Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम Textbook Questions and Answers, Additional Important Questions, Notes.

BSEB Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

Bihar Board Class 11 Psychology अधिगम Text Book Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधिगम क्या है? इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
परिचय एवं परिभाषा-अभ्यास और अनुभव के कारण व्यवहार में या व्यवहार की क्षमता में होने वाला अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन को अधिगम कहा जाता है। कभी-कभी मानवीय व्यवहारों में अस्थायी अथवा क्षणिक परिवर्तन देखे जाते हैं। इस श्रेणी का परिवर्तन अधिगम नहीं कहलाता है जैसे, संगीत के प्रति उत्पन्न रुझान को अधिगम मान सकते हैं।

यदि यह परिवर्तन स्थायी हो जाए और प्रभावित व्यक्ति संगीत के सभी कार्यक्रमों में भाग लेने की तत्परता दिखाने लगे, लेकिन बेटे की गलती के कारण माँ का रौद्र रूप अधिगम नहीं माना जाएगा क्योंकि पीटने वाली माँ कुछ ही देर बाद बच्चे को सहलाने लगती है। अर्थात् उत्पन्न गुस्सा से माँ के व्यवहार में आने वाला परिवर्तन बिल्कुल अस्थायी होने के कारण अधिगम नहीं कहला सका।

अधिगम की विशेषताएं-अधिगम की प्रक्रिया से संबंधित कुछ विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं जो निम्नलिखित हैं –

1. अधिगम में सदैव किसी-न-किसी तरह का अनुभव सम्मिलित रहता है:
उदाहरण के रूप में, एक ऐसे व्यक्ति के व्यवहार पर विचार करते हैं जो चाय पीने वाले को देखकर हँसी उड़ाता था और आज वह चाय पीने का लत का स्वयं शिकार बनकर रोज सात बजे सुबह चाय की दुकान पर पहुंचकर बोलता है कि चाय नहीं पीने से सर दर्द होने लगता है। उस व्यक्ति में चाय की लत स्थायी रूप ले चुकी है।

इसी तरह भींगे हाथ से बिजली का स्विच दबाते ही झटका महसूस करने वाला लड़का स्विच को छूने से डरने लगा है। स्विच के प्रति लड़का के आचरण या व्यवहार में आने वाला अन्तर भी अधिगम माना जाएगा। किन्तु, क्रिकेट में भारत की हार का समाचार सुनते ही मूर्च्छित होकर गिर जाने वाले लड़का के व्यवहार में आने वाला अस्थायी अन्तर अधिगम नहीं माना जाएगा क्योंकि सभी दुखद समाचार के प्रभाव से वह मूर्च्छित नहीं हो पाता है।

2. अधिगम के कारण व्यवहार में होने वाले परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं:
थकान, औषधि, आदत के कारण व्यवहार में होनेवाले परिवर्तन अस्थायी होने के कारण अधि गम नहीं कहलाते हैं लेकिन नहीं खाने पर कमजोरी महसूस करने वाला परिवर्तन स्थायी होने के कारण अधिगम कहलाने का अधिकार रखते हैं।

3. अधिगम में मनोवैज्ञानिक घटनाओं का एक क्रम होता है:
बच्चे को अंग्रेजी सिखलाने वाला सर्वप्रथम यह जानना चाहता है कि बच्चा कितने बड़े शब्द भंडार या व्याकरण के नियमों की जानकारी रखता है। इसके बाद वह यह जानने का प्रयास करता है कि बच्चा के पास किस प्रकार के शैक्षणिक साधन (किताब, कॉपी, पेन्सिल) उपलब्ध है। तीसरे क्रम में वह पता लगाता है कि बच्चा अंग्रेजी सीखने की ललक रखता है या नहीं।

अंत में वह सभी तरह से संतुष्ट होकर अंग्रेजी पढ़ाने लगता है। कुछ ही दिनों के बाद बच्चा अंग्रेजी में बातचीत करने में गौरव महसूस करने लगता है। अंग्रेजी के प्रति बच्चे के व्यवहार में आनेवाला परिवर्तन मनोवैज्ञानिक घटनाओं का एक निश्चित क्रम का स्थायी परिणाम है। अतः इसे अधिगम की श्रेणी में रखा जा सकता है।

4. अधिगम एक अनुमानित प्रक्रिया है और निष्पादन से भिन्न है:
निष्पादन किसी व्यक्ति का प्रेक्षित व्यवहार या अनुक्रिया है। एक व्यक्ति कार चलाने की कला (ड्राइवरी) सीखने के लिए अपनी माँ से पैसा लेता है। वह कभी प्रशिक्षण में शामिल होता कभी नहीं लेकिन माँ को अच्छी जानकारी का झांसा दिया करता है। समय समाप्त होने पर माँ उसे कार चलाने को कहती है।

वह व्यक्ति कार को शहर के भीड़वाले रास्ते से होकर माँ को मन्दिर तक पहुँचा देता है। कार चला लेना ही प्रशिक्षण का अंतिम पड़ाव था जिसमें वह व्यक्ति सफल रहा। उस व्यक्ति के व्यवहार से माँ प्रयास का सफल निष्पादन मानते हुए लड़के को सफल चालक के रूप में स्वीकार कर लिया। माँ का यह अनुमान कि लड़का कार चलाना सीख चुका है, अधिगम का एक उदाहरण कहलाता है।

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प्रश्न 2.
प्राचीन अनुबंधन किस प्रकार साहचर्य द्वारा अधिगम को प्रदर्शित करता है?
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधन में अधिगम की स्थिति में दो उद्दीपकों के बीच साहचर्य स्थापित होता है और एक उद्दीपक दूसरे उद्दीपक के आने की सूचना देने वाला बन जाता है। यहाँ एक उद्दीपक दूसरे उद्दीपक के घटित होने की सम्भावना प्रकट होती है।

भरपेट भोजन करने के उपरान्त मनपसन्द मिठाई से भरी थाली को देखते ही एक व्यक्ति के मुँह में लार का उत्पन्न होना एक अनुबंधित अनुक्रिया का उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्राचीन अनुबंधन कहलाने वाले अधिगम का अध्ययन सर्वप्रथम ईशान पी पावलव ने किया था। उन्होंने कुत्ता को माध्यम बनाकर उद्दीपकों तथा अनुक्रियाओं के पारस्परिक संबंध को पूर्णतः समझना चाहा।

प्रयोग की शुरूआत में उन्होंने एक कुत्ता को एक बॉक्स में बंद कर दिया बॉक्स के अन्दर कुत्ते के लिए भोजन (मांसचूर्ण) वहुँचाया गया। कई दिनों तक भूखा रखने के बाद जब उसे भोजन पाने का अवसर मिला तो कुत्ते के मुँह में लार जमा होने लगा। पाइप और मापक बेलन की सहायता से उत्पन्न लार की माप रखी जाने लगी। कई दिनों तक कुत्ते को भोजन देने के पूर्व घंटी बजाई जाती। एक दिन घंटी के ध्वनि सुनते ही कुत्ते के मुँह में लार जमा होने लगा। घंटी का आवाज भोजन पाने की आशा के बीच साहचर्य संबंध स्थापित हो चुका था।
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सारांशतः प्रयोग से पता चला कि प्रारम्भ में दिया गया भोजन अनुबंधित उद्दीपक (US) जैसा बर्ताव किया और परिणामतः लार का निकलना अननुबंधित अनुक्रिया (UR) का काम किया। प्रयोग के अंत में जब घंटी बजाकर भोजन नहीं दिया गया तो ध्वनि की उपस्थिति में लार निकलने लगता है। इस स्थिति में घंटी को अनुबंधित उद्दीपक (CS) तथा लार स्राव को अनुबंधित अनुक्रिया (CR) जैसा बर्ताव करता हुआ पाया गया। यहाँ एक प्राणी दो उद्दीपकों के मध्य साहचर्य को सीखता है। एक तटस्थ उद्दीपक (अनुबंधित उद्दीपक, एक अननुबंधित उद्दीपक (CS) के आने का संकेत देता है। अनुबंधित उद्दीपक के परिवर्तन होते ही वह अननुबंधित उद्दीपक के आने की प्रत्याशा में अनुबंधित अनुक्रिया (CR) करने लगता है।

एक छोटा बच्चा एक फूले हुए गुब्बारे पर ज्योंहि हाथ लगाता है त्योंहि वह तेज ध्वनि के साथ फट जाता है। बच्चा डर जाता है और अब बच्चा किसी दूसरे गुब्बारे को छूने से डरने लगता है। इस स्थिति में अनुबंधित उद्दीपक (CS) के रूप में गुब्बारे तथा अनुबंधित उद्दीपक के (CS) के रूप में तीव्र ध्वनि की पहचान होती है। इस प्रकार प्रयोग एवं प्रक्षेणों से स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन अनुबंधन साहचर्य द्वारा अधिगम को प्रदर्शित करता है।

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प्रश्न 3.
क्रिया प्रसूत अनुबंधन की परिभाषा दीजिए। क्रिया प्रसूत अनुबंधन को प्रभावित करनेवाले कारकों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
क्रिया प्रसूत अनुबंध की परिभाषा-“मानवों अथवा जानवरों द्वारा ऐच्छिक रूप से प्रकट किये जाने वाले व्यवहार या अनुक्रियाओं को जो उनके नियंत्रण में रहती है, क्रिया-प्रसूत माने जाते हैं।” या क्रिया प्रसूत नामक व्यवहार का अनुबंधन ‘क्रिया प्रसूत’ अनुबंधन कहा जाता है। इसमें प्राणी पर्यावरण में सक्रिय रहता है। क्रिया प्रसूत अनुबंधन का अन्वेषण सर्वप्रथम बी. एफ. स्किनर के द्वारा किया गया था जो पर्यावरण में सक्रियता प्राणियों की ऐच्छिक अनुक्रियाओं पर आधारित प्रयोगों द्वारा पूरा किया गया था। क्रिया प्रसूत अनुबंधन को प्रभावित करनेवाले कारक-क्रिया प्रसूत अनुबंधन अधिगम का एक प्रमुख भेद (प्रकार) है जिसमें अनुक्रिया को प्रबलन द्वारा मजबूत बनाया जाता है।

कोई भी घटना या उद्दीपक एक प्रबलक हो सकती है जो किसी वांछित अनुक्रिया को घटित होने की संभावना को बढ़ाता है अर्थात् पूर्वगामी अनुक्रिया को बढ़ाती है। क्रिया प्रसूत अनुबंधन की हर प्रबलन के प्रकार (धनात्मक या ऋणात्मक) प्रबलित प्रयासों की संख्या, गुणवत्ता (उच्च या निम्न) प्रबलन अनुसूची (सतत अथवा आशिक) और प्रबलन में विलम्ब से प्रभावित होती है। अनुबंधित की जाने वाली अनुक्रिया अथवा व्यवहार का स्वरूप’ को भी एक कारक का स्थान दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अनुक्रिया के घटित होने और प्रबलन के बीच का अंतराल भी क्रिया प्रसूत अधिगम को प्रभावित करनेवाला कारक माना जाता है।

प्रबलन के प्रकार:
प्रबलक वे उद्दीपक होते हैं जो पूर्व में घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर या संभावना को बढ़ा देते हैं। प्रबलन का विभाजन दो तरह से किया गया है –

(क) धनात्मक प्रबलक और ऋणात्मक प्रबलक तथा
(ख) प्राथमिक प्रबलक और द्वितीयक प्रबलक

प्रत्येक प्रबलन अनुसूची (व्यवस्था) अनुबंधन की दिशा को अपने – अपने ढंग से बदलती है। अर्जन प्रयास के दिये जाने के क्रम के आधार पर पता चला है कि आंशिक प्रबलन, सतत प्रबलन की अपेक्षा में विलोप के प्रति अधिक विरोध प्रदर्शित करता है। विलंबित प्रबलन-किसी भी प्रबलन की प्रबलनकारी क्षमता विलम्ब के साथ-साथ घटती जाती है। अर्थात् प्रबलन प्रदान करने में बिलम्ब से निष्पादन का स्तर निकृष्ट हो जाता है । जैसे, विलम्ब से मिलने वाले बड़े पुरस्कार की तुलना में शीघ्रता से कार्य कारक के तुरंत बाद मिलने वाला छोटा पुरस्कार अधिक पसन्द किया जाता है।

व्यवहार का स्वरूप:
अधिगम के द्वारा मिलने वाले परिणाम को अच्छा या बुरा, हितकारी या हानिकारक ध्वनि में व्यवहार का स्परूप प्रभावी होता है। अच्छा व्यवहार सुन्दर परिणाम का कारण बन जाता है। प्रबलन का बीच का अंतराल-क्रिया प्रसूत अधिगम को सफलतापूर्वक समाप्त किये जाने में प्रयास के रूप प्रबलन आरोपित करने के क्रम तथा दो प्रबलन के बीच की अवधि में विस्तार प्रबलन के प्रभाव को घटा-बढ़ा सकता है। धनात्मक प्रबलक सुखद परिणाम वाले होते हैं क्योंकि ये भोजन, पानी, धन, प्रतिष्ठा, सूचना-संग्रह आदि के माध्यम से विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ होते हैं। फलतः एक धनात्मक प्रबलन के मिलने के पहले जो अनुक्रिया घटित होती है, उसकी दर बढ़ जाती है।

ऋणात्मक प्रबलन, परिहार अनुक्रिया अथवा पलायन अनुक्रिया सिखाते हैं, जैसे जाड़े से बचने के लिए स्वेटर पहनना, आग के डर से भाग जाना। अतः खतरनांक उद्दीपकों से दूर भागने की प्रवृत्ति को जगाना क्योंकि यह ऋणात्मक प्रबलन से जुड़ा होता है। अर्थात् ऋणात्मक प्रबलक अपने हटने या समापन से पहले घटित होनेवाली अनुक्रिया की दर को बढ़ा देता है। प्राथमिक प्रबलक जैविक रूप से महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है।

द्वितीयक प्रबलक पर्यावरण और प्राणी के बीच संबंध बनाकर प्रबलक की विशेषताओं को स्पष्ट कर देता है। इसके अन्तर्गत धन, प्रशंसा और श्रेणियों का उपयोग जैसी स्वाभाविक वृत्ति को बढ़ावा मिलता है। प्रबलन की संख्या अथवा आवृत्ति-प्रबलन की संख्या अथवा आवृत्ति से उन प्रयासों का बोध होता है जो उद्दीपन की अनुक्रियता को प्रभावित करता है। उचित परिणाम में भोजन-पानी की उपलब्धता की उपस्थिति में बार-बार का प्रयास एक परिणामी निष्कर्ष को पान में समर्थ हो सकता है। अतः क्रिया-प्रसूत की गति आवृत्ति के बढ़ने से समानुपाती तौर पर बढ़ जाती है।

प्रबलन की गुणवत्ता:
आवृत्ति के बढ़ने से समानुपाती तौर पर बढ़ जाती है। क्रिया-प्रसूत अथवा नैमेत्तिक अनुबंधन की गति सामान्यत: जिस अनुपात में उसकी गुणवत्ता बढ़ती है।

प्रबलन अनुसूचियों:
अनुबंधन से सम्बन्धित प्रयासों के क्रम में प्रबलन उपलब्ध कराने की व्यवस्था के रूप में अनुबंधन की दिशा प्रभावित होती है।

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प्रश्न 4.
एक विकसित होते हुए शिशु के लिए एक अच्छा भूमिका-प्रतिरूप अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। अधिगम के उस प्रकार पर विचार-विमर्श कीजिए जो इसका समर्थन करता है।
उत्तर:
बच्चे स्वभाव से नकलची होते है। उनकी सम्पूर्ण क्रिया-विधि पर परिवेशीय क्रियाकलापों की गहरी छाप देखने को मिलती है। बच्चे किसी भी क्रिया के सम्पादन विधि को बड़ी ध्यान से देखते हैं और तुरंत बाद स्वयं उस क्रिया को दुहराने के फिराक में रहते हैं। अर्थात् शिशु अपने घर-परिवार अथवा सामाजिक उत्सवों एवं समारोहों में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं जहाँ उन्हें मनपसन्द दृश्य और प्रेरणादायक क्रिया-विधि देखने को मिलता है। शिशु प्रौढ़ व्यक्तियों के अनेक प्रकार के व्यवहारों को ध्यान से प्रेक्षण करके सब कुछ सीखने का प्रयास करते हैं।

समारोह एवं उत्सव के अवसर समाप्त हो जाने के बाद वे देखे गये क्रियाकलापों को अपने खेल में शामिल कर लेते हैं। विवाह पद्धति, जन्मदिन समारोह, चोर-सिपाही, घर में होनेवाले साफ सफाई का जीवंत वित्रण करने के लिए तरह-तरह के स्वांग रचते हैं। यहाँ तक कि माता-पिता को विवाह करते देखकर वे भी काल्पनिक रूप से माता-पिता का अभिनय करके उन्हीं सब बातों को दुहराते हैं जो वे अपने घर में सुन रखा था। अत: बच्चे अधिकांश सामाजिक व्यवहार प्रौढ़ों को प्रेक्षण तथा उनकी नकल करके सीखते है। वे कपड़ा पहनना, शिक्षक बनकर छात्रों को डाँटना, फोन करना, टी.वी. चलाना, अतिथियों का आदर-सत्कार करना जैसे सभी कार्यों को बड़ों की नकल करके ही सीख लेते हैं।

सच तो यह है कि बढ़ते हुए शिशु में व्यक्तित्व का विकास, आचरण की अच्छाई, व्यवहार में कुशलता, चाय-पानी पीने का तरीका, मनपसन्द भोजन का चयन आदि प्रेक्षणात्मक अधिगम के द्वारा ही संभव होता है। दयालुता, परोपकार, आदर, श्रम-साधना, आलस्य का परित्याग के साथ-साथ तम्बाकू खाना, बीड़ी-सिगरेट पीना, आक्रामक व्यवहार को अपनाना जैसी अच्छी-बुरी आदतों या जानकारियों का मुख्य आधार प्रेरणात्मक अधिगम अथवा भूमिका प्रतिरूप ही होता है। अतः एक विकसित होते हुए शिशु के लिए एक अच्छा भूमिका-प्रतिरूप अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

अधिगम के सभी प्रकारों में सीखने-जानने की विधि भिन्न-भिन्न रूपों में उपलब्ध होती है लेकिन उनमें से प्रेरणात्मक अधिगम शिशुओं के स्वभाव और आवश्यकता के अनुकूल होता है। शिशुओं के द्वारा अनुकरण करने की क्षमता को प्रोत्साहित करने के लिए प्रौढ़ों को अच्छे। भूमिका-प्रतिरूप के प्रदर्शन में संकोच नहीं करना चाहिए। प्रेरणात्मक अधिगम का शिशुओं पर इतना अच्छा प्रभाव पाया गया कि इसे सामाजिक अधिगम भी कहा जाने लगा। शिशु दूसरे व्यक्तियों के व्यवहारों का प्रेक्षण करते हैं और यथासंभव प्रौढ़ों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। व्यवसाय क्षेत्र में महत्वपूर्ण व्यक्तियों को उपभोक्ता बनाकर पेश करके अपने उत्पादन की खपत को बढ़ाने का प्रयास करते हैं।

मनोवैज्ञानिक बंदूरा और उनके सहयोगियों ने भी अध्ययन एवं प्रयोग के आधार पर प्रेरणात्मक अधिगम को शिशुओं के विकास के लिए अनुकूल बताया है। बंदूरा ने प्रेक्षण का महत्व समझने के लिए शिशुओं पर आधारित एक प्रयोग किया। प्रयोग में शिशुओं की तीन अलग टोलियों को चंद मिनट का फिल्म दिखाया। एक फिल्म में आक्रामक व्यवहार करनेवाले को इनाम एवं प्रशंसा पाते हुए दिखाया गया। दूसरे फिल्म में गलती करने वाले को दण्ड पाते दिखाया गया। तीसरे फिल्म में दिखाया गया कि आक्रामक रुख की कोई खास प्रतिक्रिया नहीं होती है। इसे स्वाभाविक वृत्ति मानकर लोग उस ओर ध्यान नहीं देते है।

