल) के आश्रम से अपने आपको संभाला। आप ही बतादें कि इसे प्रब्रजित कर लेने के पश्चात् अब मेरा आश्रयदाता कौन होगा ? अतः यह नियम अनुचित, अव्यवहारिक एवं निन्दनीय है। इसमें प्रबजित किये जाने वाले व्यक्ति के माता-पिता की अनुमति अपेक्षित है।

सम्राट शुद्धोधन की उपर्युक्त बात तथागत को रूचिकर प्रतीत हुई। जिसके कारण प्रव्रज्या के निमयों के परिवर्तन (संशोधन) लाना आवश्यक समझा। तत्पश्चात् उन्होंने अपने संघ के भिक्षुओं को आदेश दिया कि बिना माता-पिता की आज्ञा (अनुमति) प्राप्त किये किसी भी व्यक्ति को प्रब्रजित न किया जाय। साथ-ही-साथ यह भी निर्देश दिया कि जो ऐसा करेंगा उसे दुक्कट के अपराध से युक्त माना जायेगा।

इस तरह प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से हमें यह देखने को मिलता है कि भगवान बुद्ध तानाशाही प्रवृत्ति के व्यक्ति न थे, बल्कि समाज और परिस्थिति की पुकार पर अपने संघ-संचालन की व्यवस्था करते थे।

प्रश्न 2.
इद खो पन भिक्खवे, दुक्खसमुदयं अरियसच्चं – यायं तण्हा
पानेब्भविका नन्दिरागसहगता तत्रतत्राभिनन्दिनी,
सेय्यथीदं कामतण्हा, भवतण्हा, विभवतण्हा।
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत गद्यांश डा० जगदानन्द ब्रह्मचारी द्वारा सम्पादित एवं हमारी पाठ्य-क्रम के लिए निर्धारित पुस्तक ‘पालि पाठ सङ्गहो’ के ‘धम्मचक्कप्पवत्तन’ शीर्षक कहानी से अवतरित है। इस भावपूर्ण गद्यांश में तृष्णा के यथार्थ स्वरूप का प्रतिबिम्ब खींचा गया।

भगवान बुद्ध वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में पञ्चवर्गी भिक्षुओं को अपना प्रथम धर्मोपदेश में चार आर्य सत्य का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि संसार के समस्त प्राणी दुखों से अक्रान्त हैं और इस दुःख का कारण है तृष्णा। अपने द्वितीय आर्य सत्य अर्थात् ‘दुक्खसमुदाय अरिय सच्चं’ में इसी तृष्णा का व्यापक वर्णन करते हुए भगवान बुद्ध ने तृष्णा को समस्त दु:खों की जननी कहा है। यह तृष्णा बार-बार जन्म लेने वाली तथा आनन्द मार्ग में मस्त रहने वाली होती है जो मानव मन को असीम इच्छाओं के साम्राज्य में उलझाकर उसे मोक्ष से कोसों दूर फेंक देती है। यह तृष्णा बौद्ध दर्शन के अनुसार तीन प्रकार की इच्छा बतलायी गयी हैं, यथा

(i) कामतण्हा-विषय-वासना से उत्पन्न होने वाली सुख की इच्छा या कामना,
(ii) भवतण्हा-सांसारिक वैभव विभूतियों की प्राप्ति से मिलने वाली आनन्द की इच्छा या कामना और
(iii) विभवतण्हा-भव से अलग जनवादी या शाश्वतवादी धारणाओं से मिलने वाली सुख की इच्छा या कामना।

भगवान बुद्ध ने तृष्णा के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए बतलाया है कि यह तृष्णा बड़ी मनोरम प्रकृति की है। तृष्णा के वशीभूत होकर ही प्राणी दुःख झेलता रहता है। तृष्णाएँ अनन्त होती हैं। मनुष्य को एक तृष्णा पूरी भी न हो पाती हैं कि दूसरी तृष्णा बलवती हो उठती हैं। अपने अनन्त तृष्णाओं और वासनाओं की पूर्ति के लिए प्राणी असंख्य अकुशल तथा पापमूलक कर्मों को करते हुए आश्रवं, संयोजन, नीवरण एवं पुण्य के अनेक अवरोधों को एकत्र करते हुए अकुशल संस्कार संयोता रहता है, जिसके परिणामस्वरूप पुनर्जन्म की उपलब्धि होती है और तब फिर अभाव, बुढ़ापा, व्याधि, मृत्यु, पुर्नजन्म के तार बंध जाते हैं। इस प्रकार यह तृष्णा ही मनुष्य के जन्म-मरण एवं अन्यन्य दु:खों का प्रधान हेतु चक्र है।

प्रश्न 3.
द्वेमे, भिक्खवे, अन्ता पल्बजितेन न सेवितब्बा।

व्याख्या – यह गूढ वाक्य हमारी पाठ्य-क्रम ‘पालि पाठ सङ्गहो’ के ‘धम्मचक्कप्पवत्तन’ शीर्षक कहानी का बड़ा ही महत्त्वपूर्ण अंश है। इस भावपूर्ण वाक्य के माध्यम से तथागत ने पञ्चवर्गीय भिक्षुकों को अपने प्रथम धर्मोपदेश के क्रम में दो अन्तों का सेवन निषिद्ध बतलाया है।
उत्तर:
बोधगया में निरञ्जना नदी के तट पर बोधिवृक्ष के नीचे बुद्धत्व-प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ब्रह्मा सहम्पति के आग्रह पर सारनाथ के ऋषिपतन मृगदाव में जाकर पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को अपना प्रथम धर्मोपदेश देते हैं। इस अवसर पर वे उन पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को दो अन्तों का सेवन न करने को कहा। दो अन्तों से उनका तात्पर्य दो प्रकार की विचारधाराओं से है, जो उस समय समाज में प्रचलित थी। ये हैं-अतिशय काम-सुख में लिप्त होना तथा अतिशय काय-क्लेश में लगना। तथागत की दृष्टि में ये दोनों ही विचार असेवनीय हैं, क्योंकि इनसे व्यक्ति की तृष्णाओं का दमन नहीं होता। भगवान बुद्ध ने इन दोनों ही विचारों को अपने जीवन के व्यावहारिक पक्ष में लाकर देखा था-एक राजकुमार के रूप में कामजनित सभी सुख-सौख्य का उपभोग करके तथा दूसरा साधक के रूप में अत्यधिक काय-क्लेश सहकर लेकिन इनसे उन्हें अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हुई।

अतएव उन्होंने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को इन दोनों अन्तों का सेवन अनुपयुक्त बतलाते हुए . इन्हें त्यागकर स्वनिर्मित ‘मध्यम मार्ग’ को अपनाने की सीख दी, जो आर्य अष्टांगिक मार्ग का शील समाधि और राजा के नाम से प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 4.
अकुप्पा में विमुत्ति, अयमन्तिमा जाति, नत्थ दानि पुनएभवोति।
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत भावपूर्ण उद्धृतांश हमारी पाठ्य-क्रम ‘पालि पाठ सङ्गहो’ के ‘धम्मचक्कप्पवत्तन’ शीर्षक कहानी का अन्तिम तथा महत्वपूर्ण पंक्ति है। इसमें तथागत ने चार आर्य सत्यों के महत्व पर प्रकाश डाला है।

तथागत ने एक सफल चिकित्सक की भाँति दुःख से ग्रसित संसार के प्राणियों को उससे त्राण दिलाने हेतु ही अपना समस्त उपदेश दिया है। जैसे कोई डाक्टर किसी रोगी के रोग का नामकरण, रोग का निरोध तथा रोग के निरोध के उपायों को बताकर रोगी को रोग मुक्त करता है वैसे ही तथागत ने समस्त मानवता के मूल रोग दुःख, दुःख का कारण, दुःख का निरोध तथा दुःख के उपायों पर प्रकाश डालते हुए क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ आर्य सत्यों की स्थापना की है, जिनके सम्यक् अनुशीलन तथा अनुपालन से मनुष्य निर्वाण की प्राप्ति कर सकता है। साथ ही पुनर्जन्म के बन्धनों से अपने आप को परे रख सकता है।

इन चार आर्य सत्यों-दुःख, दुःख समुदाय, दुःख निरोध तथा दुःख निरोधगामिनी पटिपदा के सम्बन्ध में तथागत ने अपने प्रथम धर्मोपदेश में पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा है कि भिक्षुओं। जब तक मैंने चार आर्य सत्यों का तेहरा करके अर्थात् उसके द्वादस स्वरूप का दर्शन नहीं कर लिया तब तक मैंने सम्यक् सम्बोधि प्राप्त कर लेने की घोषणा नहीं किया कि मैंने ज्ञान लोक का दर्शन कर लिया है। मेरी विमुक्ति अचल है और यह मेरा अन्तिम जन्म है, अर्थात् इसके पश्चात् मेरा इस संसार में पुनर्जन्म नहीं होगा।

इस तरह हम देखते हैं कि प्रस्तुत पंक्ति में चार आर्य सव्य को ही तथागत ने विमुक्ति का यथार्थ साधन माना है।

प्रश्न 5.
संखित्तेन पञ्चुपादानक्खन्धा दुक्खा।
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत भावपूर्ण पक्ति हमारी पाठ्य-क्रम ‘पालि पाठ सङ्गहो के’ धम्मचक्कप्वत्तनं शीर्षक कहानी का उद्धृतांश है। इस पंक्ति में तथागत ने पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को जीवन के दुःखमय स्वरूप का दिग्दर्शन कराया है।

बुद्धत्व-प्राप्ति के पश्चात् भगवान बुद्ध वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को अपना प्रथम धर्मोपदेश देते हैं। इस अवसर पर उन्होंने कहा है कि जीवन के प्रत्येक . : क्षण में मानव दुःख झेलता रहता है। लाख प्रयत्न करने पर भी उसे इससे त्राण नहीं मिल पाता। इन दुःखों की गणना करना सहज संभव नहीं: क्योंकि जन्म भी दुःख है, जरा (बुढ़ापा) भी दुःख है, व्याधि (रोग) भी दुःख है, मरण भी दुःख है, अप्रिय का संयोग भी दुख है, प्रिय का वियोग भी दुःख है, इच्छित वस्तु का न मिलना भी दुख है। संक्षेपतः यही कहा जा सकता है कि मानव व्यक्तित्व का सृजन जिन पाँच उपादान स्कन्धों, यथा-रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान से हुआ है, वे सभी दुःख का कारण हैं।

अतः उद्धृत व्याख्यात्मक पंक्ति में इन्हीं पञ्च उपादान स्कन्धों को तथागत ने दुःखमय बतलाते हुए अपने प्रथम आर्य सत्य अर्थात् दुक्ख अरियसच्चं में ‘दुःख क्या है’ के हर पहलुओं पर विस्तृत विवेचन उपस्थित किया है।

प्रश्न 6.
माता-पिता दिशा पुब्बा, आचरिया दक्खिणा दिशा ।
पुत्तदारा दिसा पच्छा, मित्तामच्चा च उत्तरा ॥
दासकम्पकरा हेट्ठा, उद्धं समणब्राह्मणा ।
एतादिसा नमस्सेय्य, अलमत्तो कुले गिही ॥
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत भावपूर्ण गाथा पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-क्रम ‘पालि पाठ सङ्गहो’ के सिंगाल-सुत्त शीर्षक कहानी से उद्धृत है। इन गाथाओं में दिशा-पूजन के महत्व को बतलाया गया है।

अपने मृत पिता की अन्तिम इच्छा की पूर्ति हेतु सिंगाल द्वारा दिशाओं के पूजन को देखकर भगवान बुद्ध दिशाओं के पूजन की विधि तथा उसके फलों को समझाते हुए सिंगाल से कहासिंगाल ! आर्य के धर्म-विनय में दिशाएँ छः मानी गयी हैं; यथा-पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, नीचे और ऊपर की दिशा। ये छः दिशाएँ छः प्रकार के व्यक्तियों का घोतक करती है, जिनमें पूर्व तथा दक्षिण दिशा क्रमशः माता-पिता एवं आचार्य (गुरु) का, पश्चिम तथा उत्तर दिशा क्रमशः स्त्री-पुत्र एवं मित्र-अमात्यों का और नीचे तथा ऊपर की दिशा क्रमशः दास-कम्मकार एवं श्रवण-ब्राह्मण का प्रतीक माना गया है और इनके प्रति सम्यक् कर्त्तव्य का पालन ही इन छः दिशाओं का सम्यक् (यथेष्ट) पूजन है।

इस प्रकार उद्धृत गाथाओं के माध्यम से समाज के व्यक्तियों के प्रति हमारे कर्तव्य का यथोचित ज्ञानबोध कराने के लिए ही तथागत ने दिशाओं के पूजन का महत्व बतलाया है। समाज के लोगों में अपनी प्रेम तथा सद्भावना बनाये रखने से राष्ट्र एवं व्यक्ति दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध होता है। इसलिए गृहस्थ को अपने कुल में इन दिशाओं को अच्छी तरह नमस्कार (पूजन) करने की सीख दी गयी है।

प्रश्न 7.
“जितम्हा वत भो अम्बकाय, पराजितम्हा वत भो अम्बकाया, ति।”
उत्तर:
व्याख्या – यह प्रस्तुत वाक्य हमारी पाठ्य पुस्तक ‘पालि पाठावलि’ के ‘अम्बपालि गणिका’ शीर्षक से उद्धृत है। इसमें लिच्छवी कुमारों के मानसिक संताप की झलक परिलक्षित होती है।

भगवान का दर्शन कर लौट रही अम्बपालि को भगवान् के दर्शनार्थ जाते लिच्छवी कुमारों से मार्ग में भेंट होती है। अम्बपालि प्रसन्नता के भावावेश में उनका मार्ग रोक लेती है। उन्हें आश्चर्य होता है और वे कारण पूछते हैं। कारण जानकर उनलोगों ने समझा कि एक गणिका भला भगवान बुद्ध को हमारे समझ क्या निमन्त्रण देगी। यह तो पैसे की भूखी होती है। इसे रूपये देकर इसका मुँह बन्द कर दिया जायेगा। अतः इस आशय का उन्होंने अम्बपालि के सामने प्रस्ताव रखा। पर उनके प्रस्ताव को तुच्छ समझकर अस्वीकार कर दिया। उसने कहा- आर्यों, सौ हजार कार्षापण क्या, वैशाली की सारी सम्पत्ति भी इस भोजन के समक्ष बौनी है। इतना सुनते ही लिच्छवी कुमारों का भ्रम टूट गया। उन्होंने समझ लिया कि आज अम्बपालि ने हमें मात दे दी है। इसके हृदय में भी भगवान के प्रति अपार श्रद्धा एवं अटूट विश्वास झिलमिला रहा है। यह हमलोगों से पीछे नहीं, आज आगे हो गयी। इसके समक्ष हम गौण हो गये हैं।

प्रश्न 8.
“इत्थी खो गिल्मनी पुरिसानं अमनापा।”
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘पालि पाठावलि’ के ‘जीवको’ कोमार भच्चों शीर्षक से उद्धृत है। इसमें गर्भवती नारी के मनोवैज्ञानिक पहलू पर दृष्टिपात किया गया है।

शालवती कुमारी राजगृह की गणिका के पद पर प्रतिष्ठित होकर अपनी सुन्दरता एवं कला के कारण लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन चुकी थी। अभी वह अपनी सम्पूर्ण कला का प्रदर्शन भी न कर सकी थी कि वह गर्भवती हो गई। यह उसकी चिन्ता का विषय हो गया। वह सोचने लगी कि गर्भवती स्त्रियाँ पुरुषों के मनोरंजन के योग्य नहीं रहती हैं। अब मैं लोगों को न तो अपने कला-प्रदर्शन के माध्यम से और न अपने सौन्दर्य-जाल से आकर्षित कर सकूँगी। अब मेरी कला एवं सुन्दरता दोनों शिथिल पड़ जायेंगी और मेरी ओर कोई मुड़कर भी नहीं देखना चाहेगा। मैं अब अपना सारा सम्मान खो दूंगी। पुरुष गर्भवती महिला से सर्वथा दूर रहना चाहता है, क्योंकि उसके मन में गर्भवती महिला के प्रति विराग उत्पन्न हो जाता है।

प्रश्न 9.
इमानि खो राजकुलानि न सुकरानि असिप्येन उपजीवितुं।
यंनूनाहं सिप्पं सिक्खेय्यं ति।।
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत वाक्य डॉ० आत्रेय एवं डॉ० मिश्र द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘पालि पाठावलि’ के जीवको कोमार भच्चो से उद्धृत किये गये हैं। इनमें शिल्प (विद्या) के महत्व पर प्रकाश डाला गया है।

जीवक’ कुमार भृत्य बाल सुलभ चंचलतावश एक दिन अभय राजकुमार से अपनी माँ एवं पिता का परिचय पूछ बैठता है। अभय कुंमार से उत्तर सुनकर जीवक अपनी कुशाग्र बुद्धि से समझ जाता है कि यह मेरा अपना घर नहीं है। यह कोई राज घराना है, जहाँ मेरा लालन-पालन मेरे अनाथ होने के कारण किया जा रहा है। अभी मैं बाल्यावस्था में हूँ, अतः लोग मुझे अपना प्यार दे रहे हैं। युवा एवं पौढ़ावस्था में भी इस परिवार में बने रहने और लोगों का प्यार पाते रहने के लिए मुझे ज्ञानार्जन करना चाहिए। बिना किसी शिल्प में दक्षता प्राप्त किए यह सम्भव नहीं क्योंकि कहा गया है-सित्यं समं धन नत्यि एवं ईघा लोके सित्यं मित्त। अतः उसने शिल्प सीखने (विद्याध्ययनं करने) का दृढ़ संकल्प किया-यन्न्नाहं सित्यं सिक्खेय्यं ति।’

प्रश्न 10.
सेय्थापि नाम वलवा पुरिसो समिञ्जितं दा वाहं पस्सारेय्थ, पसारितं वा वाहं समिळ्थ्य एवमेव जेतवने अन्तरहितो विसाखाय मिगारमातुया कोट्ठके पातुरहोसि।
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत सारगर्भित पंक्ति हमारी पाठ्य पुस्तक ‘पालि पाढावली’ के ‘विशाखा मिगारमाता’ शीर्षक कहानी से लिया गया है। इस पंक्ति में भगवान बुद्ध के पुरुषार्थ एवं अलौकिक गुणों को दिखाया गया है।

श्रावस्ती में अनाथापिण्डिका के जेतवनाराम में विहार कर रहे भगवान भिक्षु-संघ सहित एक दिन विशाखा मिगारमाता ने अपने यहाँ भोजन पर आमन्त्रित किया। उसके कुछ दिन पूर्व से ही अन्तिम चतुदर्शिक महामेघ वरस रहा था, जिसके कारण चारों ओर प्रलय सा दृश्य उपस्थित हो गया था और जीवन अस्त-व्यस्त होने लगा था। ऐसी स्थिति में भी भगवान बुद्ध अपने भिक्षु संघ के साथ ठीक समय पर चीर पहनकर पात्र ले जैसे वलवान पुरुष अपनी समेटी वाहों को पसारे अथवा पसारी वाँहों को समेट ले, ठीक उसी प्रकार जेतवन में अतध्यान हो विशाखा मिगार माता के कोठे पर प्रगट हुए।

भगवान बुद्ध के ऐसे पुरुषार्थ को देख विशाखा आश्चर्य में पड़ गयी, क्योंकि जांघ भर कमरभर बाढ़ के रहते एक भी भिक्षु का पैर या चीवर तक न भिंगा था। इस तरह बुद्ध के ऐसे अद्भूत भरे कार्यों के दृव्यावलोकन से उनमें अलौकिक गुणों का समावेश होना स्पष्ट परिलक्षित होता है अथवा यो कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बुद्ध पहुंचे हुए ऋद्धिमान पुरुषावतार थे।

प्रश्न 11.
एवं तुम्हाकं ज्यो अन्ता परिग्गाहिता भविसन्ती ति ।
या, असुचित भन्ते नग्गियं पटिक्कूलं।
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत भावपूर्ण पंक्तियाँ ‘पालि पाढावलि’ के ‘विशाखा मिगारमाता’ शीर्षक से लिया गया है। इस वाक्य में बौद्ध भिक्षुणियाँ तत्कालीन वेश्याओं द्वारा तीखा प्रहार किया गया है।

एक बार बुद्धकालीन भिक्षुणियाँ वेश्याओं के साथ अचिरवती नदी में एक ही घाट पर नग्न होकर स्नान कर रही थी। नग्नता घृणित, गंदी, असभ्य, अनुचित एवं अमाननिय व्यवहार है। भिक्षुणियों के इस व्यवहार के साथ ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करते देख वेश्याओं को बड़ा आश्चर्य होता है। वे समझ नहीं पाती की युवावस्था में ब्रह्मचर्य जीवन का क्या प्रयोजन है ? उनकी दृष्टि में युवावस्था तो कामनाओं के उपभोग का दिन होता है और ब्रह्मचर्य पालन वृद्धावस्था के लिए श्रेष्ठकर होता है। वृद्धावस्था में मनुष्य की समस्थ इन्द्रियाँ शिथिल पड़ जाती है और कामनाओं का वेग जाता रहता है। इसलिए भिक्षुणियों को नसीहत के तौर पर कहती है कि युवावस्था में कामनाओं के भोग का उपयोग करें और वृद्धा वस्था में ब्रह्मचर्य का पालन ऐसा करने से उन्हें दोनों ही फलों की प्राप्ति होगी, अर्थात् युवावस्था में इन्द्रियजनित सुख तथा , वृद्धावस्था. में मोक्ष्य की प्राप्ति।

इस तरह उद्धृत व्याख्यात्मक पंक्ति के आधार पर कहा जा सकता है कि तत्कालीन बौद्ध नवयुवती भिक्षुणियों कुछ आचरण ऐसे थे, जिसके कारण वे समाज में मखौल और उपहास का केन्द्र बिन्दु बन गई थी तथा समाज के निम्न वर्ग के लोगों द्वारा भी उनके ब्रह्मचर्य-जीवन यापन पर व्यंग कशा जाता था। अत: उपयुक्त बातों को ध्यान में रखकर ही विशाखा मिगार माता ने भगवान बुद्ध से आजीवन बौद्ध भिक्षुणियों के ‘उदकसाटिका” देते रहने की अनुमति प्रदान की थी।

प्रश्न 12.
नत्थि रागसमो अग्नि, नत्थि दोससमो कलि ।
नत्थि खन्धासमा दुक्खा, नत्थि सन्ति परं सुखं ॥
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत भावपूर्ण पंक्तियाँ ‘पालि पाठसंग्रहो’ द्वितीय भाग के ‘सुखवग्गो’ शीर्षक का छठा गाथा है। इस गाथा में तथागत के बड़ा मनोरम ढंग से दुःख निवारण को बतलाया है।

प्रस्तुत सुत्त में तथागत ने राग, द्वेष और मोह ये तीन अंकुश हेतु के बारे में बतलाया है। जिसके कारण मनुष्य इस भवचक्र में पड़ सांसारिक यातनाओं का उपभोग करता है। भगवान ने पञ्चस्कन्ध के बारे में भी बड़े ही मनोरम ढंग से बतलाया है। रूप, वेदना, संज्ञा संस्कार और विज्ञान ये पञ्चस्कन्ध हैं। जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। तथागत की दृष्टि में ये सभी दुःख कारक हैं। इन सभी के अमूल्य विनाश से ही निरूपधिशेष निर्वाण की प्राप्ति करता है जो परम सुख कारक है।

