Bihar Board 12th Hindi 50 Marks गद्य खण्ड Important Questions Short Answer Type

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Bihar Board 12th Hindi 50 Marks गद्य खण्ड Important Questions Short Answer Type

निम्नलिखित उदाहरणों का भावार्थ लिखें :

प्रश्न 1.
काला-कलूटा-फिर भी खूबसूरत? सौन्दर्य की रंगसाजी और नक्कासी का मजमूआ।
उत्तर:
प्रस्तुत पक्तियाँ ‘मंगर’ कहानी से उद्धृत की गयी है। इसके कहानीकार श्री रामवृक्ष बेनीपुरी हैं। इन पंक्तियों में कहानीकार ने मंगर के शारीरिक-सौन्दर्य का वर्णन प्रस्तुत किया है। मंगर काला-कलूटा था फिर भी खूबसूरत था। यह बात कुछ बेढ़गी और बेतुकी लगती है, क्योंकि साधारणतः लोग समझते हैं कि जो काला-कलूटा होता है वह खूबसूरत नहीं होता। पर कहानीकार ऐसा नहीं मानते। उनका कहना है कि सौन्दर्य शरीर के रंग में नहीं है। वह तो उसके गठन में है-विकास में है-संतुलन में है-स्वास्थ्य में है। मंगर का शरीर सुगठित था, सुव्यवस्थित था, सुविकसित था, संतुलित था। इसलिए काला होने पर भी वह सुन्दर लगता था।

प्रश्न 2.
क्योंकि न जाने क्यों, मंगर को बच्चों से यह स्वाभाविक स्नेह नहीं, जो उसके ऐसे लोगों में प्रायः देखा जाता है। आज जब मंगर अशक्त, जर्जर हो चुका है, बच्चे मानो इसका बदला चुकाने को अपनी छोटी छड़ियों से उसे छेड़कर भागते हैं।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘मंगर’ कहानी से उद्धृत की गयी है। इसके कहानीकार श्री रामवृक्ष बेनीपुरी हैं। इन पंक्तियों में कहानीकार ने वृद्धावस्था में मंगर के स्वभाव का वर्णन किया है। जब मंगर प्रौढ़ था तो बच्चों को उतना प्यार नहीं करता था। पर इसका यह अर्थ नहीं कि-उसके हृदय में बच्चों के लिए प्रेम नहीं है। इसलिए जब मंगर बूढ़ा हो गया तो बच्चे उससे बदला लेने की भावना से उसे छड़ियों से छेड़ते थे। इसपर मंगर झल्लाता था, खीझता था, गालियां देता था, पर बच्चे कब मानने वाले थे। दुखी होने के बदले वे खिलखिला कर हंसते थे। हंसते ही नहीं थे बल्कि उसका मुंह भी चिढ़ाते थे।

प्रश्न 3.
दोस्ती के लिए कोई अपना ईमान नहीं बेचता। पंच के दिल में खुदा बसता है। पंचों के मुंह से जो बात निकलती है, वह खुदा की तरफ से निकलती है।
उत्तर:
प्रस्तुत अवतरण प्रेमचन्द द्वारा रचित ‘पंच परमेश्वर’ शीर्षक कहानी से उद्धृत किया गया है। इसमें कहानीकार ने यह बतलाया है कि पंचों में ईश्वर का निवास होता है, अतएव पंचों के निर्णय में सच्चा न्याय रहता है। जुम्मन शेख ने अपनी बूढ़ी मौसी की सारी सम्पत्ति इस शर्त पर लिखवा ली थी कि वह जिन्दगी भर बुढ़िया को खाना और कपड़ा देगा। बाद में वह इस शर्त का पालन नहीं करता है। उसकी मौसी ने न्याय करवाने के लिए पंचायत बुलवाई। अलगू चौधरी जुम्मन के अनन्य मित्र थे, इसलिए वे इस पंचायत में पंच नहीं बनना चाहते थे। बुढ़िया ने अलगू चौधरी को पंच चुना। वे यह कहकर बचना चाहते थे कि जुम्मन उनके पुराने मित्र हैं, इसलिए उनका पंच बनना उचित नहीं होगा।