प्रयोग के अंत में तीनों टोलियों को एक साथ मिलाकर आक्रामक व्यवहार करने वाले प्रतिरूप (खिलौना) को उनके बीच छोड़ दिया गया। प्रेक्षक छिपकर प्रतिक्रिया का अवलोकन करता रहा। प्रेक्षण के अवलोकन के आधार पर निर्णय किया गया कि जो बच्चा आक्रामक को इनाम पाते देखा था वह शांत रहा और जिसने दंड पाते देखा था वह क्रोध की मुद्रा बनाकर खिलौने को फेंककर उसे आहत करने का प्रयास किया। अतः अनुकरण के पक्ष में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि प्रेक्षण द्वारा अधिगम की प्रक्रिया में प्रेक्षक मॉडल (प्रतिरूप) के व्यवहार का प्रेक्षण करके जानकारी हासिल करता है परन्तु आचरण की दिशा देखे गये दृश्य पर निर्भर करता है।

इसी प्रकार, यदि कागज की नाव बनाने की कला का प्रदर्शन बच्चों के समक्ष किया जाए तो अधिकांश बच्चे कागज उपलब्ध होते ही उसे नाव बनाने में समाप्त कर देंगे। यह भी पाया जाता है कि बच्चे मोबाइल लेकर माता-पिता की भाषा में बात-चीत करने लग जाते हैं। रीमोट का प्रयोग कर माता-पिता के पसन्द का कार्यक्रम देखने का प्रयास करते है। इस प्रकार तय होता है कि विकास करते शिशुओं का भला चाहने वाले सदा प्रेरक कहानियों, सुन्दर आचरण, आधुनिक तकनीकों के प्रयोग आदि से सम्बन्धित अच्छी भूमिका प्रस्तुत करें जिसे शिशुओं का भविष्य उज्जवल हो।

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प्रश्न 5.
वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधियों की व्याख्या कीजिए। या, वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधि का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
मनुष्य अपनी भावना तथा आवश्यकताओं को प्रकट करने में दूसरे के अर्जित झान को अपनाने में तथा संभावित घटनाओं को बतलाने में शब्द को माध्यम बनाता है। मानव बोलकर, सुनकर, लिखकर या पढ़कर शब्दों की महत्ता को बतलाया है। वाचिक अधिगम को अनुबंधन से भिन्न मानते हुए मात्र मनुष्यों तक ही सीमित माना है।

मनोवैज्ञानिक वाचिक अधिगम की प्रक्रिया को समझने तथा प्रयोग में लाने के लिए कई तरह की सामग्रियों का उपयोग करते हैं। जैसे निरर्थक शब्दांश, परिचित शब्द, अपरिचित शब्द, वाक्य तथा अनुच्छेद। इस अधिगम को उपयोग में लाने के लिए कई विधियों का विकास किया गया है जिनमें से निम्नलिखित तीन विधियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं –

(क) युग्मित सहचर अधिगम:
परिचय-प्रस्तुत विधि उद्दीपक-उद्दीपक अनुबंधन और उद्दीपक अनुक्रिया अधिगम के समान होती है।

प्रयोग का उद्देश्य:
अपनी मातृभाषा के शब्दों के पर्याय सीखने में इस विधि का उपयोग किया जाता है।

प्रयोग-क्रम:

  • सर्वप्रथम युग्मित सहचरों की एक सूची बनाई जाती है जिसमें युग्मों का पहला शब्द उद्दीपक तथा दूसरा. शब्द अनुक्रिया के रूप में अपनाया जाता है।
  • उद्दीपक शब्द व्यंजन-स्वर-व्यंजन के रूप में निरर्थक शब्दांश होता है तथा दूसरा शब्द वांछित भाषा के संज्ञा-पद होते हैं।
  • अधिगमकर्ता को उद्दीपक और अनुक्रिया शब्द को एक साथ दिखाया जाता है।
  • दोनों (उद्दीपक और अनुक्रिया) प्रकृति वाले शब्दों को पुनःस्मरण करने का परामर्श दिया जाता है।
  • एक-एक करके उद्दीपक शब्द दिखाकर प्रतिभागी को सही अनुक्रिया शब्द बताने को कहा जाता है।
  • प्रयास में असफल होने की स्थिति में वांछित अनुक्रिया शब्द दिखा दिया जाता है।
  • पहले प्रयास के सभी उद्दीपक पदों को दिखा दिया जाता है।
  • प्रयास का यह क्रम तब तक जारी रखा जाता है जब तक बिना गलती किये सभी अनुक्रिया पद बता दिये जाते हैं।
  • मानक मापदण्ड को पाने के लिए प्रयासों की कुल संख्या को युग्मित सहचर अधिगम मान लिया जाता है।

(ख) क्रमिक अधिगम:
परिचय-उद्दीपक और अनुक्रिया को नियत क्रम में प्रस्तुत करने की यह प्रचलित विधि है।

उद्देश्य:
प्रतिभागी के द्वारा सीखने की प्रक्रिया को जानना इस विधि का उद्देश्य होता है। अर्थात् प्रतिभागी किसी शाब्दिक एकांश की सूची किस तरह सीखता है और सीखने में कौन-कौन सी प्रक्रियाएँ अपनायी जाती हैं, जैसे प्रश्नों का सही उत्तर का पता लगाना इस विधि का उपयोग है।

प्रयोग-क्रम:

  • प्रयोग का प्रारम्भ शब्दों की एक सूची को तैयार कर लेने से किया गया जिसमें निरर्थक शब्दांश, अधिक परिचित शब्द, कम परिचित शब्द, परस्पर संबंधित शब्द आदि को जगह दी गई।
  • प्रतिभागी को सूची का पूरा अंश देकर निर्देश दिया गया कि सूची के क्रम को बिना बदले एकांशों को बतलाना है।
  • सूची का मात्र पहला अंश दिखाकर प्रतिभागी से दूसरा एकांश बतलाने को कहा जाता है।
  • प्रतिभागी के असफल हो जाने पर दूसरा एकांश दिखाया जाता है जिससे दूसरा एकांश उद्दीपक बन जाता है।
  • प्रतिभागी तीसरा एकांश (अनुक्रिया शब्द) को ठीक-ठीक बताने का प्रयास करता है।
  • इस बार भी असफल होने की स्थिति में उसे सही एकांश बतला कर उसे चौथा एकांश के लिए उद्दीपक मान लिया जाता है।
  • उद्दीपक-अनुक्रिया के क्रमिक पूर्वाभास विधि क्रम जारी रखा जाता है।
  • अधिगम के प्रयास को तब तक जारी रखा जाता है जब तक प्रतिभागी सभी एकांशों का सही-सही पूर्वाभाव नहीं कर लेता है।

(ग) मुक्त पुनः स्मरण:
परिचय-कुछ निर्धारित शब्दों को स्मरण के द्वारा एक विशिष्ट क्रम में सजाकर बतलाने का प्रयास मुक्त पुनः स्मरण विधि कहलाता है।

उद्देश्य:
प्रतिभागी शब्दों को किस तरह से संगठित करके उन्हें अपनी स्मृति में संचित करते हैं। स्मृति संबंधी इसी उत्सुकता को मिटाने में पुनः स्मरण विधि का उपयोग किया जाता है।

प्रयोग-क्रम:

  • सर्वप्रथम दस से अधिक शब्दों की एक सूची प्रतिभागियों को पढ़ने एवं बोलने के लिए दिया जाता है।
  • निश्चित समय तक प्रतिभागी के पास छोड़ा जाता है।
  • प्रतिभागी को किसी भी क्रम में शब्दों को बतलाने का अवसर दिया जाता है।
  • प्रतिभागी द्वारा बतलाये गये शब्दों के क्रम में एक प्रयास से दूसरे प्रयास में भिन्न पाये जाते हैं।
  • शब्दों को स्मृति में संचित करके उनके संगठन करने की प्रक्रिया अथवा विधि का पता लगाया जाता है।
  • प्रेक्षण के निष्कर्ष के रूप में पाया जाता है कि सूची के आरम्भ और अंत में स्थित शब्दों का पुनः स्मरण सूची के बीच में स्थित शब्दों की तुलना में अधिक सरल होता है।
  • स्मरण और शब्दों के संगठन सम्बन्धी तरह-तरह की जानकारियाँ जमा की जाती हैं।

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प्रश्न 6.
कौशल से आप क्या समझते हैं? किसी कौशल के अधिगम के कौन-कौन से चरण होते हैं?
उत्तर:
कौशल का परिचय:
सामान्य अथवा अटिल, साधारण अथवा तकनीकी किसी भी तरह के कार्य को सरलता से दक्षतापूर्ण विधि के द्वारा त्रुटिहीन परिणाम के साथ पूरा करने की कला या क्षमता को कौशल कहा जाता है। जैसे, हवाई जहाज चलाना, आशुलिपि में लिखना, कार चलाना आदि कौशल के उदाहरण हैं। किसी कौशल में अनुभव और अभ्यास के द्वारा प्रात्यक्षिपेशीय अनुक्रियाओं की एक श्रृंखला अथवा उद्दीपक-अनुक्रिया साहचर्यों की एक श्रेणी प्राप्त की जाती है। अभ्यास एवं प्रयास के द्वारा समय, त्रुटि, अवरोध आदि से बचा जाता है। कौशल प्राप्त हो जाने पर कम समय में उच्चस्तरीय परिणाम मिल जाता है।

कौशल के अधिगम के प्रमुख चरण:
महान मनोवैज्ञानिक फिट्स के अनुसार कौशल अधिगम की प्रक्रिया तीन चरणों में होती हैं –

  1. संज्ञानात्मक
  2. साहचर्यात्मक तथा
  3. स्वायत्त

कौशल अधिगम के विभिन्न चरणों में अलग-अलग तरह की मानसिक क्रियाएँ की जाती हैं लेकिन यह भी माना जाता है कि अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है।

1. संज्ञानात्मक चरण:
अभिकर्ता को प्राप्त होने वाले निर्देशों का पालन करते हुए परिवेश से मिलने वाले सभी संकेतों एवं निर्देशों का माँग तथा अपनी अनुक्रियाओं के परिणामों को सदा अपनी चेतना में रखना होता है। कार्य निष्पादन की एक उत्तम विधि का उपयोग करके यथासंभव अच्छे परिणाम पाने के लिए अपनी समझ का प्रयोग करना होता है।

2. साहचर्यात्मक चरण:
कौशल अधिगम के प्रस्तुत चरण में विभिन्न प्रकार की सांवेगिक सूचनाओं अथवा उद्दीपकों को उपयुक्त अनुक्रियाओं से जोड़ना होता है। अभ्यास, त्रुटियाँ, लागत समय, कार्य निष्पादन के साथ उच्चस्तरीय परिणाम की प्राप्ति के प्रति सदा सतर्क रहना होता है। प्रस्तुत चरण से प्राप्त परिणामों के आधार पर ज्ञात होता है कि अभ्यास की मात्रा बढ़ाने से संभावित त्रुटियों में कमी आती है और निष्पादन की गुणवत्ता बढ़ती है। अभ्यास के द्वारा किसी अनुक्रिया को करने में लागत समय को घटाया जा सकता है। प्रेक्षण कार्य करने में एकाग्रता रखना वांछनीय हो जाता है।

3. स्वायत्त चरण:
स्वायत्त चरण में निष्पादन संबंधी दो परिवर्तन अधिक प्रमुख माने जाते हैं –
(क) पहला साहचर्यात्मक चरण की अवधानिक माँगें कम हो जाती हैं और
(ख) वाह्य कारकों द्वारा उत्पन्न की गई बाधाएँ घट जाती हैं।
अतः इस चरण में सचेतन प्रयत्न की अल्प माँगों के साथ कौशलपूर्ण निष्पादन स्वचालिता प्राप्त करना प्रमुख उद्देश्य बन जाता है।

निष्कर्ष:

  1. कौशल अधिगम का एक मात्र साधन अभ्यास है।
  2. अधिगम के लिए निरंतर अभ्यास और प्रयोग करते रहने की आवश्यकता होती है।
  3. एकाग्रता, सतर्कता और जिज्ञासा सुन्दर परिणाम के लिए वांछनीय होता है।
  4. त्रुटिहीन निष्पादन की स्वचालित, कौशल का प्रमाणक मानी जाती है।
  5. अभ्यास ही मनुष्य की पूर्ण बनाता है।

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प्रश्न 7.
सामान्यीकरण तथा विभेदन के बीच आप किस तरह अंतर करेंगे?
उत्तर:
सामान्यीकरण और विभेदन की प्रक्रियाएँ प्रायः सभी प्रकार के अधिगम का मुख्य लक्षण होता है। समान उद्दीपकों (घंटी का बजना, आकस्मिक प्रकाश का उत्पन्न होना, टेलीफोन की घंटी का बजना) के प्रति समान अनुक्रिया (लार स्राव, भागना, चौंकना) के गोचर को सामान्यीकरण माना जाता है। माँ के द्वारा छिपाई गई मिठाई को बार-बार खोजने की क्रिया समान अनुक्रिया का बोध कराता है। अत: जब तक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण कहते हैं।

विभेदन को समान्यीकरण का पूरक माना जाता है। समान्यीकरण समानता पर आधारित होती है जबकि विभेदन भिन्नता के प्रति अनुक्रिया मानी जाती है। जैसे यदि कोई बच्चा एक बार मूंछ-दाढ़ी वाले व्यक्ति से डर जाता है तो वह नेक आदमी से भी डरने लगता है यदि वह मूंछ-दाढ़ी वाला हो। दूसरी ओर एक खतरनाक प्रकृतिवाला व्यक्ति भी मूंछ-दाढ़ी साफ कराके सफेद धोती में चश्मा लगाकर प्रकट होता है तो बच्चा उसके चश्मा से खेलने लगता है। यहाँ भय का कारण मूंछ-दाढ़ी को माना जाता है। बच्चे का डरना और नहीं डरना विभेदन का एक उदाहरण बन जाता है। सामान्यीकरण होने का अर्थ विभेदन की विफलता होती है। विभेदन की अनुक्रिया किसी भी प्राणी को विभेदक क्षमता या विभेदन के अधिगम का महत्त्व समझा देता है।

प्रश्न 8.
अधिगम अंतरण कैसे घटित होता है?
उत्तर:
अधिगम अंतरण को प्रशिक्षण अंतरण भी माना जाता है। इसके अंतर्गत नए अधिगम पर पूर्व अधिनियम के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। अधिगम अंतरण पर आधारित एक रोचक प्रयोग दो भाषाओं (माना अंग्रेजी और फ्रांसीसी) के सीखने के लिए दो समूहों का चयन किया जाता है। प्रतिभागियों के एक समूह को प्रायोगिक दशा के लिए तथा दूसरे समूह को नियंत्रित दशा के लिए निर्धारित कर लिया जाता है। प्रायोगिक दशा वाले प्रतिभागियों को एक वर्ष का समय अंग्रेजी सीखने के लिए दिया जा रहा है जबकि दूसरे नियंत्रक समूह वाले प्रतिभागियों को फ्रांसीसी भाषा सीखने का अवसर दिया जाता है।

एक वर्ष की समाप्ति पर दोनों समूहों के द्वारा अर्जित भाषा-ज्ञान की जाँच की जाती है। एक वर्ष के बाद दूसरे वर्ष में प्रायोगिक समूह को फ्रांसीसी तथा नियंत्रक समूह को अंग्रेजी भाषा सीखने को कहा जाता है। दो वर्ष बीत जाने पर दोनों समूहों को दोनों विषयों के लिए समान समय उपलब्ध होने की बात मानी जाती है। दोनों समूहों को पुनः लब्धांक प्राप्त करना होता है। लब्धांक के आधार पर तया किया जाता है कि किस भाषा को सीखना सरल या कठिन है। अतः उद्दीपकों और अनुक्रियाओं में परस्पर अन्तर लाकर अधिगम की विशिष्टता को पहचानना अधिगम अंतरण के घटित होने का आधार होता है। इसमें समय, स्थिति, विषयों के क्रम, अनुभव एवं सुविधा में अन्तर लाकर सीखने या प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर जुटाता है।

प्रश्न 9.
अधिगम के लिए अभिप्रेरणा का होना क्यों अनिवार्य है?
उत्तर:
अधिगम के लिए अभिप्रेरणा उसे सुगम बनाने वाले कारकों में से एक है। अभिप्रेरणा का सामान्य अर्थ है व्यक्ति को किसी काम के प्रति रुचि जगाना तथा आवश्यक ऊर्जा का संचार करना। प्राणी की एक ऐसी मानसिक एवं शारीरिक अवस्था अभिप्रेरणा के अन्तर्गत आता है जो वांछनीय लक्ष्य या आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए व्यक्ति विशेष को प्रबलता से काम करने की ओर धकेलता है। अधिगम के लिए अभिप्रेरणा का होना निम्न कारणों से अनिवार्य होता है –

  1. अभिप्रेरणा व्यक्ति के अन्दर क्रियाशीलता को बढ़ाता है।
  2. अभिप्रेरणा हमारे व्यवहार का चयन करने में मदद करता है।
  3. अभिप्रेरणा किसी व्यक्ति के व्यवहार में सुधार लाता है।
  4. अभिप्रेरणा लक्ष्य की प्राप्ति की ओर व्यक्ति की रुचि जगाता है।
  5. अभिप्रेरणा किसी व्यक्ति को प्रबलन की महत्ता को सीखाता है।
  6. अभिप्रेरणा से व्यक्ति में श्रम करने की योग्यता तथा कुछ खोजने की प्रवृत्ति जगाता है।

अर्थात् किसी भी व्यक्ति की दक्षता को बढ़ाने के लिए सुरक्षा की समझ देने, लक्ष्य, प्रयास, परिणाम की वास्तविकता को समझना अभिप्रेरणा से संभव है। इसी कारण अभिप्रेरणा एक अनिवार्य कारक के रूप में सर्वप्रिय है।

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प्रश्न 10.
अधिगम के लिए तत्परता के विचार का क्या अर्थ है?
उत्तर:
तत्परता का साधारण अर्थ इच्छाशक्ति अथवा किसी काम के प्रति अनुराग का प्रदर्शन है। यदि कोई व्यक्ति किसी काम को पूरा कर लेने पर संतोष व्यक्त करता है अथवा अवसर पाकर काम को पूरा करने हेतु तैयार हो जाता है ता माना जाता है कि उस व्यक्ति के द्वारा तत्परता दिखाई जा रही है। प्राणियों की विभिन्न प्रजातियों में अपनी संवेदना क्षमताओं तथा अनुक्रिया करने के लिए परम लक्ष्य होता है वही दूसरों के लिए निरर्थक माना जाता है। प्राणियों के लिए उद्दीपक-उद्दीपक (S-S) अथवा उद्दीपक-अनुक्रिया (S-R) का मान साहचर्य को स्थापित करने की दृष्टि से अलग-अलग होती है।

रुचि, क्षमता, लगन, दक्षता, कुशलता आदि में से प्रत्येक मामले में सभी प्राणियों की दशा अलग-अलग होती है। सीखने की दृष्टि से यदि तत्परता पर ध्यान देने की बात चले तो स्पष्ट होगा कि सीखे जानेवाले वैसे कार्य या विषय तथा अवश्यकता या रुचि के प्रतिकूल कार्य या विषय के बीच व्यवहार में भारी अन्तर प्रकट होता है। इच्छा शक्ति और लक्ष्य के अनुकूल कार्य सरलता से अच्छे परिणाम के साथ पूरे किये जाते हैं जबकि लक्ष्यहीन कार्य कठिनाई से एवं अनियमित ढंग से किसी तरह पूर्णता तक पहुँचा दिये जाते हैं।