प्रश्न 13.
जयं वे पसवति, ‘दुक्खं सेति पराजितो ।’
उपसन्तों सुखं सेति, हित्वा जय पराजयं ॥
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत गाथा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘पालि पाठ संग्रहो’ ‘दुतियोभाग’ के ‘सुखवग्गो’ शीर्षक से ली गई है। इस सुत्त में जय और पराजय के बारे में वर्णित किया गया है। वैर शत्रुता को जन्म देती है जय और पराजय से परे रहकर सुख की निन्द सोता है।

इस गाथा में प्रशान्त चित्त की विशेषता पर प्रकाश डाला गया है। जिस व्यक्ति ने राग, द्वेष और मोह का सम्पूर्ण त्याग कर दिया है उसे प्रशान्त चित्त की संज्ञा प्रदान की जाती है। जिसका चित्र प्रशान्त हो जाता है उसे किसी वस्तु की कामना नहीं रह जाती है। फलतः वह जया, प्राजय दोनों से दूर रह निश्चित हो सुख की निन्द सोता है, क्योंकि वह जानता है कि विजय शत्रुता एवं प्रलोभन को जन्म देती है। पराजित व्यक्ति विजय का और विजय पराजित का शत्रु बन बैठते हैं। प्राजित व्यक्ति अपनी विजय से फूला नहीं समाता है उसका मद एवं प्रलोभन और बढ़ जाता है तब वह पुनः विजय और अभियान प्रारम्भ कर देता है।

प्रश्न 14.
साधु दस्सनमरियानं सन्निवासो सदा सुखो ।
अदस्सनेन बालान, निच्चमेव सुसी सिया ॥
उत्तर:
व्याख्या – अवतरित व्याख्यात्मक गाथा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘पालि पाठ संग्रहो’ के ‘सुखवग्गो’ का बड़ा ही महत्वपूर्ण अंश है। यह गाथा बुद्ध उपदिष्ट आर्य सत्यों के महत्व के साथ-साथ सत्यपुरुषों के साहचर्य तथा मूर्तों के संगती से दूर रहने का आदर्श उपस्थित किया गया है।

तथागत से संसार के प्राणियों की दुःख से त्राण दिलाने हेतु चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया है। जिसके बुद्ध उपदिष्ट चार आर्य सत्यों को भली-भाँति जान लिया है वह निश्चय ही निर्वाण प्राप्त कर दुःख से छुटकारा पा लेता है, क्योंकि आशक्ति, तृष्णा, आश्रव निवरण, संयोजन पुनर्जन्म आदि से मुक्त हो चुका होता है बुद्ध ने सदा सत्यपुरुषों की संगति करने को कहा है, क्योंकि सज्जन व्यक्ति लोभ, दोष, मोह आदि से रहित, निन्दा प्रशंसा में अविचलित कुशल तथा पुण्यात्मक कार्यों में सदा रत रहते हैं।

अतः बुद्ध मुखों की संगति न कर सज्जन की संगति करने की नेक सलाह दी है। सज्जनों की संगति सदा सुखदायी होती है, जबकि मुखों की संगति सदा दुःखदायी। मूर्ख अपनी अज्ञानता के कारण हिंसात्मक एवं पाप मूलक कर्मों के कारण सदा दु:ख के दल-दल में फंसता चला जाता है। सांसारिक आसक्ति एवं तृष्णाओं के साम्राज्य में वह उलझा रह जाता है। प्रेम, दया, त्याग, मैत्री, सहानुभूति आदि का मानव चित्र का उसमें अभाव रहता है।

अतः उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए भगवान बुद्ध ने प्रस्तुत व्याख्यात्मक गाथा के माध्यम से कहा है कि आर्य सत्यों का दर्शन सुन्दर है। सन्तों के साथ निवास सदा सुखदायक है और मूखों के दर्शन न होने से मनुष्य सदा सुखी रहता है। .

प्रश्न 15.
धम्मपीति सुखं सेति, विप्पसन्नेन चेतसा ।
भरियप्पवेदिते धम्मे, सद रमति पण्डितो ॥
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत भावपूर्ण एवं सारगर्भित गाथा हमारे पाठ्य पुस्तक के ‘पालिपाठ’ संगहो के ‘पण्डितवग्गो’ शीर्षक से अवतरित है। इस गाथा में पण्डितजनों की चारित्रिक विशेषताओं पर सम्यक् प्रकाश डाला गया है।

तथागत के अनुसार पण्डित धर्म रस पान कर प्रसन्न चित्त हो सुख पूर्वक सोते हैं। उन्हें सांसारिक गतिविधियों की तनिक भी चिन्ता नहीं रह पाती। वे तो आधा पुरुषों के निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण कर सम्यक् जीवन यापन किया करते हैं। सतत जागरूकता के कारण उनका चित्त कुमार्गों की ओर अग्रसर नहीं हो पाता। अतः उनके चित्त में अदम्य साहस, अत्यधिक उत्साह एवं असिम आनन्द सदा विद्यमान रहता है।

इस तरह प्रस्तुत गाथा के द्वारा तथागत ने संसार के प्राणियों को पण्डित जनों के आचरण का अनुसरण करने का पाठ पढ़ाया है।

प्रश्न 16.
यथा मात-पित भाता, अज्जे वापि च जातक ।
गावो नो परमा मित्र, यासु जायन्ति ओसधा ॥
उत्तर:
व्याख्या – अवतरित गाथा ‘ब्राह्मणधम्मिक सुत्त’ शीर्षक पाठ की है, इस गाथा में गोधन महत्व को दर्शाया गया है। भारतीय पशुओं में गायों का स्थान महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि इसे माता-पिता, भ्राता आदि सदृश्य आदरणीय एवं पूज्य माना जाता है।

प्राचीन भारतीय ब्राह्मण समाज में गायों के प्रति अमिट श्रद्धा थी। वे इसके प्रति वही श्रद्धा एवं स्नेह रखते थे, जो अपने माता-पिता, भ्राता तथा अन्य सगे-सम्बन्धियों के बीच रखते थे। इसका प्रमुख कारण था कि जिस प्रकार इन सम्बन्धियों से अपातकाल में मानव को अत्यधिक सहायता मिल पाती है। उसी प्रकार गायें भी मानव समाज के लिए काफी उपयोगी और सहायक सिद्ध होती है। गाय से मनुष्य को पौष्टिक पदार्थ की प्राप्ति होती है, इतना ही नहीं, बल्कि विभिन्न प्रकार की औषधियों के काम में लाये जाते हैं।

इस प्रकार भारतीय समाज की वृद्धि तथा सर्वांगीण विकास में अन्यतम सहायता देने के कारण ही गायें भारतीय संस्कृति में एवं भारतीय पशुओं में अत्यधिक सम्मानित मानी जाती थी और आज भी मानी जाती है।

प्रश्न 17.
ब्रह्मचरियं च शीलं च, अज्जवं मदृवं तप ।
सोरच्चं अविहिसं च, खन्तिं चापि अवण्णयुं ॥
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत भावपूर्ण गाथा हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘पालि पाठ संग्रहो’ के ‘ब्राह्मणध म्मिक सुत्त’ शीर्षक पद्य से उद्धृत है। इसमें प्राचीन भारतीय ब्राह्मणों के परिशुद्ध चरित्र की झाँकी प्रस्तुत की गई है।

प्राचीन भारतीय ब्राह्मणों के समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। वे समाज के नायक माने जाते थे। उनके सम्यक् पथ-प्रदर्शन के कारण ही भारतीय समाज समुन्नतशील एवं गौरवान्वित हो सका था। इन ब्राह्मणों में ब्रह्मचर्य, सच्चरित्रता, ओज, मृदुता, तपश्चर्य, सज्जनता अहिंसा क्षमाशीलता आदि गुण एक साथ विद्यमान थे। इन्हीं गुणों के कारण समाज के लोग इनकी प्रसन्नता करते थे।

इस तरह हम देखते हैं कि तत्कालीन भारतीय ब्राह्मण अपनी ज्ञान की अपूर्व ज्योति से सारे संसार को आलोकित कर रखा था एवं अपूर्व त्याग के कारण भारतीय सभ्यता संस्कृति की मूर्धन्य स्थान प्राप्त हो सका।

प्रश्न 18.
खतिया ब्रह्मबन्धु च, यं चज्जे गोतरक्खिता ।
जाति वादे निरङ्गत्वा, कामनं वसमागमुन्ति ॥
उत्तर:
व्याख्या – प्रस्तुत भावपूर्ण पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक पालि पाठ संग्रहो के ‘ब्राह्मणपतीक सुत्र’ की अन्तिम गाथा था। __उन्नति तथा आवन्ति प्राकृतिक का स्वाभाविक एवं खण्डन नियम है। इस अकाट्य सिद्धान्त के अनुरूप ही भारतीय समुन्नतशील समाज की स्थिति में परिवर्तन आया और यही भी हीनवस्था को प्राप्त किया। उपर्युक्त व्याख्यात्मक गाथा में इसकी हीनावस्था के कारण तथा वर्तमान स्थिति का सुक्षम दिग्दर्शन है।

भारतीय ब्राह्मणों, जिनकी तपश्चर्य एवं चरित्रवल के कारण ही भारतीय समाज गौरवान्वित हो चुका था, काल क्रम में लोभ और लाभ में पड़कर वे आचार परित हो गये। सांसारिक वस्तुओं के प्रति उनके हृदय में लिप्सा जागृत हुई। परिणाम स्वरूप भारतीय समाज आलोकित हो उन्नित के पथ पर अग्रसर होने से वंचित हो विभिन्न वर्गों में विभाजित होकर दुर्बल बन गये। क्षत्रिय, ब्राह्मण एवं दूसरे गोत्र के जाति का विनाश कर विषय के वशीभुत हो गये। सांसारिक वस्तुओं के प्रति व्यामोह का स्वार्थपरता उनमें इतनी प्रबल हो उठी कि वे इस भार को सम्भाल नहीं सके और विभिन्न दोष से युक्त हो सद्भव की भावना भूल गये।

Bihar Board 12th Pali Important Questions

Bihar Board 12th Pali Important Questions Long Answer Type

Bihar Board 12th Pali Important Questions Long Answer Type

प्रश्न 1.
‘धम्मचक्कत्यवत्तनं’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा, ‘धम्मचक्करपवत्तनं’ के आधार पर मज्झिमा पटिपदा के महत्व पर प्रकाश डालिए।
अथवा, धम्मचक्कत्पवत्तनं के अवसर भगवान बुद्ध द्वारा दिए गये उपदेशों का उल्लेख कीजिए।
अथवा, ‘धम्मचक्कत्पवत्तनं’ में वर्णित घटनाओं का उल्लेख अपने शब्दों में आलोचनात्मक ढंग से लिखें।
उत्तर:
डॉ. जगदानन्द ब्रह्मचारी द्वारा सम्पादित तथा हमारी पाठ्यक्रम के लिए निर्धारित ग्रंथ ‘पालि पाठ सङ्गहो’ के ‘धम्मचक्कत्पवत्तनं’ शीर्षक कहानी में भगवान बुद्ध के प्रथम धर्मोपदेश का विशद वर्णन प्रस्तुत करते हुए मज्झिमा पटिपदा पर समुचित प्रकाश डाला गया है। कुमार सिद्धार्थ ने व्यावहारिक जगत में हास्य को चीर रूदन में, ऐश्वर्य का निल्किचनता में हर्ष को विषाद में, खिलते फूल को कुम्हलाते, मुरझाते और सारी सुख सम्पदा की अट्टालिका को भर्राकर चकनाचूर होते देखा था। जिस जीवन और जगत की वैभव विभूतियों को उन्होंने चीर स्थायी तथा शाश्वत मानकर गले लगाया था।

उनका नींव नश्वरता एवं परिवर्तन को आघात मात्र से हिल उठा। परिणामस्वरूप यह मानव-जीवन उन्हें निस्सार, बेकार, जकड़न, बन्धन का केन्द्र एवं अनित्य मालूम पड़ा। बुढ़ापा, रोग, शोक, परिताप, बन्धन, मृत्यु आदि विषयक दुःख पूँजों से मानव को उद्धार दिलाने के लिए वे तत्पर हो उठे और अपनी 29 वर्ष की अवस्था में सारे राजपाट, विश्व की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी पत्नी यशोधरा नवजात शिशु राहल, पुत्र के लिए सभी सुखों को न्योछावर कर देने वाले पिता शुद्धोधन तथा महाप्रजापति गौतमी जैसी मौसी का परित्याग कर अंधेरी रात में अमृत की खोज में घर से निकल पड़े।

साधना और कठिन तपश्चर्य के छः वर्ष बीतने के बाद कुमार सिद्धार्थ के उरूवेला के जंगल में निरंजना नदी के तट पर बोधिवृक्ष के नीचे बुद्धत्व की प्राप्ति हुई। बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् तथागत के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि जिस तान को मैंने प्राप्त किया है वह बड़ा ही गंभीर दूरदर्श, शान्त, उत्तम तर्क से अप्राप्त निपुन एवं पण्डितों द्वारा जानने योग्य है। अतः काम वासनाओं में तृप्त संसार के प्राणियों के बीच उसका प्रकाशन करना ठीक नहीं। परन्तु ब्रह्मा सहम्पत्ति ने तथागत के इस विचार को जान लिया और उनसे धर्मोपदेश करने का आग्रह किया तथागत ने ब्रह्म सहम्पत्ति के आग्रह को स्वीकार करते हुए अपना प्रथम धर्मोपदेश तीक्ष्ण बुद्धि वाले अपने दो गुरू आलार कालाम और उदक राम पुत्र को देना चाहा, लेकिन एक सप्ताह पहले दोनों गुरू काल कलवित हो चुके थे। तब उन्होंने वारणसी के ऋषिपतन मृगदाव में रह रहे पञचवर्षीय भिक्षुओं के समक्ष अपना धर्मोपदेश देने का निश्चय कर वहाँ पहुँचे।

अपना प्रथम धर्मचक्रवर्तन करते हुए तथागत ने इन पञ्चवर्गीय भिक्षुओं से कहा-भिक्षुओं ? दो अन्तों का सेवन कभी भी अवजित के लिए उचीत नहीं है। दो अन्तों से उनका तात्पर्य दो प्रकार के विचारधाराओं से था, जो तत्कालीन समाज में प्रचलित थी तथा जिसके समर्थकों की संख्या भी कम न थी। इसमें प्रथम कामनाओं में कामसुखलिप्त होना था तथा दूसरा अनर्थों से युक्त काटा-कलेश में लगना। तथागत ने इसे अनार्य, ग्राम्य तथा अनर्थों से युक्त बतलाया, क्योंकि उन्होंने इन दोनों विचारों की अपने जीवन के व्यवहारिक पक्ष में लाकर देखा था और इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि इससे तृष्णा का विनाश सम्भव नहीं है। अतएव उन्होंने भिक्षुओं को मध्यम मार्ग का अनुशरण की शिक्षा दी। आठ अंगों से समन्वित यह मध्यम मार्ग अष्टांगिक मार्ग है जिसके आठ अंग है-समदिट्ठि, सम्मा संकल्पा, सम्मावाचा, समाकयान्तो, समाआजीवी, समावायामी, समासति और सम्मासमाधि। इन आठ अंगों को तथागत ने शील, समाधि और पता नामक तीन शीर्षों में बाँटा।

तत्पश्चात उन्होंने भिक्षुओं को चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया। ये हैं-दुःख अरियसच्यं, दुःख समुदाय अरिय सच्चं, दुक्ख निरोध अरिय सच्चं, दुक्ख निरोध गामिनिपटिपदा अरिय सच्चा अपने प्रथम धर्मोपदेश के क्रम में पञ्चवर्गीय भिक्षुओं के समक्ष भगवान बुद्ध ने दुःख अनित्य और अनात्म पर विचार करते हुए संसार को निलक्षणात्मक बतलाया तथा प्रतीत्य समुत्पाद का प्रकाशन कर इसके महत्व को भी दर्शाया। अन्त में भगवान बुद्ध के इस उपदेशों को सतव्यत पञ्चवर्गीय भिक्षुओं ने अपने जीवन को ध्यान माना तथा सम्यक आचरण करने के सन्कल्प को लेकर बुद्ध के उपदेशों का अभिनन्दन किया और बुद्ध धर्म एवं संघ की शरण में आकर बौद्ध उपासक बन गये।

प्रश्न 2.
‘अम्बापालि गणिका’ का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
अम्बपालि गणिका महापरिनिब्बान सुत्त से संग्रहित है जो पालि साहित्य के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ दीघ निकाय का है। इसमें भगवान बुद्ध के अन्तिम यात्रा का वर्णन मिलता है।

अम्बपालि वैशाली राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी थी। उस समय वैशाली एक समृद्ध राज्य था। समृद्ध राज्य की गणिका होने के कारण योवनावस्था में उससे भौतिक एवं दैहिक सुख का भरपूर उपयोग किया था। जब वह भगवान के शरण में आयी, उसने सात्विक और शास्वत सुख का रसास्वादन किया तो उसे संसार निस्सार लगने लगा।

अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में भगवान बुद्ध की यात्रा राजगृह से प्रारम्भ होकर कुशीनारा में अन्त हुई। इस यात्रा के क्रम में वे पाटलिपुत्र से कोटी ग्राम पहुँचे। सूचना पाते ही अम्बापालि गणिका सुन्दर रथ पर सवार होकर कोटि ग्राम की ओर चल पड़ी। सड़क के बाद रथ से उतर पैदल ही भगवान बुद्ध के पास पहुंची। तथागत ने उसे धार्मिक कथाओं से संतुष्ट कर दिया। गदगद होकर उसने अपने पुज्य महात्मा बुद्ध को भिक्षु संघ के साथ भोजन के लिए आमंत्रित किया। भगवान बुद्ध ने अपनी बौद्ध परम्परा के अनुसार उसे मौन रहकर स्वीकृति दे दी। अम्बपालि तथागत की स्वीकृति जानकर अभिवादन और प्रदक्षीणा कर प्रस्थान कर गई।

इधर वैशाली की लिच्छवी तथागत के आने के सूचना मिलते ही सुन्दर रथ एवं सुन्दर पोशाक में सजकर दर्शन के लिए जा रहे थे कि अम्बपालि अपने रथ को उसके रथ से टकरा देती है और सूचना देती है कि तथागत कल का भोजन बौद्ध संघ सहित हमारे निवास स्थान पर स्वीकार किया है। यह सुनकर लिच्छवी तिलमिला गई और उसे निमन्त्रण को खरीदने के लिए मोल-जोल करने लगी। परन्तु उसका दो टुक उत्तर सुनकर वे अवाक् रह गयी। अन्त में निराश होकर तथागत के निकट पहुँचती है तथा विधिवत अभिवादन कर एक ओर बैठ जाती है। उन्हें भी धार्मिक कथाओं एवं उपदेशों को कहते हुए यह सूचना देते हैं कि अम्बपालि के निमंत्रण को स्वीकार कर चुके हैं, अतः लिच्छवी कुमारी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं।

अगले दिन श्रद्धालु उपासिका अम्बपालि ने श्रद्धा से उत्तम भोजन बनाकर उचित समय पर भगवान बुद्ध एवं संघ को सूचना दी। पूर्वाह्न समय में भगवान बुद्ध ने भिक्षु मंडली सहित अम्बपालि के निवास स्थान पर पहुँचे और बिछे आसन पर बैठ गये। अम्बपालि ने स्वयं अपने हाथों से परोस-परोस कर उनको भोजन कराया। उनके भोजन करा लेने के पश्चात वह एक ओर बैठ गई तब भगवान बुद्ध ने उसे धार्मिक वचन का रसास्वादन कराया। उनके उपदेशों से मानों कृत्य-कृत्य होकर उसने अपना प्रिय आम्रवन उन्हें समर्पित कर दिया। “अम्बपालि बुद्ध प्रमुक्सस्य भिक्खु संघस्स दम्माति” तथागत इस दान को स्वीकार करते हैं।

इस कहानी से यह स्पष्ट होता है कि उस समय भगवान बुद्ध के प्रति अपार श्रद्धा रखते थे और सत्यनिष्ठा से उनका सत्यकार करते थे।

प्रश्न 3.
विशाखा मिगारमाता में वर्णित आठ वरों का उल्लेख करते हुए उनकी महत्ता पर प्रकाश डालें।
अथवा, विशाखा मिगारमाता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
विशाखा अंग राज्य भट्यिा नगर में राज्य धनंजय की पुत्री थी। वह बौद्ध धर्म की परम श्रद्धालु और सर्व प्रमुख उपासिका थी। उसकी शादी श्रावस्ती के राजा मिगार के पुत्र पज्ञावर्द्धन से हुई थी। बचपन से ही वह बुद्ध के प्रति अपार श्रद्धा रखती थी। वह एक अत्यन्त एवं कुशल और कुशाग्र बुद्धि की नारी थी। जिन बातों को दासी अपनी आँखों से देखकर नहीं समझती थी उसे वह अनुमान से ही जान जाती थी।

‘विशाखा ने अपनी शादी के बाद तथागत को भिक्षु संघ सहित भोजन के लिए आमंत्रित किया जिसे भगवान ने अपनी परम्परा के अनुसार मौन रहकर उसकी स्वीकृति प्रदान कर दी। विशाखा ने दूसरे दिन प्रणीत भोजन बनाकर दासी के द्वारा सूचना भेजी। उस समय भगवान बुद्ध की आज्ञा के अनुसार सभी भिक्षु वर्षा में अन्तिम र्षा का स्नान कर रहे थे। वस्त्र के अभाव में उन्होंने वस्त्र को उतार कर रख दिया था। दासी ने उन्हें अजीवक समझ और आश्रम खाली पाकर लौट गई। वहाँ लौटकर दासी ने विशाखा को इसकी सूचना दी। किन्तु विशाखा ने स्थिति की भांप लिया। तथागत ने भत्रच्छेद के भय से भिक्षु संघ सहित जेतवन से अन्तर्धान होकर विशाखा के कोठे पर जा पहुंचे। विशाखा को घोर आश्चर्य हुआ कि इतनी घनघोर वर्षा के बावजूद भी किसी भिक्षु के पाँव तक नहीं भीगे हैं। विशाखा ने हृषितमन से भगवान की भिक्षु-संघ के साथ भोजन करवाया। भोजन के उपरान्त वह एक ओर बैठ गई और तथागत से आठ वरदानों की याचना की। विशाखा ने जो आठ माँग माँगा वे इस प्रकार हैं-