तब बुढ़िया ने अलगू चौधरी के धर्म-ज्ञान को ललकारा। उसने कहा कि यह सच है कि जुम्मन से उसकी गाढ़ी मित्रता है, किन्तु मित्रता, तथा व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए धर्म और कर्तव्य को भूल जाना उचित नहीं है। जब कोई व्यक्ति पंच बनता है तो वह न किसी का मित्र होता है और न किसी का शत्रु। सच्चा पंच वह है जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के परिधियों से ऊपर उठकर निष्पक्ष निर्णय करता है। सच तो यह है कि पंच ईश्वर का प्रतिनिधि होता है। उसके हृदय में ईश्वर का निवास होता है। पंच के रूप में मनुष्य के मुंह से जो वाणी निकलती है, उसमें ईश्वर की ही आवाज होती है। अतएव, पंचों के निर्णय में सच्चा न्याय होता है। मित्रता या शत्रुता पंचों के निर्णय में किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुंचा सकती।

प्रश्न 4.
भकोलिया मंगर की आदर्श जोड़ी। शारीरिक ढाँचे में ही नहीं, स्वभाव में भी।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘मंगर’ कहानी से उद्धृत की गयी है। इसके कहानीकार श्री रामवृक्ष बेनीपुरी हैं। इन पंक्तियों में मंगर की स्त्री भकोलिया के स्वभाव का वर्णन किया गया है। पहले भकोलिया सीधी थी। वह किसी पर झपटती नहीं थी। उसके स्वभाव में कठोरता नहीं थी। पर बाद में उसका स्वभाव मंगर की तरह हो गया। जिस प्रकार मंगर झिझकता था, उसी प्रकार वह भी झिझकती थी। जिस प्रकार मंगर डपटता था, उसी प्रकार वह भी डपटती थी। इस प्रकार वह ‘मंगर’ की आदर्श जोड़ी थी। पर इसका अर्थ यह नहीं कि भकोलिया का हृदय मलिन था-कठोर था। ऐसी बात नहीं थी। उसका हृदय निर्मल और कोमल था, वह केवल फूंकार मारती थी। उसमें दंशन न था-विष न था।

प्रश्न 5.
इतना पुराना मित्रतारूपी वृक्ष सत्य का एक झोंका भी न सह सका। सचमुच वंह बालू की ही जमीन पर खड़ा था।
उत्तर:
प्रस्तुत अवतरण प्रेमचन्द की ‘पंच-परमेश्वर’ शीर्षक कहानी से उद्धृत है। अलगू चौधरी और जुम्मन अत्यन्त घनिष्ठ मित्र थे। दोनों को एक दूसरे पर अत्यन्त विश्वास था। दोनों बचपन से ही मित्र थे, किन्तु पंचायत में जुम्मन के विरुद्ध फैसला होते ही दोनों की मित्रता समाप्त हो गयी। जो व्यक्ति अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मित्रता करते हैं वे अपने स्वार्थ में बाधा पड़ने पर तुरंत ही मित्रता का दामन छोड़ देते हैं। इन पंक्तियों में कहानीकार ने मित्रता की तुलना एक वृक्ष से की है। जब वृक्ष पुराना हो जाता है, तो उसकी जड़ें जमीन में बहुत भीतर चली जाती हैं और वह भयानक तूफान में भी खड़ा रहता है। इसी प्रकार जो मित्रता सच्ची और निःस्वार्थ होती है, वह व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण समाप्त नहीं होती है।

जिस मित्रता का आधार व्यक्तिगत स्वार्थ होता है उसके नाश होने में कोई देर नहीं लगती है। अतएव, कहानीकार का कथन है कि अलगू और जुम्मन की मित्रता अत्यन्त पुरानी होने पर भी सच्ची नहीं थी। यदि उनकी मित्रता निःस्वार्थ . होती तो जुम्मन इस प्रकार अपनी पुरानी दोस्ती को थोड़ी-सी बात के लिए समाप्त नहीं कर लेता। अतएव हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि उनकी मित्रता स्वार्थ के आधार पर ही खड़ी थी और जब स्वार्थ की पूर्ति में बाधा पहुंची, तो वह तुरंत खत्म हो गयी।