ईंट ढोने को यदि उदाहरण माना जाय तो यदि तत्परता के साथ ईंट लाया जाएगा तो वह पूर्व आकार में रहेंगे तथा सजाकर रखे जाएँगे लेकिन यदि तत्परता का अभाव होगा तो टूटी-फूटी ईंटों का एक बेडौल ढेर देखने को मिलेगा। दोनों हालतों में पूर्व स्थान से ईंट को हटाने का कार्य पूरा कर लिया गया प्रतीत होता है। अतः तत्परता किसी व्यक्ति की कार्यकुशलता को बढ़ाती भी है तथा अच्छे परिणाम को पाने के लिए प्रेरित भी करती है। तत्परता के साथ किसी विषय को सीखना भी सरल हो जाता है तथा तत्परता के साथ सीखा गया विषय स्थायी भी होता है।

प्रश्न 11.
संज्ञानात्मक अधिगम के विभिन्न रूपों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम को मनोवैज्ञानिक अधिगम का मूल माना जाता है। इसमें कार्यकलापों की जगह ज्ञान में परिवर्तन लाने का प्रयास शामिल है। संज्ञानात्मक अधिगम को दो विभिन्न रूपों में बाँटकर अध्ययन किया जाता है –
(क) अंतर्दृष्टि अधिगम और
(ख) अव्यक्त अधिगम।

(क) अंतर्दृष्टि अधिगम:
अंतर्दृष्टि से ऐसी प्रक्रिया का बोध होता है जिसके द्वारा किसी समस्या का समाधान एकाएक प्रकट हो जाता है। अंतर्दृष्टि अधिगम की व्याख्या अनुबंधन के आधार पर सरलता से नहीं की जा सकती है किन्तु इसका सामान्योकरण अन्य मिलती हुई समस्याओं की परिस्थितियों में हो सकता है। अंतर्दृष्टि अधिगम में अचानक समाधान प्राप्त होना अनिवार्य है। इसे सत्य प्रमाणित करने के लिए कोहलर ने चिम्पैंजी को माध्यम बनाकर प्रयोग को पूरा किया।

उन्होंने एक भूखे चिम्पैंजी को एक बड़े बंद खेल क्षेत्र में डाल दिया। वह भूखा था लेकिन भोज्य पदार्थ उसकी पहुँच से बाहर रख दी गई थी। बन्द क्षेत्र में बक्सा तथा छड़ी रख दिया गया। भूखा होने के कारण चिम्पैंजी भोज्य पदार्थ प्राप्त करने के लिए प्रयास करने लगा। शीघ्र ही चिम्पैंजी ने बक्सा तथा छड़ी अपने अधीन कर लिया।

वह बक्सा पर चढ़कर छड़ी की सहायता से बार-बार रोटी गिराने का प्रयास करने लगा। चिम्पैंजी अब बक्सा पर चढ़कर छड़ी से रोटी गिराना सीख चुका था। चिम्पैंजी, अब बन्द किये जाने पर तुरंत रोटी को गिरा कर खा लेता था। किसी प्रयोग से परिणाम की प्राप्ति नहीं होने पर अचानक निष्कर्ष को पाकर प्रयोगकर्ता काफी खुश होता है। सिंचाई के लिए परेशान किसान हठात् की वर्षा पाकर खुश हो जाता है। संज्ञानात्मक अधिगम में साधन और साध्य के बीच एक संबंध का होना प्रतीत होता है।

(ख) अव्यक्त अधिगम:
अव्यक्त अधिगम की प्रमुख विशेषता के रूप में माना जाता है कि इसमें एक नया व्यवहार सीख लिया जाता है, किन्तु व्यवहार दर्शाया नहीं जाता है। अपवर्त्य अधिगम से संबंधित एक प्रयोग टॉलमैन के द्वारा किया गया। टॉलमैन ने चूहों के दो समूहों को भूल-भुलैया नामक कक्ष में छोड़ दिया। चूहों के एक समूह को भोज्य पदार्थ की स्थिति ज्ञात थी लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता अज्ञात था। भोजन की लालच में चूहा बहुत भटका। कई अंधपथों में आगे बढ़कर लौट आया।

लेकिन अंत में वह भोज्य पदार्थ तक पहुँच ही गया। बार-बार किये गये प्रयास का फल उसे प्राप्त हो गया। अब वह आसानी से कम समय में द्वार से भोजन तक का रास्ता बिना भटके दौड़कर पूरा कर लेता है। दूसरा चूहा कुछ नहीं जानता था फिर भी वह पहले चूहा की तरह रास्ता तय करने लगा। प्रस्तुत प्रयोग के माध्यम से टॉलमैन अपनी खोज का एक निष्कर्ष निकाला जिसके अनुसार चूहों ने अपने अव्यक्त अधिगम के सहारे भोज्य पदार्थ तक पहुँचने का मार्ग चुन लिया। वह किस प्रकार रास्ता का सही अंदाज लगाया यह अव्यक्त ही रहा। अर्थात् अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उन्हें, जिन दिशाओं और स्थानिक अवस्थितियों की आवश्यकता भी उनका मानस चित्रण किया।

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प्रश्न 12.
अधिगम अशक्तता वाले छात्रों की पहचान हम कैसे करते हैं?
उत्तर:
अधिगम अशक्तता वाले छात्रों की पहचान हम निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर करते हैं –

  1. अधिगम अशक्तता वाले छात्रों को अक्षरों, शब्दों तथा वाक्यांशों को लिखने-पढ़ने में कठिनाई होती है।
  2. इस श्रेणी के बच्चे सीखने के लिए कोई मनपसन्द योजना अथवा तरीका खोजने में लगभग अक्षम होते हैं।
  3. ये किसी एक विषय पर देर तक ध्यान केन्द्रित नहीं रख पाते हैं।
  4. ये विभिन्न आवश्यक सामानों को अनवरत रूप से इधर-उधर हटाते रहते हैं।
  5. इन्हें पेशीय समन्वय तथा हस्तनिपुणता प्रकट करने में कठिनाई होती है।
  6. ये बच्चे काम करने के मौखिक अनुदेशों को समझने और अनुसरण करने में असफल होते हैं।
  7. सामाजिक संबंधों का मूल्यांकन करने में इनसे भूल हो जाया करती है।
  8. भाषा सीखने एवं समझने में भी ये अक्षम होते हैं।
  9. इनमें प्रात्यक्षिक विकार (दृष्टि, श्रवण, स्पर्श, ध्वनि, गति) भी पाए जाते हैं।
  10. इनमें पठन वैकल्प के लक्षण पाए जाते हैं। अर्थात् ये शब्दों को वाक्यों के रूप में संगठित करने में अपेक्षाकृत अक्षम होते हैं।

अतः अस्वाभाविक स्वभाव तथा शारीरिक गठन की तुलना में मानसिक दुर्बलता का पाया जाना, अधिगम, अशक्तता वाले छात्रों की पहचान है।

Bihar Board Class 11 Psychology अधिगम Additional Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्राचीन अनुबंधन का सबसे प्रमुख लक्षण क्या है?
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधन में अधिगम की स्थिति में दो उद्दीपकों के बीच साहचर्य स्थापित होता है।

प्रश्न 2.
सहकालिक अनुबंधन किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब अनुबंधन तथा अननुबंधित उद्दीपक साथ-साथ प्रस्तुत किए जाते हैं तो इसे सहकालिक अनुबंधन कहा जाता है।

प्रश्न 3.
दो परिवर्तनों का उदाहरण दीजिए जो अधिगम नहीं माने जाते हैं।
उत्तर:

  1. अत्यधिक शराब पीकर लड़खड़ाते हुए चलना।
  2. आँख में धूलकण के चले जाने से कुछ भी देख पाने में असमर्थता व्यक्त करना।

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प्रश्न 4.
अधिगम की तीन विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:

  1. अधिगम में सदैव किसी-न-किसी तरह का अनुभव सम्मिलित रहता है।
  2. अधिगम के कारण व्यवहार में होनेवाले परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं।
  3. अधिगम एक अनुमानित प्रक्रिया है और निष्पादन से भिन्न है।

प्रश्न 5.
युग्मित सहचर अधिगम का उपयोग बतावें।
उत्तर:
युग्मित सहचर अधिगम (वाचिक अधिगम) विधि का उपयोग मातृभाषा (हिन्दी) के शब्दों के किसी विदेशी भाषा (अंग्रेजी) के पर्याय सीखने में किया जाता है।

प्रश्न 6.
क्रमिक अधिगम का संबंध किस प्रकार की जिज्ञासा से है?
उत्तर:
क्रमिक अधिगम (वाचिक अधिगम) का उपयोग यह जानने के लिए किया जाता है कि प्रतिभागी किसी शाब्दिक एकांशों की सूची को किस तरह सीखता है और सीखने में कौन-कौन-सी प्रक्रियाएँ अपनायी जाती हैं।

प्रश्न 7.
वर्ग गुच्छन किसे कहा जाता है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक वॉसफील्ड ने पुनः स्मरण विधि को समझने के लिए साठ शब्दों से चार समूहों में रखा। नाम, पशु, पेशा तथा सब्जी से जुड़े शब्दों को अलग-अलग वर्गों में रखा गया। प्रतिभागियों के द्वारा पुनः स्मरण विधि के क्रम में बतलाये गये शब्द समूहों को वॉसफील्ड ने ‘वर्ग गुच्छन’ कहा।

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प्रश्न 8.
संप्रत्यय क्या है?
उत्तर:
संप्रत्यय एक श्रेणी है, जिसका उपयोग अनेक वस्तुओं अथवा घटनाओं (पशु, फल, भवन, भीड़) के लिए किया जाता है। संप्रत्यय के उदाहरण वे वस्तुएँ, व्यवहार या घटनाएँ होती हैं जिनमें समान विशेषताएँ हों।

प्रश्न 9.
कौशल का सामान्य परिचय क्या है?
उत्तर:
किसी जटिल कार्य को आसानी से और दक्षता से करने की योग्यता कर्ता का कौशल कहलाता है। अभ्यास और अनुभव के आधार पर कौशल की मर्यादा रखी जाती है, जैसे, जहाज, कार चलना, रेडियो बजाना, मोबाइल से संदेश भेजना आदि।

प्रश्न 10.
कौशल अर्जन के प्रमुख चरण क्ग हैं?
उत्तर:
फिट्स के अनुसार संज्ञानात्मक, साहचर्यात्मक तथा स्वायन से सम्बोधिर चरणों में मानसिक क्रिया द्वारा कौशल ग्रहण किया जाता है।

प्रश्न 11.
अधिगम अंतरण का दूसरा नाम क्या हो सकता है?
उत्तर:
अधिगम अंतरण को प्रायः प्रशिक्षण अंतरण या अंतरण प्रभाव कहा जाता है।

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प्रश्न 12.
अधिगम को सुगम बनाने वाले प्रमुख कारक क्या हैं?
उत्तर:
अधिगम को सुगम बनानेवाले कारकों में अभिप्रेरणा तथा प्राणी की तत्परता प्रमुख है।

प्रश्न 13.
अधिगम शैलियाँ किस प्रकार व्युत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
अधिगम शैलियाँ मुख्यतः प्रात्यक्षिक प्रकारता, सूचना प्रक्रमण तथा व्यक्तित्व प्रतिरूप से व्युत्पन्न होता है।

प्रश्न 14.
संबंधनात्मक शैली और विश्लेषणात्मक शैली में कार्यान्मुख क्षेत्र की दृष्टि से अन्तर बतावें।
उत्तर:
संबंधात्मक शैली अशैक्षणिक क्षेत्रों में अधिक कार्योन्मुख होते हैं जबकि विश्लेषणात्मक शैली शैक्षणिक संदर्भ में अधिक कार्यान्मुख होते हैं।

प्रश्न 15.
अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का उपचार संभव है या नहीं?
उत्तर:
उपचारी अध्ययन विधि के उपयोग से बहुत लाभ होता है। शिक्षा मनोवैज्ञानिकों के शिक्षण विधियों से अधिकांश लक्षणों को हटाया जा सकता है।

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प्रश्न 16.
स्किनर ने अपना प्रयोगात्मक अध्ययन किस पर किया था?
उत्तर:
स्किनर ने अपना प्रयोगात्मक अध्ययन कबूतर और चूहा पर किया था।

प्रश्न 17.
स्किनर के साधनात्मक अनुकूलन में सीखने का आधार क्या है?
उत्तर:
स्किनर के साधनात्मक अनुकूलन में सीखने का आधार प्रवर्तन व्यवहार (Operant behaviour) है।

प्रश्न 18.
अननुबंधित उद्दीपकों के दो प्रकारों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. प्रवृत्यात्मक तथा
  2. विमुखी।

प्रश्न 19.
नैमित्तिक अनुबंधन के दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर:

  1. माँ के द्वारा छिपाकर रखे गये मिठाई के डिब्बे को खोज लेना।
  2. रेडियो, टी.वी. आदि को चलाना।

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प्रश्न 20.
धनात्मक एवं ऋणात्मक प्रबलन के उपयोगों को बतावें।
उत्तर:
धनात्मक प्रबलन का परिणाम सुखद होता है क्योंकि धनात्मक प्रबलक आवश्यकताओं (भोजन, पानी, प्रशंसा, प्रतिष्ठा) की पूर्ति करता है। ऋणात्मक प्रबलक अप्रिय एवं पीड़ादायक उद्दीपक होते हैं। ऋणात्मक प्रबलक के प्रभाव के रूप में सर्दी, चिन्ता, रोग, दुर्घटना, दण्ड आदि मिलते हैं।

प्रश्न 21.
आंशिक प्रबलन की एक विशेषता बतावें।
उत्तर:
आंशिक प्रबलन. सतत प्रबलन की अपेक्षा में विलोप के प्रति ज्यादा विरोध पैदा करता है।

प्रश्न 22.
निष्पादन पर विलम्ब का केसा प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
विलम्ब स निष्पादन का स्तर निकृष्ट हो जाता है।

प्रश्न 23.
प्रबलक का परिचय दें।
उत्तर:
प्रबलक वे उद्दीपक होते हैं जो अपने पहले घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर या संभावना को बढ़ा देते हैं।

प्रश्न 24.
प्रबलकों के नियमित उपयोग से क्या लाभ मिलता है?
उत्तर:
प्रबलकों के नियमित उपयोग से वांछित अनुक्रिया प्राप्त हो सकती है।

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प्रश्न 25.
अधिगम और विलोप का पारस्परिक आचरण क्या है?
उत्तर:
अधिगम की प्रक्रिया विलोप का प्रतिरोध प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 26.
सामान्यीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब एक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण कहते हैं। सामान्यीकरण होने का तात्पर्य विभेदन की विफलता है।

प्रश्न 27.
प्रेरणात्मक अधिगम को सामाजिक अधिगम कहलाने का कारण क्या है?
उत्तर:
प्रेरणात्मक अधिगम में व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों को सीखता है इसी कारण इसे सामाजिक अधिगम भी कहा जाता है।

प्रश्न 28.
स्वतः पुनः प्राप्ति की स्थिति कब आती है?
उत्तर:
स्वतः पुनः प्राप्ति किसी अधिगत अनुक्रिया के विलोप होने के बाद होती है।

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प्रश्न 29.
संज्ञानात्मक अधिगम की प्रमुख विशेषता क्या है?
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम में सीखने वाले व्यक्ति के कार्य-कलापों की बजाय उसके ज्ञान में परिवर्तन आता है।

प्रश्न 30.
अंतर्दृष्टि अधिगम किसे कहते हैं?
उत्तर:
अंतर्दृष्टि ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी समस्या का समाधान एकाएक (हठात्) स्पष्ट हो जाता है।

प्रश्न 31.
अव्यक्त अधिगम से संबंधित एक मनोवैज्ञानिक का नाम बतावें जो भूल-भुलैया और चूहा को प्रयोग का आधार बनाया था?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक टॉलमैन ने अव्यक्त अधिगम के संप्रत्यय को अपना प्रारम्भिक योगदान दिया।

प्रश्न 32.
वाचिक अधिगम की प्रक्रिया के अध्ययन में मनोवैज्ञानिक किस प्रकार की सामग्रियों का उपयोग कर रहे हैं?
उत्तर:
निरर्थक शब्दांश, परिचित शब्द, वाक्य, अनुच्छेद आदि।

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प्रश्न 33.
सामाजिक शिक्षण क्या है?
उत्तर:
समाज में रहकर सामाजिक नियमों के अनुसार व्यावहारिक जीवन के नियमों को सीखना ही सामाजिक शिक्षण कहलाता है।

प्रश्न 34.
अनुबंधन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अनुबंधन का अर्थ साहचर्य द्वारा सीखना होता है।

प्रश्न 35.
अधिगम के सिद्धान्तों का अनुप्रयोग बतावें।
उत्तर:
अधिगम के सिद्धान्तों का अनुप्रयोग संगठन, कुसमायोजित प्रतिक्रियाओं के उपचार, बच्चों का पालन-पोषण तथा विद्यालय अधिगम के लिए किया जाता है।

प्रश्न 36.
मनोविश्लेषण का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
मनोचिकित्मा की एक विधि जिससे मनोचिकित्सक दमित अचेतन सामग्री को सचेतन स्तर पर लान का प्रयास करता हैं मनोविश्लेषण कहलाता है।

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प्रश्न 37.
पॉवलव ने अपना प्रयोग किस पर किया था?
उत्तर:
पॉवलव ने अपना प्रयोग भूखे कुत्ते पर किया था।

प्रश्न 38.
पॉवलव ने शिक्षण के संबंध में क्या कहा है?
उत्तर:
पॉवलव ने शिक्षण के संबंध में कहा है कि “सीखना और कुछ नहीं बल्कि संबंध प्रत्यावर्तन की एक लम्बी शंखला मात्र है।”

प्रश्न 39.
पॉवलव ने सीखने का आधार क्या बताया?
उत्तर:
पॉवलव ने सीखने का आधार संबंध प्रत्यावर्तन को बताया जिसमें प्राणी अनुबंधित अनुक्रिया करना सीखता है।

प्रश्न 40.
पॉवलव के प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपक क्या था?
उत्तर:
पॉवलव के प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपक मांस था।

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प्रश्न 41.
पॉवलव के सिद्धान्त एवं स्किनर के सिद्धान्त में मुख्य अन्तर क्या है?
उत्तर:
पॉवलव ने प्रत्यार्थी व्यवहार (Respondent behaviour) को सीखने का आधार माना जबकि स्किनर ने प्रवर्तक व्यवहार (Operant behaviour) को सीखने का आधार माना है।

प्रश्न 42.
संबंध प्रत्यावर्तन सिद्धान्त का प्रतिपादन किस मनोवैज्ञानिक ने किया?
उत्तर:
संबंध प्रत्यावर्तन सिद्धांत का प्रतिपादन रूस के एक महान मनोवैज्ञानिक पॉवलव ने किया।

प्रश्न 43.
अनुबंध या संबंध के सिद्धांत कौन-कौन हैं?
उत्तर:
अनुबंध या संबंध के दो प्रमुख सिद्धांत हैं, जो इस प्रकार हैं –

  1. प्राचीन अनुबंध या संबंध का सिद्धान्त
  2. साधनात्मक अनुबंध या संबंध का सिद्धान्त

लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
प्रेक्षणात्मक अधिगम का स्वरूप एवं उपयोग बतायें।
उत्तर:
प्रेक्षणात्मक अधिगम दूसरों के द्वारा किये जाने वाले कार्यों के लिए अपनायी जाने वाली विधियों का प्रेक्षण का व्यावहारिक परिणाम हैं। इसके अन्तर्गत अनुकरण, सामाजिक अधिगम तथा मॉडलिंग की प्राथमिकता मिली हुई है।

1. अनुकरण:
दूसरों की क्रिया-विधियों की नकल करना, अनुकरण माना जाता है। जैसे, आँख बन्द करके चलना एक अंधे का अनुकरण करने का प्रयास है।

2. सामाजिक अधिगम:
प्रेक्षणात्मक अधिगम में व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों (अतिथि सत्कार, पूजा-विधि, विवाह पद्धति) को सरलता से सीखता है। इसी कारण इस अधिगम को सामाजिक अधिगम भी कहा जाता है।