  • वस्सिका साटिका – इसका अर्थ है वर्षा-ऋतु के वस्त्र। चूँकि वस्त्राभाव में भिक्षुगण नग्न स्नान करते थे। नग्नता गन्दी घृणित बुरी, असभ्य एवं अमानविक कर्म है, जिसे दूर करने के लिए विशाखा ने बुद्ध से अनुरोध किया था कि आप मुझे अनुमति दे कि मैं अपने जीवन भर पूरे भिक्षु संघ की वास्सिका साटिका या वर्षाकाल के लिए अतिरिक्त वस्त्र देना चाहती हूँ।
  • आगन्तुकमतं – नावगन्तुक भिक्षुओं को जीवन भर भोजन देते रहने का वरदान या अधिकार भी विशाखा ने पाया।
  • गमिकमतं – बाहर जाने वाले भिक्षु को जीवन भर भोजन देकर बाहर भेजने का वरदान, ताकि जाने वाले भिक्षु को भोजन के लिए मार्ग में किसी प्रकार कष्ट न हो।
  • गिलानमतं – उचित भोजनाभाव में कभी-कभी रोगी भिक्षु की मृत्यु हो जाती थी। अतः यह देख विशखा ने रोगी भिक्षु को जीवन भर भोजन देते रहने की अनुमति प्राप्त की।
  • गिलानुपट्ठाकमत – रोगी कि सेवा करने वाले भिक्षु को या तो कभी स्वयं भूखे रह जाना पड़ता था या अपने भोजन की खोज में लगे रहने के कारण रोगी भिक्षु को भाँति-भांति देखभाल नहीं कर पाते थे। परिणामस्वरूप या तो रोगी की मृत्यु हो जाती थी या सेवक की। इस बात को दूर करने के लिए विशाखा ने आजीवन रोगी के सेवक को भोजन देते रहने की प्रतिज्ञा की।
  • गिलानभेसज्जं – औषधि के अभाव में रोगी भिक्षु मर न जाय, इसलिए जीवन प्रयन्त उन्हें दवा देते रहने की प्रतिज्ञा भी विशाखा ने किया।
  • धुवयागु-भिक्षु-भिक्षुणियों को नित्य नियमित रूप से भोजन मिलता रहे, इसके लिए विशाखा ने बौद्ध-संघ को सदा खिचड़ी देने की स्वीकृति भी बुद्ध से प्राप्त की।
  • उदकसाटिका- वस्त्राभाव में भिक्षुणियाँ नग्न होकर स्नान करती थी। अतः वस्त्राभाव के कारण वे समाज में मखौल और उपहास का विषय न बनें, इसके लिए विशाखा ने आजीवन बौद्ध भिक्षुणियों को उदकसाटिका (वस्त्र) देते रहने की अनुमति भी बुद्ध से माँगी।

तथागत ने विशाखा के इन वरदानों को संघ की सुव्यवस्था की दृष्टि से अत्यन्त ही महत्वपूर्ण समझा और उसे अनुमति दी ये सब जितने अभाव हैं उनकी पूर्ति का समुचित प्रबंध करे।

अन्त में भगवान बुद्ध ने विशाखा के दानशीलता की प्रशंसा की और उसके मंगलमय जीवन की शुभकामनाएँ देते हुए भिक्षुओं को अभाव की चीजों को ग्रहण करने का आदेश दिया। इस सुत्त के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि ‘विशाखा मिगारमाता’ बौद्ध धर्म की एक सच्ची एवं कर्तव्यानिष्ठ उपासिका थी। तथागत के उपदेश से मिगार का चित्त प्रसन्न हो गया था। मिगार ने सोचा कि यह उपदेश उसे विशाखा के द्वारा ही मिला और वह विशाखा को. माता कहकर पुकारने लगा। इसलिए वह विशाखा मिगार माता के नाम से विख्यात है।

प्रश्न 4.
“राहुल कुमारस्यं दायज्जदानं का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
इस कहानी में राहुल कुमार के प्रवजित होकर संघ में शामिल होने की कथा का वर्णन मिलता है। राहुल कुमार भगवान बुद्ध का एक मात्र सुपुत्र यशोधरा का लड़का एवं महाराज शुद्धोदन का प्यारा पौत्र था। जिस समय सिद्धार्थ कुमार महाभिनिष्क्रमन की तैयारी में थे उस समय वे अपने पुत्र से नहीं मिल पाते थे। उन्होंने कहा था “बुद्धो हुत्वाच आगन्त्वा पुत्रं परिसस्सामी ति” इसी वाणी के अनुसार चारिका करते हुए भगवान बुद्ध अपनी जन्मभूमि कपिलवस्तु पहुँचे और अपने पुत्र एवं परिवार का दर्शन किया।

भगवान बुद्ध ने राजगृह में इच्छानुसार विहार कर कपिलवस्तु के लिए प्रस्थान किया और अनुक्रम चारिका करते हुए कपिलवस्तु पहुंचे। वहाँ भगवान बुद्ध शाक्यों के बीच कपिलवस्तु के निग्रोधाराम में ठहरे। दूसरे दिन पूर्वछण में भिक्षाटन हेतु चीवर धारण कर पात्र शालेक्य शुद्धोदन के राजमहल में पहुँचे। जब वे यशोधरा से ही मिले तो यशोधरा ने, ‘पधारो हे, भव-भव के भगवान’ कहकर उनका स्वागत किया। पुनः राहुल माता यशोधरा ने अपने पुज्य पिता के पास जा और अपने उत्तराधिकार का माँग कर। तब आज्ञाकारी बालक पिता के पास पहुँचकर बोला-“श्रवण तेरी क्षाया सुखमय है।” जब भगवान अपने आसन से उठकर प्रस्थान करने लगे, तो सप्तवर्षीय राहुल ने “दायाज्ज में शरण देहिय का रट लगाते हुए उनके पिछे-पिछे चल पड़े।

उन्होंने अनुभव किया कि ये बालक ज्ञान पिपासु है और सांसारिक बंधनों से मुक्त होने के लिए तत्पर है। तब भगवान बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य सारिपुत्त को आज्ञा दी ओ सारिपुत्त? राहुल को प्रव्रजित करो। सारिपुत्त को आश्चर्य हुआ की इतना छोटा बालक प्रव्रज्या कैसे ग्रहण करेगा ? क्या वह प्रव्रज्या के मंत्रों का उच्चारण कर सकेगा ? अतः उन्होंने भगवान. से पूछा-“कथंह, भन्ते राहुल कुमारं पब्बाजेही ति?” भगवान बुद्ध ने एक नियम घोषणा की’अनुजानामि भिक्खवे, तेहि सरणगमनेहि सामणीर पब्वज्जो’ तब आयुष्मान सारिपुत्र ने राहुल कुमार को प्रव्रजित किया और संघ में शामिल कर लिया। इस प्रकार राहुल कुमार अपने उत्तराधिकार को पाने में सफल हुआ।

महाराज शुद्धोदन व्यस्तता के कारण इस घटना से दूर था. जब उन्हें राहुल कुमार के प्रव्रज्या के समाचार मिला तो उनके हृदय को बड़ा आघात लगा। वे जहाँ भगवान थे वहाँ गये और उन्हें अभिवादन कर एक ओर बैठ गये और अपनी आपार व्यथा की चर्चा की। उन्होंने भगवान बुद्ध का ध्यान अव्यस्कता की ओर दिलाया और अनुरोध किया कि अल्प व्यस्क बालक. को बिना उनके माता-पिता की अनुमती के प्रव्रजित न किया जाय, क्योंकि पुत्र-प्रेम कभी-कभी व्यक्ति के हृदय को छलनी बना देता है। आपको शायद इस बात का पता नहीं होगा कि आपके प्रवजित होने पर मुझपर क्या बीति थी।

परन्तु राहुल के रहने से हृदय में संतोष था। अब आपने मेरी बिना अनुमति के मुझसे छीन लिया। वह पिड़ा मेरे लिए असहन्य हो रही है। भविष्य में किसी और व्यक्ति की यह पिड़ा नहीं झेलनी पड़े, इसलिए मैं आपसे उपयुक्त वर की माँग करता हूँ. अच्छा हो भन्ते आर्य माता-पिता की अनुज्ञा के बिना किसी को प्रव्रजित न करें। भगवान बुद्ध ने महाराज शुद्धोदन के परामर्श का सहर्ष अनुमोदन किया। इसी प्रकरण में धार्मिक कथा कहा ? भिक्षुओं को सम्बोधित किया-“न भिक्खवे ! अननुज्ञातो माता पितूहि पुत्रो पबगाजेतब्बों, यो पब्बाजटेय, अपति दुम्कटस्सा ति।” अर्थात् माता-पिता के अनुज्ञा के बिना किसी को प्रव्रजित नहीं करना चाहिए। जो प्रव्रजित करे उसे दुक्कट का दोष लगेगा।

प्रश्न 5.
‘सुखवग्गो’ में वास्तविक सुख और शान्ति का संदेश प्रस्तुत किया गया है। इस कथन की विवेचना करें।
अथवा, ‘सुखवग्गो’ की कथावस्तु पर प्रकाश डालें।
अथवा, ‘सुखवग्गो’ का सारांश लिखते हुए उसमें निहित देशनाओं का उल्लेख करें।
उत्तर:
ईसा के पाँचवी-छठी शताब्दी पूर्व भारतीय समाज परम्परागत रूप से दुखाक्रान्त था। सामान्यतया मानव जीवन में अभाव, व्याधि एवं विभिन्न प्रकार के दुःख (पीड़ा) जिस प्रकार विराजमान रहते हैं वैसे ही उस युग के समाज में भी थे। धन, विद्या, जाति, गोत्र तथा विभिन्न बातों के आधार पर तत्कालीन समाज विश्रृंखलित था। वैसे समाज में सुख, शान्ति और सम्पन्नता की कल्पना निरर्थक थी। ऐसी ही समाज में भगवान बुद्ध का आविर्भाव भारतवर्ष में हुआ।

बुद्ध ने तत्कालीन समाज की दुःखावस्था से द्रविभूत होकर समाज को सुसम्पन्न, समुन्नतशील, शान्त और सुखी बनाने का सफल प्रयास किया। कठिन तप से अर्जित ज्ञान-कोष . को बुद्ध ने मानवीय समाज को सुखी जीवन के लिए अपने उपदेशों के माध्यम से विखेर दिया, जिसका निचोड़ हम ‘सुखवग्गो’ नामक शीर्षक में पाते हैं। ‘सुखवग्गो’ में मानव-जीवन एवं समाज को सुखी तथा सम्पन्न बनाने के उपायों और साधनों पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है, अर्थात् यहाँ यह बतलाया गया कि हमारा जीवन कैसे सुखी हो सकता है ?

‘सुखवग्गो’ में सुखी जीवन की कल्पना करते हुए तथागत ने प्रथम तीन गाथाओं में यह आदर्श उपस्थित किया है कि हमें विरोधियों, आसक्तियाँ तथा महत्वाकांक्षियों के समाज में क्रमशः मित्र, अनासक्त और तृष्णा रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए। सुखी और शान्त जीवन के लिए जय-पराजय की भावना से मुक्त होकर शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए। छट्ठी गाथा में राम, द्वेष तथा स्कन्ध को दुःखमय बतलाते हुए सुखाकांक्षी को इनसे मुक्त रहने का उपदेश दिया गया है। इसी प्रकार तृष्णा (नदी, तण्हा) को भयंकर रोग तथा संस्कार को साक्षात् दुःख मानकर इनके निरोध द्वारा निर्वाण की प्राप्ति से सुखी जीवन ग्रहण करने की शिक्षा सातवीं गाथा में दी गई है। सुन्दर स्वास्थ्य, संतोष तथा विश्वास को परम हितकारी बतलाते हुए आठवीं गाथा में इन तीनों को सुखी जीवन का आवश्यक तत्व कहा गया है।

इसी तरह आगे की गाथा में सुख की कामना करने वाले प्राणी को मूखों की दु:खद संगति को त्याग करके पण्डितों या ज्ञानियों के साहचर्य ग्रहण का उपदेश दिया गया है। अन्त में सुखी और शान्तिपूर्ण जीवन व्यतित करने की शिक्षा हमें इस सुत्त में वैसे ही दी गयी है जैसे नक्षत्र-पथ की परिक्रमा चन्द्रमा करता हैं।

इस प्रकार ‘सुखवग्गो’ में न केवल वास्तविक सुख और शान्ति का संदेश प्रस्तुत किया गया है, बल्कि सुखी एवं समुन्नतशील जीवन व्यतीत करने के लिए उपयुक्त तथा आवश्यक आधार विषयक साधनों की ओर संकेत करते हुए भगवान बुद्ध ने हमें शील और प्रज्ञा से युक्त होकर कुशल कर्मों के सम्पादन की नैतिक शिक्षा दी है।

प्रश्न 6.
‘धातु विभाजनीय कथा’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा, भगवान बुद्ध के धातु विभाजन की कथा अपनी पाठ्य-पुस्तक के आधार पर लिखें।
उत्तर:
प्रत्येक सम्प्रदाय में अपने धर्म प्रवर्तक के प्रति श्रद्धा, विश्वास और सम्मान प्रकट करने के लिए सृष्टि के आदिकाल से ही परम्परा रही है कि उनके शिष्यगण गुरू की मृत्यु के ‘पाठ्य-पुस्तक’ पालि पाठ सङ्गहो में संकलित सुत्त ‘धातुविभाज़नीय कथा’ में पाते हैं कि इस परम्परा के निर्वाह को मोह बौद्ध भिक्षु भी न छोड़ सके थे। लगभग 80 वर्ष की अवस्था में कुशीनारा के युगल शाल वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद एक चक्रवर्ती सम्राट की भाँति उनका दाह-संस्कार सम्पन्न किया गया।

बुद्ध की मृत्यु की सूचना जब सारे जम्बुद्वीप में प्रसारित हो गयी तब विभिन्न क्षेत्राधिपतियों ने उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी स्मृति में स्तूप निर्माण हेतु अस्थियों (धातुओं) को प्राप्त करने के लिए जेहाद छेड़ दी। अन्ततोगत्वा स्थिति को विषम, गंभीर, जटिल और विस्फोटक होते देख द्रोण नामक ब्राह्मण ने पंचायती की। उन्होंने लोगों को बतलाया कि भगवान बुद्ध झगड़े और अशान्ति के निवारक थे। वे युद्ध एवं हिंसा में विश्वास नहीं करते थे और उन्हीं के धातुओं को लेकर आप झगड़ते हैं, अशान्ति फैलाते हैं तो इससे बुद्ध धातु को महाकष्ट होगा।

द्रोण भिक्षु की वाणी से संतुष्ट होकर बुद्ध धातु. के विभाजन का अधिकार उपस्थित राजाओं ने उन्हें दे दिया। इसके बाद द्रोण भिक्षु ने सम्पूर्ण अस्थियों को आठ बराबर भागों में विभक्तकर मगध नरेश अजातशत्रु, वैशाली के लिच्छवी, कपिलवस्तु के शाक्य, अल्लकप्प के बुल्ली, रामग्राम के कोलिय, वेदद्वी के ब्राह्मण, पावा तथा कुशीनारा के मल्लों को बुद्ध की मौलिक अस्थि प्रदान कर दी और स्वयं बुद्ध के नित्य के उपयोग में आनेवाला कुम्भ को ही लेकर संतोष का अनुभव किया। मौर्य प्रदेश के लोगों ने तब उसमें अंगार को ही ग्रहण किया। इस प्रकार इन अस्थियों को प्रतीक मान दस स्तूप विभिन्न प्रदेशों में निर्मित हुए।

पुनः शमशान के बचे खुचे राखों से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए एक स्वर्गलोक में, एक गंधार में, एक कलिंग में तथा एक नागराज द्वारा पूजित हुआ। इसी प्रकार भगवान बुद्ध के पात्र, दण्ड और चीवर से बजिरा में कुशासन तथा सयनासन से कलिपवस्तु में उनके कमरबन्द से पाटलिपुत्र में उदकसाटिका से चम्पा में, कायबध्यन से कौशल में कषाय वसा से स्वर्ग लोक में, आसन से अवन्तिपुर में लकड़ी से मिथिला में सूई धागे से इन्द्रराष्ट्र में तथा अविशष्ट परिष्कार से अपरन्तक प्रदेशों में स्तूप का निर्माण हुआ।

इस प्रकार सारे जम्बुद्वीप में तथागत के अस्थियों एवं उनके द्वारा प्रयुक्त स्मृति स्वरूप स्तूपों का निर्माण किया। लोगों के हृदय में तथागत के प्रति इस सच्ची निष्ठा एवं लगन के फलस्वरूप उनके धातुओं तथा अवशिष्ट अस्थियों का सर्वत्र प्रसार हो गया और अनुकम्पक शास्त्र के विचार से बहुत लोग अवगत हुए। इस तरह प्रस्तुत ‘धातु विभाजनीय कथा’ में भारतीय संस्कृति के आदर्श की एक झलक देखने को मिलती है और इससे आज भी हम भारतीय गौरवान्वित होते हैं।

प्रश्न 7.
‘ब्राह्मणधम्मिक – सुन्त’ के आधार पर प्राचीन कालिक ब्राह्मणों के उत्थान एवं पतन के कारणों की समीक्षा कीजिए।
अथवा, “ब्राह्मणधम्मिक सुत्त’ की कथावस्तु पर प्रकाश डालें।
अथवा, ‘ब्राह्मणधम्मिक-सुत्त’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘ब्राह्मणधम्मिक – सुत्त’ में प्राचीनकालिक भारतीय ब्राह्मणों के क्या-क्या धर्म थे, उनका रहन-सहन तथा व्यवहार कैसा था और समाज में उनका क्या स्थान था इत्यादि बातों का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत किया गया है अर्थात इस सुत्त में प्राचीनकालिन ब्राह्मणों के उत्थान एवं पतन के कारणों की समीक्षा की गयी है। साथ-ही-साथ इस सुत्त के आधार पर परोक्ष रूप में बुद्धकालीन भारतीय समाज की धार्मिक तथा अन्याय अवस्थाओं पर भी प्रकाश डाला गया है।

सुत्त के प्रारम्भ में यह बतलाया गया है कि प्राचीन काल में ब्राह्मण विद्यानुरागी, तपस्वी, धर्म-चिन्तक तथा परोपकारी थे। वे इन्द्रिय-जनित पंचकाम गुणों से विरत हो आत्म-चिन्तन में लीन रहा करते थे। इन ब्राह्मणों को न तो पशु और न सोने-चाँदी जैसे धन की ही चाह थी। चाकरी रहित जीवन व्यतीत करते हुए ऐसे ब्राह्मण निर्लोभी, अनासक्त, दलितोद्वारक तथा विद्याचरण सम्पन्न रहने के कारण-समाज में पुज्य माने जाते थे। लगभग आधी आयु तक वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शील, समाधि और प्रज्ञा अर्थात, आर्य अष्टांगिक मार्ग से युक्त होते थे। चावल, वस्त्र, तेल आदि धर्मपूर्वक समाज से लेकर वे जीवन-यापन करते थे। वे गायों को माता-पिता एवं भाई के समान आदर तथा रक्षा करते थे। गो-वंश को प्राचीन ब्राह्मण अन्नदाता, बलदाता, कर्म तथा सुख देने वाला मानते थे। इस प्रकार त्याग, निलाभ, क्षमा, दया. और धर्म के अवतार वे प्राचीन भारतीय ब्राह्मण समाज में अत्यधिक प्रतिष्ठित, पुनीत तथा विशिष्ट माने जाते थे।

परन्तु, काल – क्रम में लाभ और लोभ के गर्त में पड़कर उनका अधःपतन होने लगा। उपर्युक्त रीति से धार्मिक जीवन-यापन करने वाले वे प्राचीन ब्राह्मण तत्कालीन राजाओं, महाराजाओं के सुख-ऐश्वर्य को देखकर सुखोपभोग के साधनों के प्रति आकृष्ट होने लगे। सुअलंकृत नारियों से सम्बन्ध स्थापन प्रारम्भ किया। चारिका पद्धति का परित्याग करके उच्चासनों तथा गगनचुम्बी महलों के स्वामी बनने लगे। इन ब्राह्मणों ने स्वार्थ सिद्धि के अनुकूल और उपर्युक्त मंत्रों की रचना कर डाली। राजाओं से स्वरचित स्वार्थमूलक मंत्रों के द्वारा विवशतापूर्वक यज्ञ करवाने लगे तथा उनके कल्याण का प्रलोभन देकर यज्ञ के माध्यम से अपार धन धान्य ग्रहण करने लगे। इस प्रकार अब वे धार्मिक ब्राह्मण चित्रित रथ, सुन्दर भवन सोने-चाँदी तथा अन्यान्य सम्पत्तियों के स्वामी बनकर लोभ के कारण पतन के गर्व में आ धंसे।

इसके कारण प्राचीन काल में जो इच्छा, भुखमरी तथा बुढ़ापा जैसी तीन व्याधियाँ थीं, ब्राह्मणों के गो हिंसा के कारण बढ़कर लगभग 98 हो गयीं।

सुत्त के अन्त में यह बतलाया गया है कि धर्म के पतन होने पर शूद्रों और वैश्यों में वैमनस्य हो गया। क्षत्रिय भी अलग-अलग हो गये तथा स्त्रियाँ पति का अपमान करने लगीं। क्षत्रिय ब्राह्मण एवं दूसरे गोत्ररक्षक जातिवाद का विनाश कर विषयों के वंशीभूत हो गये अर्थात् वासनाओं में आसक्त होने के कारण यहाँ की समस्त जातियाँ मूलतः पतित आचार के धरातल पर अवतरित हो गयी।

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रस्तुत ‘ब्राह्मणधम्मिक सुत्त’ में प्राचीन ब्राह्मणों के दिनचर्या पर प्रकाश डालते हुए भारत की समुन्नतशील अवस्था से लेकर हीनावस्था तथा उनके कारणों का विशद वर्णन प्रस्तुत किया गया है अन्ततः इस सुत्त के माध्यम से हमें निर्लिप्त और निर्लोभी. बनाकर धार्मिक जीवन व्यतीत करने की शिक्षा दी गयी है।

प्रश्न 8.
‘पण्डितवग्गो’ के आधार पर पण्डितों के लक्षणों पर प्रकाश डालें।
अथवा, ‘पण्डितवग्गो’ का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
ज्ञान को भगवान बुद्ध ने आत्म प्रकाश माना है। बुद्ध के मतानुसार ज्ञान या बुद्धि ही अज्ञानता या अविधा का विनाशक तत्व है। यही कारण है कि बुद्ध ने ज्ञान या पाण्डित्य को अपने प्रवचन में तथा साधना में प्रमुख स्थान दिया है। जिसकी हल्की झाँकी हम बौद्धों, के परम पवित्र, लोकप्रिय एवं आदरनीय ग्रंथ धम्मपद से अपने पाठ्य-क्रम के लिए निर्धारित तथा डॉ० जगदानन्द ब्रह्मचारी द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘पालि पाठ सङ्हो’ में संग्रहित सुत ‘पण्डितवग्गो’ में पाते हैं।

‘पण्डितवग्गो’ बालवग्गो का विरोधी विषय प्रतिपादित करता है। इस सुत्त में पण्डित या ज्ञानीजन के लक्षण एवं पहचान का निर्देश करते हुए उनके सद्गुणों के सुपरिणामों को मोहक अभिव्यंजना हम पाते हैं। साथ ही सज्जन एवं ज्ञानी पुरुषों के साहचर्य या सहवास से मिलने वाले भौतिक तथा आध्यात्मिक लाभों का विवेचन इस सुत्त में देखने को मिलता है। पण्डित या ज्ञानीजन के लक्षण बतलाते हुए यहाँ कहा गया है कि जो व्यक्ति दुर्जन की संगति से अलग रहकर सज्जनों को साहचर्य में रहता है उसे पण्डित समझना चाहिए। दुर्जनों की संगति सदैव दुःखकारी होती है। इसलिए प्राणी को चाहिए कि दुष्ट मित्र और अधम पुरुष का परित्याग कर कल्याणकारी मित्र एवं सद्पुरुषों का साहचर्य ग्रहण करे।