प्रश्न 6.
इसे कहते हैं न्याय ! यह मनुष्य का काम नहीं, पंच में परमेश्वर वास करते हैं, यह उन्हीं की महिमा है। पंच के सामने खोटे को कौन खरा कह सकता है?
उत्तर:
प्रस्तुत अवतरण ‘पंच-परमेश्वर’ शीर्षक कहानी से उद्धृत है। इस कहानी के रचयिता श्री प्रेमचन्द हैं। इस कहानी में प्रेमचन्दजी ने बतलाया है कि जब किसी मनुष्य को न्याय करने के लिए मनोनीत किया जाता है तो वह स्वार्थों की संकुचित परिधियों से ऊपर उठकर समुचित न्याय करता है। पंच बनने पर मनुष्य अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को कोई महत्त्व नहीं देता। जब हम ‘पंच-परमेश्वर’ शीर्षक कहानी पर दृष्टिपात करते हैं तो इस कथन की सत्यता सिद्ध हो जाती है। जुम्मन ने पंच के रूप में जो निर्णय दिया उसमें किसी प्रकार का पक्षपात तथा वैर का भाव नहीं था। उसका निर्णय निष्पक्ष न्याय था। यही कारण है कि पंचायत में एकत्रित सभी लोगों ने ‘जुम्मन के न्याय की भूरि-भूरि प्रशंसा की। सभी लोग जुम्मन की न्याय-प्रियता की जय-जयकार करने लगे। लोगों की विश्वास हो गया कि पंच में वस्तुतः ईश्वर का निवास होता है।

प्रश्न 7.
पर मर्दो की अपेक्षा औरतें अपने को परिस्थिति के सांचे में ज्यादा और जल्द ढाल पकती हैं, उसका उदाहरण यह भकोलिया है।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘मंगर’ कहानी से उद्धृत की गयी है। इसके कहानीकार श्री रामवृक्ष बेनीपुरी हैं। इन पंक्तियों में कहानीकार ने मदों और औरतों की मनोवृत्तियों का वर्णन बड़े ही सूक्ष्म ढंग से किया है। कहानीकार का कहना है कि साधारणतः यह देखा जाता है कि मर्द अपने आपको परिस्थिति के अनुकूल नहीं बना पाते। अगर बनाते भी हैं तो उसमें देर लगती है। पर औरतें अपने आपको जल्द ही परिस्थिति के लायक बना लेती हैं। मंगर स्वाभिमान में आकर काम नहीं भी करता था। अगर भकोलिया ऐसा करती तो भूखी रहती और मंगर भी भूखा रहता! पर वह समझती थी कि उसकी स्थिति ऐसी है कि बिना काम कियें उसंका काम चल नहीं सकता। अतः वह किसी का कुटान-पिसान करती थी, किसी का गोबर पाथती थी, किसी का पानी भरती थी तो किसी का और कोई काम करती थी। इस प्रकार उसने अपने आपको परिस्थिति के अनुकूल बना लिया था।

प्रश्न 8.
बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?
उत्तर:
प्रस्तुत सारगर्भित पंक्ति प्रेमचन्द लिखित ‘पंच परमेश्वर’ शीर्षक कहानी से उद्धृत है।
अलगू चौधरी जुम्मन का मित्र है। वह पंचायत में अपने मित्र के खिलाफ नहीं बोलना चाहता था। वह मित्र से बिगाड़ नहीं करना चाहता है। इसी प्रसंग में बूढी खाला अलगू से कहती हैं बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे? लोग प्रायः बिगाड़ के भय से अपने मित्रों के विरुद्ध नहीं बोलते हैं। अन्याय देखकर खामोश रह जाते हैं। प्रेमचन्द इसी कुप्रवृत्ति पर चोट करते हैं। ईमान सबसे बड़ी चीज है। ईमान का अर्थ है इन्सानियत या मानवता निश्चय ही जाति, धर्म, परिवार या राष्ट्र इन सबसे ऊपर है मनुष्य का ईमान। ईमान को दबा कर दोस्ती निभाना उचित नहीं।

प्रश्न 9.
अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा हमारे संकुचित व्यवहारों का सुधारक होता है। जब हम राह भूलकर भटकने लगते हैं तब यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय पथ-प्रदर्शक बन जाता है।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रेमचन्द की ‘पंच-परमेश्वर’ शीर्षक कहानी से ली गयी है। इस कहानी में लेखक ने दिखलाया है कि पंचों में परमेश्वर का निवास होता है। इन पंक्तियों में कहानीकार ने मानव-प्रकृति का अत्यन्त मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। मनुष्य अत्यन्त स्वार्थी जीव होता है। स्वार्थ के लिए वह उच्च भावनाओं की भी तिलांजलि दे देता है। कभी-कभी वह न्याय, धर्म, नीति, विवेक, सदाचार आदि के महत्त्व को भूल जाता है और स्वार्थ की पूर्ति के लिए बुरे कर्मों की ओर प्रवृत्त होता है। इस प्रकार स्वार्थ के कारण ही मनुष्य में बुरी भावनाओं का जन्म होता है। मनुष्य के स्वभाव की एक यह भी विशेषता है कि वह अवसर आने पर सवृत्तियों की ओर भी प्रवृत्त होता है।