3. मॉडलिंग:
मॉडलिंग को स्वांग भरना भी कह सकते हैं। बुढ़िया की तरह खाँसना झुककर चलना, बन्दरवाला बनकर डमरू बजाना, टैम्पूवाला बनकर एक सवारी एक सवारी चिल्लाना आदि मॉडलिंग के विभिन्न रूप हैं जो किसी अन्य की तरह व्यवहार करने के रूप में प्रकट होता है।

प्रेक्षणात्मक अधिगम की उपयोगिता:

1. सीखना:
समाज में रहनेवाले तरह-तरह के व्यक्तियों की कार्य-विधियों को देखकर हम भी वैसा कार्य करना सीख लेते हैं। जैसे-रीमोट चलाना, रेडियो बजाना, कुएँ से पानी खींचना अदि।

2. व्यवसाय की प्रगति:
विज्ञापन के माध्यम से प्रभावकारी हस्तियों के द्वारा उत्पादन का व्यवहार करते हुए दिखाकर उत्पादन की खपत बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।

3. अच्छी आदतों से परिचय:
बड़ों को टहलते, व्यायाम करते, व्यायाम करते, चबा-चबाकर खाते, देखकर बच्चे भी टहलने, व्यायाम करने, भोजन ग्रहण करने तथा समय पर सोने-जगने की आदत अपनाने लगते हैं।

4. पर्व-त्योहारों का सम्मान:
दीपावली में दीपों को सजाने, होली में रंग-अबीर का प्रयोग करने, आरती करने तथा शिक्षक दिवस पर शिक्षकों का आदर-सम्मान देने संबंधी आचरण का ज्ञान प्रेक्षणात्मक अधिगम से सरल हो जाता है।

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प्रश्न 2.
प्राचीन अनुबंधन के प्रमुख कारकों का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
प्राचीन अनुबंधों के अन्तर्गत समय और कार्य-स्तर की दृष्टि से कई कारकों के द्वारा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाये जाते हैं। कुछ प्रमुख कारक निम्न वर्णित हैं –

1. उद्दीपकों के बीच समय-संबंध:
अनुबंधित उद्दीपक और अननुबंधित उद्दीपकों की शुरूआत के बीच समय संबंध पर प्राचीन अनुबंधन प्रक्रियाएँ आधारित होती हैं। प्राचीन अनुबंधन प्रक्रियाएँ मुख्यत: चार प्रकार की होती हैं जिनमें से प्रथम तीन प्रक्रियाएँ अग्रवर्ती अनुबंधन की है तथा चौथी प्रक्रिया पश्चगामी अनुबंधन की है।

(क) सहकालिक अनुबंधक:
जब अननुबंधित तथा अनुबंधित उद्दीपक के साथ-साथ प्रस्तुत किए जाते हैं।

(ख) विलंबित अनुबंधन:
जब अनुबंधित उद्दीपक का प्रारम्भ और अन्त दोनों अननुबंधिक उद्दीपक के पहले होता है।

(ग) अवशेष अनुबंधन:
इस प्रक्रिया में भी अनुबंधित का प्रारम्भ और अंत अननुबंधित उद्दीपक से पहले होता है। किन्तु दोनों के बीच कुछ समय अंतराल होता है।

(घ) पश्चगामी अनुबंधन:
इस प्रक्रिया में अननुबंधित उद्दीपक का प्रारम्भ अनुबंधित उद्दीपक के पहले होता है। इन चारों प्रक्रियाओं में से पश्चगामी अनुबंधन प्रक्रिया प्राप्त होने की सम्भावना बहुत ही कम होती है।

2. अननुबंधित उद्दीपकों के प्रकार:
अननुबंधित उद्दीपक दो प्रकार के होते हैं –

(क) प्रवृत्यात्मक:
यह स्वतः सुगम्य अनुक्रियाएँ उत्पन्न करती है।

(ख) विमुखी अनुबंधित उद्दीपक:
ये परिहार तथा पापन की अनुक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं जो दुखदायी और क्षतिकारक होते हैं।

3. अनुबंधित उद्दीपकों की तीव्रत:
अनुबंधित उद्दीपक जितना अधिक तीव्र होगा उतने ही कम प्रयासों की आवश्यकता अनुबंधन की प्राप्ति के लिए करना होता है।

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प्रश्न 3.
प्रमुख अधिगम प्रक्रियाओं का सामान्य परिचय दें।
उत्तर:
प्रमुख अधिगम प्रक्रियाएँ निम्न वर्णित हैं –

1. प्रबलन:
किसी प्रयोगकर्ता के द्वारा प्रबलक देने की प्रक्रिया को प्रबलन कहते हैं जहाँ प्रबलक के उद्दीपक अपने पहले घटित होने वाली अनुक्रियाओं की दर को बढ़ा देते हैं। एक धनात्मक प्रबलक प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है। जबकि ऋणात्मक प्रबलक स्वयं को हटाकर अनुक्रियाओं की दर को बढ़ा देते हैं। एक प्राथमिक प्रबल प्राणी के जीवन का निर्धारक होता है। जबकि द्वितीयक प्रबलक पर्यावरण और प्राणी के बीच के सम्बन्ध को बतलाती है। प्रबलकों के नियमित उपयोग से वांछित अनुक्रिया प्राप्त हो सकती है।

2. विलोम:
प्रबलन को हटा लेने के परिणामस्वरूप अधिगत अनुक्रिया के लुप्त होने को विलोप कहते हैं। इसमें सीखे हुए व्यवहार को भी लुप्त होना देखा जा सकता है। अधिगम की प्रक्रिया विलोप का प्रतिरोध प्रदर्शित करती है। सीखते समय प्रबलित प्रयासों की संख्या बढ़ने के साथ विलोप का प्रतिरोध बढ़ता है।

3. सामान्यीकरण:
समान उद्दीपकों के प्रति समान अनुक्रिया करते सम्बन्धी गोचर को सामान्यीकरण कहते हैं। अतः जब एक सीखी हुई अनुक्रिया की एक नए उद्दीपक से प्राप्ति होती है तो उसे सामान्यीकरण माना जाता है। सामान्यीकरण होने का तात्पर्य विभेदन की विफलता है।

4. विभेदन:
सामान्यीकरण के पूरक के रूप में विभेदन भिन्नता के प्रति अनुक्रिया होती है। विभेदन की अनुक्रिया प्राणी की विभेदन क्षमता यदि भेदन के अधिगम पर निर्भर करता है।

5. स्वतः पुनः प्राप्ति-स्वतः पुनः
प्राप्ति किसी अधिगत के विलोप होने के बाद होती है। उदाहरण एवं प्रयोग के माध्यम से यह पाया गया है कि काफी समय बीत जाने के बाद सीखी हुई अनुबंधित अनुक्रिया का पुनरुद्धार हो जाता है और वह अनुबंधित उद्दीपक के प्रति घटित होती है। स्वतः पुनः प्राप्ति की मात्रा विलोप के बाद बीती हुई समयावधि पर निर्भर करती है। यह अवधि जितनी ही अधिक होती है, अधिगत अनुक्रिया की पुनः प्राप्ति उतनी ही अधिक होती है। इस प्रकार की पुनः प्राप्ति स्वाभाविक रूप से होती है।

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प्रश्न 4.
कृत्रिम संप्रत्यय की विशेषताओं पर आधारित उदाहरणों को व्यक्त करें।
उत्तर:
कृत्रिम संप्रत्यय वे होती हैं जो सुपरिभाषित होते हैं और विशेषताओं को जोड़ने वाले नियम परिशुद्ध और कठोर होते हैं। संप्रत्ययों में जैविक वस्तुएँ, वास्तविक जीवन के उत्पाद तथा मनुष्यों द्वारा बनाई गई विभिन्न कलाकृतियों, जैसे, औजार, कपड़े, मकान आदि सम्मिलित हैं।

प्रश्न 5.
संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों की चर्चा करें।
उत्तर:
संज्ञानात्मक अधिगम में सीखने वाले व्यक्ति के कार्यकलापों की बजाय उसके ज्ञान में परिवर्तन होता है। किसी समस्या का एकाएक समाधान पाना तथा नित्य नया व्यवहार सीखना, कार्य पूरा कर लेने का संकल्प लेना, अनवरत प्रयास के महत्व को समझना आदि संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों से ही संभव हो पाता है। अंतर्दृष्टि अधिगम एवं अव्यक्त अधिगम के द्वारा इसके विस्तृत प्रभावों को समझा जा सकता है। कोहलर के द्वारा चिम्पैंजी पर किये जाने वाले प्रयोग तथा टॉलमैन के द्वारा चूहे और भूल-भुलैया वाले प्रयोग से संज्ञानात्मक अधिगम के प्रभावों का प्रायोगिक अध्ययन किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
वाचिक अधिगम के अध्ययन में प्रयुक्त विधियों के नाम और परिणाम बतावें।
उत्तर:

  1. युग्मित सहचर अधिगम-मातृभाषा के शब्दों के लिए विदेशी शब्द को पर्याय के रूप में सीखना।
  2. क्रमिक अधिगम-किसी समस्या के समाधान के लिए किए जाने वाले प्रयासों को परिणामी प्रक्रम में सजाकर व्यवहार में लाना।
  3. मुक्त पुनः स्मरण-शब्दों को स्थायी रूप से स्मृति में रखने के लिए उनके क्रम को एक संगठन का रूप देना।

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प्रश्न 7.
अनुबंधित अनुक्रिया तथा स्वाभाविक अनुक्रिया में अंतर करें।
उत्तर:
स्वाभाविक अनुक्रिया वैसी अनुक्रिया को कहा जाता है जो स्वाभाविक उद्दीपन funconditioned stimulus) द्वारा उत्पन्न होता है जैसे भोजन देखकर लारस्राव करन में लारस्राव करना एक स्वाभाविक अनुक्रिया है, जो स्वाभाविक रद्दीपन (भोजन) के प्रति किया जा रहा है। अनुबंधित अनुक्रिया वैसी अनुक्रिया को कहा जाता है जो स्वाभाविक उद्दीपन तथा अनुबंधित उद्दीपन में साहचर्य स्थापित होने के बाद प्राणी अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) के प्रति करता है।

जैसे-पॉवलव के प्रयोग में जब कुत्ता मात्र घंटी की आवाज पर घंटी तथा भोजन में साहचर्य स्थापित करने के बाद लारस्राव करने लगता है तब लारस्राव की यह अनुक्रिया अनुबंधित अनुक्रिया का एक उदाहरण है। परंतु यही लारस्ताव प्रारंभ में जब भोजन को देखकर किया जाता था तब उसे स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response) कहा जाता है।

प्रश्न 8.
पुनर्बलन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्राणी के आवश्यकता की पूर्ति जिन वस्तुओं से होती है उसे पुनर्बलन (Reinforce ment) कहा जाता है। पॉवलव के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है क्योंकि भोजन से ही भूख मिट सकती है। पुनर्बलन प्राप्त करने के उद्देश्य से ही प्राणी उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया करने के लिए प्रेरित रहता है। वास्तव में अनुबंधन द्वारा किसी अनुक्रिया को सीखने के लिए पुनर्बलन एक आवश्यक शर्त है जिसका पॉवलव ने अपने प्रयोग में स्पष्टीकरण किया है।

प्रश्न 9.
अविशिष्ट अंतरण से क्या स्पष्ट होता है?
उत्तर:
एक कार्य का सीखना अधिगमकर्ता को अगला कार्य ज्यादा सुविधा से सीखने के लिए स्फूर्ति प्रदान करता है। क्रिकेट खिलाड़ी के खड़े होने की स्थिति तथा परीक्षार्थियों को लिखने के लिए बैठने की विधि के आधार पर लिखने की गति में आने वाले अन्तर को स्फूर्ति परिणाम का कारक मानना अविशिष्ट अंतरण का उदाहरण माना जा सकता है। अर्थात् कोई व्यक्ति एक साथ दो या अधिक कार्यों को सीख सकता है।

प्रश्न 10.
अनुबंधन का अर्थ सोदाहरण बतावें।
उत्तर:
अनुबंधन का अर्थ होता है साहचर्य द्वारा सीखना। जब प्राणी के सामने कोई उद्दीपन, जैसे-भोजन तथा उसके ठीक कुछ पहले एक दूसरा उद्दीपन (stimulus), जैसे-रोशीन (light) दी जाती है और यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है तब प्राणी रोशनी जलते ही यह समझ जाएगा कि भोजन आनेवाला है। इस प्रत्याशा (expectation) में वह ठीक वैसी ही अनुक्रिया करना प्रारंभ कर देता है जो भोजन की वास्तविक उपस्थिति में वह आमतौर पर करता है। इस तरह के सीखना को अनुबंधन कहा जाता है जिसके लिए स्पष्टतः अन्य बातों के अलावा अभ्यास, उद्दीपन आदि का होना अनिवार्य है।

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प्रश्न 11.
अनुबंधित उद्दीपन तथा स्वाभाविक उद्दीपन में अंतर बतावें।
उत्तर:
स्वाभाविक उद्दीपक वैसे उद्दीपन को कहा जाता है जो बिना किसी पूर्व प्रशिक्षण के ही प्राणी में एक स्वाभाविक अनुक्रिया उत्पन्न करता है। जैसे-भोजन देखकर भूखे व्यक्ति के मुँह में लार आने की अनुक्रिया में भोजन एक स्वाभाविक उद्दीपन के साथ बार-बार उपस्थित किए जाने पर कुछ प्रयासों के बाद वह अकेले ही वैसी अनुक्रिया उत्पन्न कर लता है जो स्वाभाविक उद्दीपन द्वारा उत्पन्न किया जाता है।

जैसे-भोजन देने के पहले घंटी बजा दी जाए और यह प्रक्रिया कई प्रयासों में दोहराई जाए तो कुछ देर के बाद मात्र घंटी बजते ही प्राणि लारस्राव की अनुक्रिया करने लगेगा। इस तरह के तटस्थ उद्दीपन (neutral stimulus) को अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) कहा जाता है। अत: इन दोनों में मुख्य अंतर यह है कि स्वाभाविक उद्दीपन बिना प्रशिक्षण के ही अनुक्रिया उत्पन्न करता है, परंतु अनुबंधित उद्दीपन प्रशिक्षण के बाद स्वाभाविक उद्धेपन के समान अनुक्रिया करता है।

प्रश्न 12.
सीखना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सीखने से तात्पर्य व्यवहार में परिवर्तन से होता है, परंतु व्यवहार में हुए सभी तरह के परिवर्तनों को सीखना नहीं कहा जाता है। जैसे-व्यक्ति के व्यवहार में परिपक्वता (maturation) के कारण परिवर्तन हो जाता है, औषधि खा लेने से परिवर्तन आ जाता है, थकान होने से परिवर्तन होता है, आदि-आदि। ऐसे सभी परिवर्तनों को सीखने की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। व्यवहार में केवल उन्हीं परिवर्तनों को सीखना कहा जाता है जो अभ्यास (practice) या अनुभूति (experience) के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। व्यवहार में ऐसे परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थायी (relatively permanent) होते हैं।

प्रश्न 13.
शिक्षण वक्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शिक्षण वक्र एक ऐसा वक्र है जिसके माध्यम से विभिन्न प्रयासों (trials) या अभ्यासों में हुए सीखने की प्रगति या दर को दिखाया जाता है, सामान्यतः सीखने की दर को तीन कसौटियों के रूप में दिखाया जाता है-सीखने की यथार्थता पर परिशुद्धता (accuracy in learning), त्रुटि में कमी (reduction in error) तथा सीखने में लिया गया समय। इससे तीन तरह के शिक्षण वक्रों का निर्माण होता है।

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प्रश्न 14.
शिक्षक वक्र में पठार का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
किसी पाठ या विषय को सीखने की अवधि के बीच में कभी-कभी ऐसा होता है कि अभ्यास जारी रहने के बावजूद सीखने में कोई प्रगति नहीं होती है। फलस्वरूप, ऐसी परिस्थिति में बननेवाला वक्र आधार के समानांतर हो जाता है। शिक्षण वक्र की इस स्थिति को पठार कहा जाता है।

प्रश्न 15.
शाब्दिक सीखना किसे कहा जाता है?
उत्तर:
शाब्दिक सीखना का तात्पर्य शब्दों, अंकों, आकृतियों के. अर्थ को समझकर उसके प्रति विशेष अनुक्रिया करने से होता है। जैसे-यदि कोई व्यक्ति ‘हाथी’ शब्द लिखता-पढ़ता है, तथा उसका अर्थ समझता है तथा उस शब्द का सही उपयोग भी करता है तो यह शाब्दिक सीखना का एक उदाहरण होगा। इस तरह के सीखना में ज्ञानेन्द्रियों (sense organs) की भूमिका शरीर के पेशीय अंगों (motor organs) की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। कविता याद करना शाब्दिक सीखना का एक उदाहरण है।

प्रश्न 16.
संवेदी-पेशीय सीखना का अर्थ बतावें।
उत्तर:
संवेदी:
पेशीय सीखना से तात्पर्य वैसे सीखना से होता है जिसमें शरीर की ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों (motor organs) का संयुक्त योगदान होता है, परंतु कर्मेन्द्रियों या पेशीय अंगों का तुलनात्मक रूप से अधिक सक्रिय योगदान होता है। जैसे-कार चलाना सीखना, टाइप करना सीखना, तैरना सीखना आदि संवेदी-पेशीय सीखना के कुछ उदाहरण हैं। इस तरह के सीखना में कर्मेन्द्रियों अर्थात् हाथ, पैर आदि का योगदान आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों से स्पष्टत: अधिक होता है।

प्रश्न 17.
प्रवर्तन अनुकूलन से आप. क्या समझते हैं?
उत्तर:
स्किनर (Skineer 1938) ने समस्या बॉक्स जैसे जटिल साधनात्मक अधिगम को इतना सरल रूप दिया कि उसे अनुकूल कोटि में रखा जा सकता है। बक्से में एक लीवर लगा था जिसके दबने से भोजन की एक गोली बाहर आती थी। चूहे को बक्से में रखा गया। इधर-उधर घूमने के क्रम में वह लीवर पर चढ़ा। लीवर दबा और भोजन की एक गोली बाहर आयी। इस परिस्थिति से यह स्पष्ट नहीं है कि अनुकूलन उत्तेजक क्या था, लीवर का दृश्य या भोजन को गंध। लीवर दबाना अनुकूलन उत्तेजक थी, भोजन की गोली अनुकूलन और खाना अनुकूलन उत्तेजक थी। स्किनर ने इसी साधनात्मक अधिगम को प्रवर्तन (operant) अनुकूलन कहा है। साधनात्मक एवं प्रवर्तन अनुकूलन में भी भेद है।

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प्रश्न 18.
अभ्यास नियम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अभ्यास नियम का प्रतिपादन थार्नडाइक द्वारा अपने सीखने के सिद्धांत में किया गया। इस नियम के अनुसार सीखने का आधार अभ्यास (exercise) होता है। इस नियम के दो उपनियम हैं-उपयोग नियम (law of use) तथा अनुपयोग नियम (law of disuse)। उपयोग नियम के अनुसार जब किसी अनुक्रिया को प्राणी बार-बार दोहराता है तब उसे वह करना सीख लेता है। अनुपयोग नियम के अनुसार जब प्राणी किसी अनुक्रिया को बार-बार नहीं दोहराता है तब वह उसे सीख नहीं पाता है। जैसे-यदि कोई व्यक्ति मात्र एक या दो बार टाइप करने का प्रयास करता है, तो वह टाइप करना नहीं सीख पाएगा।