पण्डितजन सदैव धर्मप्रिय, प्रसन्नचित्त और आर्यों द्वारा प्रशंसित होते हैं। जैसे नहर बनाने वाला अपनी इच्छित जगह पर पानी को ले जाता है, वाण बनाने वाला उसकी नोक को सीधा करता है, बढ़ई लकड़ी को चिकना कर मनचाही वस्तु बना देता है वैसे ही पण्डित या ज्ञानी पुरुष चतुर्दिक फैली हुई अपनी चित्र-वृत्तियों को ज्ञान के द्वारा समेटकर एकत्र करता है। ज्ञानी पुरुष की विशिष्टता का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जैसे अचल पर्वत आँधी के कठोर झोकों में भी तनकर खड़ा रह जाता है वैसे ही पण्डितजनं निन्दा और प्रशंसा रूपी झंझवातों से भी तनिक नहीं घबराता बल्कि अडिग तथा अविचलित रहते हुए परिस्थितियों से डटकर मुकाबला करता है। अर्थात् ज्ञानी पुरुष न तो आत्म प्रशंसा से प्रफुल्लित होता है एवं न आत्म निन्दा से दुःखी ही।

आगे की गाथाओं में पण्डितों के लक्षणों पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि जैसे विशाल सागर का तल पर्ण शान्त तथा गंभीर रहता है, वैसे ही पण्डित या ज्ञानी धर्मों के श्रवण मात्र से पूर्ण प्रसन्न, शान्त और गंभीर बन जाता है, पण्डितजन कदापि काम वासनाओं और सांसारिक आसक्तियों में लिप्त नहीं होता है। वह अपने लिए या किसी के लिए भी किसी प्रकार का लोभ प्रकट नहीं करता। वह शील एवं प्रज्ञा से युक्त होने के कारण अधर्मपूर्वक जीवन व्यतीत कभी नहीं करता। वह मृत्यु के भव सागर को निर्वाण को नौका से अनवरोध लाँघ जाता है अर्थात् वह चितमलों या चित्तक्लेशों से मुक्त हो सम्बोधित अंगों से युक्त होकर अन्ततोगत्वा निर्वाण को प्राप्त करते हुए जन्म-मरण से सदैव के लिए परे हो जाता है।

इस प्रकार ‘पण्डितवग्गो’ में ज्ञानार्जन के लक्षणों तथा उसके सदकर्मों का वर्णन करते हुए गाथाकार अर्थात् भगवान बुद्ध ने हमें ज्ञानार्जन द्वारा सदाचारी और प्रज्ञावान बनकर जीवन व्यतीत करके चरम लक्ष्य निर्वाण की प्राप्ति करने की सीख दी है।

Bihar Board 12th Pali Important Questions

Bihar Board 12th Pali Important Questions Short Answer Type

Bihar Board 12th Pali Important Questions Short Answer Type

प्रश्न 1.
राहुल कौन था ?
उत्तर:
ढाई हजार वर्ष पूर्व शाक्यों की राजधानी कलिपवस्तु के सम्राट शुद्धोदन का पौत्र तथा भगवान बुद्ध का पुत्र था।

प्रश्न 2.
राहुल को प्रब्रजित किये जाने पर सम्राट शुद्धोदन की प्रतिक्रिया का उल्लेख करें।
उत्तर:
राहुल को भगवान बुद्ध के आदेश पर सारिपुत्र द्वारा बौद्ध धर्म में प्रबजित कर लेने की सूचना जब सम्राट शुद्धोदन को मिला तब उन्हें काफी दुःख हुआ और वे शीघ्र ही बुद्ध के पास आकर अपनी प्रतिक्रिया इन शब्दों में जाहिर किये। पुत्र-प्रेम मेरा छाल छेद रहा है, छाल छेदकर चमड़े को छेद रहा है, चमड़े को छोड़कर मांस को छेद रहा है, मास को छेदकर, नस की छेद रहा है, नश को छेदकर हड्डी को छेद रहा है। हड्डी को छेदकर घायल कर दिया है। जब मैं आपके प्रव्रज्या से मैं दुःखी था तो नन्द पर ढाढ़स बाँधा और जब नन्द प्रब्रजित हुआ तो शिशु राहुल को अपना आश्रयदाता माना था। अब वह भी प्रव्रजित हो गया है। अतः आपही कहें-मेरा आश्रयदाता कौन होगा ? इसलिए यह उचित है भन्ते कि बिनां माता-पिता के आज्ञा प्राप्त किये बिना अपने संघ में किसी को प्रव्रजित न करें।

प्रश्न 3.
विशाखा को विशाखा मिागरमाता क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
विशाखा अंग देश भद्वीय नगर के सुप्रसिद्ध रईश धनञ्जय की पुत्री थी। वाल्यकाल से ही उस भगवान बुद्ध एवं उनके धर्म से अपार श्रद्धा थी। युवा होने पर विशाखा का विवाह श्रावस्ती निवासी निगार पुत्र प्रज्ञवहन से हुआ। विवाहोपरान्त एक दिन विशाखा भगवान बुद्ध को अपने घर भोजन पर आमंत्रित किया। भोजनो परान्त बुद्ध के धर्म श्रवण से मिगार का चित्त आश्रय विमुक्त हो गया। जिसका श्रेय विशाखा का ही था। अतः उसके नाम के बाद मिगार शब्द जोड़ दिया गया। पुनः उनके पति ने उस दिन के बाद माता कहकर सम्बोधित करने लगे। इस तरह विशाखा को तब से विशाखा मिगार माता से जाना जाने लगा।

प्रश्न 4.
अजातशत्रु कौन था ?
उत्तर:
अजात शत्रु बुद्ध कालीन मगध का सुप्रसिद्ध सम्राट था।

प्रश्न 5.
धम्मचक्कप्पवत्तनं से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
धम्मचक्कप्पवत्तनं में ‘धम्म’ का अर्थ है धर्म, ‘चक्क’ का अर्थ है चक्र और पवत्तनं का अर्थ है प्रवर्तन करना या घुमाना। इस धम्मचक्कत्तपवनं का शाब्दिक अर्थ हुआ धर्म रूपी चक्र को घुमाना। ज्ञातव्य है कि कुमार सिद्धार्थ ने साधना और कठिन तपश्चर्या के छः वर्ष बीतने के अनन्तर अपने आपको बुद्धत्व तक पहुँचाया था। बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् भगवान बुद्ध ब्रह्म सहम्पत्ति के आग्रह पर वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाय में पञ्चवर्गीय भिक्षुओं को अपना प्रथम धर्मोपदेश दिया है। बुद्ध के इस प्रथम धर्मोपदेश को ही पालि साहित्य में धम्मचक्कव्पवत्तनं के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 6.
‘पण्डितवग्गो’ के आधार पर पण्डितों के चार लक्षणों को बतावें।
उत्तर:
पण्डितों के चार लक्षण निम्नलिखित प्रकार है।
(क) पंडित सदैव धर्मप्रिय, प्रसन्नचित और आर्य द्वारा प्रशासित होते हैं ?
(ख) पण्डित निन्दा प्रशंसा में अविचलित रहते हैं।
(ग) वह काम वासनाओं और सांसारिक आसक्तियों में लिप्त नहीं होता।
(घ) शील, समाधी और प्रज्ञा से युक्त ही तृष्णा आसक्ति, चित्रमल आदि का निवास कर वह निर्वाणोंपलब्धि में तत्पर रहता है।

प्रश्न 7.
प्राचीन ब्राह्मणों के उत्थान के किन्हीं चार कारणों को लिखें।
उत्तर:
प्राचीन ब्राह्मणों के उत्थान के चार कारण ये हैं-
(क) प्राचीन ब्राह्मण संयमी, तपस्वी, जागरूक, विद्यानुरागी धर्म चिन्तक तथा परोपकारी थे।
(ख) उन ब्राह्मणों को न तो पशु और न सोने-चाँदी जैसे धन की चाहत थी।
(ग) समाज के धर्मपूर्वक चावल, वस्त्र तेल, घी आदि की याचना करते थे तथा यज्ञों में जीवहींसा नहीं करते थे।
(घ) त्याग दया क्षमा, क्लिोम, अनाशक्त आदि मानवोचित गुणों से प्राचीन ब्राह्मण युक्त होते थे।

प्रश्न 8.
ब्राह्मणों के पतन की किन्हीं चार कारणों को ‘ब्राह्मणधम्मिक सुत्त’ के आधार पर बतलावें।
उत्तर:
पतन के चार कारण इस प्रकार हैं-
(क) तत्कालीन राजाओं महाराजाओं के सुख ऐश्वर्य को देखकर सुखोपभोग के साधनों के प्रति आकृष्ट होने लगे।
(ख) सुअलंकृत नारीयों से सम्बंध स्थापन प्रारम्भ किया।
(ग) राजाओं से स्वर चित स्वार्थमूलक मंत्रों के द्वारा विवशतापूर्वक यज्ञ करवाने लगे तथा : उनके कल्याण का प्रलोभन देकर यज्ञ के माध्यम से अपार धन धान्य ग्रहण कर विलासतापूर्वक जीवन व्यतित करने लगे।
(घ) यज्ञों में पशओं की हत्या करने लगे।

प्रश्न 9.
‘धम्मचक्कप्पवतन’ का क्या अर्थ होता है ?
उत्तर:
‘धम्मचक्कप्पवतन’ का अर्थ धर्म का उपदेश करना। ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध उन “पंचवर्गीय” भिक्षुओं को धर्म उपदेश दिये।

प्रश्न 10.
नाना दिशाओं को नमस्कार करते देख भगवान ने क्या प्रश्न किया ?
उत्तर:
सिंगाल पुत्त तुम भींगे शरीर, वस्त्र, केश क्या कर रहे हो उसने उत्तर दिया भगवान मेरे पिता मृत्यु पर पड़े मुझे ऐसा सय्या उपदेश दीया था उसी की मैं नकल कर रहा हूँ।

प्रश्न 11.
माता – पिता के कितने प्रकार से सेवन करना चाहिए ?
उत्तर:
पाँच प्रकार से माता-पिता को सेवन करना चाहिए।

  1. भारणपीयन,
  2. काम करना,
  3. वंश कायम,
  4. दाञ्जदान,
  5. मृत्यु पनद्वा।

प्रश्न 12.
छः दिशाओं का क्या कारण है ?
उत्तर:
छः दिशाओं का अलग-अलग कार्य है-

  1. पूर्व दिशा-माता-पिता,
  2. दक्षिणआचार्य,
  3. पश्चिम-पुत्र, स्त्री,
  4. उत्तर-मित्र, आमात्यों,
  5. नीचे-दास-दासी,
  6. ऊपरप्रगमण-ब्रह्माणों।

प्रश्न 13.
कितने वर्ष अथक परिश्रम के बाद ज्ञान की प्राप्ति हुई ?
उत्तर:
सात वर्ष इधर-उधर भटकने के उपरान्त तथा कठिन परिश्रम एवं तपस्या के बाद कुमार सिद्धार्थ को अनमोल ज्ञान प्राप्त हुआ।

प्रश्न 14.
निर्वाण (निब्बान) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
‘निब्बान’ शब्द नि+वान से बना है। ‘नि’ का अर्थ है नहीं तथा ‘वान’ का अर्थ है इच्छा या तृष्णा। इस प्रकार न इच्छा या तृष्णा विहीन अवस्था को निब्बान (निर्वाण) कहा जाती है। यह पालि साहित्य का मौलिक शब्द है, जो लगभग मुक्ति, मोक्ष, ब्रह्मानन्द की प्राप्ति इत्यादि का समकक्ष अर्थ देता है। भगवान बुद्ध ने निब्बान के सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं है। उनके मतानुसार निब्बान के लिए कुछ भी कहना अव्याक्त है। वैसे निब्बान का शाब्दिक अर्थ है पुछना। तृष्णा के तीक्ष हो जाने की अवस्था ही निब्बान है।

निब्बान या मोक्ष की प्राप्ति समस्त साधनाओं का उद्देश्य केन्द्र रहा है। बुद्ध धर्म में निब्बान को प्रमुख. या प्रधान स्थान दिया गया है। बुद्ध ने इसे मानव-जीवन का चरम वा शाश्वत सत्य माना है, जिसे कोई भी प्राणी उसके उपदेशों या शिक्षाओं का पालन करके प्राप्त कर सकता है। यह मानव-मन की इच्छा रहित अवस्था का नाम है। अतः स्पष्ट है कि निब्बान कोई ठोस वस्तु या किसी निश्चित स्थान पर रहने वाली कोई चीज नहीं, अपितु मनुष्य के मस्तिष्क के उस. विशिष्ट अवस्था का घोतक है, जहाँ इच्छा या तृष्णा का पूर्ण निवास हो चुका रहता है। इस निर्माण की प्राप्ति के लिए पालि साहित्य में शील समाधि और प्रज्ञा का आर्य अष्टांगिक मार्ग या मध्यम मार्ग ही एक मात्र साधन मान गया है। यह निर्वाण पालि साहित्य में परमश्रेष्ठ, शान्त एवं अमृत माना गया है। निर्वाण से मानव को दुःख क्लेश और भवचक्र से मुक्ति प्राप्त होती है। बुद्ध के स्वस्थ उपदेश संघ शिक्षाएँ निर्वाण प्राप्ति को लक्ष्य में करके ही दिया गया है।

प्रश्न 15.
लुम्बिनी का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
बुद्धकालिन भारत के एक विशिष्ट जंगल या वन का नाम लुम्बिनी था, जो – तत्कालीन कपिलवस्तु या देवदह नगरी के बीच में थो। शाल वृक्षों एवं अन्य पुष्पादि लता-मण्डलों का यह सघन वन अति सुन्दर, आकर्षक और मोहक था। प्राकृतिक छटाओं की मोहकता से युक्त इसी लुम्बिनी वन में भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। अतः भगवान बुद्ध के जन्म स्थल होने के कारण बौद्ध उपासकों के लिए यह लुम्बिनी वन महातीर्थ माना जाता है। लुम्बिनी वन भारत के उत्तरी छोर पर पूर्व से पश्चिम की ओर फैले हुए हिमालय के तराई के पास जहाँ-तहाँ फैला हुआ था। जो आज भी छिटपुट रूप में विद्यमान है। वर्तमान समय में यह गौरवमयी स्थल पर्यटकों के लिए आकर्षक का केन्द्र बिन्दु बना हुआ है। अतः आज यह एक आकर्षक पर्यटक-स्थल के रूप में विश्व विख्यात है।

प्रश्न 16.
राजगृह (राजगह) का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
राजगृह वर्तमान बिहार राज्य के नालन्दा जिला का एक ऐतिहासिक स्थल है। भगवान बुद्ध अपने महाभिनिष्क्रमण के पश्चात् सर्वप्रथम राजगृह ही पधारे थे, जहाँ आलास कलाम और उदकराम पुत्र से समाधि के कई स्तरों का ज्ञान लाभ किया था। ज्ञानोपलब्धि के बाद भगवान बुद्ध अपनी चारिका के क्रम में कई बार राजगृह आये थे। यहीं पर देवदत्त ने नालागिरि नामक पागल हाथी तथा अन्य उपक्रमों से बुद्ध की हत्या का असफल प्रयास किया था। सारिपुत्र और मोग्गल्लान इसी राजगृह में भगवान बुद्ध से प्रव्रज्या तथा उपसम्पदा पायी थी। मगध सम्राट बिम्बिसार तथा आजातशत्रु को बुद्ध ने इसी राजगृह के गृद्धकूट पर्वत पर : धर्मोपदेश दिया था। अपनी अन्तिम यात्रा का प्रारम्भ भी बुद्ध ने इसी राजगृह के गृद्धकुट पर्वत पर ही धर्मोपदेश दिया था। कुछ ही दिन बाद महाकश्यप की अध्यक्षता में प्रथम बौद्ध संगीति हुई थी।

राजगृह ‘का महत्व न केवल बौद्ध दृष्टिकोण से ही है बल्कि हिन्दुओं के लिए भी यह एक पवित्र स्थल माना जाता है। यहाँ के गर्म कुण्ड के झरना विश्वविख्यात हैं हर तीन साल पर यहाँ एक माह मलमास मेला लगता है, जिसमें देश-विदेश के नर-नारी पहुँचकर कुण्ड में स्नान करते हैं। द्वापर युग में यहाँ राजा जरासंघ का निवास था, जिसका साक्षी आज भी उसके नाम से बना अखाड़ा है। राजगृह को वसुमति, गिरिव्रज, वृहद्रथपुर तथा कुशाग्रपुर भी कहा गया है। यहाँ आज भी दर्शनीय चीजें विद्यमान हैं। यहाँ गृद्धकूट पर्वत, वैभारगिरि तथा रत्नागिरि पर्वत, सप्तपर्णी गुफा, स्वर्ण भंडार विम्बिसारकारा वेणुवन, शान्ति स्तूप आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 17.
पाटलिपुत्र का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
पाटलिपुत्र वर्तमान पटना का प्राचीन नाम है। राजगृह के गृद्धकूट पर्वत से अपनी अन्तिम यात्रा का प्रारम्भ कर भगवान बुद्ध अब अम्बलट्ठिका, नालंदा आदि का परिभ्रमण करते हुए पाटलिपुत्र पहुंचे थे और मगध सम्राट अजातशत्रु के आग्रह पर पाटलिपुत्र नगर का उद्घाटन करते हुए भविष्यवाणी की थी कि व्यापारिक दृष्टि से यह नगर भविष्य में काफी समृद्धशाली होगा, परन्तु इस नगर को तीन तरह के विघ्न वराबर उपस्थित होते रहेंगे और वे हैं- अग्नि, जल तथा पारस्परिक वैमनस्यता। बुद्ध का उपर्युक्त कथन अर्थ सत्य साबित हो रहा है।

बौद्ध साहित्य में पाटलिपुत्र का अद्वितीय स्थान है। यहीं पर मगध सम्राट अशोक के संरक्षण तथा आचार्य मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था। इस संगीति में अबौद्धों को बौद्ध-संघ से निष्कासित कर बौद्ध संघ की मौलिकता ‘और चिर स्थिति को बनाये रखने में बहुत बड़ी सफलता मिली थी। इसी संगीति के पश्चात् सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्त को बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ श्रीलंका भेजा गया था।

प्रश्न 18.
पञ्जा (प्रज्ञा) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
पञ्जा आध्यात्मिक जीवन का एक आधार स्तम्भ है। बौद्ध दर्शन के अनुसार निर्वाण तक पहुंचने की यह एक कड़ी है। भगवान बुद्ध ने अपने आर्य अष्टांगिक मार्ग में प्रथम दो अर्थात् सम्मादिछि और सम्मासंकप्पयो को पञा की श्रेणी में रखा है या पञ्जा कहा है। मिलिन्दपज्हो नामक ग्रंथ के अनुसार ‘काटना’ और दिखा देना पज्ञ (प्रज्ञा) की पहचान है, यथा जैसे-कृषक बायें हाथों से धान, गेहूँ के फसल को पकड़ दाहिने हाथ से हँसिया लेकर काटता है, उसी तरह योगी विवेक से अपने मन को पकड़ पञ्जा (रूपी हॉसिया) से क्लेशों को काटता है। दिखा देने के अर्थ में उदाहरण देते हुए यहाँ कहा गया है कि पञ्जा (प्रज्ञा) उत्पन्न होने से अविधा रूपी अंधेरा दूर से जाता है और विद्या रूपी प्रकाश पैदा होता है, जिसमें चार आर्य सत्य साफ-साफ दिखाई देता है। पञ्जा के कारण मनुष्य के विवेक पर से अज्ञान रूपी पर्दा हट जाता है और विद्यारूपी ज्ञान के आलोक में संसार की यथार्थता दुःख, अनित्य तथा अनात्म को भली-भांति ज्ञान होता है।

प्रश्न 19.
सद्धा (श्रद्धा) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
“सद्दहतीति सद्धा” जो धर्म विश्वास उत्पन्न करता है, अथवा जिसके द्वारा श्रद्वेय वस्तुओं में विश्वास किया जाता है, अथवा विश्वास करना मात्र सद्धा (श्रद्धा) है। बुद्धोत्पाद आदि श्रद्धेय वस्तुओं में संदेह न होकर उनकी सत्यता में विश्वास होना श्रद्धा है। यह बाढ़ को पार करने की तरह लाँघने या उसमें निर्भय प्रवेश करने के लक्षणावली है। यह दान देना, शील की रक्षा करना, उपस्थित करना एवं भावना का आरम्भ करना आदि कर्म में पूर्वगामी होती है, चित्र की स्वच्छता इसके जानने का आधार है। अधिमुक्ति इसका प्रत्युप्रस्थान है। श्रद्धेय वस्तुएँ इसका आसन्न कारण है। त्रिरत्ल (बुद्ध, धर्म, संघ), कर्म कर्मफल, इसलोक, परलोक आदि श्रद्धेय वस्तुएँ हैं। विभिन्न प्रकार के नदी, वृक्ष, पशु आदि के प्रति अन्य अवरकोटि के देवी-देवताओं के प्रति होने वाली श्रद्धा यथार्थ श्रद्धा न होकर प्रतिरूपिका (कृत्रिम) श्रद्धा है। इसे श्रद्धा न कहकर मिथ्याधि मोक्ष कहना चाहिए। श्रद्धा चेतसिक, सर्द्धम-श्रवण आदि श्रोतापति के पदस्थान वाला है। इसे हाथ, धन और विज के समान समझना चाहिए।

प्रश्न 20.
सति (स्मृति) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
‘सरतीति सति’ अर्थात् जो धर्म स्मरण करता है अथवा जिसके कारण स्मरण किया जाता है अथवा स्मरणमात्र सति (स्मृति) है। भगवान बुद्ध ने साधकों के लिए जीवन के पग-पग सति के महत्व को बतलाया है। सति कुशल धर्मों का स्मरण करती है, यथा-यह चार सतिपट्ठान है, यह चार सम्दामधान है इत्यादि। हित, अहित धर्मों की गति का अन्वेषण करके अहित्य का त्याग एवं हित का उपादान करने वाली सति है। सति दो प्रकार की होती है- बुद्ध आदि आलम्बनों का स्मरण करने वाली स्मृति सम्मासति (सम्यक्स्मृति) है तथा लाभ एवं मोह आदि के आलम्बनों का सदा स्मरण करने वाली स्मृति कृत्रिम स्मृति है। सुत्तों में इसे मिथ्यास्मृति कहा गया है। आलम्बन में दृष्टापूर्वक प्रतिष्ठित होने के कारण सति को इन्द्रलोक के समान यथा चक्षुदृष्टि आदि की रक्षा करने के कारण इसे पहरेदार के समान समझना चाहिए।

प्रश्न 21.
समाधि पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
समाधि चित्र एकाग्रता का ध्यानावस्था को समाधि कहा जाता है, संसार के सारे उपकरण मनुष्य को क्षणिक सुख प्रदान कर अपने में लिपटाये रखते हैं, आजीवन प्राणी विश्व कि लौकिक विभूतियों तथा समाज और संसार की अन्य सुन्दर अवस्थाओं में आसक्ति रहा है, यह आसक्ति तृष्णा की जड़ मजबूत करती है, जिसके चक्र में फंसा प्राणी जन्म जन्मान्तर तक दुःख भोगता रहता है। इस दुःख का नाश तथा शाश्वत सुख की उपलब्धि कैसे हो इसके लिए भगवान बुद्ध ने कुछ व्यावहारिक एवं प्रायोगिक ढंग बतलाया है, जिसे बौद्ध वाणी में साधना या समाधि कहते हैं। इस प्रकार चित्त का दमन एवं चित्त की चंचल प्रवृत्तियों पर अंकुश डालने के लिए चित्त की जो एकाग्रावस्था होती है उसे ही समाधि कहा जाता है, चार स्मृति प्रस्थान समाधि के निमित्त और चार सम्यक् प्रयत्न समाधि के सामग्री हैं, इस प्रकार संक्षेप में स्मृति और व्यायाम का सेवन, बढ़ाव तथा इनकी भावना करना ही समाधि भावना है।