जब मनुष्य को अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान होता है तो उसकी संकुचित मनोवृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। जब मनुष्य. अपनी जिम्मेदारियों को समझता है तो वह स्वार्थों की क्षुद्र परिधि से ऊपर उठ जाता है। अतएव, किसी व्यक्ति की क्षुद्र भावनाओं को दूर करने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि उस पर कुछ उत्तरदायित्व दिया जाय। उत्तरदायित्व आ जाने पर मनुष्य स्वार्थ, ईर्ष्या, पक्षपात, अज्ञान आदि दोषों का त्याग कर देता है। जब मनुष्य अपने कर्तव्य तथा. अकर्तव्य में विभेद करने में असमर्थ होता है तो उसका उत्तरदायित्व ही उसे उचित मार्ग दर्शाता है।

प्रेमचन्द ने इन पंक्तियों में मनुष्य की प्रकृति का अत्यन्त स्वाभाविक एवं मनोवैज्ञानिक विवेचन किया है। कहानीकार ने इस महान तथ्य की ओर संकेत किया है कि उत्तरदायित्व का ज्ञान ही मनुष्य का सबसे बड़ा मार्ग-प्रदर्शक होता है।

प्रश्न 10.
“गाय करुणा की कविता है।”
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति महादेवी वर्मा रचित ‘गौरा’ शीर्षक शब्दचित्र से ली गयी है।
करुणा का अर्थ है बेदना की गहरी अनुभूति। कविता विचार और भाव की अभिव्यक्ति है। करूणा की कविता का तात्पर्य है वेदना की अभिव्यंजना। गाय निरीह प्राणी है। उसका जीवन अत्यन्त करूण है। वह मानव जाति का अपार ठपकार करती है, लेकिन वह मानव द्वारा घोर यातना सहती हैं। ‘गौरा’ नामक गाय का एक ग्वाला सुई खिला देता है। वह घोर यातना सहकर मर जाती है। गौरा के निर्मम मृत्यु को देखते हुए यह कथन अत्यन्त सार्थक है कि गाय करुणा की कविता है।

प्रश्न 11.
“बाण की तीव्र गति क्षण भर के लिए दृष्टि में चकाचौंध उत्पन्न कर सकती है, परन्तु मन्द समीर से फूल का अपने वृन्त पर हौले-हौले हिलना दृष्टि का उत्सव है।”
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियों ‘गौरा शीर्षक पाठ से उद्धत है। इसके रचयिता महादेवी वर्मा हैं। विवेच्य पंक्तियों में तीव्र गति और मन्थर गति के सौन्दर्य का तुलनात्मक वर्णन किया गया है तीव्र गति में सौन्दर्य है। उसमें चकाचौंध उत्पन्न करने की क्षमता है, लेकिन मन्थर गति में अलौकिक सौन्दर्य है। इसमें नैसर्गिक खूबसूरती है। मन्द समीर से डाली पर फूलों का हिलना दृष्टि का उत्सव है। गाय की मन्थर गति अद्भुत है।

प्रश्न 12.
“उसका साहचर्यजनित लगाव मानवीय स्नेह के समान ही निकटता चाहता था।”
उत्तर:
साहचर्यजनित लगाव का अर्थ है निरन्तर सम्पर्क और सान्निध्य के कारण उत्पन्न प्रेम। दो प्राणी यदि निरन्तर सम्पर्क में हो तो उनमें परस्पर प्रेम होना स्वाभाविक है। पालतु पशु भी स्वामी के निरन्तर सम्पर्क में रहने से प्रेम भाव का आकांक्षी हो जाता है। _ ‘गोरा’ महादेवी जी के स्नेह पाकर बहुत प्रसन्न रहती थी। वह सहलाने के लिए अपनी गर्दन बढ़ा देती कंधे पर हाथ फेरने पर अपनी आँख बन्द कर लेती । लेखिका अब उससे दूर जाने लगती तो वह गर्दन घुमा-घुमा कर देखती रहती। पशु भी प्रेम भाव से प्रसन्न होता है।