प्रश्न 19.
प्रभाव नियम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्रभाव नियम का प्रतिपादन थार्नडाइक द्वारा अपने सीखने के सिद्धान्त में किया गया। इस नियमं द्वारा यह पता चलता है कि प्राणी किसी अनुक्रिया को उस अनुक्रिया से उत्पन्न प्रभाव के आधार पर सीखता है। अनुक्रिया करने के बाद यदि उसे संतुष्टि (satisfaction) होती है तो वह उस अनुक्रिया को बार-बार दोहराता है और उसे सीख लेता है। परंतु, यदि उसे अनुक्रिया करने के बाद खीझ (annoyance) होती है तो वे उसे दोहराता नहीं है और उसे नहीं सीख पाता है। थार्नडाइक के प्रयोग में भूखी बिल्ली दरवाजा खोलने की अपक्रिया को इसलिए सीख जाती है, क्योंकि दरवाजा खोलने के बाद उसे भोजन मिलता था जिसे खाकर वह संतुष्ट हो जाती थी।

प्रश्न 20.
अधिगम (सीखने) की परिभाषा दें।
उत्तर:
“सीखना” बहुत व्यापक शब्द है, इस मानसिक प्रक्रिया की अभिव्यक्ति व्यवहार के सहारे होती है। सीखने से प्राणी के व्यवहार में परिवर्तन या परिमार्जन होता है। सीखने में व्यवहार में जो परिवर्तन होता है, वह अनुभव या अभ्यास पर आधारित होता है और उससे समायोजन में सहायता मिलती है। मॉर्गन और गिलीलैंड ने सीखने की परिभाषा इस प्रकार दी है-“सीखना अनुभव के परिणाम स्वरूप जीव के व्यवहार में कुछ परिमार्जन है जो कम-से-कम कुछ समय के लिए भी जीव द्वारा धारण किया जाता है।” उपरोक्त परिभाषा में निहित तथ्य इस प्रकार है –

  1. सीखने से व्यवहार में परिवर्तन होता है।
  2. सीखा हुआ व्यवहार कुछ समय तक व्यक्ति के व्यवहार में स्थायी रूप से बना रहता है।
  3. सीखा हुआ व्यवहार अचानक नहीं होता है। यह अनुभव अथवा अभ्यास पर आधारित होता है।
  4. सीखने के पीछे अभिप्रेरण कार्य करता है।
  5. सीखा हुआ व्यवहार का मापन संभव है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
सीखने में अनुप्रेरणा (motivation) के प्रभाव का वर्णन करें। अथवा, सीखने में अभिप्रेरणा (motivation) की भूमिका स्पष्ट करें।
उत्तर:
सीखने की क्रिया में तीन तत्व संयुक्त होते हैं, जिन्हें हम इस प्रकार कह सकते हैं –

  1. मनोवैज्ञानिक तत्व
  2. शारीरिक तत्व तथा
  3. वातावरण-सम्बन्धी तत्व। मनोवैज्ञानिक तत्व को हम सीखने में ‘अनुप्रेरणा’ (Motivation) कहते हैं।

सीखना प्राणी की वह क्रिया होती है, जिसके द्वारा वह अपने पर्यावरण से प्रतिक्रिया करता है। सीखने वाले के अन्दर क्रिया को हम प्रेरणा के द्वारा ही उत्पन्न करते हैं। उत्तेजना, रुचि, उद्देश्य इत्यादि अनुप्रेरण के विभिन्न रूपों पर बल देते हैं। ‘प्रेरणा’ ही सीखने की क्रिया का मूल तत्व है। अनुप्रेरणा ही बालक को क्रियाशील बनाती है, प्रतिक्रिया, रुचि, प्रयत्न आदि के परिणाम हैं। जिन्हें शिक्षक पसन्द करता है और यह विद्यार्थियों के लिए भी लाभदायक होते हैं। ये सब अनुप्रेरण से ही जन्म लेते हैं।

शिक्षा में अनुप्रेरणा वह कला है जो बालक के अन्दर रुचि उत्पन्न करती है। जब भी बालक किसी कार्य या वस्तु में रुचि अनुभव नहीं करता, अनुप्रेरणा द्वारा रुचि को उसमें जाग्रत किया जा सकता है। स्वीकृत व्यवहार को जाग्रत करना, बनाये रखना तथा निर्देशन देना विद्यमान की शिक्षा में प्रेरणा का ही कार्य है। व्यक्ति की प्रत्येक क्रिया जो किसी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहती है, अनुप्रेरणात्मक होती है। चूँकि सभी प्रकार सीखना एक विशेष लक्ष्य रखता है, इसलिए सभी प्रकार का सीखना एक अनुप्रेरित क्रिया होती है।

उत्तेजना की तीव्रता, लक्ष्यों को देखने, विविधता आदि सीखने की क्रिया के प्रभावोत्पादन में अन्तर उत्पन्न करते हैं। अध्यापक का कर्तव्य है कि वह बालकों को अनुप्रेरणा द्वारा सीखने को प्रोत्साहित करें। सीखने की क्रिया के अन्तर्गत अनुप्रेरकों और लक्ष्यों का बुद्धिसंगत योग होता है जो अनुकूल और आनुपातिक वातावरण का निर्माण करता है, संवेगात्मक रुचि उत्पन्न करता है और बालकों के अन्दर संतोष की भावना करता है।

सीखने की क्रिया में अनुप्रेरकों के तीन कार्य (Three functions of Motives in Learming process):
मेटल के मतानुसार, अनुप्रेरक सीखने की क्रिया में तीन कार्य करते हैं। वे इस प्रकार हैं –

1. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार को शक्तिशाली बनाते हैं (Motives Energise Behaviour):
अनुप्रेरक शक्ति का वर्द्धन करते हैं, जिससे हमारे अन्दर क्रियाशीलता उत्पन्न होती है। इस प्रकार भूख तथा प्यास भी हमारे अन्दर मांसपेशिक तथा ग्रन्थिक (Musculars and Glandular) प्रतिक्रिया होती है। प्रशंसा, आरोप, पुरस्कार, दण्ड आदि शक्तिशाली उत्तेजक हैं, जो हमारे बहुत-से कार्य को प्रभावित करते हैं। ये हमें किसी विशेष दिशा की ओर कार्य करने को बाध्य करते हैं और सीखने की क्रिया में सहायक होते हैं।

2. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार को चुनने वाले होते हैं (Motives are selector of behaviour):
प्रेरक व्यक्ति की किसी उत्तेजना-विशेष के प्रति प्रतिक्रिया करने के लिए उत्तेजित करते हैं.और दूसरी वस्तुओं के प्रति अवहेलना। वे यह भी बताते हैं कि किसी अवस्था-विशेष में व्यक्ति किस प्रकार या करेगा। यदि एक समाचार पत्र विभिन्न व्यक्ति को दिया जाय तो हर व्यवि उसी खण्ड को गढ़ेगा जिसके लिए उसे अनुप्रेरणा प्राप्त है। उदाहरण के लिए, बेरोजगा व्यक्ति आवश्यकता पप्बन्धी खण्ड को ध्यान से देखेगा और बहुत-सी आवश्यकताओं को याद कर लेगाः सके विपरीत एक खिलाड़ी खेल के समाचार की ओर अधिक आकृष्ट होगा।

3. अनुप्रेरक हमारे व्यवहार का संचालन करते हैं (Motive Direct Our Behaviour):
अनुप्रेरक केवल व्यवहार को सुनते ही नहीं वरन् उनका संचालन भी करते हैं। वह व्यवहार का संचालन इस प्रकार करते हैं कि हमारे अन्दर संतुष्टि की भावना जाग्रत हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति अपने सीखने में उन्नति करने के लिए कार्यशीलता को अपनाये, अपनी संपूर्ण शक्ति को आदर्श ग्रहणीय लक्ष्यों की ओर प्रवाहित करे और उन्हीं में अपनी शक्ति का प्रयोग करे।

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प्रश्न 2.
प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में प्रमुख अन्तर निम्न प्रकार से है –

1. प्राचीन अनुबन्धन में कुत्ते को लार का स्राव उचित समय पर भोजन देकर कराया जा सकता है। इससे प्रयोगकर्ता प्रयोज्य को उपयुक्त समय पर उत्तेजना प्रस्तुत करता है तभी अनुक्रिया नियंत्रित होती है। नैमित्तिक अनुबन्धन में प्रयोगकर्ता के हाथ में ऐसी उत्तेजना नहीं होती जिससे वह अपने प्रयोज्य से छड़ दबाने जैसी प्रतिक्रियाएं करा सके।

2. प्राचीन अनुबन्धन में पुनर्बलनं (US) अनुक्रिया पर निर्भर नहीं करता। जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन में पुनर्बलन अनुक्रिया पर निर्भर करता है। डी-अमेटो के अनुसार नैमित्तिक अनुबन्धन में पुनर्बलन प्रयोज्य को मिलेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि प्रयोज्य उपयुक्त अनुक्रिया करता है अथवा नहीं।

3. अनेक अध्ययनों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि केवल प्राचीन अनुबन्धन प्रक्रियाओं द्वारा स्वतः चालित अनुक्रियाओं का अध्ययन हो सकता है। स्वतः चालित क्रियाएं जैसे लार स्रावित होना, पलक मारना आदि हैं। स्पेन्स और रॉस के कथनानुसार पलक गिरने की क्रिया स्वतः है तथा पलक मारने की क्रिया ऐच्छिक है। दोनों प्रकार की क्रियाओं की प्रकृति तथा अनुक्रिया काल अलग-अलग है। इन मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि पलक गिरने की क्रिया प्राचीन अनुबन्धन का उदाहरण है तथा पलक मारने की क्रिया नैमित्तिक अनुबन्धन के फलस्वरूप होती है।

4. माउरर के अनुसार सैद्धान्तिक दृष्टि से भी प्राचीन तथा नैमित्तिक अनुबन्धन में अन्तर है। माउरर के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन में अधिगम समीपता के आधार पर होता है। यह देखा गया कि CS तथा Vs की उपस्थिति में जितना की कम अन्तर होगा, CS तथा US में साहचर्य उतनी ही जल्दी स्थापित हो जायेगा। इस प्रकार के अधिगम प्रक्रम में पुनर्बलन आवश्यक नहीं है। दूसरी ओर नैमित्तिक अनुबन्धन में CD तथा US के मध्य पुनर्बलन के आधार पर साहचर्य स्थापित होता है। एक अनुबन्धन में साहचर्य स्थापित होने का आधार समीपता है तो दूसरी जगह पुनर्बलन। इस आधार पर कहा जा सकता है कि दोनों अनुबन्धनों में सैद्धान्तिक दृष्टि से अन्तर है।

5. श्लासवर्ग के अनुसार नैमित्तिक अनुबन्धन में साहचर्य उत्तेजना-अनुक्रिया के मध्य स्थापित होता है। प्राचीन अनुबन्धन में उत्तेजना-उत्तेजना के मध्य साहचर्य स्थापित होता है। प्राचीन अनुबन्धन एक प्रकार से Stimulus Substitution होता है।

6. स्किनर के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन स्वत: है जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन एक प्रतिक्रिया है। प्राचीन अनुबन्धन प्राचीन अनुबन्धन में पुनर्बलन का सम्बन्ध उत्तेजना के साथ होता है जबकि नैमित्तिक अनुबन्धन में यह स्थिति नहीं होती है। दूसरे प्राचीन अनुबन्धन की कुछ निन्दा करते हुए उसने यह कहा है कि शुद्ध प्राचीन अनुबन्धन में प्रायोगिक प्रमाणों का अभाव है।

नैमित्तिक अनुबन्धन में अनुक्रिया और पुनर्बलन के बीच धनात्मक सम्बन्ध होता है। इसमें पुनर्बलन की प्राप्ति इस बात पर निर्भर करती है कि प्रयोज्य किस प्रकार की अनुक्रिया करता है। स्किनर ने यह भी कहा है कि उद्दीपक प्रकार के अनुबन्धन की सीमा सहज क्रियाओं तक तथा नैमित्तिक अनुबन्धन की सीमा ऐच्छिक पेशीय क्रियाओं तक है।

7. मेडिनिक के अनुसार प्राचीन अनुबन्धन से सम्बन्धित व्यवहार प्रतिक्रियात्मक (Respondant behaviour) अथवा प्रतिकृत (Elicited) प्रकार का व्यवहार है। इस प्रकार का व्यवहार सहज क्रियात्मक तथा उत्तेजना के नियंत्रण से होता है। दूसरी ओर नैमित्तिक अनुबन्धन से सम्बन्धित व्यवहार प्रवर्तन (operant) व्यवहार कहलाता है। इस प्रकार का व्यवहार ऐच्छिक होता है।

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प्रश्न 3.
साधनात्मक अनुकूलन या नैमित्तिक अनुबंधन का वर्णन करें।
उत्तर:
डी अमेटो (D’Amato, 1970) के अनुसार:
“नैमित्तिक अनुबंधन (Instrumental Conditioning) ऐसा कोई भी सीखना होता है जिसमें अनुक्रिया अवलम्बित पुनर्बलन.पर आधारित हो तथा जिसमें प्रयोगात्मक रूप से परिभाषित विकल्पों का चयन सम्मिलित न हो।” (Instrumental Conditioning is any learning based on response contingent reinforcement that does not involve choice among experimentally defined alternatives)

नैमित्तिक अनुबंधन की मुख्य विशेषता परिभाषा की पहली लाइन में ही दी हुई है जिसका अर्थ है कि प्रयोज्य के लिए पुनर्बलन या पुरस्कार (Reinforcement) की उपलब्धि प्रयोज्य की अनुक्रियाओं पर आश्रित होती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रयोज्य की अनुक्रियाएँ पुनर्बलन (Reinforcement) का Instrument (निमित्त) बन जाती है। नैमित्तिक अनुबंधन उत्तेजना-अनुक्रिया के बीच साहचर्य स्थापित करने की दूसरी विधि है, प्रथम विधि प्राचीन अनुबंधन है।

पुनर्बलन की प्रकृति धनात्मक अथवा निषेधात्मक किसी भी प्रकार की हो सकती है। धनात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcement) वह उत्तेजना है जिसे प्रयोज्य प्राप्त करने के लिए चेष्टा और कार्य करता है। निषेधात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement) वह प्रयोज्य है जिसे प्रयोज्य उपेक्षित करने के लिए कार्य करता है अथवा इस उत्तेजना से बचने के लिए कार्य करता है। इस प्रकार के (Reinforcer प्राय: Aversive or Noxious Stmulus) कहे जाते हैं।

ऐसा नैमित्तिक अनुबंधन जिसमें धनात्मक पुनर्बलन का प्रयोग होता है, प्रवृत्यात्मक अनुबंधन (Appetitive Conditioning) तथा निषेधात्मक पुनर्बलन का प्रयोग होता है, उन्हें विमुखी अथवा हानिकारक अनुबंधन (Aversive or Noxiopus Conditioning) कहा जाता है। नैमित्तिक अनुबंधन का वर्गीकरण पुनर्बलन का धनात्मकता (Positiveness) अथवा निषेधात्मक (Negativeness) पर आधारित होने के साथ-साथ अधिगम प्रक्रम की उग्र-गमनता (Forward movement) तथा पृष्ठ-गमनता (Backward-movement) पर भी आधारित है।

कोनोस्र्की (1948) ने साधनात्मक नैमित्तिक अनुबंधन के निम्न तीन प्रकार बतलाए हैं –

1. परिहरण-अनुकूलन (Avoidance conditioning):
यदि घंटी बजे, फिर पाँव में विद्युत-आघात लगे और उसपर.कुत्ता पाँव उठा ले तो कुछ यत्नों के बाद घंटी बजते ही कुत्ता अपना पाँव उठाना सीख लेगा। अधोनुकूलन में पाँव उठा लेने पर भी विद्युत आघात लगेगा। यदि पाँव उठा लेने से वह आघात से बच जाए तो वही साधनात्मक स्वरूप का परिहरण-अनुकूलन कहलाता है।

2. पलायन-अनुकूलन (Escape conditioning):
साधनात्मक अनुकूलन के इस रूप में प्राणी धीरे-धीरे किसी कष्टकर परिस्थिति से बचना सीखता है। मौवरर ने एक प्रयोग में चूहे को पिंजड़े में बन्द किया और उसके फर्श को विद्युत-आवेशित कर दिया फिर धीरे-धीरे विद्युत तीव्रता बढ़ती गई। चूहा विविध प्रकार की क्रियाएँ करने लगा, यहाँ तक कि वह एक लीवर पर चढ़ गया जिससे लीवर दबा और विद्युत-आवेश समाप्त हो गया। यही परिस्थिति फिर दुहरायी गयी। इस बार अपेक्षाकृत शीघ्र ही वह लीवर पर चढ़ गया। एक ऐसी अवस्था भी आ गयी कि जब बिजली का आभास होता था तो चूहा लीवर दबा कर आघात से बचने लगा। यही पलायन-अनुकूलन है।

3. प्रवर्तन अनुकूलन (Operant conditioning):
स्किनर (Skinner 1938) ने समस्या बॉक्स जैसे जटिल साधनात्मक अधिगम को इतना सरल रूप दिया कि उसे अनुकूलन कोटि में रखा जा सकता है। बक्स में एक लीवर लगा था जिसके दबने से भोजन की एक गोली बाहर आती थी। चूहे को बक्स में रखा गया। इधर-उधर घूमने के क्रम में वह लीवर पर चढ़ा, लीवर दबा और भोजन की एक गोली बाहर आयी।

इस परिस्थिति से यह स्पष्ट नहीं है कि अनुकूलन उत्तेजक क्या था, लीवर का दृश्य या भोजन की गंध। लीवर दबाना अनुकूलन उत्तेजक थी, भोजन की गोली अनुकूलन उत्तेजक और खाना अनुकूलन उत्तेजक थी। स्किनर ने इसी साधनात्मक अधिगम को प्रवर्तन (operant) अनुकूलन कहा है। साधनात्मक एवं प्रवर्तन अनुकूलन में भेद भी है।

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प्रश्न 4.
पॉवलव के शिक्षण सिद्धान्त की विवेचना करें।
उत्तर:
सीखने के अनुबंधित-अनुक्रिया सिद्धांत का प्रतिपादन रूसी शरीर क्रिया-विज्ञानी पॉवलव (Pavlov) द्वारा किया गया। पॉवलव के इस सिद्धान्त का आधार अनुबंधन (conditioning) है जिससे तात्पर्य साहचर्य द्वारा सीखना (learning by association) होता है। जैसे-जब किसी अस्वाभाविक उद्दीपन (conditioned stimulus) के प्रति साहचर्य के आधार पर प्राणी स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response) करना सीख लेता है तब इस तरह के सीखना को अनुबंध द्वारा सीखना (conditioning learning) कहा जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझाया जा सकता है-मानलिया जाए कि एक भूखा व्यक्ति भोजन को देखता है, तो उसके मुँह में लार आने लगता है। यहाँ भोजन एक स्वभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) है जो व्यक्ति में स्वाभाविक अनुक्रिया (लारस्राव) उत्पन्न कर रहा है। अब थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि एक घंटी बजाकर उसके सामने भोजन दिया जाता है और यह प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है।

ऐसी परिस्थिति में संभव है कि व्यक्ति घंटी की आवाज को भोजन आने का सूचक मानकर घंटी की आवाज सुनते ही लारस्राव करने लगे। यदि ऐसा होता है तो यह कहा जाएगा कि व्यक्ति घंटी की आवाज (अस्वाभाविक उद्दीपन) के प्रति एक स्वाभाविक अनुक्रिया (लारस्राव) करना सीख लिया है। इस तरह के सीखना को अनुबंध न द्वारा सीखना (learning by conditioning) कहा जाता है। पॉवलव ने इस सिद्धांत की जाँच करने के लिए एक कुत्ते पर प्रयोग किया है तथा वाटसन एवं रेनर (Watson & Raynor) ने एक छोटे शिशु, जिसका नाम अलबर्ट (Albert) था, उसपर एक प्रयोग किया है। इन दोनों प्रयोगों का वर्णन यहाँ अपेक्षित है।

कुत्ते पर पॉवलव द्वारा किया गया प्रयोग (Pavlov’s experiment on dog):
अनुबंधन अनुक्रिया सिद्धांत के तथ्य के समर्थन में पॉवलन ने एक प्रयोग एक भूखे कुत्ता पर किया। कुत्ता को एक ऐसे कमरे में विशेष उपकरण के सहारे खड़ा किया गया जिसमें बाहर से किसी तरह की आवाज नहीं आने पाए।