समाधि दो प्रकार के होते हैं, समथ भावना सामाधि और विपस्सना भावना समाधि। दु:ख के मूल कारण तृष्णा के विनाश द्वारा निर्वाण प्राप्ति के लिए साधक या योगावचर सामाधि की भावना करता है, इसके लिए वह अकुशल का परित्याग कर कुशल को ग्रहण करते हुए चित्त की चार भूमियों में से कामावचर, रूपावचर तथा अरूपावचर में जो मानसिक क्रियाएँ करता है उसका नाम समर्थ भावना समाधि है। विपस्सना भावना समाधि उस मानसिक क्रिया को कहते हैं, जिसके द्वारा साधक चित्त की अन्तिम भूमि लोकुत्तर में दस संयोजनों को नष्ट करते हुए निर्वाण का साक्षात्कार करता है। इस प्रकार सामाधि दुःखों के विनाश और स्थायी सुख की प्राप्ति के लिए बौद्धमतानुसार चित्त को एकाग्र करने की यह विशिष्ट यौगिक क्रिया है।

प्रश्न 22.
नीवरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
‘नीवरण’ का शब्दगत अर्थ रोकना होता है, नीवरण सामाधि प्राप्त के मार्ग को रोक अर्थात् रोड़ा उत्पन्न करता है, दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि नीवरण चित्त की चंचलता को बनाये रखने में सहायक है। नीवरण पाँच हैं, यथा

  1. कामकन्द की,
  2. व्यापाद,
  3. चीन – मिद्ध,
  4. उद्धच्च – दुकुच्च,
  5. विचिकिच्छा।

कामभोग सम्बन्धी कामना की कामछन्द कहते हैं। प्रतिहिंसा की भावना व्यापाद है। मानसिक और शारीरिक आलस्य थीन-मिद्ध है। चंचलता और पश्चाताप उद्धच्च-कुकुच्च है। बुद्ध, धर्म और संघ के सम्बंध में संदेह विच्चिकिच्छा है। इन्हीं पाँच नीवरणों के दबाने पर रूपावचर चित्त भूमि में कोई साधक या योगावचर किसी गुरू की सहायता से चालिस कम्मट्ठानों में से किसी एक पर चित्त को एकाग्र करने में सफल होता है। इस तरह हम देखते हैं कि नीवरण किसी साधक के निर्वाण प्राप्ति मार्ग में अवरोध उत्पन्न करता है। जिसका विनाश करना साधक के लिए अनिवार्य होता है। क्योंकि इसके विद्यमान रहने पर निर्माण प्राप्ति करना असम्भव है।

प्रश्न 23.
अरहत (अर्हत) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
जीवन मुक्ति को अरहत कहते हैं। जिसके समस्त चित्त क्लेशों एवं मन के विकारों को निर्मूल करके शील, समाधि और प्रज्ञा की पूर्णता द्वारा निर्वाण को उपलब्ध कर अपने को जन्म-मरण से परे बना लिया हो उसे अरहत कहते हैं। अरहित् की प्राप्ति के पूर्व कोई साध क या योगावचर श्रोतापति, साकृदागामे, अनागामि के ध्यानाभ्यास में दस संयोजनों का पूर्णत: प्रहाण कर चुका होता है। अतः अरहत प्राप्त व्यक्ति समस्त दुःखों की जननी तृष्णा का विनाश कर भवचक्र के बंधनों को तोड़ डालता है और वह पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। अरहत प्राप्त व्यक्ति सांसारिक कामभोगों तथा विषय वासनाओं के साम्राज्य में पुनः उलझता नहीं। वह लोभ, दोष तथा मोह आदि अकुशल कर्मों से सहित हो निन्दा प्रशंसा में सदा अविचलित रहता है, अपनत्व और परत्व की कुटिसत भावना से ऊपर उठा होता है। विश्व-कल्याण वसुधैव-कुटुम्बकम, भावना से ओत-प्रोत हो वह सभी प्राणियों की प्रति दया, करुणा, सहानुभूति, मैत्री आदि भाव रखते हुए सत्य अहिन्सा, त्याग, गुण, प्रेम इत्यादि गुणों का सर्वत्र संचार करता है।

प्रश्न 24.
बोध गया का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
वर्तमान बोधगया, गया जिला मुख्यालय से आठ-दस मील दक्षिण निरंजना नदी के तट पर स्थित है। इस स्थान का यह मौलिक नाम नहीं है। बोधिसत्व के रूप में भगवान बुद्ध उरूवेला के जंगलों में निरंजना नदी के तट पर साधनारत हो जब बुद्धत्व या बोधि प्राप्त किया था तब से इस स्थान का नाम बोधगया हो गया है। पहले इसका नाम उरुवेला ही था। बुद्ध के ज्ञान-स्थली होने के कारण आज यह स्थान बौद्धों का महातीर्थ स्थलों में एक माना जाता है। ‘महापरिनिब्बान सुत्त’ में चर्चा है कि कुशीनारा में अब महापरिनिब्बान से पूर्व भगवान बुद्ध ने आनन्द से बौद्धों के लिए चार दार्शनिक स्थानों की घोषणा की थी।

वे चार दार्शनीय स्थान- तथागत के जन्म स्थली, लुम्बिनी, ज्ञान प्राप्ति स्थान बोधगया, प्रथम धम्मचक्कपवत्तनं स्थान सारनाथ और भरावरिनिब्बान स्थान कुशीनारा। इसी तरह बौद्धों के चार दर्शनीय स्थलों में बोध-गया का दूसरा स्थान है। बोध गया में जिस पीपल वृक्ष के निचे सिद्धार्थ ने बुद्धत्व की प्राप्ति की थी वह पीपल वृक्ष आज बोधिवृक्ष के नाम से जाना जाता है। बोध-गया का प्राचीन नाम उरूवेला था। आज भी उरूवेला नामक कस्बा या वस्ती वर्तमान है जो अपनी प्राचीन नाम की गरीमा को संयोगे परम दर्शनीय है।

प्रश्न 25.
वैशाली का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
बुद्धकालीन भारत के सोलह जनपदों में एक वैशाली भी एक थी। आधुनिक वैशाली, मुजफ्फरपुर, चम्पारण और दरभंगा जिले तत्कालीन वैशाली जनपद के अंग थे। त्रिपिटक एवं अट्ठाकथाओं के अनुसार वैशाली एक वैभवशाली राज्य था। नगर के सात हजार सात सौ सात प्रसाद तथा उतनी ही संख्या में कुटागार, आराम, पुष्करणियाँ आदि इसकी समृद्धि के द्योतक थे और उस समृद्धि का श्रेय वज्जियों (लिच्छवियों) की गणतांत्रिक शासन व्यवस्था को दिया जाता था। लिच्छवियों के वस्त्राभूषण और रहन-सहन ग्रह प्रमाणित करते थे कि वे साज श्रृंगार, के बड़े प्रेमी थे। नृत्य-गीत और वाद्य से भी उनकी अच्छा लगाव था।

तभी तो अपने मनोरंजन के लिए परम सुन्दरी नृत्यांगना अम्बपालि को गाणिका (राज्य नर्तकी) के रूप में उन्होंने प्रतिष्ठित किया था। भगवान बुद्ध अपनी अन्तिम चारिका या यात्रा का अन्तिम वर्षावास वैशाली में बिताया। वैशाली गणतंत्र में सात अपरिहारणीय धर्म के पालन की प्रशंसा करते हुए तथागत ने राजगृह के गृद्धकुट पर्वत पर मगध सम्राट आजातशत्रु के महामंत्री वर्षकार से कहा था कि जब तक वज्जिओं द्वारा सात अपरिहाणीये धर्मों का पालन किया जाता रहेगा तब-तक वैशाली गणतंत्र को कोई जीत नहीं सकता। ..

प्रश्न 26.
कुशीनगर का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
सुत्तपिटक साहित्य के दीघनिकाय के ‘महापरिनिब्बान सुत्त’ के अनुसार बौद्धों के लिए चार दर्शनीय स्थलों में कुशीनगर एक है। यह स्थल भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण स्थल होने के कारण पालि त्रिपिटक और बौद्ध जगत में बड़ा ही विशिष्ट स्थान रखता है। अपनी 80 वर्ष की अवस्था में इसी कुशीनगर से जुड़वे शाल-वृक्षों की सुखद छाया में 483 ई० पू० वैशाख पूर्णिमा को भगवान बुद्ध महापरिनिब्बाण को प्राप्त किया था। बुद्ध कालीन कुशीनगर मल्लों की नगरी थी। भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद कुशीनारा के मल्लों ने पूरे राजकीय सम्मान और चक्रवर्ती सम्राट के समान अपने शास्ता की अन्येष्ठी क्रिया के लिए बैड-बाजे साथ एकत्रित हुए थे तथा अत्यधिक उमंग एवं निष्ठा के कारण पूरे छः दिनों तक उनके पार्थिक शरीर को विभिन्न फूलों, मालाओं, गन्धों और गगनभेदी नारों से पूजा अर्चना करते थे।

सातवें दिन ‘मुकुट-बन्धन नामक मल्लों के पवित्र स्थल पर बुद्ध के पार्थिव शरीर को अग्नि समर्पित किया गया था। आज भी देश-विदेश के पर्यटक इस पुण्य स्थल को देखने के लिए कुशीनारा पहुंचते हैं। ‘दिव्यादान’ के अनुसार जब मगधराज अशोक ने कुशीनगर की यात्रा की तो भगवान की इस परिनिर्वाण भूमि को देखकर भावावेश में मूर्छित हो गये थे। सन् 1861 की ऐतिहासिक खुदायी के परिणामस्वरूप कनिघम ने वर्तमान कसया (जिला गोरखपुर) और विशेषतः इसके समीप अनुरूधवा गाँव के टीले को प्राचीन कुशीनगर बताया था, जिसके सम्बंध में यद्यपि वाटर्स और स्मिथ ने संदेह प्रकट किया था, परन्तु बाद के खोजों ने इस पहचान को प्रायः निश्चित प्रमाणित कर दिया।

प्रश्न 27.
इसिपतनमिगदाय पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
इसिपतनंमिगदाय वर्तमान उत्तर प्रदेश के सारनाथ के जंगल का बुद्धकालीन नाम है। घने जमलों से घिरे सुरभ्य मनोहर और प्राकृतिक सौंदर्य वाले इस उपवन में मृग या हिरण के निवास होने के कारण ही इस स्थान का नाम मिगदाय पड़ा तथा ऋषियों एवं तपस्वियों के साधना स्थल होने के कारण इसे इसिफ्तन कहा जाता था। यह ऋषियों का मिगदाय ही पहला स्थान था जहाँ भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम धर्मोपदेश दिया था। जिसे पालि साहित्य में धम्मचक्कपवत्तनं के नाम से जाना जाता है। यहीं अपने प्रथम धर्मोपदेश के अवसर पर भगवान बुद्ध ने पञ्चवर्गय भिक्षुओं को दो अतिशयों के त्याग, मध्यम मार्ग की महानता, चार आर्य सत्यों का प्रकाशन, प्रतीव्य समुत्पाद का प्रत्याख्यान और दुःख अनित्य एवं अनात्म का विशद् विवेचन प्रस्तुत किया था। ‘महापरिनिब्बान सुत्तं के अनुसार बौद्धों के चार दर्शयनीय स्थलों में यह भी एक है। इस गौरवमयी स्थल को देखने के लिए आज भी देश-विदेश के पर्यटकों में भीड़ लगा हुआ रहता है।

प्रश्न 28.
जातक पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
जातक ‘खुदकनिकाय’ का 10वाँ प्रसिद्ध ग्रंथ है और सुत्तपिटक इसका अपना विशिष्ट स्थल है। जातक शब्द का अर्थ जन्म संबंधी है। जातक में भगवान बुद्ध के पूर्व जन्म सम्बन्धी कथाएँ हैं। बुद्धत्व प्राप्ति कर लेने की अवस्था से पूर्व भगवान बुद्ध बोधिसत्व के रूप में जाने जाते हैं और दान, शील, मैत्री, सत्य इत्यादि पारमिताओं अथवा परिपूर्णताओं का अभ्यास करते हैं। जातक कथाओं में वे प्रधान पात्र के रूप में उल्लिखित हैं। कहीं-कहीं उनका स्थान . गौनपात्र के रूप में होता है और कहीं-कहीं दर्शक के रूप में भी चित्रित किये गये हैं।

जातक में भगवान बुद्ध के पूर्व जन्म के 547 कथाएँ संग्रहित है, जो 22 निपातों में विभक्त है। इसका विभाजन ठीक उसी प्रकार किया गया है, जिस प्रकार थेर एवं थेरीगाथाओं का।: जातक केवल साहित्य दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि प्राचीन भारतीय संस्कृति के इतिहास के लिए प्रजोत है। शिल्पकला के क्षेत्र में भी जातक का गहरा छाप है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण भरभूत एवं साँची के पत्थरों पर उत्कीर्ण बौद्ध शिल्प कला को देखने से मिलता है।

इसी प्रकार दक्षिण भारत के अमरावती के भाष्कर और उसके उत्तरकाल में विश्वविख्यात अजन्ता एवं एलोरा का जो चित्रण है सभी जातक पर आधारित हैं, तत्कालीन सामाजिक जीवन का जितना अच्छा चित्र जातक से प्राप्त होता है, उतना अन्य भारतीय ग्रंथों से नहीं। इस प्रकार तत्कालीन लोगों के रहन-सहन शिक्षा पद्धति राजनैतिक अवस्था आदि का ज्ञान प्राप्त करने के लिए जातक एक महत्वपूर्ण श्रोत है।

प्रश्न 29.
धम्मपद पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
धम्मपद् सुत्तपिटक के ‘खुदृकनिकाय’ का दूसरा महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसे बौद्ध साहित्य का संभवतः सबसे लोकप्रिय ग्रंथ माना जाता है। इस प्रकार इसे बौद्धों का गीता भी कहा जाता है। धम्मपद शब्द का अर्थ है धर्म सम्बंधी पद या शब्द। ‘पद’ का शाब्दिक अर्थ · . वाक्य या गाथा की पंक्ति भी होता है। अतः धम्मपद का अर्थ धर्म सम्बन्धी वाक्य या गाथा भी है। धम्मपद में कुल 423 गाथाएं हैं, जो 26 वर्गों में विभक्त है। धम्मपद की विषय वस्तु को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि उसमें नीति के वे सभी आदर्श संग्रहित हैं जो भारतीय संस्कृति और समाज की सामान्य सम्पत्ति है। संक्षेपतः इस ग्रन्थ के बारे में कहा जा सकता है कि नैतिक दृष्टि से जितना गम्भीर है, उतना ही वह प्रसादगुणपूर्ण भी है।

पूज्य भदन्त आनन्द कौसल्यायन जी का यह कथन बिलकुल ठीक है कि “एक पुस्तक को और केवल एक एक पुस्तक को जीवन भर साक्षी बनाने की यदि कभी आपकी इच्छा हुई तो विश्व के पुस्तकालय में अपने ‘धमपदं”” से बढ़कर दूसरा पुस्तक मिलना कठिन है बुद्धोपदेश का धम्मपद से अच्छा संग्रह पालि साहित्य में नहीं है। इसकी गाथाएं सरल और मर्मर पार्थिनी है। इन गाथाओं में शील, समाधि, प्रज्ञा, निर्वाण आदि का बड़ी सुन्दरता के साथ वर्णन है जिन्हें पढ़ते हुए अद्भूत संवेग, धर्मरस शान्ति और संसार निर्वेद का अनुभव होता है। अतः आज विश्व में मानव के समक्ष मुँह वाये खड़ी विभिन्न चुनौतियों और विषम परिस्थितियों में धम्मपद के प्रचार की बहुत बड़ी आवश्यकता है। जितना ही इसका प्रचार होगा, उतना ही मानव जनता का कल्याण होगा।

प्रश्न 30.
उदान से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
‘उदान’ सुत्तपिटक साहित्य के ‘खुदक’ निकाय का तीसरा महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। ‘उदान’ भगवान बुद्ध के मुख्य से समय-समय पर निकले हुए प्रीति-वाक्यों का संग्रह है। भावातिरेक से सन्तों के मुख से जो प्रीति वाक्य निकला करते हैं, उन्हें उदान कहते हैं। ‘उदान’ : में भगवान बुद्ध के ऐसे गम्भीर और उनकी समाधि-अवस्था के सूचक शब्द संगृहीत हैं, जो उन्होंने विशेष अवसरों पर उच्चरित किये।

‘उदान’ में आठ वग्ग हैं और प्रत्येक बग्ग में 10 सुत्त हैं, केवल 7वें वग्ग में 9 सुत्त हैं। आठ वग्गों, के नाम इस प्रकार हैं-

  1. वोधिवग्ग,
  2. मुचलिन्द वग्ग,
  3. नन्द-वग्ग,
  4. मेथिय वग्ग,
  5. सोणत्थेरस वग्ग,
  6. जज्चन्ध-वग्ग,
  7. चुलवग्ग,
  8. पाटलिगामिय वग्गो प्रत्येक वग्ग के प्रत्येक सुत्त में भगवान बुद्ध का गाथावृद्ध उदान है।

शैली सरल है और सब जगह प्रायः एक सी है। उदान की सबसे बड़ी विशेषता है बौद्ध-जीवन दर्शन का उसके अन्दर स्पष्टतम प्रस्फुटित स्वरूप। बुद्ध-जीवन के अनेक प्रसंगों के अतिरिक्त चित्त की परम शान्ति निर्वाण, पुनर्जन्म, कर्म और आचार-तत्व सम्बंधी गंभीर उपदेश उदान में निहित है।

प्रश्न 31.
अपदान से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
अपदान खुद्दकनिकाय का क्रमबद्ध 13वाँ ग्रंथ है। इसमें 547 बौद्ध भिक्षुओं और 40 भिक्षुणियों के पूर्व जन्मों के महान कृत्यों का वर्णन है। जातक के समान ही इसकी कहानी के दो भाग हैं-एक अतीत जन्म सम्बन्धी और दूसरा वर्तमान जन्म सम्बंधी। अपदान दो भागों में विभक्त: है और अपदान और थेरी अपदान में 55 वर्ग हैं और थेरी अपदान में 41 थेर 10 अपदान (केवल 24वें वर्ग में 7 अपदान) थेरीगाथा में 10 अपदान जो साहित्य या इतिहास की दृष्टि से इस ग्रन्थ का कोई विशेष महत्व नहीं है। हाँ लोकधर्म के रूप बौद्ध धर्म का एक चित्र यहाँ अवश्य मिलता है, इसी ग्रन्थ की शैली पर संस्कृत बौद्ध साहित्य का अपदान साहित्य अधिकाशंतः विकसित हुआ है, यह भी इसका महत्व कहा जा सकता है। अपदान में ‘चीनरट्ठ’ (चीनराष्ट्र) का उल्लेख है।

प्रश्न 32.
बोधिसत्त से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
बोधिसत्व दो शब्दों के योग से बना है-बोधि और सत्व। बोधि का अर्थ ज्ञान, बोध का विवेक होता है और सत्य का अर्थ प्राणी। इस तरह दोनों शब्दों के मिलने से जो अर्थ प्रकट होता है वह है. ज्ञान के लिए प्राणी। दूसरे शब्दों में सम्यक् सम्बोधि (ज्ञान) की प्राप्ति के लिए सत्यकर्मकर्ता पुरुष को बोधिसत्व कहा जाता है ये बुद्ध पद के अभ्यर्थी होते हैं। भगवान बुद्ध अपने बुद्धत्वलाभ के पूर्व अनेक जन्मों तक बोधिसत्व के रूप में कुशल कर्मों के सम्पादन करते हैं, यानि बुद्धत्व प्राप्ति के पूर्व जन्मों में भगवान बुद्ध बोधिसत्व के नाम से जाने जाते हैं। बोधिसत्व के रूप में उनकी कहानियाँ जातक ग्रंथ में देखने को मिलता है।

लगभग 550 जातक कथाओं में भगवान बुद्ध बोधिसत्व के रूप में सदैव 10 पारमिताओं यथा-दान पारमिता, शीलपारमिता, नैव्कम्यपारमिता, पतापारमिता, वीर्यपारमिता, शान्तिपारमिता, सत्यपारमिता, अधिष्ठान-पारमिता, मैत्रीपारसिता तथा उपेक्षापारमिता का पालन किये हैं। बोधिसत्व आदर्श सेवा एवं शुद्धता का जीवन है। बोधिसत्व केवल बौद्ध ही नहीं होते, बल्कि अन्य धर्मावलम्बी भी होते हैं। बोधिसत्व तीन प्रकार के होते हैं। प्रज्ञा प्रधान, सद्धप्रधान और वीर्य प्रधान। प्रज्ञा प्रधान का यह अर्थ कदापि नहीं कि उनमें श्रद्धा तथा वीर्य का अभाव रहता है। श्रद्धा एवं वीर्य की अपेक्षा प्रज्ञा की प्रबलता के कारण, प्रज्ञा प्रधान कहा जाता है। इसी तरह अन्य दो के सम्बंध में भी ऐसा ही समझना चाहिए। भगवान बुद्ध को प्रज्ञा प्रधान बोधिसत्व माना गया है।

प्रश्न 33.
सारिपुत्त का संक्षिप्त परिचय दें
उत्तर:
सारिपुत्त भगवान बुद्ध की प्रमुख शिष्यों में से एक थे। सारिपुत्त में तत्कालीन साम्राज्य के नालन्दा क्षेत्र के निवासी माना जाता है। सारिपुत्त को उपतिस्स के नाम से भी जाना जाता है। मोग्गलान सारिपुत्त के मित्र थे। दोनों मित्र बौद्ध धर्म में भगवान बुद्ध के एक साथ पाब्बजा तथा उपसम्पदा पायी थी। दोनों मित्र बौद्धधर्म में दीक्षित होने के पूर्व राजगृह स्थित संजय परिब्राजक के शिष्य थे। भगवान बुद्ध के आदेश पर सारिपुत्त ने ही राहुल कुमार (भगवान बुद्ध के पुत्र) को बौद्ध धर्म में प्रव्रजित किया था। सारिपुत्त बड़ा ही तेज बुद्ध के भिक्षु थे। इन्हें अभिधर्म के ज्ञाता माना जाता था। बुद्ध के उपदेशों में उनके शिष्यों के उपदेश होने के बावजूद भी उसे बुद्ध वचन माना जाता है, क्योंकि ऐसे उपदेशों का बुद्ध द्वारा अनुमोदन प्राप्त है। मज्झिम निकाय का सम्मादिट्ठि-सुत्त करिपुत्र द्वारा भाषित है तथापि यह बुद्ध वचन है, क्योंकि इस सुत्त के उपदेश का बुद्ध द्वारा अनुमोदन प्राप्त है। बुद्ध के जीवन काल में ही बुद्धधर्म था उपदेश को जन-जन तक पहुँचाने में सारिपुत्त का अद्वितीय योगदान को कभी भूलाया नहीं जा सकता।