प्रश्न 13.
मंगर के लिए ये बैल, बैल नहीं साक्षात् महादेव थे।
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्ति ‘मंगर’ शीर्षक शब्द-चित्र से ली गयी है। इसक रचचिता ‘कलम के जादूगर’ श्री रामवृक्ष बेनीपुरी है।
मंगर एक खेत मजदूर है। वह एक हलवाहा है। वह अपनी रोटी से दो टुकड़े कर बैलों को खिला देता है। उसकी नजर में ये बैल मात्र पशु नहीं है, बल्कि साक्षात् महादेव है। भगवान शिव का वाहन वृषभ (बैल) है। बैल को शिव समझना उसका अंध-विश्वास नहीं है, बल्कि पशुओं के प्रति मानवीय प्रेम का प्रतीक है। बैल के प्रति उसकी श्रद्धा अत्यन्त प्रशंसनीय है। इससे उसके विशिष्ट मानवीय गुण की झलक मिलती है।

प्रश्न 14.
“स्वतंत्रता दिवस भीगता है, गणतंत्र दिवस ठिठुरता है।”
उत्तर:
विवेच्चय पक्ति लब्धप्रतिष्ठ व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ शीर्षक निबंध से उद्धृत है।
ठिठुरता और भींगना शब्द में गहरा व्यंग्य है। निर्धन व्यक्ति ही मौसम की मार झेलता है। स्वतंत्रता दिवस15 अगस्त और गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को सम्पन्न होता है। जनवरी जाड़े का मौसम है और अगस्त बरसात का। गणतंत्र में ठिठुरते हैं और स्वतंत्रता दिवस में भीगते हैं।

भींगना और ठिठुरता गरीबी का प्रतीक है आजादी के आधी शताब्दी के बाद भी लोग आवश्यक नागरिक सुविधाओं से वंचित है। देश की बहुसंख्यक आबादी घोर दरिद्रता और अभाव में जी रहा है।

प्रश्न 15.
गणतंत्र ठिठुरते हुए हाथों की तालियों पर टिका है। गणतंत्र को उन्हीं हाथों की ताली मिलती है, जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिए’ गर्म कपड़े नहीं है।
उत्तर:
विवेच्य गद्यांश श्री हरिशंकर परसाई लिखित ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ शीर्षक व्यंग्य लेख से लिया गया है।
लोकतंत्र में गरीबों की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। मध्यवर्ग नेतृत्व करता है, लेकिन लोकतंत्र का आधार गरीब वर्ग ही है। ‘हाथों की ताली’ का तात्पर्य-समर्थन देने के है। निश्चय ही लोकतंत्र जन सामान्य के भागीदारी पर आधारित है। प्रायः देखा जाता है स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के समारोह में साधारण लोग ही शामिल होते हैं। वे ही तालियां बजाते हैं। इसी तरह मतदान केन्द्र के पास लम्बी-लम्बी पक्तियों में गरीब और साधारण लोग ही खड़े रहते हैं। रैली में साधारण लोग ही भाग लेते हैं।
अतः लेखक का कथन सही है कि गणतंत्र ठिठुरते हुए हाथों की तालियों पर टिका है।

प्रश्न 16.
इस देश में जो जिसके लिए प्रतिबद्ध है, वही उसे नष्ट कर रहा है।
उत्तर:
‘ठिठुरते हुए गणतंत्र’-शीर्षक हास्य-व्यंग्य लेख में हरिशंकर परसाई ने उन सभी लोगों पर व्यंग्य किया है, जिन पर किसी कार्य की जिम्मेवारी होती है। लोगों की प्रवृत्ति बड़ी निराली है। जो व्यक्ति जिस कार्य से जुड़ा हुआ है, वही उस कार्य को नष्ट कर रहा है। रक्षक ही भक्षक बना हुआ है। नेता राजनीति को, पदाधिकारी प्रशासन को, शिक्षक शिक्षा-व्यवस्था को बिगाड़ रहे हैं। पत्रकार या मीडिया वाले झूठी खबरें देकर समाचार पत्रों की विश्वसनीयता समाप्त कर रहे हैं।
निश्चय ही परसाईजी का व्यंग्य अत्यन्त गंभीर है।

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