कुत्ते द्वारा टपकाई गई लार की मात्रा को मापने के लिए उसके गलफड़े में एक खास किस्म का यंत्र लगा दिया गया जिसे चित्र में दिखाया गया है। कुछ प्रयास तक कुत्ते के सामने भोजन दिया और भोजन देखते ही कुत्ते के मुँह में लार आने लगी। कुछ प्रयास के बाद कुत्ते के सामने भोजन उपस्थित करने के चंद सेकंड पहले तक घंटी बजाई जाने लगी। इस प्रक्रिया को कुछ प्रयासों तक दोहराने के बाद घंटी की आवाज सुनते ही बिना भोजन देखे
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चित्र: पॉवलव द्वारा कुत्ते पर किया गया प्रयोग

ही कुत्ते के मुंह में लार आने लगी। इस तरह कुत्ता ने घंटी की आवाज पर लारस्राव करने की अनुक्रिया को सीख लिया। पॉवलव के अनुसार यहाँ कुत्ता घंटी की आवाज तथा लारस्राव में संबंध स्थापित करना सीख लिया जिसे अनुबंधन (conditioned stimulus या CS), भोजन एक स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus या UCS) तथा लार का स्राव (अनुबंधन के बाद) एक अस्वाभाविक अनुक्रिया (conditioned response या CR) का उदाहरण है। भोजन के प्रति की गई अनुक्रिया (अनुबंधन के पहले) एक स्वाभाविक अनुक्रिया (unconditioned response या UCR) का उदाहरण है।

वाटसन तथा रेनर द्वारा किया गया प्रयोग (Experiment done by Waston & Raynor):
वाटसन (Watson) ने अपनी पत्नी रेनर (Raynor) के साथ मिलकर अलबर्ट नामक एक बच्चे पर प्रयोग किया। प्रयोग इस प्रकार है-अलबर्ट एक उजले चूहे के साथ खेल रहा था। तभी जोरों की तीव्र आवाज उत्पन्न कर दी गई।

आवाज से बच्चा डर जाता था। कुछ दिनों तक यह प्रक्रिया दोहराने के बाद यह देखा गया कि बच्चा उजले चूहे को देखते ही डरकर रोने लगता था। आगे चलकर अलबर्ट में और तीव्र अनुबंधन होता पाया जिसें अलबर्ट केवल उजले चूहे बल्कि उसे मिलती-जुलती अन्य चीजों, जैसे उजला रोएँदार कोट, उजला खरगोश आदि से भी डरने लगा। इस प्रयोग में स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) जोरों की आवाज तथा अस्वाभाविक या अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) चूहा है और अनुबंधित अनुक्रिया डर है जो मात्र चूहा देखकर ही उत्पन्न होता था।

उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि अनुबंधन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें स्वाभाविक उद्दीपन तथा अस्वाभाविक या अनुबंधित उद्दीपन में एक विशेष संबंध स्थापित हो जाता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति अस्वाभाविक उद्दीपन के प्रति ठीक वैसी ही अनुक्रिया करता है जैसी स्वाभाविक उद्दीपन के प्रति।

अनुबंधन के लिए कुछ प्रमुख बातें –
अनुबंधन द्वारा किसी प्रक्रिया को सीखने के लिए निम्नलिखित बातों का होना अनिवार्य है –

1. आवश्यकता (Need):
सीखनेवाले प्राणी में आवश्यकता का होना अनिवार्य है। पॉवलव के प्रयोग में कुत्ता भूखा था। अतः उसमें भोजन की अवश्यकता (need) थी। ऐसी आवश्यकता नहीं होती तो वह घंटी की आवाज के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है जिससे कुत्ते की भूख की आवश्यकता की पूर्ति होती थी।

2. पुनर्बलन (Reinforcement):
प्राणी की आवश्यकता की पूर्ति जिस चीज से होती है, उसे पुनर्बलन की संज्ञा दी जाती है। पॉवलव के प्रयोग में भोजन एक पुनर्बलन का उदाहरण है जिससे कुत्ते की भूख की आवश्यकता की पूर्ति होती थी।

3. अनुबंधित उद्दीपन तथा स्वाभाविक उद्दीपन के बीच का समय-अंतराल (Time interval between conditioned stimulus and unconditioned stimulus):
fortit अनुक्रिया का संबंध अनुबंधित उद्दीपन के स्थापित हो, इसके लिए यह भी आवश्यक है कि अनुबंधित उद्दीपन के तुरंत बाद स्वाभाविक उद्दीपन दिया जाए। शायद यही कारण है कि पॉवलव के प्रयोग में घंटी बजने के तुरंत बाद कुत्ते के सामने भोजन दिया जाता था।

4. व्याघातक उद्दीपनों की अनुपस्थित (Absence of disturbing stimulus):
अनुबंधन द्वारा सीखने के लिए यह आवश्यक है कि प्रयोग करते समय अनुबंधित उद्दीपन (conditioned stimulus) तथा स्वाभाविक उद्दीपन (unconditioned stimulus) से मिलते-जुलते दूसरे व्याघातक उद्दीपन वहाँ नहीं हों अन्यथा प्राणी अनुबंधित उद्दीपन के साथ स्वाभाविक अनुक्रिया का साहचर्य स्थापित नहीं कर पाएगा।

आलोचनाएं (Criticis):
इस सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ निम्नांकित हैं –

(a) इस सिद्धांत के अनुसार सीखने के लिए पुनर्बलन (reinforcement) आवश्यक है। परन्तु, टॉलमैन (Tolman) तथा ब्लोजेट (Blodgett) आदि द्वारा किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हो गया है कि पुनर्बलन की अनुपस्थिति में भी प्राणी किसी अनुक्रिया को सीखता है। पुनर्बलन की आवश्यकता सीखी गई अनुक्रिया की अभिव्यक्ति के लिए होती है।

(b) इस सिद्धांत के अनुसार सीखने के लिए अभ्यास या पुनरावृत्ति को महत्त्वपूर्ण कारक माना गया है। परन्तु, बहुत अनुक्रियाएं ऐसी होती है जिसे व्यक्ति मात्र एक बार के अनुभव में ही सीख लेता है।

(c) कुंछ आलोचकों का मत है कि अनुबंधन द्वारा प्रतिपादित सीखना स्थायी तथा आशिक रूप से ही प्राणी के व्यवहार में परिवर्तन लाता है। कुत्ता घंटी की आवाज पर तभी तक लार का स्त्राव करता था जबकि घंटी की आवाज के बाद उसे. भोजन दिया जाता था।

(d) कुछ मनोवैज्ञानिकों का मत है कि अनुबंधन द्वारा सीखी गई अनुक्रिया अस्वाभाविक होती है जिसके आधार पर स्वाभाविक ढंग से सीखने की प्रक्रियाओं की व्याख्या नहीं की जा सकती है। इन अलोचनाओं के बावजूद पॉवलव का सिद्धान्त एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है।

Bihar Board Class 11 Psychology Solutions Chapter 6 अधिगम

प्रश्न 5.
अधिगम अन्तरण का क्या स्वरूप है? कुछ प्रायोगिक उदाहरण द्वारा किसी भूत अधिगम के आगामी अधिगम पर प्रभाव की व्याख्या कीजिए। अथवा, अन्तरण के प्रभावों को निर्धारित करने में समानता एक मुख्य परिवर्तनीय है। (अण्डरवुड) अपने उत्तर की पुष्टि में प्रयोगात्मक प्रभाव दीजिए। अथवा, सीखने के स्थानान्तरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
शिक्षक बालक को कक्षाओं में ज्ञान देता है। ज्ञान देने की क्रिया के पीछे अध्यापक की यह भावना अवश्य रहती है कि बालक इस ज्ञान अथवा सीखी हुई क्रिया का उपयोग अन्य परिस्थितियों में करेगा। अत: एक क्रिया का दूसरी परिस्थति में उपयोग किया जाना ही सीखने का स्थानान्तरण कहलाता है। उदाहरणार्थ, एक बालक गणित के सभी प्रश्नों को.बिना किसी की सहायता से स्वयं ही हल कर लेता है। गणित के ज्ञान द्वारा वह विज्ञान के विषयों में भी लाभ उठा सकता है।

इस क्रिया को सीखने का स्थानान्तरण कहते हैं। यहाँ तक बात ध्यान देने योग्य है कि यदि समाज में ज्ञान का स्थानान्तरण न होता तो मनुष्य को हर क्रिया को सीखने के लिए नये सिरे से प्रयत्न करना पड़ता। इसलिए क्रो ने स्थानान्तरण की परिभाषा इस प्रकार दी है – “सीखने के स्थानान्तरण से यह अभिप्राय है, जब सीखने में प्राप्त विचार, अनुभव या कार्य, ज्ञान अथवा कौशल का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में उपयोग किया जाय।”

शिक्षा-विश्व-कोष में स्थानान्तरण की व्याख्या इस प्रकार दी गई है-“जब कोई विशेष अनुभव व्यक्ति की योग्यता को दूसरी परिस्थिति में प्रतिक्रिया करने के हेतु प्रभावित करता है और प्राप्त अनुभवों के आधार पर वह नई समस्या को हल करने में उत्तेजना प्रदान करता है।” कॉलसानिक ने भी स्थानान्तरण की परिभाषा इस प्रकार दी है-“स्थानान्तरण पहली स्थिति में अर्जित ज्ञान, कौशल, स्वभाव, मनोवृत्ति अथवा प्रतिक्रयाओं का अन्य परिस्थितियों में प्रयोग करता है।” इन परिभाषाओं से यह ज्ञात होता है कि अर्जित अनुभव का लाभ उठाना ही स्थानान्तरण है। इस प्रकार के विचार सोरेन्स ने भी व्यक्त किये हैं – “स्थानान्तरण के द्वारा व्यक्ति उस सीमा तक सीखता है जहाँ से वह अर्जित योग्याताओं की सहायता दूसरी परिस्थितियों में करता है।

इन परिभाषाओं से प्राप्त निष्कार्षों को एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है। एक व्यक्ति ने ट्रैक्टर चलाना सीख लिया है। वह उसके संचालन की हर विधि को अच्छी तरह जान गया है। यदि उसे कार या ट्रक चलाने को कहा जाय तो उसे कार या ट्रक का संचालन करने में परेशानी होगी। ट्रैक्टर चलाने की क्रिया का उपयोग कार या ट्रक चलाने में किया गया, इसलिए यह ट्रैक्टर चलाने की क्रिया स्थानान्तरण है।

स्थानान्तरण के प्रकार (Types of Transfer) यदि पूर्व सीखने का अनुभव दूसरे सीखने पर प्रभाव डालता है तो दूसरे सीखने में कम समय तथा कम शक्ति का प्रयोग हो सकता है। यदि दूसरे कार्य के अधिगम में सुगमता हो जाय या कार्य दुरूह हो जाय अथवा प्रभाव शून्य हो जाय तो उन्हें क्रमश: भावात्मक या विधेयात्मक (Positive), नकारात्मक (Negative) तथा शुन्यात्मक (Zero) स्थानान्तरण के नाम से पुकारेंगे। इस प्रकार स्थानान्तरण के तीन प्रकार बताये गये।

1. भावात्मक या विधेयात्मक (Positive) स्थानान्तरण:
इस अधिगम स्थानान्तरण का तात्पर्य है कि जब एक क्रिया का सीखना दूसरी क्रिया के सीखने में सहायक होता है तो उसे भावात्मक या विधेयात्मक स्थानान्तरण कहते हैं। मार्गन (1956) के अनुसार भावात्मक या विधेयात्मक अन्तरण उस अवस्था में उत्पन्न होता है जब पूर्वानुभव अधिगम में सहायक होता है।

उदाहरणार्थ-दाएँ हाथ से लिखना सीख लेने पर बाएँ हाथ से भी लिखने का कार्य थोड़ा बहुत किया जा सकता है। प्रयोगशालाओं में दर्पण चित्रांकन (Mirror drawing) पर प्रायः धनात्मक या विधेयात्मक अन्तरण पाया जाता है। विधेयात्मक अन्तरण का जीवन में अत्यधिक महत्व है। नवीन परिस्थिति में ऐसा अन्तरण अधिक सहायक होता है। बेबर, फेकनर, डक्कन, ग्रिग एवं किम्मेल, हिलगार्ड आदि ने इस प्रकार विशेष कार्य किया है।

2. निषेधात्मक या नकारात्मक (Negative) स्थानान्तरण:
जब एक क्रिया का सीखना दूसरी क्रिया के सीखने में अवरोध या बाधा उत्पन्न करता है तो उसे नकारात्मक या निषेधात्मक स्थानान्तरण कहते हैं। आसगुड (Osgood) के अनुसार अवरोधक अन्तरण की निषेधात्मक या नकारात्मक अधिगम अन्तरण है। बोरिंग तथा अन्य के अनुसार यदि पूर्व अनुभव नवीन कार्य पर बाधक प्रभाव डालता है तो अन्तरण निषेधात्मक कहलाता है।

यह कई कारणों से हो सकता है। इसमें अनुक्रिया स्पर्धा या विपरीत अनुक्रिया इत्यादि प्रमुख कारण हैं। उदाहरणार्थ-जब हम किसी कार्य को दायें हाथ से करने में अभ्यस्त हो जाते हैं और इसी क्रिया को जब बायें हाथ से करते हैं तो कार्य में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है तथा दुरूहता आ जाती है। यही नकारात्मक या निषेधात्मक अधिगम स्थानान्तरण है।

3. शून्य स्थानान्तरण (Zero Transfer):
कुछ ऐसी परिस्थितियां भी आती हैं जब एक क्रिया का सीखना किसी अन्य क्रिया में न भावात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है और न नकारात्मक, अर्थात् शून्य स्थानान्तरण की अवस्था में न तो पूर्वानुभाव सहायक होता है न बाधक। ऐसी स्थिति में अन्तरण प्रभावशून्य होगा।

अधिगम स्थानान्तरण के सिद्धान्त (Theories of Transfer of Learning):
अधिगम स्थानान्तरण के संदर्भ में निम्नलिखित सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है –

1. औपचारिक अनुशान का सिद्धान्त (Theory of FormalDiscipline):
शिक्षा-शास्त्रियों की विचारधारा काफी वर्षों तक यह थी मनुष्य का मस्तिष्क विभिन्न संकायों (Faculties) का स्वरूप है। इसमें स्मृति, विश्लेषण, निर्णय, इच्छा, कल्पना तथा तर्क आदि माने जाते हैं। इस विचारधारा को मानने वालों का मत था कि जिस प्रकार व्यायाम से शरीर की मांसपेशियाँ पुष्ट होती हैं उसी प्रकार प्रशिक्षण से मानसिक शक्तियाँ भी विकसित हो जाती हैं। उदाहरणार्थ, गणित के ज्ञान से व्यवसाय में तथा कविता के ज्ञान से वाक्य के विभिन्न रूपों के समझने में सहायता मिलती है। स्वयं तर्क करने की शक्ति से समस्या समाधान में सहायता मिलती है। बुडवर्थ तथा विलियम जेम्स ने इसकी आलोचना की।

2. समान अंशों का सिद्धान्त (Theory of Identical Elements):
इसके प्रतिपादक थार्नडाइक (Thorndike) महोदय ने बताया कि एक विषय के संस्कार उसी अनुपात में दूसरे विषय में स्थानान्तरित होते हैं जिस अनुपात में दोनों विषयों में समानता पायी जाती है। विद्यार्थियों को ऐसे विषयों का ज्ञान कराया जाना चाहिए जिसके ज्ञान से जीवन के समान क्षेत्रों में स्थानान्तरण हो सके।

स्पीयरमैन (Spearman) ने भी द्वि-तत्व सिद्धान्त का प्रतिपादन करके यह बताया कि सामान्य बुद्धि हर मनुष्य में एक-सी होती है जिसका उपयोग सामान्य क्रियाओं में होता है। सामान्य बुद्धि ही स्थानान्तरण का आधार है। विशिष्ट बुद्धि को जो मनुष्य में भिन्न होती है उसका उपयोग हर मनुष्य अपने ढंग से करता है। सामान्य विषयों जैसे भूगोल, इतिहास, गणित तथा साहित्य आदि में भी किसी का स्थानान्तरण करने में उसकी मात्रा कम या अधिक होगी।

3. सामान्य अनुभव का सिद्धान्त (Theory of Generalization of Experience):
चार्ल्स जुड (Charles Judd) इस सिद्धान्त के जन्मदाता हैं। इसे “सिद्धान्त द्वारा स्थानान्तरण” कहा जाता है। जिन सिद्धान्तों को व्यक्ति अपने अनुभवों द्वारा सीख लेता है उनका जीवन परिस्थितियों में स्थानान्तरण होता है। जिन सिद्धान्तों काके राइट ब्रदर्स (Wright Brothers) ने पतंग उड़ाने में सीखा था उन्हीं के आधार पर जहाज बनाने में सहायता प्राप्त की।

सीखने में स्थानान्तरण का महत्त्व

  1. स्थानान्तरण के महत्त्व को देखते हुए विद्यालयों में बालकों का पाठ्यक्रम ऐसा बनाया जाना चाहिए कि उनके भविष्य के जीवन से सम्बन्धित हो। पाठ्यक्रम में सामाजिक, शारीरिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य, चरित्र-निर्माण आदि जैसे विषयों का समावेश हो सके तो अच्छे परिणाम मिल सकते हैं।
  2. स्थानान्तरण से एक विषय के बाद दूसरा विषय सरलता से सीख लिया जाता है जिससे अधिक श्रम एवं समय की भविष्य में बचत होती है।
  3. स्थानान्तरण के महत्व को स्वीकार करके विद्यालय के पाठ्यक्रम से ऐसे विषयों को निकाला जा सकता है जिनका विद्यार्थी के जीवन में नकारात्मक स्थानान्तरण होता है।
  4. वातावरण प्रतिकूल है या अनुकूल इसका ध्यान प्रशिक्षण के दौरान महत्त्वपूर्ण होता है। प्रतिकूल वातावरण में स्थानान्तरण नहीं हो पाता है।
  5. शिक्षकों को स्थानान्तरण के महत्त्व को स्वीकार करके पाठ्यक्रम को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करना चाहिए जिससे कि विद्यार्थी की रुचि अध्ययन में लग सके।

विशिष्ट विषय में स्थानान्तरण:
आज की शिक्षा प्रणाली पर एक मुख्य आरोप यह लगाया जाता है कि वह जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करती है। गणित, बीजगणित, रेखागणित या विज्ञान हो, जो हम कक्षा में पढ़ते हैं, वह छात्रों के व्यावहारिक जीवन में अनुपयोगी होती है। थॉर्नडाइक ने विभिन्न विषयों के स्थानान्तरण पर प्रयोग किया। उसने हाईस्कूल के पाठ्यविषयों के आधार पर दसवीं, ग्यारहवीं तथा बारहवीं कक्षा के 13,500 छात्रों पर तर्क (Logic) के परीक्षणों का प्रयोग किया। उसने यह निष्कर्ष निकाला –

  1. विभिन्न विषयों के तुलनात्मक स्थानान्तरण की प्रतिशत में अन्तर कम होता है।
  2. विषय का स्थानान्तरण शिक्षण विधि पर निर्भर करता है।
  3. स्थानान्तरण इस बात पर निर्भर करता है कि प्राप्त ज्ञान का उपयोग किस सीमा तक हुआ है।

थार्नडाइक के इन विषयों से हम निम्नलिखित सुझावों को कार्यरूप में परिणत करके विशिष्ट विषयों में स्थानान्तरण की प्रक्रिया को लागू कर सकते हैं।