प्रश्न 34.
आनन्द का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
आनन्द भगवान बुद्ध के अग्रगण्य शिष्यों में एक था। भगवान के सबसे निकट और साथ रहने का सौभाग्य आनन्द को ही प्राप्त था। आनन्द के आग्रह पर भगवान बुद्ध अनेक बार लोगों को उपदेश दिये थे। आनन्द के आग्रह पर ही बुद्ध ने बौद्ध संघ में महिलाओं के प्रवेश तथा भिक्षुणी संघ का निर्माण किया था। भगवान पब्वज्या सुत्त का उपदेश भी आनन्द के आग्रह पर ही दिया था। इस प्रकार भगवान बुद्ध बहुतों बार आनन्द को सम्बोधित कर भिक्षुओं को उपदेश दिया है।

भगवान बुद्ध के अन्तिम वचन सुनने तथा उनकी अन्त्येष्ठि क्रिया में भाग लेने का सौभाग्य आनन्द को प्राप्त था। बुद्ध महापरिनिर्वाण के. बाद महाकास्सप के अध्यक्षता में जो प्रथम बौद्ध संगीति हुई थी उसमें आनन्द नेही महाकास्सप द्वारा पूछे गये ध म विषयक प्रश्नों का सविस्तार उत्तर दिया था। अगर इस संगीति में आनन्द सम्मलित न होता तो शायद त्रिपिटक का बुद्धवचन के रूप में संगायन करना आसान न होता। इस संगीति में बुद्ध महापरिनिर्वाण के समय अपने द्वारा किये गये कुल भूलों की जिम्मेवारी आनन्द स्वीकार करते हुए. समस्त सभासदों के आगे प्राचित भी किया था। संक्षेपतः कहा जा सकता है कि आनन्द बौद्ध धर्म ज्ञाताओं में एक थे, तभी तो धर्मधर कहा जाता है।

प्रश्न 35.
सुजाता का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
सुजाता बुद्धकालीन उरूवेला (वर्तमान बोध गया) के सेनानी कस्वे में एक बड़े कृषक के घर जन्म ग्रहण की थी। तरूणी होने पर उसे वट वृक्ष (पीपल वृक्ष) से यह मनौती.. की थी कि समान जाति के कुल जो पहले ही-गर्भ में यदि मैं पुत्र प्राप्त करूँगी तो प्रतिवर्ष एक लाख के खर्च में वृक्ष देव का पूजन करूंगी। उसकी यह मनोकामना पूरी हुई। अतः एक वैशाख पूर्णिमा को अपने मनौती को पूर्ण करने की इच्छा से हजार गायों को मधुवन में चरवा, उनके दूध को पाँच सौ गायें को पिलवा इसी क्रम से उसने आठ गायों को तैयार करवा उनके दूध से खीर पकायो। तदन्तर सुजाता ने अपनी दासी पूर्णा को वृक्ष के निकट जा देवस्थान को साफ करने की अनुमति दी।

छः वर्षों की दुष्कर तपश्चर्या को पूर्णकर बोधिसत्व की उसी रात्रि में पाँच महास्वप्नों को देख, अपनी बुद्धत्वकाल की समीप समक्ष प्रातःकाल उसी वृक्ष के नीचे अपनी प्रतिभा से सारे वृक्ष को प्रभावित कर बैठे हुये थे। पूर्णिमा ने आकर वृक्ष के निचे बोधिसत्व को देखा। . देखकर सोची की उसकी स्वामिनी की भक्ति से प्रसन्न हो वृक्षदेव स्वयं साक्षात् हो मनौती लेने की निमित बैठे हैं। इसलिए उसने शीघ्र ही आकर सुजाता से यह बात कही। सुजाता ने भी शीघ्र ही चलकर क्टवृक्ष के नीचे स्नेह सूर्य-अर्थात् बोधिसत्व (सिद्धार्थ) को बैठा देख अपना . . कुल देवता समझ लिया और स्वर्ण थाल में ओजपूर्ण खीर सिद्धार्थ के कर कमलों में रख दिया। सिद्धार्थ ने उसे ग्रहण किया और आश्चर्य है उसी रात में उन्हें सम्बोधि अर्थात् बुद्धत्व का साक्षात्कार हुआ। तब से यह घटना पालि साहित्य में ‘सुजाता पायसदानं’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 36.
विशाखा मिगारमाता का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
विशाखा एक कुशल बौद्ध उपासिका थी, जिसने एक प्राचीन भारतीय नारी त्याग और बलिदान की पवित्र भावना का परिचय दिया था। विशाखा, अंग राज्य के भट्ठिया नगर के सुप्रसिद्ध रईश धनञ्जय की पुत्री थी। बाल्यकाल से ही उसे बुद्ध के प्रति अपार श्रद्धा थी। बड़ा होने पर उसका विवाह श्रावस्ती के निवासी मिगार पुत्र प्राज्ञवर्द्धन से कर दिया गया था। विवाहोपरान्त जब वह श्रावस्ती में रह रही थी उसी समय भगवान बुद्ध एक बार श्रावस्ती में अनाथपिण्डिका के जेतवनाराम में विहार कर रहे थे। विशाखा वहाँ जाकर, भिक्षु संघ सहित भगवान बुद्ध को अपने यहाँ भोजनो पर आमंत्रित की थी। भोजनोपरान्त तथागत के उपदेश-श्रमण से ही मिगार का चित्र आश्रव विमुक्त हो गया था। इसका श्रेय विशाखा की ही था। अतः उसके नाम के बाद मिगार शब्द जोर दिया गया। पुनः उसका पति प्रज्ञावर्द्धन ने उसे माता कहकर सम्बोधित किया, जिसके कारण तभी से वह विशाखा मिगारमाता के नाम से प्रसिद्ध हुई।

विशाखा मिगारमाता के आठ वरदान पालि साहित्य में चिर स्मरणीय है. जिसकी स्वीकति उसे भगवान से मिली थी उसने आठ वरदानों से जीवन भर भिक्षु संघ को सेवा करते रहने की प्रतिज्ञा की थी। वे प्रतिक्रिया हैं-वस्सिकं साटिक, आगन्तुकभत्तं, गिलान भत्रं, गिलानुपट्ठाकभत्तं, गिलानभेससञ्ज, धुबयागु और उदसाटिक। विशाखा के उपर्युक्त आठों अनुदानों उसका एक . ऐसा त्याग चित्त उपस्थित करता है, जिसके आधार पर हमें उसे समस्थ भारतीय नारी जगत के या नारी आकाश के चाँद कह सकते हैं।

प्रश्न 37.
मोग्गल्लान का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
मोग्गलान भगवान बुद्ध के अत्राश्रावक थे। पालि साहित्य में कोलित के नाम से भी जाना जाता है। सारिपुत्र मोग्गलान के मित्र थे दोनों मित्र एक साथ बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए थे। दोनों मित्र पहले राजगृह स्थित संजय परिव्राजक के शिष्य थे। संजय इन दोनों सहित 250 परिब्राजको का गुरू था। दोनों मित्र अश्वजित नामक बौद्ध भिक्षु के दर्शन के बाद अपने 250 परिव्राजक शिष्यों के साथ राजगृह के वेणुवन, में भगवान बुद्ध के बौद्ध धर्म की प्रव्रज्या तथा उपसम्पदा पायी थी। मोग्गलान सारीपुत्र के भांति ही बौद्ध-संघ का एक महत्वपूर्ण व्यक्ति था। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार और बौद्ध संघ को सुदृढता प्रदान करने में मोग्गलान के योगदान को कभी भूलाया नहीं जा सकता। बौद्ध धर्म के उत्थान में अपनी अद्भूत सेवा के कारण ही तो बुद्ध के प्रधान शिष्यों में अपना बनाया था।

Bihar Board 12th Pali Important Questions

Bihar Board 12th Pali Objective Important Questions Part 3

Bihar Board 12th Pali Objective Important Questions Part 3

प्रश्न 1.
अम्बापालि से बुद्ध के आमंत्रण को कौन खरीद लेना चाहता था ?
(क) लिच्छवी – राजकुमार
(ख) मगध का राजा
(ग) साकेत का सेठ
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) लिच्छवी – राजकुमार

प्रश्न 2.
कुरंगमिगजातक संग्रहीत है
(क) धम्मपद से
(ख) जातक से
(ग) सुत्तनिपात से
(घ) उदान से
उत्तर:
(ख) जातक से

प्रश्न 3.
प्रज्ञावर्द्धन विशाखा का कौन था ?
(क) पिता
(ख) पत्र
(ग) पति
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) पति

प्रश्न 4.
विशाखा ने बुद्ध से कितने वरों की याचना की थी ?
(क) 2
(ख) 4
(ग) 6
(घ) 8
उत्तर:
(घ) 8

प्रश्न 5.
पूर्वाराम बिहार कहाँ अवस्थित था ?
(क) श्रवस्ती
(ख) वैशाली
(ग) राजगृह
(घ) सारनाथ
उत्तर
(क) श्रवस्ती

प्रश्न 6.
शिल्प के समान क्या नहीं है ?
(क) धन
(ख) गोत्र
(ग) सुख
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(क) धन

प्रश्न 7.
‘बाल’ शब्द का क्या अर्थ है ?
(क) पण्डित
(ख) ज्ञानी
(ग) मूर्ख
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) मूर्ख

प्रश्न 8.
‘वण्डितवग्गो’ में कितनी गाथाएँ है ?
(क) 14
(ख) 13
(ग) 12
(घ) 11
उत्तर:
(क) 14

प्रश्न 9.
पण्डितवग्गो संग्रहीत है
(क) धम्मपद से
(ख) जातक से
(ग) उदान से
(घ) थेरगाथा से
उत्तर:
(क) धम्मपद से

प्रश्न 10.
‘पराभवसुत्त’ में पराभव से क्या तात्पर्य है ?
(क) उत्थान
(ख) पतन
(ग) ज्ञान
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ख) पतन

प्रश्न 11.
पण्डितवग्गो विरोधी विषय प्रस्तुत करता है
(क) धनियसुत्त का
(ख) सुखवग्गों का
(ग) बालवग्गों का
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) बालवग्गों का

प्रश्न 12.
ब्राह्मणधम्मिकसुत्त में रोगों की संख्या बताई गई है
(क) 96
(ख) 97
(ग) 98
(घ) 99.
उत्तर:
(ग) 98

प्रश्न 13.
‘अन्नदा, वण्णदा, सुखदा’ किसे कहा गया है ?
(क) भेड़ को
(ख) गाय को
(ग) अश्व को
(घ) हाथी को
उत्तर:
(ख) गाय को

प्रश्न 14.
बसल का अर्थ होता है
(क) महान्
(ख) श्रेष्ठ
(ग) वषल
(घ) उत्तम
उत्तर:
(ग) वषल

प्रश्न 15.
पब्बज्जासुत्त में प्रवज्या की कहानी है
(क),गौतम बुद्ध की
(ख) आनन्द की
(ग) राहुल की
(घ) सारिपुत्र की
उत्तर
(क),गौतम बुद्ध की

प्रश्न 16.
भगवान बुद्ध की मृत्यु हुई थी
(क) लुम्बिनी
(ख) बोधगया
(ग) सारनाथ
(घ) कुशीनगर
उत्तर:
(घ) कुशीनगर

प्रश्न 17.
धनिया सपरिवार रहता था
(क) गंगा के तट पर
(ख) यमुना के तट पर
(ग) मही के तट पर
(घ) इनमे से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) मही के तट पर

प्रश्न 18.
शिल्प के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है
(क) धम्मेवाद में
(ख) नीतिगाथा में
(ग) पब्बज्जासुत्त में
(घ) बालवग्गो में
उत्तर:
(ख) नीतिगाथा में

प्रश्न 19.
पिटकों की संख्या है
(क) 1
(ख) 2
(ग) 3
(घ) 4
उत्तर:
(ग) 3

प्रश्न 20.
भिक्षु – संघ का संविधान है
(क) सुत्त – पिटक
(ख) विनय – पिटक
(ग) अभिधम्मपिटक
(घ) अनुपिटक
उत्तर:
(ख) विनय – पिटक

प्रश्न 21.
अभिधम्मपिटक में कितने ग्रन्थ हैं ?
(क) 5
(ख) 6
(ग) 7
(घ) 8
उत्तर:
(ग) 7

प्रश्न 22.
“जातक’ का अर्थ है
(क) जन्म संबंधी
(ख) ज्ञान संबंधी
(ग) चरित्र संबंधी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) जन्म संबंधी

प्रश्न 23.
खुद्दक – निकाय के अंतर्गत ग्रन्थों की संख्या है
(क) 5
(ख) 10
(ग) 15
(घ) 20
उत्तर:
(ग) 15

प्रश्न 24.
धम्मपद में गाथाएँ है
(क) 223
(ख) 323
(ग) 423
(घ) 523
उत्तर:
(ग) 423

प्रश्न 25.
‘धम्मपद’ आता हैं
(क) दीघनिकाय में
(ख) मज्झिमानिकाय में
(ग) खुद्दकनिकाय
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) खुद्दकनिकाय

प्रश्न 26.
भगवान बुद्ध ने अपना उपदेश दिया था
(क) संस्कृत में
(ख) पालि में
(ग) अवधी में
(घ) हिन्दी में
उत्तर:
(ख) पालि में

प्रश्न 27.
प्रथम संगीति कहाँ हुई थी?
(क) राजगृह
(ख) वैशाली
(ग) पटना
(घ) सारनाथ
उत्तर:
(क) राजगृह

प्रश्न 28.
तृतीय संगीति कहाँ हुई थी?
(क) राजगृह
(ख) पाटलिपुत्र
(ग) वैशाली
(घ) सारनाथ
उत्तर:
(क) राजगृह

प्रश्न 29.
पालि वर्णमाला में वर्गों की संख्या हैं
(क) 38
(ख) 39
(ग) 40
(घ) 41
उत्तर:
(घ) 41

प्रश्न 30.
प्रालि में आगत व्यंजनों की संख्या है
(क) 33
(ख) 34
(ग) 35
(घ) 36
उत्तर:
(क) 33

प्रश्न 31.
‘स्वागत’ का सन्धि – विच्छेद होगा
(क) स्व + आगत
(ख) स्वा + गतं
(ग) सु + आगतं
(घ) स + आगतं
उत्तर:
(ग) सु + आगतं

प्रश्न 32.
व्यकतों का सन्धि – विच्छेद होगा
(क) वि + आकतो
(ख) व्या + कतो
(ग) व्याक + तो
(घ) व्य + आकतो
उत्तर:
(क) वि + आकतो

प्रश्न 33.
‘तस्सेदं’ का सन्धि – विच्छेद होगा
(क) तस्य + एवं
(ख) तस्य + इदं
(ग) तस् + सेदं
(घ) तस्से + दं
उत्तर:
(ख) तस्य + इदं

प्रश्न 34.
पालि में वचन होते हैं
(क) 1
(ख) 2
(ग) 3
(घ) 4
उत्तर:
(ख) 2

प्रश्न 35.
पालि में लिंग होते हैं
(क) 1
(ख) 2
(ग) 3
(घ) 4
उत्तर:
(ग) 3

प्रश्न 36.
‘बुद्ध’ शब्द का प्रथमा विभक्ति बहुवचन में रूप होगा
(क) बुद्धो
(ख) बुद्ध
(ग) बुद्धं
(घ) बुद्धे
उत्तर:
(ख) बुद्ध

प्रश्न 37.
पालि में उपसर्ग हैं
(क) 20
(ख) 18
(ग) 16
(घ) 14
उत्तर:
(क) 20

प्रश्न 38.
‘लता’ शब्द का द्वितीया विभक्ति एकवचन में रूप होगा
(क) लता
(ख) लतं
(ग) लताय
(घ) लतासु
उत्तर:
(ख) लतं

Bihar Board 12th Pali Important Questions

Bihar Board 12th Pali Objective Important Questions Part 2

Bihar Board 12th Pali Objective Important Questions Part 2

प्रश्न 1.
भगवान उद्ध के आदेश पर राहुल कुमार को किसने प्रवजित किया ?
(क) आनन्द्र
(ख) सारिपुत्र
(ग) मोग्गलान
(घ) महाकाश्यप
उत्तर:
(ख) सारिपुत्र

प्रश्न 2.
बिन’ मा :-पिता के अनुमति किसे ब्रजित किया गया ?
(क) राहुल
(ख) आनन्द
(ग) भगवान
(घ) अन्य भिक्षु
उत्तर:
(क) राहुल

प्रश्न 3.
शिक्षा प्राप्ति उपरान भगवान किसके निवास स्थान पर पहुंचे थे ?
(क) सरिपुत्र
(ख) भिक्षु
(ग) शुद्धोदन
(घ) श्रावणेर
उत्तर:
(ग) शुद्धोदन

प्रश्न 4.
बिना माता-पिता के अनुमति प्रव्रजित करने पर बुद्ध ने किस प्रकार के दण्ड का विधान किया था ?
(क) मृत्युदण्ड
(ख) दुक्कर का दोष
(ग) तीन माह की कैद की सज़ा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) तीन माह की कैद की सज़ा

प्रश्न 5.
राहुल के प्रवजित होने पर अधिक कष्ट किसे हो रहा था ?
(क) सारिपुत्र
(ख) भगवान
(ग) शुद्धोदन
(घ) भिक्षुमंडली को
उत्तर:
(ग) शुद्धोदन

प्रश्न 6.
भगवान बुद्ध द्वारा किस शीर्षक में दिशा-पूजन के महत्व को दर्शाया गया है ?
(क) धम्मचक्कपत्वनं
(ख) दोनों में
(ग) सिंगाल सुत्त
(घ) तीनों में से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) सिंगाल सुत्त

प्रश्न 7.
आर्य के धर्म-विनय में दिशाएँ कितनी मानी गई है ?
(क) चार
(ख) आठ
(ग) छः
(घ) दस
उत्तर:
(ग) छः

प्रश्न 8.
सिंगाल सुत्त में मुख्य पात्र कौन हैं ?
(क) भगवान
(ख) पुत्त
(ग) सिंगाल
(घ) गृहपति
उत्तर:
(ख) पुत्त

प्रश्न 9.
सिंगाल का विपरित कार्य कौन करता था ?
(क) सिंगाल
(ख) भिक्षु
(ग) पुत्त
(घ) दिशा
उत्तर:
(ग) पुत्त

प्रश्न 10.
अञ्जलिदान का मतलब क्या है ?
(क) नमस्कार
(ख) दिशा
(ग) दृष्टि
(घ) अनुभव
उत्तर:
(क) नमस्कार

प्रश्न 11.
अम्बपालि कहाँ की रहने वाली थी ?
(क) राजगृह
(ख) पाटलिपुत्र
(ग) वैशाली
(घ) कुशीकारा
उत्तर:
(ग) वैशाली

प्रश्न 12.
रथ-रथ किसने टक्कर किया ?
(क) अम्बपालि
(ख) बुद्ध
(ग) लिच्छवी
(घ) दर्शनार्थ
उत्तर:
(क) अम्बपालि

प्रश्न 13.
रकम देकर लिच्छवी क्या खरीदना चाहती थी ?
(क) भगवान का भोजन
(ख) वैशाली
(ग) आम्रवन
(घ) राजगृह
उत्तर:
(क) भगवान का भोजन

प्रश्न 14.
पराजित किसने की ?
(क) लिच्छवी
(ख) सुजाता
(ग) अम्बपालि
(घ) भिक्षु
उत्तर:
(ग) अम्बपालि

प्रश्न 15.
तथागत के सर्वप्रथम उपासिक कौन थी ?
(क) सुजाता
(ख) विशाखा
(ग) अम्बपालि
(घ) लिच्छवी
उत्तर:
(ख) विशाखा

प्रश्न 16.
प्रज्ञावर्द्धन कौन हैं ?
(क) पिता
(ख) भाई
(ग) पति
(घ) वहन
उत्तर:
(ग) पति

प्रश्न 17.
प्रज्ञावर्द्धन विशाखा को किस नाम से सम्बोधित किया ?
(क) नर्तकी
(ख) माता
(ग) सुन्दरी
(घ) उपासिक
उत्तर:
(ख) माता

प्रश्न 18.
विशाखा तथागत से किस वस्तु का जिक्र की है ?
(क) पढ़ाई
(ख) भिक्षु संघ का वरदान
(ग) खेल
(घ) कुछ नहीं
उत्तर:
(ख) भिक्षु संघ का वरदान

प्रश्न 19.
विशाखा कितने वरदानों की मांग की है ?
(क) आठ
(ख) दस
(ग) चार
(घ) छ
उत्तर:
(घ) छ

प्रश्न 20.
‘पण्डितवग्गो’ विरोधी विषय प्रस्तुत करता है ?
(क) धनिया सुत्त का
(ख) वालवग्गो
(ग) सुखवग्गो
(घ) वसलसुत्त का
उत्तर:
(ख) वालवग्गो

प्रश्न 21.
वास्तविक सुख और शान्ति का संदेश किसने प्रस्तुत किया गया ?
(क) पराभवसुत्त
(ख) वालवग्गो
(ग) पेण्डितवग्गो
(घ) सुखवग्गो
उत्तर:
(घ) सुखवग्गो

प्रश्न 22.
प्राचीन भारतीय ब्राह्मणों का उत्थान एवं पतन का वर्णन किसमें है ?
(क) नीतिगाथा
(ख) धम्मोवाद
(ग) पब्वज्जा सुत्त
(घ) ब्राह्मणधम्मिकसुत्त
उत्तर:
(घ) ब्राह्मणधम्मिकसुत्त

प्रश्न 23.
सुखवग्गो में गाथाओं की संख्या कितनी है?
(क) 9
(ख) 12
(ग) 10
(घ) 14
उत्तर:
(ख) 12

प्रश्न 24.
भिक्षु को पालि में क्या कहा जाता है ?
(क) भिखु
(ख) भिखवो
(ग) भिक्ष्खु
(घ) भिक्खू
उत्तर:
(घ) भिक्खू

प्रश्न 25.
भगवान बुद्ध धातु का विभाजन किसने किया था?
(क) आनन्द ने
(ख) द्रोण ने
(ग) महाकाश्यप ने
(घ) सारिपुत्त ने
उत्तर:
(ख) द्रोण ने

प्रश्न 26.
भगवान बुद्ध के मौलिक अस्थि को किसे नहीं प्रदान किया गया था ?
(क) सक्तवासी को
(ख) बुल्ली को
(ग) लिच्छवी को
(घ) कोलिय को
उत्तर:
(क) सक्तवासी को

प्रश्न 27.
गौतम बुद्ध को ज्ञान कहाँ प्राप्त हुआ था ?
(क) सारनाथ
(ख) बोधगया
(ग) कुशीनगर
(घ) वैशाली
उत्तर:
(ख) बोधगया

प्रश्न 28.
बुद्ध ने अपना उपदेश कहाँ दिया था?
(क) सारनाथ
(ख) बोधगया
(ग) कुशीनगर
(घ) वैशाली
उत्तर:
(क) सारनाथ

प्रश्न 29.
बुद्ध द्वारा उपदेशित आर्य सत्यों की संख्या है
(क) 1
(ख) 2
(ग) 3
(घ) 4
उत्तर:
(घ) 4