  1. बालकों को किसी विषय या समस्या के प्रत्येक अंग की जानकारी देनी चाहिए।
  2. बालकों को समय पर चिंतन तथा तर्क करने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए।
  3. बालकों को समस्या के विश्लेषण का अवसर देना चाहिए और पश्चात् सामान्य सिद्धान्तों के मध्य से स्थानान्तरण का अवसर देना चाहिए।
  4. गणित जैसे विषय को पर्याप्त सहायक सामग्री (Helping Material) के द्वारा पढ़ाया जाना चाहिए।

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प्रश्न 6.
अधिगम सिद्धांत के अनुप्रयोग का वर्णन करें।
उत्तर:
1. बच्चों के पालन-पोषण में अनुप्रयोग:
सीखने के सिद्धांत का उपयोग बच्चों के पालन-पोषण में होता है, शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत का उपयोग कर बच्चों को सिखाया जा सकता है कि कौन-सी वस्तु खतरनाक है तथा उससे कैसे बचना चाहिए। नैमित्तिक अनुबंधन का उपयोग कर बच्चों के अनुचित व्यवहार को सुधारा जा सकता है।

2. विद्यालय में अनुप्रयोग:
विद्यालय में बच्चों के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू का विकास किया जाता है इस संबंध में शाब्दिक सीखना, प्रेक्षणात्मक सीखना, कौशल सीखना के नियम बहुत उपयोगी हैं शिक्षक को एक आदर्श परामर्शदाता के रूप आचरण करना पड़ता है जिससे वे विद्यार्थी के आदर्श बन सके। वांछित व्यवहार विकसित करने के लिए पुरस्कार का प्रयोग करना चाहिए। इससे छात्रों में विषय संबंधी पढ़ाई में तेजी आती है तथा उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी उन्नत होती है।

3. संगठन में अनुप्रयोग:
संगठन का अर्थ कार्यालय, उद्योग, संघ से है सीखने के सिद्धांत का प्रयोग कर कर्मचारी के संतोष, मनोबल पारस्परिक संबंध को उन्नत बनाया जाता है, जिससे अनुशासनहीनता घटती है तथा उत्पादन में वृद्धि होती है इसके लिए समय-समय पर प्रबंधन द्वारा आकर्षक पुरस्कार की व्यवस्था की जाती है। सीखने के सिद्धांत विशेषकर प्रोत्साहन एवं प्रवलन का प्रयोग सभी प्रकार के संगठन में स्वस्थ वातावरण एवं उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है।

4. चिकित्सात्मक उपचार में अनुप्रयोग:
सीखने के सिद्धांत का उपयोग मानसिक चिकित्सा के क्षेत्र में किया गया। मनोवैज्ञानिक समायोजन संबंधी समस्या अनावश्यक भय और गलत आदत, सुधारने में व्यवहार सुधार तकनीक का विकास किया।

भय दूर करने के लिए विलोप का, बच्चों और प्रौढ़ों के भय को दूर करने के लिए आदतावन, अत्यधिक भय से पीड़ित व्यक्ति के लिए क्रमिक-विकास, संवेदनीकरण, अवांछित आदत छुड़ाने के लिए विरूचि चिकित्सा, मानसिक रूप से घबराहट और अशांति अनुभव करने वाले के जैव प्रतिपादित दी जाती है। संक्षेप में मनोचिकित्सा की विभिन्न तकनीकों एवं विधियों में सीखने का सिद्धांत के लाभकारी अनुप्रयोग किए जाते हैं। स्पष्ट है कि सीखने के सिद्धांत एवं नियमों का प्रयोग जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में किया जा रहा है और इसके उत्पादवर्द्धक परिणाम प्राप्त हो रहे हैं।

प्रश्न 7.
विभेदन के अर्थ एवं स्वरूप को बताएँ। विभेदन सीखने की विभिन्न विधियों का वर्णन करें।
उत्तर:
अर्थ एवं स्वरूप (Meaning and Nature):
विभेदन (discrimination) सामान्यीकरण (generalization) का विपरीत होता है। अनुबन्धन के क्षेत्र के प्रयोगकर्ताओं ने अपने अध्ययनों में यह देखा है कि प्रशिक्षण की आरंभिक अवस्था में प्राणी CS तथा उससे मिलते-जुलते उद्दीपकों में अन्तर नहीं कर पाता है। फलतः वह CS के समान ही इन सभी उद्दीपकों के प्रति अनुक्रिया करता है जिसे सामान्यीकरण (generalization) कहा जाता है। जैसे-जैसे प्रशिक्षण आगे बढ़ता है, प्राणी में CS को अन्य समान उद्दीपकों से भिन्न करने की क्षमता विकसित हो. जाती है और वह अब सिर्फ CS के प्रति अनुक्रिया करता है अन्य समान उद्दीपकों के प्रति नहीं। इसे ही मनोवैज्ञानिकों ने विभेदन (discrimination) की संज्ञा दी है।

जैसे, मान लिया जाए कि पॉवलोवियन अनुबन्धन में 1000 Hz के आवाज को CS के रूप में उपयोग करके कुत्ता को उस पर लार स्राव करने की अनुक्रिया करना सिखलाया जाता है। इस प्रशिक्षण के प्रारंभिक अवस्था में कुत्ता 800 Hz तथा 1200 Hz पर भी वैसी ही अनुक्रिया करेगा। परंतु प्रशिक्षण की अंतिम अवस्था में वह सिर्फ 1000 Hz के आवाज पर ही लार स्राव की अनुक्रिया करेगा, अन्य उद्दीपकों जैसे 800 Hz एवं 1200 Hz पर नहीं करेगा क्योंकि कुत्ता इस अवस्था में CS तथा उन उद्दीपकों के बीच विभेदन करना सीख लेता है। स्पष्ट है कि विभेदन के स्वरूप के बारे में हमें निम्नांकित तथ्य मुख्य रूप से मिलता है –

  1. विभेदन की प्रक्रिया सामान्यीकरण की प्रक्रिया के विपरीत होती है।
  2. विभेदन में प्राणी CS के प्रति ही अनुक्रिया करता है अन्य किसी भी समान उद्दीपक के प्रति के प्रति नहीं।
  3. विभेदन की अवस्था में CS की विशिष्टता की पहचान स्पष्ट हो जाती है।

विभेदन सीखने की विधियाँ (Methods of Discrimination learning):
विभेदन सीखने का क्रमबद्ध प्रयोगशाला (systematic laboratory) अध्ययन करीब 1900 से प्रारम्भ हुआ है। तब से आज तक किये गये प्रयोगों एवं शोधों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि विभेदन सीखना अध्ययन करने के लिए निम्नांकित तीन तरह की विधियों का प्रतिपादन किया गया हैं –

  1. पृथक प्रयास विधियाँ (discrete trial methods)
  2. स्वचालित विधियाँ (automated methods)
  3. स्वतंत्र-क्रियाप्रसूत विधियाँ (free operant methods)

1. पृथक प्रयास विधियाँ (Discrete trial methods):
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस विधि में प्राणी दिये हुए उद्दीपकों के बीच विभेदन करना प्रत्येक प्रयास में किये गए पृथक अनुक्रियाओं के आधार पर सीखता है।

2. स्वचालित विधियाँ (Automated methods):
स्वचालित विधियों द्वारा भी विभेदन सीखने का अध्ययन किया गया है। इन विधियों की आवश्यकता इसलिए पड़ी, क्योंकि पृथक प्रयास विधि (discrete trial method) द्वारा विभेदन सीखना में काफी समय लगता था और साथ ही इनसे एक प्रयास से दूसरे प्रयास में अनुक्रिया परिवर्तनशीलता (response variability) होने लगती है जिसके कभी-कभी गंभीर परिणाम होते हैं।

स्वचालित विधि में ऐसी कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं। स्वचालित विधि में स्वचालित स्विचिंग उपकरण (automatic switching equipment) होते हैं और पशुओं को पूर्णतः एक पृथक परिस्थिति (isolated condition) में रखा जाता है। जैसे, चूहा को दो खिड़की या दो रास्तों के बीच चुनने के बजाय उसे दो लीवर या दो बटन में से किसी एक लीवर या बटन को दबाकर अनुक्रिया करना होता है।

3. स्वतंत्र-क्रियाप्रसूत विधियाँ (Free operant methods):
इस विधि में प्राणी के सामने उद्दीपकों, जिनके बीच विभेदन करना सीखना होता है, बारी-बारी से (successively) या कभी-कभी एक ही साथ (simultaneously) उपस्थित किया जाता है। प्राणी को उन उद्दीपनों को इधर-उधर करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।

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प्रश्न 8.
स्किनर के प्रवर्तन अनुकूलन या साधनात्मक अनुकूलन सिद्धान्त की आलोचना की व्याख्या करें।
उत्तर:
स्किनर ने सीखने के क्षेत्र में एक नए सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जो पॉवलव के सम्बन्ध प्रत्यावर्तन एवं थॉर्नडाइक के सम्बन्ध पर आधारित था। इस सिद्धान्त को प्रबन्धन अनुकूलन या साधनात्मक अनुकूलन के नाम से जानते हैं। उन्होंने अपने सिद्धान्त में अनुकूलन के बहुत-से ऐसे प्रत्ययों का व्यवहार किया, जो पॉवलव के सिद्धान्त से लिया गया था तथा थॉर्नडाइक के प्रभाव के नियम को अपने सिद्धान्त का आधार माना।

स्किनर ने पॉवलव तथा थॉर्नडाइक के सिद्धान्तं से कुछ कच्चे माल प्राप्त कर एक नए चीज का आविष्कार किया जो एक सफल सिद्धान्त साबित हुआ। उन्होंने क्लासिकल अनुबन्धन का विरोध किया और प्राणी और प्राणी की प्रतिक्रिया के प्रभाव को प्रधानता दी। उन्होंने व्यवहार की संज्ञानात्मक व्याख्या को अस्वीकार किया और व्यवहारवादी व्याख्या पर बल दिया।

स्किनर ने प्रत्यार्थी-व्यवहार और प्रवर्तन-व्यवहार में अन्तर बताया और कहा कि सीखने की परिस्थिति में प्राणी अपनी समस्याओं का समाधान प्रवर्तन व्यवहार के द्वारा सीखता है, प्रत्यार्थी व्यवहार के द्वारा नहीं। उन्होंने बताया कि प्रत्यार्थी-व्यवहार वह है जो उत्तेजना के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। जैसे-पॉवलव के प्रयोग में भोजन या घंटी की आवाज के बाद कुत्ते के मुँह से लार निकलता था। परन्तु प्रवर्तन-व्यवहार उसे कहते हैं, जिसे उत्पन्न किया जाता है, वहाँ उत्तेजना की प्रधानता होती है। परन्तु यहाँ उत्तेजना के साथ-साथ प्राणी की भी प्रधानता होती है। स्किनर ने कहा कि प्रवर्तन-व्यवहार साधनात्मक होता है। प्रभाव को उत्पन्न करने में प्राणी साधन का काम करता है।

स्किनर ने अपने सिद्धान्त की पुष्टि के लिए कई प्रयोगात्मक अध्ययन किया। उनका प्रयोग मुख्य रूप से चूहों और कबूतरों पर किया गया। इसके लिए उन्होंने एक विशेष प्रकार के बक्से का निर्माण किया, जिससे स्किनर बॉक्स के नाम से जानते हैं। स्किनर बॉक्स में एक छोटी-सी पीतल की कुंजी होती है, जिसकों दबाने से खाने की गोली निकल आती है। कुंजी का सम्बन्ध एक यंत्र से होता है, जिससे भूखे चूहे द्वारा किये गये प्रयासों का पता चलता है। स्किनर ने एक भूखे चूहे को स्किनर बॉक्स में बन्द किया।

उन्होंने देखा कि प्रारंभ में चूहा इधर-उधर घूमने लगा। इसी बीच उसका पंजा पीतल की कुंजी पर पड़ गया। कुंजी के दबते ही भोजन की गोली बाहर निकल गयी, जिसे चूहा खाकर संतुष्ट हुआ। इस प्रकार जब भी वह कुंजी को दबाता था, उसे भोजन की गोली मिल जाती थी। कई प्रयासों के बाद चूहे ने कुंजी को. दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख लिया। स्किनर ने एक दूसरा प्रयोग कबूतरों पर किया। उसे भी एक बक्से में बन्द किया। बक्से की बनावट पहले वाले बक्से से भिन्न थी।

इसमें पीतल की कुंजी की जगह रौशन प्लास्टिक की कुंजी थी। उस रौशन प्लास्टिक की कुंजी पर कबूतर द्वारा चोंच मारने से खाने का दाना निकलता था। प्रारंभ में कबूतर ने इधर-उधर चोंच मारी, परन्तु उसे भोजन नहीं मिला। लेकिन प्लास्टिक की कुंजी पर चोंच मारते ही भोजन का दाना निकल आया। इस तरह कई प्रयासों के बाद कबूतर ने उस रौशन प्लास्टिक की कुंजी पर चोंच मारकर दाना प्राप्त करना सीख लिया।

स्किनर के उपर्युक्त प्रयोगों से स्पष्ट होता है कि प्राणी प्रवर्तन अनुकूलन के आधार पर ही सीखता है। उन्होंने प्रवर्तन अनुकूलन की कुछ विशेषताओं की चर्चा की है, जो निम्नलिखित हैं –

1. प्रवर्तन व्यवहार:
स्किनर ने दावा किया है कि सीखने की परिस्थिति में प्राणी का व्यवहार-प्रवर्तन होता है। इस बात की पुष्टि उन्होंने चूहे और कबूतरों के प्रयोग से सिद्ध कर दिया। प्रवर्तन से उस पर प्रभाव पड़ता है और प्राणी इस क्रिया को सीख लेता है।

2. साधनात्मक व्यवहार:
स्किनर ने शिक्षण में साधनात्मक व्यवहार पर भी बल दिया है और कहा है कि प्राणी का व्यवहार प्रबलन प्राप्त करने के लिए साधना का काम करता है। गलत व्यवहार करने पर प्रबलन नहीं मिलता है तथा सही व्यवहार करने पर प्रबलन प्राप्त होता है।

3. प्रबलन:
अन्य मनोवैज्ञानिकों की तरह स्किनर ने भी शिक्षण के लिए प्रबलन को आवश्यक माना है। उन्होंने दो प्रकार के प्रबलन की चर्चा की है, जिसे सकारात्मक प्रबलन तथा नकारात्मक प्रबलन के नाम से जानते हैं। सकारात्मक प्रबलन उसे कहते हैं, जिससे प्राणी की संतुष्टि मिलती है तथा उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है जबकि नकारात्मक प्रबलन से असंतुष्टि मिलती है। प्राणी उससे बचने का प्रयास करता है।

4. व्यवहार-सुसंगठन:
प्रबलन से प्राणी के व्यवहार को सुसंगठित किया जाता है। इस आधार पर पशुओं को जटिल कार्य सिखलाया जाता है। जैसे-स्किनर ने कबूतर को पहले बक्से से परिचय कराया और फिर प्लास्टिक कुंजी पर चोंच मारकर दाना प्राप्त करना सिखाया और अन्त में उस व्यवहार को सुगठित किया। इसलिए कबूतर को बाद में जब भी स्किनर बॉक्स में बन्द किया जाता था, वह तुरंत ही प्लास्टिक कुंजी दबाकर भोजन प्राप्त कर लेता था।

उन्होंने व्यवहार-सुगठन के पक्ष में और भी प्रयोग किये हैं। व्यवहार सुगठन केवल पशुओं के लिए ही उपयोगी नहीं, बल्कि मनुष्यों के लिए भी प्रभावशाली सिद्ध हुआ। ग्रीन स्पून ने मनुष्यों पर प्रयोग करके इसे प्रमाणित करने का प्रयास किया। इसी तरह वरप्लांक ने भी मनुष्य के व्यवहार के सुगठन को मौखिक अनुकूलन द्वारा प्रमाणित किया है।

5. उत्तेजना सामान्यीकरण:
जब कोई तटस्थ उत्तेजना किसी अनुक्रिया को उत्पन्न करने के लिए अनुकूलित हो जाती है, तो वह अनुक्रिया उस उत्तेजना से मिलती-जुलती उत्तेजनाओं के प्रति भी होने लगती है, जिसे उत्तेजना सामान्यीकरण कहते हैं। स्किनर ने अपने अध्ययनों में देखा कि जब चूहा कुंजी दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख लिया, तो उससे कुछ भिन्न दूसरे बक्से में छोड़ा गया। यहाँ भी चूहे ने अपनी उसी प्रतिक्रिया को दुहरायी। ग्राइस एवं राल्ज ने भूल-भुलैया के आधार पर उत्तेजना सामान्यीकरण को सिद्ध किया।

6. उत्तेजना-विभेद:
उत्तेजना-विभेद का अर्थ हुआ कि जब प्राणी एक परिस्थिति में कोई व्यवहार सीख लेता है, तो उस परिस्थिति से भिन्न परिस्थितियों में उसे नहीं दुहराता है। स्किनर ने कबूतर को स्किनर-बॉक्स में दाना प्राप्त करना सिखाया। उसके बाद उस बक्से से भिन्न दूसरे बक्से में कबूतर को रखा तो वहाँ उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। ग्राइस एवं राल्ज के अध्ययन से भी यह बात प्रमाणित हो जाती है।

7. विलोप:
पॉवलव के क्लासिकल अनुबन्धन की तरह इसमें भी विलोप की विशेषता पायी जाती है। विलोप से तात्पर्य यह है कि प्राणी उत्तेजना के प्रति व्यवहार करना सीख ले और उसे प्रबलन नहीं मिले, तो धीरे-धीरे व्यवहार समाप्त हो जाता है। स्किनर ने देखा कि चूहों को कुंजी दबाने के बाद भी कई बार भोजन नहीं मिला, तो उसने कुंजी को दबाना छोड़ दिया, इसे ही विलोप कहते हैं।

8. स्वतः पुनाप्ति:
अनुबन्धन होने के बाद यदि उसे प्रबलन नहीं दिया जाता है, तो धीरे-धीरे अनुबंधित अनुक्रिया को प्राणी भूल जाता है। स्किनर ने देखा कि भोजन के अभाव में चूहे ने कुंजी दबाना छोड़ दिया, लेकिन कुछ समय बाद उसने स्वतः कुंजी को दबाया। इस तरह स्किनर का शिक्षण-सिद्धान्त एक वैज्ञानिक सिद्धान्त है।

उन्होंने वाटसन तथा गथरी की तरह शिक्षण से सम्बन्धित अमूर्त विषयों के व्यवहारिक पक्ष पर बल दिया है। उन्होंने शिक्षण में प्रवर्तन व्यवहार को आवश्यक माना तथा अन्य मनोवैज्ञानिकों की तरह प्रबलन को भी आवश्यक माना है। बच्चों के समाजीकरण की व्याख्या करने में भी यह सिद्धान्त सफल है। व्यवहार परिमार्जन की दिशा में इस सिद्धान्त का कोई मुकाबला नहीं है। परन्तु इन गुणों के बावजूद स्किनर का सिद्धान्त दोषों से मुक्त नहीं है। इस सिद्धान्त के निम्नलिखित प्रमुख दोष हैं –

दोष (Demerits):

1. स्किनर ने सीखने के लिए प्रबलन को आवश्यक माना है, परन्तु टॉलमैन ने प्रबलन को आवश्यक नहीं माना। उन्होंने अपने प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर सिद्ध कर दिया है कि बिना प्रबलन के भी प्राणी सीख सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने एक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, जिसे ‘लेटेंट शिक्षण’ कहते हैं।

2. स्किनर ने प्रवर्तन तथा प्रत्यार्थी:
व्यवहारों के बीच अन्तर माना है, परन्तु मिलर और टेरिस उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि प्रवर्तन-व्यवहार और प्रत्यार्थी-व्यवहार के बीच सीमा-रेखा खींचना मुश्किल हैं।

3. इस सिद्धान्त पर एक आरोप यह लगाया जाता है कि इसमें परिधीय यंत्रों पर बल दिया गया है तथा केन्द्रीय यंत्रों को छोड़ दिया गया है, जबकि केन्द्रीय यन्त्रों की शिक्षण में प्रधानता होती है।