प्रश्न 30.
राहुल किसा पौत्र था?
(क) सिद्धार्थ
(ख) शुद्धोदन
(ग) देवदत्त
(घ) सारिपुत्र
उत्तर:
(ख) शुद्धोदन

प्रश्न 31.
आर्य आष्टांगिक मार्ग के कितने अंग हैं ?
(क) 2
(ख) 4
(ग) 6
(घ) 8
उत्तर:
(क) 2

प्रश्न 32.
ज्ञान-प्राप्ति के पूर्व किसने बुद्ध को खीर खिलाया?
(क) यशोधरा
(ख) सुजाता
(ग) गोपा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर
(ख) सुजाता

प्रश्न 33.
राहुल की माता थी
(क) सुजाता
(ख) यशोधरा
(ग) लोपामुद्रा
(घ) आम्रपालि
उत्तर:
(ख) यशोधरा

प्रश्न 34.
सिगालसुत्त के अनुसार पूर्व दिशा किसका प्रतीक है?
(क) माता – पिता
(ख) अचार्य
(ग) स्त्री – पुत्र
(घ) दास
उत्तर:
(क) माता – पिता

प्रश्न 35.
अम्रपाल किस प्रदेश की गणिका थी?
(क) राजगृह
(ख) वैशाली
(ग) कोसल
(घ) कुरूं
उत्तर:
(ख) वैशाली

प्रश्न 36.
सिगालसुत्त के अनुसार आर्य के धर्म-विनय में दिशाएँ कितनी मानी गई हैं ?
(क) 4
(ख) 6
(ग) 8
(घ) 10
उत्तर:
(ख) 6

Bihar Board 12th Pali Important Questions

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Short Answer Type Part 5

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions Short Answer Type Part 5

प्रश्न 1.
What are the methods of Redemption of Debentures ?
(ऋणपत्र शोधन की क्या विधियाँ हैं ?)
उत्तर:
ऋणपत्र के शोधन की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं-

  • एक निश्चित अवधि के बाद ऋणपत्रों की समस्त राशि का एक साथ भुगतान करके शोधन।
  • ऋणपत्रों का किश्तों में लॉटरी विधि द्वारा कुछ वर्षों में शोधन।
  • ऋणपत्रों को अंशों में परिवर्त्तिन करके शोधन।
  • खुले बाजार में अपने ही ऋणपत्रों का क्रय करके शोधन।

प्रश्न 2.
आगम एवं शोधन खाते की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
आगम एवं शोधन खाते की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार है-

  • आगम एवं शोधन खाता एक वास्तविक खाता है।
  • यह खाता रोकड़ आधार पर बनाया जाता है।
  • इस खाते का डेबिट पक्ष अधिक रहने पर अन्तर की राशि अंतिम रोकड़ शेष या क्रेडिट पक्ष अधिक रहने पर अंतर की राशि बैंक अधिविकर्ष है।

प्रश्न 3.
What is Ratio analysis ?
(अनुपात विश्लेषण क्या है ?)
उत्तर:
अनुपात एक ऐसा संख्यात्मक सम्बन्ध प्रदर्शित करता है जो वित्तीय विवरणों के दो या दो से अधिक मदों के बीच मापा जाता है। हंट, विलियम तथा डोनाल्डसन के अनुसार, “अनुपात वित्तीय विवरणों या लेखांकन से प्राप्त संख्याओं के सम्बन्ध अंकगणितीय रूप में प्रदर्शित करने का साधन मात्र है।”

प्रश्न 4.
How are the various activities classified according to AS- 3 (Revised) While preparing cash flow Statements ?
(रोकड़ बहाव विवरण बनाते समय लेखांकन मानक-3 (संशोधित) के अनुसार विभिन्न क्रियाकलापों का किस प्रकार वर्गीकरण किया जाता है?)
उत्तर:
लेखांकन मानक-3 (संशोधित) के अनुसार रोकड़ बहाव विवरण बनाते समय विभिन्न क्रियाकलापों का वर्गीकरण निम्न प्रकार है-

  1. परिचालन क्रियाओं से रोकड़ बहाव
  2. विनियोजन क्रियाओं से रोकड़ बहाव
  3. वित्तपूर्ति क्रियाओं से रोकड़ बहाव।

प्रश्न 5.
What is Reserve Capital ? Does it differ from Capital Reserve ?
(आरक्षित पूँजी किसे कहते हैं ? क्या यह पूँजी संचय से भिन्न होती है ?)
Or, Differentiate between Reserve Capital and Capital Reserve.
अथवा, (आरक्षित पूँजी और पूँजीगत संचय में अन्तर स्पष्ट करें।)
उत्तर:
आरक्षित पूँजी व माँगी हुई पूँजी का वह भाग है जो समापन के अतिरिक्त अन्य किसी भी दशा में मंगाया नहीं जाएगा। आरक्षित पूँजी और पूँजीगत संचय में प्रमुख अन्तर निम्नलिखित है-

  • अनिवार्य- आरक्षित पूँजी का निर्माण करना अनिवार्य नहीं है जबकि पूँजीगत लाभ हो तो इसका निर्माण करना अनिवार्य है।
  • विशेष प्रस्ताव- आरक्षित पूँजी के निर्माण के लिए कम्पनी द्वारा विशेष प्रस्ताव पास किया जाना चाहिए जबकि पूँजीगत संचय के निर्माण के लिए कोई प्रस्ताव पास करने की आवश्यकता नहीं होती है।
  • स्थिति विवरण में लेखा- आरक्षित पूँजी स्थिति विवरण में नहीं दिखाया जाता है जबकि . पूँजीगत संचय स्थिति विवरण के दायित्व पक्ष में संचय तथा आधिक्य शीर्षक के अन्तर्गत दिखाया जाता है।
  • प्रयोग- आरक्षित पूँजी का प्रयोग कम्पनी के समापन की दशा में ही किया जा सकता है जबकि पूँजीगत संचय का प्रयोग कम्पनी के जीवन काल में ही पूँजीगत हानियों को पूरा करने में अथवा बोनस अंशों के निर्गमन में किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
Write the characteristics of Company.
(कम्पनी की विशेषताओं को लिखें।)
उत्तर:
कम्पनी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. पृथक् बैधानिक अस्तित्व (Separate Legal Entity)- कम्पनी एक कानूनी व्यक्ति है और इसका अस्तित्व इसके सदस्यों से पृथक् होता है। कम्पनी अपने नाम से सम्पत्तियों का क्रय-विक्रय कर सकती है, इसके अलावा अपने नाम से बैंक में खाता खोल सकती है। इस प्रकार कम्पनी की विशेषता पृथक् वैधानिक अस्तित्व है।

2. सार्वमुद्रा (Common Seal)- कम्पनी का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं होता है। अतः यह अपने एजेन्टों के माध्यम से कार्य करती है, जिन्हें संचालक (Director) कहते हैं। संचालक द्वारा तैयार किए गए सभी प्रलेखों पर कम्पनी की सार्वमुद्रा अंकित होनी चाहिए।

3. अंशों की हस्तान्तरणीयता (Transferability of Shares)- कम्पनी की पूँजी हिस्से में विभाजित होती है और प्रत्येक हिस्से को अंश कहते हैं। यह अंश कुछ शर्तों के अन्तर्गत स्वतंत्र रूप से हस्तान्तरणीय होती है।

4. सीमित दायित्व (Limited Liability)- कम्पनी के अंशधारी का दायित्व उसके अंश के अदत्त मूल्य तक ही सीमित होता है।

प्रश्न 7.
What is forfeiture of share when and how the share of a company can be Forfeited ?
(अंशों को सब्न करने का ध्या अर्थ है ? अंशों को कब और कैसे जब्त किया जा सकता है ?)
उत्तर:
जब कोई अंशधारी आवंटन (Allotment) या किसी याचना की राशि का भुगतान नहीं करता है तो कम्पनी को ऐसे अंशधारी के अंशों को जब्त करने का अधिकार होता है। अंशों को जब्त करने से पूर्व कम्पनी उस अंशधारी को एक नोटिस भेजती है कि वह अपने अंशों पर बकाया राशि एक निश्चित समय के अन्दर ब्याज सहित भुगतान कर दे। इस सूचना में यह भी स्पष्ट लिखा होना चाहिए कि निर्धारित तिथि तक भुगतान न करने पर उसके अंशों का हरण कर लिया जाएगा। भुगतान करने के लिए सूचना में जो तिथि निर्धारित की जाए वह अंशधारी को सूचना मिलने के कम-से-कम 14 दिन बाद की होनी चाहिए। यदि नोटिस में निर्धारित तिथि तक भी भुगतान प्राप्त नहीं होता है तो उसके अंशों को जब्त कर लिया जाता है।

अंशों, को जब्त करते समय कम्पनी को अपने अन्तर्नियमों में वर्णित नियमों का ठीक पालन करना चाहिए। यदि अन्तर्नियमों में हरण के सम्बन्ध में नियम नहीं दिए हुए हैं तो कम्पनी अधिनियम की तालिका. ‘अ’ (Table A) में दिए हुए नियमों का पालन किया जाना चाहिए।

अंशं के जब्त होने पर अंशधारी द्वारा उन अंशों पर अब तक चुकाई गई राशि कम्पनी जब्त कर लेती है और इसे अंश अपहरित खाते (Share forfeiture A/c) में क्रेडिट कर देती है।

प्रश्न 8.
What is a debenture ? What are the types of debenture?
(ऋणपत्र किसे कहते हैं ? यह कितने प्रकार के होते हैं ?)
उत्तर:
भारतीय कम्पनी अधिनियम की धारा 2 (12) के अनुसार, “ऋणपत्र में ऋणपत्र स्टॉक, बॉण्ड या कम्पनी द्वारा जारी की गई ऐसी और कई प्रतिभूतियाँ सम्मिलित हैं, चाहे उनसे कम्पनी की सम्पत्तियों पर प्रभार उत्पन्न होता है या नहीं”। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि कम्पनी द्वारा निर्गमित किया गया ऋणपत्र एक सर्टीफिकेट के प्रारूप में होता है जिस पर कम्पनी की सार्वमुद्रा (Common seal) अंकित होती है। अतः ऋणपत्र कम्पनी द्वारा लिये गये ऋण का एक लिखित प्रमाण है क्योंकि यह कम्पनी की सार्वमुद्रा के अधीन निर्गमित किये जाते हैं। ऋणपत्र में निश्चित तिथि पर मूलधन के भुगतान की शर्ते और निश्चित दर से ब्याज के भुगतान की शर्ते भी लिखी हुई होती हैं। ऋणपत्र को कई भागों में बाँटा गया है, जो निम्नलिखित हैं-

  • रंक्षित ऋणपत्र
  • अरक्षित ऋणपत्र
  • रजिस्टर्ड ऋणपत्र
  • वाहक ऋणपत्र
  • शोध्य ऋणपत्र
  • अशोध्य ऋणपत्र
  • परिवर्तनशील ऋणपत्र।

प्रश्न 9.
What is Debenture Sinking fund and why is it created ?
(ऋणपत्र शोधन कोष क्या है और क्यों बनाया जाता है ?)
उत्तर:
ऋणपत्रों का शोधन करने के लिए काफी बड़ी मात्रा में धन राशि की आवश्यकता होती है। जिस वर्ष ऋणपत्रों का शोधन करना है उस वर्ष इतनी बड़ी राशि जुटाने में कम्पनी को काफी कठिनाई हो सकती है, अतः एक कम्पनी के लिए यह उचित रहता है कि वह ऋणपत्रों के शोधन के लिए लाभों से एक निश्चित राशि बचाती रहे। इसके लिए कम्पनियाँ ऋणपत्रों के निर्गमन के वर्ष से ही लाभों से एक निश्चित राशि ऋणपत्रों के भुगतान के लिए एक अलग रिजर्व में रखना शुरू कर देती है। इस रिजर्व को Sinking fund या ऋणपत्र शोधन कोष भी कहते हैं। Sinking fund की राशि को या तो व्यापार में ही प्रयोग किया जा सकता है या इसे व्यापार के बाहर किसी अन्य कम्पनी की प्रतिभूतियों को खरीदने के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

यदि इस कोष को अपने ही व्यापार में प्रयोग कर लिया जाए तो यह राशि कम्पनी की सम्पत्तियों, मशीनरी स्टॉक आदि में लग जाता है और बाद में ऋणपत्रों के शोधन के समय फिर नकद धनराशि इकट्ठा करना कठिन हो जाता है, अतः प्रायः कम्पनियाँ इस राशि को व्यवसाय के बाहर विक्रय योग्य प्रतिभूतियों में विनियोग कर देती हैं। इस प्रकार कम्पनियाँ प्रतिवर्ष एक निश्चित धनराशि लाभों में से निकाल कर व्यवसाय के बाहर प्रतिभूतियाँ खरीदने में विनियोग करती रहती हैं और इन प्रतिभूतियों पर जो प्रतिवर्ष ब्याज प्राप्त होता है उसे भी दुबारा प्रतिभूतियों में विनियोग कर दिया। जाता है।

प्रश्न 10.
What do you mean by issue of debenture at premium?
(ऋणपत्रों का प्रीमियम पर निर्गमन से आप क्या समझते हैं ?)
उत्तर:
जब कोई कम्पनी अपने ऋणपत्र अंकित मूल्य से अधिक पर निर्गमित करती है तो इस अधिक मूल्य को प्रीमियम कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि एक 100 रु. का ऋणपत्र 110 रु० में निर्गमित किया जाए तो 10 रु. प्रीमियम कहा जाएगा। ऐसा प्रीमियम पूँजीगत लाभ होता है क्योंकि यह कम्पनी की सामान्य व्यावसायिक क्रियाओं से अर्जित नहीं किया गया है। प्रीमियम खाते का उपयोग पूँजीगत हानियों जैसे अंशों एवं ऋणपत्रों के निर्गमन पर दी गई छूट, ऋणपत्रों के शोधन पर दिए गए प्रीमियम, प्रारम्भिक व्ययों, ख्याति, पेटेंट आदि को अपलिखित करने में किया जाता है।

अंश प्रीमियम खाते (Share Premium A/c) का नाम परिवर्तित होकर प्रतिभूति प्रीमियम खाता (Securities Premium A/c) हो चुका है। क्योंकि ऋणपत्र भी प्रतिभूति है अतः ऋणपत्र प्रीमियम को भी प्रतिभूति प्रीमियम खाते में क्रेडिट किया जाना चाहिए।

‘प्रतिभूति प्रीमियम खाते (Securities Premium A/c)’ को चिट्ठे के दायित्व पक्ष में रिजर्व तथा आधिक्य (Reserve and Surplus) शीर्षक के अन्तर्गत दिखाया जाता है।

प्रश्न 11.
What do you mean by issue of Debenture at discount?
(ऋणपत्रों का कटौती पर निर्गमन से आप क्या समझते हैं ?)
उत्तर:
जब किसी कम्पनी द्वारा अपने ऋणपत्र अंकित मूल्य से कम पर निर्गमित किए जाते हैं तो इसे कटौती पर निर्गमन कहते हैं। कम्पनी अधिनियम में ऋणपत्रों पर दी जाने वाली अधिकतम छूट पर कोई प्रतिबंध नहीं है। कटौती की राशि पूँजीगत हानि (Capital Loss) है। अत: इसे कम्पनी के चिट्ठे में सम्पत्ति पक्ष में ‘विविध व्यय’ (Miscellaneous) शीर्षक के अन्तर्गत दिखाया जाता है। कटौती की इस राशि को ऋणपत्रों के जीवन काल में ही पूँजीगत लाभों अथवा लाभ-हानि खाते से अपलिखित करना आवश्यक है।

कटौती क्योंकि हानि है, अतः कम्पनी की पुस्तकों में इसके लेखा “Discount on Debentures A/c” को डेबिट करके किया जाता है। कटौती का लेखा प्रायः आवंटन की प्रविष्टि में ही किया जाता है।

प्रश्न 12.
What do you mean by financial statement of a Company ?
(कम्पनी के वित्तीय विवरण से आप क्या समझते हैं ?)
उत्तर:
वित्तीय विवरणों से आशय दो.विवरणों से होता है, एक आय विवरण या लाभ-हानि खाता तथा दूसरा स्थिति विवरण या आर्थिक चिट्ठा। आय विवरण हानि या लाभ को प्रदर्शित करता है। जबकि स्थिति विवरण या आर्थिक चिट्ठा व्यापार की सम्पत्तियों, दायित्व तथा पूँजी को प्रदर्शित करता है।

वित्तीय विवरण से तात्पर्य किसी भी मौलिक विवरण से हो सकता है, जो किसी व्यवसाय या उद्योग के सम्बन्ध में आवश्यक वित्तीय सूचनाओं को प्रदर्शित करता हो। परन्तु वर्तमान काल में ‘वित्तीय विवरण’ के अन्तर्गत दो खातों या विवरणों को सम्मिलित किया जाता है जिन्हें लेखापालक किसी निश्चित अवधि के अन्त में तैयार करती है। ये दो विवरण हैं-आर्थिक चिट्ठा (जिसे वित्तीय स्थिति का विवरण भी कहते हैं) और लाभ-हानि खाता या आय विवरण (Income Statement) हाल ही में, व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा एक तीसरा विवरण भी तैयार किया जाने लगा है जिसे ‘आधिक्य ‘विवरण’ या ‘बचत लाभ विवरण’ के नाम से पुकारते हैं। पाश्चात्य देशों में एक चौथा विवरण भी तैयार किया जाने लगा है जिसे वित्तीय स्थिति में परिवर्तन का विवरण कहते हैं।

प्रश्न 13.
State the Meaning of Balance Sheet.
(आर्थिक चिट्ठा के अर्थ को बतलायें।)
उत्तर:
साधारण बोलचाल में, आर्थिक चिट्ठा को एक सन्तुलन-पत्र कहा जा सकता है जिसके अन्तर्गत एक तरफ सम्पत्तियों के मूल्यों और दूसरी तरफ दायित्वों एवं स्वामी-फण्ड (Owner’s fund) के मूल्यों को प्रदर्शित करके सन्तुलन (equality) लाया जाता है। हॉवर्ड (Howard) और अप्टन (Upton) के अनुसार, “The Balance Sheet is a statement which reports the property’s value owned by the enterprise and the claims of the creditors and owners against these properties.”

उपर्युक्त परिभाषा में प्रयुक्त ‘मूल्यों’ (values) की रकम वही होती है, जो प्रत्येक मद के व्यक्तिगत खातों की खतौनी और बाकी निकालने के बाद शेष बचती हैं। कुछ लोगों की यह मान्यता है कि लेखा-विधि की ‘जमा’ (Credit) ‘नाम’ (Debit) के बराबर होती है। इस सिद्धांत के कारण ही आर्थिक चिट्ठे के दोनों तरफ का योग बराबर होता है। परन्तु यह भावना भ्रमात्मक है। ऋण एवं दायित्व की तरह स्वामी फण्ड की रकम जड़ (rigid) प्रकृति की नहीं होती है। चूंकि सम्पत्तियों और ऋण एवं दायित्वों का अन्तर ही स्वामी-फण्ड के रूप में माना जाता है।

अतः इसका मूल्य सम्पत्तियों और ऋणपत्रों के मूल्यों के आधार पर परिवर्तित होता रहता है। इस प्रकार आर्थिक चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष के योग के बराबर दायित्व पक्ष के योग को लाने के लिए स्वामी-फण्ड का मूल्य घटता-बढ़ता रहता है। इस रूप में आर्थिक चिट्ठा व्यवसाय की सम्पत्तियों की प्रकृति एवं रकम, सभी दायित्वों की प्रकृति एवं रकम और शेष को स्वामी-फण्ड के रूप में उसकी किस्म एवं रकम को दर्शाता है।

प्रश्न 14.
What is Current Assets ?
(चालू सम्पत्तियाँ क्या हैं ?)
उत्तर:
चालू सम्पत्तियाँ (Current Assets)- एक सामान्य व्यावसायिक संस्था में चालू सम्पत्तियाँ वे सम्पत्तियाँ होती हैं, जो व्यवसाय में कार्यशील रूप में प्रयोग की जाती हैं और जिन्हें अल्पकाल में संचालन के दौरान नकद धन में परिवर्तित किया जा सकता है। अन्य शब्दों में, नकद धन से प्राप्त की गयी वे सम्पत्तियाँ, जिन्हें पुनः नकद धन में परिवर्तित किया जा सकता है, चालू सम्पत्तियाँ कहलाती हैं। साधारणतया यह चक्र (cycle) (नकद धन-सम्पत्ति-नकद धन) पूरा होने में एक वर्ष से अधिक समय नहीं लगता है। कुछ दशाओं में इससे अधिक समय भी लग सकता है। इस चक्र में चाहे कितना भी समय क्यों न लगे, हमेशा सम्पत्ति प्रयोग के आधार पर ही चालू सम्पत्तियों के रूप में वर्गीकरण करना चाहिए, न कि समय के आधार पर। एक विश्लेषक साधारणतया निम्नलिखित को चालू सम्पत्तियों के अन्तर्गत शामिल करता है-

  • रोकड़ हाथ में एक बैंक में
  • स्कन्ध
  • पुस्तकीय ऋण (Book Debts)
  • सरकारी प्रतिभूतियों में विनियोग
  • प्राप्य बिलं (Bills Receivable)
  • अग्रिम भुगतान

प्रश्न 15.
What do you mean by fixed Assets and Intangible Assets ?
(स्थायी सम्पत्तियाँ और अमूर्त सम्पत्तियाँ से आप क्या समझते हैं ?)
उत्तर:
स्थायी सम्पतियाँ (Fixed Assets)- स्थायी सम्पत्तियों से आशय उन सम्पत्तियों से होता है, जिनका क्रय व्यवसाय-संचालन में प्रयोग के लिए किया जाता है, न कि पुनर्विक्रय करके नकद धन प्राप्त करने के लिए। इस प्रकार की सम्पत्तियों का प्रयोग करके ही आय हेतु उत्पादन या वितरण का कार्य किया जाता है। स्थायी सम्पत्तियों में शामिल होने वाली कुछ प्रमुख सम्पत्तियाँ निम्न प्रकार हैं-

  • भूमि
  • भवन
  • यन्त्र
  • फर्नीचर एवं फिक्सचर्स।

अमूर्त सम्पत्तियाँ (Intangible Assets)- जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो रहा है कि सम्पत्तियाँ अमूर्त व अदृश्य होती हैं। इनको न देखा जा सकता है और न स्पर्श किया जा सकता है। इस प्रकार की सम्पत्तियों का वास्तविक मूल्य व्यवसाय की लाभार्जन शक्ति पर निर्भर होता है। इस प्रकार सम्पत्तियों के मूल्यांकन के सम्बन्ध में लेखापालक, वकील और प्रबन्धक मतभेद रखते हैं और विश्लेषण के ऊपर एक भारी बोझ पड़ता है। अमूर्त सम्पत्तियों में निम्न को शामिल करते हैं :

  • पेटेण्ट्स तथा ट्रेड मार्क्स (Patents and Trade Marks)
  • मुद्रण-अधिकार, सूत्र एवं लाइसेंस (Copyright, Formula and License)
  • ख्याति (Goodwill)

प्रश्न 16.
State the object of Analysis of Financial Statement.
(वित्तीय विवरणों के विश्लेषण के उद्देश्य को बतलायें।)
उत्तर:
यूँ तो प्रत्येक प्रयोगकर्ता अपने निजी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए वित्तीय विवरणों का विश्लेषण करता है, फिर भी विश्लेषण के कुछ सामान्य उद्देश्य निम्नलिखित हो सकते हैं-

  • आय सम्बन्धी विवरणों की सहायता से विभिन्न व्यावसायिक क्रियाओं की क्षमता एवं अर्जन शक्ति की जाँच करना।
  • एक व्यावसायिक संस्था के प्रबन्ध द्वारा निजी कार्यक्षमता एवं निष्पादन क्षमता का अनुमान लंगाना।
  • स्थिति विवरण की सहायता से व्यवसाय की अल्पकालीन व दीर्घकालीन शोधन-क्षमता का निर्धारण करना।
  • ऋण लेने वाली व्यावसायिक संस्था की वित्तीय स्थिति एवं देय क्षमता के विषय में ज्ञान प्राप्त करना।
  • व्यवसाय की भावी प्रगति एवं लाभार्जन शक्ति का निर्धारण करना।
  • संस्था की भावी सम्भावनाओं का अन्वेषण करना। .
  • समकक्ष उद्योग में कार्यरत अन्य इकाइयों के साथ संचालन-क्षमता सम्बन्धी तुलनात्मक अध्ययन करना।

प्रश्न 17.
वित्तीय विवरण क्या है ?
उत्तर:
वित्तीय विवरण प्रबन्धकीय निष्पादन की अच्छाई या बुराई बताते हैं अथवा प्रबन्ध कीय कुशलता की हीनता या श्रेष्ठता दर्शाते हैं या भावी उन्नति के विषय में संकेत देते हैं या सुदृढ़ वित्तीय स्थिति के प्रतीक हैं या असफलता के सूचक हैं-इन सभी तथ्यों का निर्माण करना प्रयोगकर्ता का कार्य होता है। वित्तीय विवरण संस्था से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्यों को अंकात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। ये अंकात्मक तथ्य मूल होते हैं; अपने आप किसी निष्कर्ष को नहीं बताते हैं। इसके लिए आवश्यक होता है कि रचना की तरह किसी वैज्ञानिक विधि का प्रयोग करके इन अंकात्मक तथ्यों से कहलाया जाए। जब प्रयोगकर्ता ऐसा प्रयास करता है तो उस क्रिया को ‘वित्तीय विवरण का निर्वचन’ कहते हैं।

प्रश्न 18.
रोकड़ प्रवाह विवरण क्या है ?
उत्तर:
रोकड़ प्रवाह विवरण एक ऐसा विवरण है जो रोकड तथा रोकड तुल्य में हए परिर्वतन को दर्शाता है। यह विवरण निर्धारित अवधि में निम्नलिखित को दर्शाता है-

  • परिचालन क्रियाओं से शुद्ध रोकड़ प्रवाह
  • निनियोग क्रियाओं से शुद्ध रोकड़ प्रवाह
  • वित्त-पूर्ति क्रियाओं से शुद्ध रोकड़ प्रवाह
  • रोकड़ प्रवाह एवं रोकड़ में शुद्ध परिवर्तन।

प्रश्न 19.
वसूली खाता तथा पूनर्मूल्यांकन खाता में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
वसूली खाता और पुनर्मूल्यांकन खाता में निम्नलिखित अन्तर है-
वसूली खाता:

  • फर्म के विघटन पर सबसे पहला काम फर्म की सम्पतियों का विक्रय तथा वसूली व दायित्वों का भुगतान करना होता है। इस कार्य के लिए फर्म की पुस्तकों में एक वसूली खाता खोला जाता है।

पुनर्मूल्यांकन खाता:

  • पुनर्मूल्यांकन खाता एक अवास्तविक खाता है जो सम्पतियों व दायित्वों के मूल्य में हुए परिवर्तन के कारण लाभ-हानि को दिखाता है।

प्रश्न 20.
अंशों के अधि-अभिदान क्या है ?
उत्तर:
प्रायः अच्छी कम्पनियों में जितने अंश आबंटन के लिए होते हैं उनसे अधिक आवेदन पत्र आ जाते हैं। इस स्थिति को अधि-अभिदान (Over subscription) कहते हैं। ऐसी दशा में कम्पनी को आवश्यकता से अधिक आवेदन राशि प्राप्त हो जाती है।

प्रश्न 21.
लाभ प्राप्ति अनुपात तथा त्याग अनुपात में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
लाभ प्राप्ति अनुपात और त्याग अनुपात में निम्नलिखित अन्तर है-
लाभ-प्राप्ति अनुपात:

  • लाभ-प्राप्ति अनुपात में परिवर्तन के परिणाम स्वरूप वर्तमान साझेदारें में से एक अथवा अधिक साझेदार अन्य साक्षेदारों के त्याग के हिस्से का कुछ हिस्सा प्राप्त (gain) कर लेते हैं। लाभ प्राप्ति के ऐसे अनुपात को लाभ-प्राप्ति अनुपात कहा जाता है।

त्याग अनुपात:

  • त्याग अनुपात की गणना का उद्देश्य क्षतिपूर्ति की वह राशि ज्ञात करना है जो लाभ-प्राप्ति करने वाला साझेदार अर्थात वह साझेदार जिसके हिस्से में परिवर्तन के फलस्वरूप वृद्धि हो गयी है। त्याग करने वाले साझेदार (अर्थात वह साझेदार जिसके हिस्से में परिवर्तन के फलस्वरूप कमी हो गयी है। को देगा। क्षति की ऐसी राशि ख्याति की आनुपातिक राशि के आधार पर दी जाती है।

प्रश्न 22.
अंशों की जब्ती क्या है ?
उत्तर:
जब कोई अंशधारी आवंटन या किसी याचना की राशि का भुगतान नहीं करता है तो कम्पनी को ऐसे अंशधारी के अंशों को जब्त करने का अधिकार होता है। अंशों को जब्त करने से पूर्व कम्पनी उस अंशधारी के अंशों को जब्त करने का अधिकार होता है। अंशों को जब्त करने से पूर्व कम्पनी उस अंशधारी को एक नोटिस भेजती है कि वह अपने अंशों पर बकाया राशि एक निश्चित समय के अंदर ब्याज सहित भुगतान कर दें। इस सूचना में यह भी स्पष्ट लिखा होना चाहिए कि निर्धारित तिथि तक भुगतान न करने पर उसके अंशों का हरण (जब्त) कर लिया जाएगा।

‘भुगतान करने के लिए सूचना में जो तिथि निर्धारित की जाए वह अंशधारी को सूचना मिलने के कम-से-कम 14 दिन बाद की होनी चाहिए। यदि नोटिस में निर्धारित तिथि तक भी भुगतान प्राप्त नहीं होता है तो उसके अंशों को जब्त कर लिया जाता है। अंशों को जब्त करते समय कम्पनी को अपने अंतर्नियमों में वर्णित नियम का ठीक-ठाक पालन करना चाहिए।

प्रश्न 23.
प्रविवरण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
प्रविवरण का आशय ऐसे प्रपत्र से है जो कम्पनी के अंशों या ऋण-पत्रों के अभिदान अथवा क्रय करने के लिए जनता से प्रस्तावित आमंत्रित करता है। प्रविवरण में कम्पनी के व्यवसाय की लाभप्रदता और सुदृढ़ता का वर्णन होता है जिसके आधार पर जनता अंश खरीदने का प्रस्ताव करती है। प्रविवरण कम्पनी तथा अंशधारियों के मध्य होने वाले समझौते का आधार होता है। अंशधारी प्रविवरण के आधार पर ही अंशों को खरीदते हैं।

यदि प्रविवरण में उन्हें भ्रमित किया जात है अथवा गलत तथ्यों को छिपाया जाता है तो वे उन हानियों के लिए संचालकों को उत्तरदायी ठहरा सकते हैं। जो उन्हें उठानी पड़ती है तथा अंशों को खरीदने संबंधी संविदा को भंग किया जा सकता है। अतः प्रविवरण को सही तथ्यों के साथ तैयार किया जाना चाहिए।

प्रश्न 24.
आयगत लाभ एवं पूँजीगत लाभ में अन्तर बतावें।
उत्तर:
ऐसे लाभ जो स्थायी या पूँजीगत प्रकृति की होती है, उन्हें पूँजीगत लाभ कहा जाता है, उदाहरण के लिए वसीयत, आजीवन सदस्य शुल्क, भवन निर्माण के लिए या टूर्नामेंट के लिए दान आदि।

ऐसे लाभ जिनकी प्राप्ति बार-बार एवं छोटी राशि की होती है, आयगत लाभ कहलाती है। जैसे-चंदे, बैंक जमा पर ब्याज, स्कूल फीस आदि। पूँजीगत लाभ दायित्व होती है और आयगत लाभ आय या आगम होती है।

अतः पूँजीगत लाभ और आयगत लाभ का तुलनात्मक अध्यन करने से इस बात की जानकारी होती है कि इन दोनों की प्रकृति और लक्षण अलग-अलग होते हैं। इसलिए इन दोनों में अन्तर पाया जाता है।

प्रश्न 25.
रोकड़ बही तथा प्राप्ति एवं भुगतान खाता में अन्तर बतावें।
उत्तर:
प्राप्ति और भुगतान खाता तथा रोकड़ बही में निम्नलिखित अंतर है-
प्राप्ति और भुगतान खाता:

  • इसके लेखे तारीखदार नहीं होते हैं।
  • यह खाता व्यापारिक संस्थाओं में खोला जाता है।
  • यह एक निश्चित अवधि के बाद बनाया जाता है।
  • यह रोकड़ पुस्तक का सार होता है।
  • इसे रोकड़ पुस्तक के आधार पर बनाया जाता है यदि कोई रोकड़ पुस्तक रखी गई हो।

रोकड़ बही:

  • इसके सभी लेखे तारीखदार होते हैं।
  • यह खाता व्यापारिक संस्थाओं में भी नहीं खोला जाता है।
  • जैसे-जैसे प्राप्तियाँ और भुगतान होते जाते हैं वैसे-वैसे इनका लेखा इनमें किया जाता है।
  • यह आगम-शोधन खाते का सार नहीं होता है।
  • इसे आगम-शोधन के आधार पर नहीं बनाया जाता है।

प्रश्न 26.
State the five objectives of Ratio Analysis.
(अनुपात विश्लेषण के पाँच उद्देश्यों को बतलायें।)
उत्तर:
अनुपात विश्लेषण का उद्देश्य (Objective of Ratio Analysis)- प्रमुख रूप में प्रबंध के आधारभूत कार्य, योजना, समन्वय, नियंत्रण, संवहन एवं पूर्वानुमान के कार्य में सहायता पहुँचाना ही अनुपात विश्लेषण का उद्देश्य होता है। इसका प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है-

  1. भूतकालीन अनुपात द्वारा लागत, विक्रय, लाभ और अन्य सम्बन्धित तथ्यों की प्रवृत्ति के विषय में ज्ञान प्राप्त हो सकता है और उनके आधार पर भावी घटना के विषय में घोषणा की जाती है।
  2. ‘आदर्श अनुपातों’ (Ideal ratios) की रचना की जा सकती है और प्रमुख अनुपात के बीच पाये जाने वाले सम्बन्ध को ‘इच्छित समन्वय’ के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
  3. विक्रय-नियंत्रण एवं लागत-नियंत्रण में भी अनुपातों की सहायता ली जा सकती है।
  4. अनुपात के प्रयोग द्वारा संवहन का कार्य सरल हो जाता है। इसके आधार पर सरलतापूर्वक बताया जा सकता है कि दो अवधियों के बीच क्या हुआ है।
  5. अनुपातों का प्रयोग ‘क्षमता’ के माप के रूप में भी किया जा सकता है। चूंकि अनुपात द्वारा वित्तीय समंकों में एकरूपता आ जाती है, अतः अन्तर्घमंडल तुलना (inter-firm comparison) सम्भव हो जाती है।

प्रश्न 27.
वित्तीय विश्लेषण क्या है?
उत्तर:
वित्तीय विवरण किसी संस्था की वित्तीय स्थिति संबंधी सूचना प्रदान करने वाले साधन हैं। वित्तीय विवरण के विश्लेषण का अर्थ किसी संस्था की आर्थिक और लाभ कमाने की स्थिति का पता लगाने के लिए विवरणों के तथ्यों को इस प्रकार वर्गीकृत करना है जिसमें इनका एक-दूसरे से संबंध स्थापित किया जा सके।

प्रश्न 28.
What do you mean by profitability Ratio ?
(लाभदायकता अनुपात से आप क्या समझते हैं ?)
उत्तर:
लाभदायकता अनुपात (Profitability Ratio)- प्रत्येक व्यावसायिक संस्था का उद्देश्य लाभ कमाना होता है। साथ ही प्रत्येक संस्था का यह प्रयत्न होता है कि प्राप्त लाभ की मात्रा न केवल निरपेक्ष रूप में (absolute) अधिक हो, बल्कि सापेक्षिक दृष्टि से भी अधिक हो अर्थात् उस संस्था में प्रयुक्त पूँजी एवं साहस की तुलना में लाभ की मात्रा पर्याप्त हो। एक व्यावसायिक संस्था द्वारा उपलब्ध साधनों के अधिकतम प्रयोग से अधिकतम लाभ कमाने की क्षमता को ही लाभदायकता कहते हैं।

लाभदायकता की स्थिति में बिक्री की मात्रा लागतों की प्रकृति एवं वित्तीय साधनों के समुचित प्रयोग पर निर्भर करती है। लाभदायकता के विश्लेषण के अन्तर्गत बिक्री का अध्ययन बिक्री वस्तु की लागत का विश्लेषण, बिक्री पर कुल उपान्त (Gross margin) का विश्लेषण, संचालन व्यय का विश्लेषण, संचालक लाभ का विश्लेषण एवं बिक्री एवं पूंजी की तुलना में शुद्ध आय का विश्लेषण आदि शामिल होता है। मूल्यांकन अवधि के बीच मूल्य-स्तर में हुए परिवर्तनों का विश्लेषण भी आवश्यक होता है । इस प्रकार के विश्लेषण में अनेक अनुपातों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 29.
कुल लाभ अनुपात से आप क्या समझते हैं ? इसकी गणना कैसे की जाती है?
उत्तर:
कुल लाभ अनुपात या बिक्री पर कुल लाभ का उपान्त (Gross Profit Ratio or Gross Margin to Net Sales)- शुद्ध बिक्री और बेची गयी वस्तु की लागत का अन्तर (कुल लाभ) बहुत ही महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह शुद्ध बिक्री पर कुल लाभ के उपान्त (margin) को प्रदर्शित करता है। कुल लाभ का उपान्त इतना पर्याप्त होना चाहिए कि संचालन व्यय तथा अन्य व्यय को पूरा करने के बाद भी बिक्री व स्वामी इक्विटी की तुलना में शुद्ध आय पर्याप्त हो। कुल लाभ उपान्त का विश्लेषण करने के लिए कुल लाभ अनुपात या बिक्री पर कुल लाभ का उपान्त अनुपात की गणना की जाती है। इसे ज्ञात करने का सूत्र इस प्रकार है-

Gross Profit Ratio = \(\frac{\text { Gross Profit } \times 100}{\text { Sales }}\)

नोट- यदि 100 में से कुल लाभ अनुपात घटा दें, तो बेची गयी वस्तु की लागत का बिक्री पर अनुपात ज्ञातं हो जाएगा। इस प्रकार का अनुपात भी अप्रत्यक्ष ढंग से संस्था की कुल लाभ उपान्त पर ही प्रकाश डालता है।

सामान्यतया यह अनुपात जितना ही ऊँचा होता है उतना ही अच्छा माना जाता है। यह अनुपात जितना ही नीचा और कम होता है, संस्था की लाभदायकता उतनी ही कम मानी जाती है ।

प्रश्न 30.
What is meant by fund ? State and two objective of preparing a Cash flow Statement. (कोष का क्या अर्थ है ? रोकड़ प्रवाह विवरण बनाने के कोई दो उद्देश्य बताइए।)
उत्तर:
कोष का आशय रोकड़ अथवा कार्यशील पूँजी अथवा समस्त वित्तीय स्रोतों से है। रोकड़ प्रवाह विवरण बनाने के दो प्रमुख उद्देश्य है-

  • उन विशिष्ट (परिचालन/विनियोजन/वित्तीय क्रियाएँ) उपयोगों का पता लगाना जिनके उपक्रम ने रोकड़ एवं रोकड़ तुल्य का सृजन किया है।
  • उन विशिष्ट (परिचालन/विनियोजन/वित्तीय क्रियाएँ) उपयोगों का पता लगाना जिनमें उपकम ने रोकड एवं रोकड तल्य का प्रयोग किया गया है।

प्रश्न 31.
ऋणपत्रों के शोधन के तरीकों का वर्णन करें।
उत्तर:
ऋणपत्रों के शोधन के तरीके ये हैं-

  • एक निश्चित अवधि के बाद ऋणपत्रों की समस्त राशि भुगतान करके शोधन।
  • ऋण पत्रों का किश्तों में लॉटरी विधि कुछ वर्षों में शोधन।
  • ऋण पत्रों को अंशों में परिवर्तन न करके शोधन।
  • खुले बाजार में अपने ही ऋण पत्रों का क्रय करके शोधन।

प्रश्न 32.
स्थायी प्रभार तथा चल प्रभार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
स्थायी प्रभार- जब प्रभार को कंपनी को निश्चित संपत्तियों के विरुद्ध सृजित किया जाता है तो इसे स्थिर प्रभार कहते हैं।
चल प्रभार- जब प्रभार को कम्पनी की सभी संपत्तियों (उन संपत्तियों को छोड़कर जोकि सुरक्षित लेनदारों को दी गयी है) के विरुद्ध सृजित किया जाता है तो इसे चल प्रभार कहते हैं।

प्रश्न 33.
संचय और प्रावधान में अंतर बताएँ।
उत्तर:
संचय का तात्पर्य लाभ के एक भाग का व्यापार में भविष्य में होने वाले अज्ञात या ज्ञात दायित्व के लिए नियोजन है जबकि प्रावधान एक निश्चित राशि का एक ज्ञात दायित्व या विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया जाता है।

प्रश्न 34.
तुलनात्मक वित्तीय विवरण किसे कहते हैं ?
उत्तर:
जब दो या दो से अधिक अवधियों के वित्तीय विवरणों की मदों को साथ-साथ इस प्रकार दिखाया जाए कि उनकी तुलना करके निष्कर्ष निकाला जा सके तो ऐसे विवरण को तुलनात्मक वित्तीय विवरण कहा जा सकता है।

प्रश्न 35.
अंशधारी और ऋणपत्रधारी में अंतर बताइए?
उत्तर:
अंशधारी वे व्यक्ति जो अंशदान करते हैं अथवा अंशों के स्वामी होते हैं कम्पनी के सदस्य या अंशधारी कहलाते हैं।
ऋणपत्रधारी ऋणपत्रधारी कम्पनी के लेनदार होते हैं। इन्हें प्रबंध संबंधी अधिकार नहीं होते हैं। फिर भी कभी-कभी ऋणपत्रधारी भी अपने हितों की सुरक्षा हेतु एकाध संचालक नियुक्त करने का अधिकार प्राप्त कर लेते हैं।

प्रश्न 36.
रोकड़ प्रवाह विवरण क्यों तैयार किया जाता है ?
उत्तर:
रोकड़ प्रवाह विवरण तैयार करने के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  • रोकड़ प्रवाह विवरण बनाने का मूल उद्देश्य रोकड़ के स्रोतों तथा प्रयोगों की जानकारी प्राप्त करना है।
  • दो चिट्ठों की तिथियों के बीच रोकड़ एवं रोकड़ समतुल्यों में हुए परिवर्तन को ज्ञात करना।
  • विभिन्न निवेश संबंधी परियोजनाओं में रोकड़ की आवश्यकताओं का निर्धारण करना।
  • कम्पनी की बित्तीय स्थिति के कुशल प्रबंधन में सहायता प्रदान करना।
  • रोकड़ बजट के निर्माण में सहायता प्रदान करना।
  • वित्तीय नीतियों के निर्धारण में मदद करना।
  • अल्पकालीन वित्तीय नियोजन में सहायता प्रदान करना।
  • तरलता स्थिति को बेहतर ढंग से व्यक्त करना।
  • ऋणी की वित्तीय स्थिति के पुनरीक्षण में मदद करना।
  • लाभांश के भुगतान के संबंध में निर्णय लेने में सहायता प्रदान करना।

प्रश्न 37.
चालू अनुपात 2 : 1 है। कार्यशील पूँजी रु० 1,50,000 है। चालू संपत्ति एवं चालू दायित्व की राशियाँ ज्ञात करें।
उत्तर:
मान लिया कि चालू दायित्व (C.I.) = x
कार्यशील पूँजी (W.C.) = चालू संपत्तियाँ (C.A.) – चालू दायित्व (C.L.)
1,50,000 = 2x – x
1,50.000 = x
x = 1,50,000
C.I. = 1.50.000
C.A. = 1.50,000 × 2 = 3,00,000

प्रश्न 38.
लेखांकन अनुपात से आप क्या समझते हैं ? इसके क्या उद्देश्य हैं ?
उत्तर:
आर० एन० एन्थोनी के अनुसार, “लेखांकन अनुपात साधारणतया एक संख्या को दूसरी संख्या के संदर्भ में प्रकट करता है। यह एक संख्या को दूसरी संख्या से भाग देने पर जो अनुपात निकलता है उस अनुपात को लेखांकन. अनुपात कहा जाता है। लेखांकन अनपात के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  • संस्था की लाभदायकता की माप करना।
  • व्यवसाय की परिचालन कुशलता निर्धारित करना।
  • व्यवसाय की शोधन क्षमता का मूल्यांकन करना।
  • पूर्वानुमान एवं बजटन में सहायता प्रदान करना।
  • लेखांकन सूचनाओं को सरल बनाना एवं सारांशित करना।
  • तुलनात्मक विश्लेषण में सहायता प्रदान करना।
  • निर्णय लेने में प्रबंध को मदद करना।
  • वित्तीय नियोजन में सहायता प्रदान करना।

प्रश्न 39.
किन्हीं तीन उद्देश्यों का उल्लेख करें जिनके लिए अंश प्रीमियम का उपयोग किया जा सकता है।
उत्तर:
तीन उद्देश्य इस प्रकार है जिनके लिए अंश प्रीमियम का उपयोग किया जा सकता है-

  • कंपनी के प्रारंभिक व्ययों को अपलिखित करने के लिए।
  • विद्यमान अंशधारियों को पूर्णदत्त बोनस अंशों के निर्गमन के लिए।
  • अंशों या ऋणपत्रों के निर्गमन पर दी गयी कटौती को अपलिखित करने के लिए।

प्रश्न 40.
लाभों पर प्रभार तथा लाभों के बँटवारे में अन्तर करें।
उत्तर:
लाभों के प्रभार एवं लाभों के बँटवारे में अंतर निम्न हैं-
लाभ का प्रभार (Charge against profit)- लाभों के बँटवारे का अर्थ है कि पूँजी पर पूरा ब्याज दिया जाएगा, चाहे फर्म का लाभ हो या हानि।

लाभों का बँटवारा (Appropriation out of profit)- लाभों के बँटवारे का अर्थ है कि सभी प्रभारों (charges) एवं विनियोजनों (appropriations) के बाद शेष बची राशि अर्थात् ‘वितरण योग्य शुद्ध लाभ’ को साझेदारों में उनके लाभ हानि के अनुपात में विभाजन।

Bihar Board 12th Accountancy Important Questions