4. स्किनर ने सीखने तथा सम्पादन के अन्तर की और ध्यान नहीं दिया है। उन्होंने उत्तेजना प्रतिक्रिया सम्बन्धन को प्रबलन का परिणाम माना, जबकि बन्धुश ने कहा कि सम्भव है कि एक बालक अपने विषय को अच्छी तरह जानता हो, परन्तु प्रबलन के अभाव में उसे सम्पादन के रूप में व्यक्त न कर सके। प्रबलन से सम्पादन प्रभावित होता है, शिक्षण नहीं।

5. कौसकी ने इस सिद्धान्त की समीक्षा करते हुए तीन बातों का उल्लेख किया है और कहा कि स्किनर ने प्राणी की आन्तरिक अवस्था की ओर ध्यान नहीं दिया है, जबकि उत्तेजना प्रतिक्रिया सम्बन्ध में इसका बहुत बड़ा हाथ होता है।

दूसरी बात उन्होंने कहा कि प्रत्ययों का मूल्य सर्जनात्मक निर्देशन पर निर्भर करता है तथा तीसरी की स्किनर ने अपने चूहे को स्किनर बॉक्स के भीतर प्राप्त प्रत्ययों का बहिर्षण करके मानव के मानसिक जीवन की समस्याओं की व्याख्या करने का असफल प्रयास किया है। स्किनर द्वारा प्रस्तुत बहिर्षण या तो गलत है या लाक्षणिक दोषों से पीड़ित है। इस तरह, हम देखते हैं कि स्किनर के सिद्धान्त में बहुत सारे दोष हैं। परन्तु इसके बावजूद इसका व्यावहारिक महत्व कम नहीं हुआ। शिक्षण के क्षेत्र में आज भी इस सिद्धान्त की अलग मान्यता है।

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प्रश्न 9.
सीखना या शिक्षण के प्रयत्न एवं भूल सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
प्रयत्न एवं भूल सिद्धांत सीखने का एक प्रमुख सिद्धांत है जिसका प्रतिपादन ई. एल. थार्नडाइक (E. L. Thorndike) द्वारा किया गया। बिल्लियों, चूहों, मुर्गियों आदि पर प्रयोग करके थार्नडाइक ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। इस सिद्धांत का सारतत्त्व यह है कि जब प्राणी किसी कार्य या कौशल को सीखना चाहता है तब वह प्रयत्न करता है और इस क्रम में उससे भूलें (erors) होती हैं।

जैसे-जैसे प्रयत्नों या प्रयासों की संख्या बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे भूलों या त्रुटियों में कमी आती जाती है। एक ऐसा समय आता है जब बिना कोई त्रुटि या भूल किए ही प्राणी उस कौशल या अनुक्रिया को करना सीख लेता है। थार्नडाइक का यह सिद्धांत उनके द्वारा किए गए कुछ प्रयोगों पर आधृत है। इन प्रयोगों में निम्नांकित दो तरह के प्रयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

1. पहेली बक्स की समस्या-संबंधी प्रयोग (Experiment relating to puzzle-box problem):
यह प्रयोग एक भूखी बिल्ली पर किया गया जिससे पहले बक्से (puzzle box) में रख दिया जाता है। पहेली बक्से के सामने बाहर में एक मछली का टुकड़ा रख दिया गया जिसे बिल्ली देख रही थी।

बिल्ली के सामने यह समस्या थी कि वह किस तरह पहेली बक्से से निकलकर मछली खाकर अपनी भूख मिटा ले। बक्से के अन्दर बंद होते ही बिल्ली बाहर निकलने के लिए प्रयत्न अर्थात् उछल-कूद करने लगी। वह भूख से प्रेरित थी जिसके फलस्वरूप वह पहेली बक्से को दाँत से काटती, कभी अपने पंजे से नोचती-खसोटती थी।
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चित्र: थार्नडाइक का पहेली बॉक्स

इन व्यर्थ प्रयासों के दौरान उसका पंजा बक्से के एक बटन या सिटकिनी पर पड़ जाता है जिससे बक्से का दरवाजा खुल गया और बिल्ली बाहर निकलकर मछली खा गई। फिर बाद में उसी बिल्ली को उसे बक्से में रखा गया तो देखा गया कि इस बारी में भी बिल्ली द्वारा कुछ उछल-कूद की व्यर्थ क्रियाएँ हुईं, परंतु पहले की अपेक्षा कम हुई।

बिल्ली थोड़ी देर तक छल-कूद करने के बाद ही दरवाजा खोल सकने में समर्थ हो गई । इस प्रक्रिया को जब कई दिनों तक दोहराया गया तब देखा गया कि प्रयास बढ़ने के साथ-ही-साथ त्रुटियों में काफी कमी आई और अंत में एक समय ऐसा भी आया कि बिल्ली को जैसे ही बक्से में रखा गया, वह सीधे सिटकिनी या बटन दबाकर दरवाजा खोल लेती थी और बाहर आकर मछली खा लेती थी। इस तरह, बिना कोई त्रुटि किए कम-से-कम समय में बिल्ली दरवाजा खोलना सीख गयी।

2. भूल-भूलैया सीखने की समस्या-संबंधी प्रयोग (Experiment relating to mazeleaming problem):
इस प्रयोग में थार्नडाइक ने एक भूखे चूहे को भूल-भूलैया में रखा। भूल-भूलैया (maze) एक ऐसा उपकरण होता है जिसमें लक्ष्य तक पहुँचने का एक ही रास्ता होता है। परंतु अंधपथ (blind ways) कई होते हैं। भुल-भुलैया के लक्ष्य स्थान पर भोजन रख दिया गया। भूखे चूहे को भूल-भूलैया के प्रवेश द्वार पर छोड़ दिया जाता था।

यह देखा गया कि जब पहली बार भूखे चूहे को भूल-भुलैया में छोड़ा गया तब वह बहुत देर तक अंधपथों में भटकता रहा और काफी देर के बाद संयोग से सही रास्ता अपनाकर लक्ष्य स्थान पर पहुँच गया, लेकिन, जब कई बार उस चूहे को भूलभुलैया में छोड़ा गया तब देखा गया कि अंधपथ में जाने की व्यर्थ क्रियाओं में काफी कमी आती गई और वह धीरे-धीरे अंधपथ का त्याग करके सही मार्ग में जाना सीख लिया।
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चित्र: भूल-भुलैया का प्रयोग चित्र

उपर्युक्त दोनों प्रयोगों से स्पष्ट है कि प्राणी किसी कार्य को सीखने के लिए बार-बार प्रयल करता है, उसमें उससे अनेक भूलें (errors) होती हैं। अभ्यास जारी रहने से भूलने की संख्या में धीरे-धीरे कमी आती है और अंत में वह कार्य को बिना किसी तरह की त्रुटि किए ही करना सीख जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार सीखने की पूरी प्रक्रिया में निम्नांकित छह अवस्थाएँ होती हैं –

(a) प्रणोद (Drive):
सीखने के लिए प्रणोद (drive) आवश्यक है, क्योंकि यह प्राणी को क्रियाशील या प्रयत्नशील बनाता है। उपर्युक्त प्रयोगों में बिल्ली तथा चूहा में भूख प्रणोद का एक उदाहरण है।

(b) प्रणोद की तुष्टि में बाधा (Interference in satisfaction of drive):
प्रणोद की तुष्टि में जब बाधा पहुँचती है तब इससे प्राणी में क्रियाशीलता बढ़ती है और वह समस्या को सुलझाने का प्रयत्न करता है।

(c) यादृच्छिक क्रियाएँ (Random activities):
समस्या को सुलझाने के पहले प्राणी कई तरह की यादृचिछक क्रियाएँ या व्यर्थ क्रियाएँ करता है। बिल्ली द्वारा उछलना, कूदना, नोचना, खसोटना ऐसी ही क्रियाओं के उदाहरण है।

(d) आकस्मिक सफलता (Accidental success):
व्यर्थ की क्रियाएँ या यादृच्छिक क्रियाएँ करते समय मात्र संयोग से ही प्राणी सही अनुक्रिया कर देता है जिसे आकस्मिक सफलता कहा जाता है। बिल्ली द्वारा उछल-कूद करते समय संयोगवश सिटकनी दब जाना एक आकस्मिक सफलता का उदाहरण है।

(e) सही अनुक्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition of correct response):
प्रथम बार सफलता प्राप्त कर लेने के बाद प्राणी धीरे-धीरे यादृच्छिक क्रियाओं का परित्याग करता चला जाता है तथा सही अनुक्रिया को दोहराता जाता है।

(f) सही अनुक्रिया स्थायीकरण (Fixation of correct response):
अंतिम अवस्था में प्राणी में सही अनुक्रिया का स्थायीकरण होता है जिसका परिणाम यह होता है कि प्राणी बिना कोई त्रुटि किए ही सही अनुक्रिया कर पाता है।

आलोचनायें (Criticisms):
इस सिद्धांत की कुछ प्रमुख आलोचनाएँ निम्नांकित हैं –

(a) थार्नडाइक ने सीखने की प्रक्रिया को एक यांत्रिक प्रक्रिया (mechanical process) माना है जिसका मतलब यह हुआ कि प्राणी यदि किसी अनुक्रिया को सीखना प्रारंभ करता है तब शुरू में यह यादृच्छिक क्रियाएँ या व्यर्थ क्रियाएँ करता है। धीरे-धीरे अभ्यास से ऐसी त्रुटियाँ समाप्त हो जाती हैं और वह सही अनुक्रिया को करना सीख लेता है। आलोचकों ने यह स्पष्ट किया है कि प्रत्येक अनुक्रिया को सीखने में इस तरह की निश्चित एवं यांत्रिक क्रियाएँ नहीं होती हैं।

(b) कुछ मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि प्रयत्न तथा भूल के सिद्धान्त के आधार पर सभी प्रकार के सीखना की व्याख्या नहीं की जा सकती। जहाँ तक सरल क्रियाओं जैसे टाइप सीखन, साइकिल चलाना सीखना आदि का प्रश्न है, वह तो अभ्यास एवं प्रभाव के नियमों के सहारे सीखा जा सकता है, लेकिन जटिल क्रियाओं को मात्र अभ्यास द्वारा सीखना संभव नहीं है। इसके लिए सूझ (insight) की आवश्यकता पड़ती है जिसकी चर्चा तक थार्नडाइक ने नहीं की।

(c) यह सिद्धांत मूलतः पशुओं, जैसे-बिल्ली तथा चूहों पर किए गए प्रयोगों पर आधारित है। अत: इसकी बहुत-सी बातें मानव सीखना के लिए उपयुक्त नहीं हैं। बिल्ली भले की पहले बक्से के भीतर से कैसे निकला जाए, नहीं जानती पर मनुष्य तो किसी भी परिस्थिति को अच्छी तरह समझकर की कोई अनुक्रिया करता है। जो भी हो, इन आलोचनाओं के बावजूद थार्नडाइक का यह सिद्धांत अपना एक अलग स्थान रखता है।

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प्रश्न 10.
शिक्षण वक्र क्या है? इसके प्रकार और उसकी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शिक्षण वक्र एक प्रकार का ग्राफ है जो सीखने में हुए विकास को दर्शाता है। इसे एक झलक देखने पर ही सीखने से व्यवहार में हुए परिवर्तनों की झांकी मिलती है। थार्नडाइक ने अपने प्रयोगों के आधार पर यह बतलाया कि सीखने में जैसे-जैसे प्रयास या अभ्यास की संख्या बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे अशुद्धियों की संख्या कम होती जाती है। इसमें लगे समय में कमी आती जाती है। अन्त में व्यक्ति कम-से-कम समय में बिना कोई गलती किए सही प्रक्रिया सीख जाता है। जहाँ तक शिक्षण वक्र के विभिन्न प्रकारों का प्रश्न है, इसके निम्नलिखित प्रकारों की व्याख्या की जा सकती है –

(क) भूल वक्र (Error-graph):
किसी भी सीखना-वक्र में दो रेखायें होती हैं-उदग्र रेखा तथा आधार रेखा।
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रेखा पर स्वतंत्र चर लिखा जाता है। स्वतंत्र चर का अर्थ यहाँ अभ्यास या प्रयत्न है। उदग्र रेखा पर आश्रित चर लिखा जाता है। यहाँ आश्रित चर का तात्पर्य भूल, समय या सीखने की मात्रा से है। जब आधार-रेखा पर प्रयत्न तथा उदग्र रेखा पर भूल अंकित करके वक्र बनाया जाता है तो इस वक्र को भूल-वक्र कहा जाता है। यह वक्र उदग्र रेखा के सिरे से शुरू होकर कभी दाहिने तरफ जाता है और कभी आधार रेखा से मिल भी जाता है। ऐसा तब होता है जबकि अंतिम प्रयत्न में भूल शून्य प्रयत्न हो जाता है।

(ख) समय वक्र (Time-graph):
जब आधार रेखा पर अभ्यास यानी प्रयत्न और उदग्र रेखा पर अभ्यास यानी प्रयत्न और उदग्र रेखा पर समय अंकित करने वक्र बनाया जाता है तो इसे समय-वक्र कहा जाता है। यह वक्र भी भूल-वक्र की तरह उदग्र रेखा के सिरे से आरम्भ होकर दाहिने ओर आधार की तरफ जाती है। परन्तु, यह आधार-रेखा से कभी भी नहीं मिलता है। कारण, अभ्यास से समय चाहे जितना भी कम हो जाए, किन्तु शून्य नहीं होता।
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(ग) उत्पादन वक्र:
जब किसी क्रिया को अभ्यास के द्वारा सीखने का प्रयास किया जाता है तो प्रारंभ में काम की मात्रा या उत्पादन कम होता है। जैसे-जैसे अभ्यास की संख्या बढ़ती जाएगी, उत्पादन की गति भी बढ़ती जाएगी। उत्पादन की इस बढ़ती हुई मात्रा को ग्राफ द्वारा दर्शाया जाए तो इससे उत्पादन वक्र प्राप्त होता है। इस प्रकार का वक्र नीचे से दाहिने ऊपर उठता जाता है। यह उठना एक सीमा तक होता है।

इस तरह शिक्षण वक्र के उपर्युक्त प्रकारों का उल्लेख किया जा सकता है। इसी प्रकार इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ भी होती हैं, जो इस प्रकार हैं –

1. प्रारंभिक चढ़ाव:
सीखना प्रारंभ करने के बाद व्यक्ति विषया या क्रिया से पूर्ण परिचित हो जाता है जब उसमें सीखने की प्रेरणा जागृत होती है और वह पूरी लगन, उत्साह, अभिरुचि तथा उत्सुकता के साथ विषय को सीखने लगता है। इससे शिक्षण वक्र में चढ़ाव देखा जाता है। इसे ही प्रारंभिक चढ़ाव कहा जाता है। शिक्षण वक्र की यह पहली विशेषता है।

2. मध्यवर्ती चढ़ाव:
जब प्रारंभिक चढ़ाव के बाद व्यक्ति की अभिरुचि, लगन, उत्साह और उत्सुकता में कमी आने लगती है तब शिक्षण वक्र में उतार आने लगता है। लेकिन व्यक्ति अपना प्रयास जारी रखता है और जब फिर उसमें उत्साह, लगन, उत्सुकता आने लगती है तब शिक्षण वक्र में चढ़ाव आने लगता है इस प्रकार, शिक्षण-वक्र में चढ़ाव ऊपर देखा जाता है। इसे मध्यवर्ती चढ़ाव कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की दूसरी विशेषता हुई।

3. अंतिम चढ़ाव:
जब सीखने वाले व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि अब विषय समाप्त होने वाला है तो वह अपनी सम्पूर्ण शक्ति और लगन के साथ विषय या क्रिया को समाप्त करने की कोशिश करता है जिससे शिक्षण-वक्र में चढ़ाव. आ जाता है। इसे ही अंतिम चढ़ाव कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की तीसरी विशेषता हुई।

4. पठार:
सीखने की अवधि के बीच कभी-कभी शिक्षण वक्र की यह स्थिति हो जाती है कि व्यक्ति को ऐसा प्रतीत होने लगता है कि सीखने में अब आगे प्रगति नहीं हो पाएगी। शिक्षण-वक्र आधार के समानान्तर हो जाता है यानी उत्पादन वृद्धि रुक जाती है। लेकिन विशेष प्रयास के बाद उसके कार्य में प्रगति देखी जाती है। शिक्षण-वक्र की इस स्थिति को सीखने में पठार कहा जाता है। यह शिक्षण-वक्र की चौथी विशेषता है।

5. दैहिक सीमा:
सीखने की अवधि में एक ऐसी भी अवस्था आती है जब वक्र का चढ़ाव बिल्कुल रुक जाता है। लाख कोशिश करने के बाद भी वक्र का चढ़ाव आगे नहीं बढ़ता है, तो इसे दैहिक सीमा कहा जाता है। जैसे- भूल-वक्र में जब अशुद्धियाँ एकदम नहीं होती हैं तब भूल-वक्र में कोई परिवर्तन की गुंजाइश नहीं रह पाती है।

ठीक इसी प्रकार समय-वक्र में जब व्यक्ति ऐसी सीमा पर पहुँच जाता है, जहाँ से आगे तीव्र गति से क्रिया करना संभव नहीं रह जाता है, तो समय-वक्र में भी कोई परिवर्तन नहीं हो पाता है। इसे दैहिक सीमा कहा जाता है। फिर उत्पादन-वक्र में जब व्यक्ति कुशलता की सीमा पर पहुँच जाता है तो वक्र के ऊपर उठने का प्रश्न ही नहीं उठता है। यह दैहिक सीमा का परिचायक है।

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प्रश्न 11.
अधिगम अशक्तता किसे कहते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों का उल्लेख करें। क्या अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का इलाज संभव है? यदि हाँ, तो कैसे?
उत्तर:
परिचय:
केन्द्रीय तंत्रिका में उत्पन्न विसंगतियों के कारण किसी व्यक्ति (खासकर बच्चे) में अक्षमता प्रकट करने से संबंधित विकार अधिगम अशक्तता माने जाते हैं जिसके कारण व्यक्ति को पढ़ने, लिखने, गणित के प्रश्नों को हल करने में बहुत ही कठिनाई होती है। बच्चों में पाई जानेवाली अधिगम अशक्तता के कारण बच्चे श्रेष्ठ बुद्धि वाले बच्चों की तुलना में सीखने की प्रवृत्ति, आत्म सम्मान, पेशा, सामाजिक परिवेश के बारे में समुचित निर्णय क्षमता प्रकट नहीं कर सकते हैं। ऐसे बच्चों के संवेदी प्रेरक तंत्र दोषी माने जाते हैं।

अधिगम अशक्तता के लक्षण-बच्चों में बुद्धि, अभिप्रेरण तथा अधिगम के लिए किया जाने वाला परिश्रम निरर्थक की श्रेणी में आता है। इस तरह के बच्चों में निम्नलिखित लक्षण पाये जाते हैं –

  1. अधिगम अशक्तता वाले बच्चों में अक्षरों या शब्दों का सही ज्ञान नहीं होता है। वे अपनी भावना को लिखकर नहीं बता पाते हैं। वे पढ़कर कुछ बतलाने की स्थिति में भी नहीं होते।
  2. अशक्तता के शिकार बच्चे सीखने के लिए भोजन बनाने या सामान्य व्यवहार करनेवाले बच्चे के रूप में कार्य करने की विधि खोजने में असमर्थ होते हैं।
  3. अधिगम अशक्तता से पीड़ित बच्चे किसी निर्धारित विषय पर देर तक ध्यान केन्द्रित करके चिंतन की अवस्था में नहीं रह पाते हैं।
  4. घरेलू सामग्रियों के स्थान को अनियमित ढंग से बदल देना इन बच्चों का विशिष्ट लक्षण है।
  5. इनमें स्थान और समय की समझदारी का अभाव होता है ये अच्छे अवसर पाकर भी उसका सदुपयोग नहीं कर पाते हैं।
  6. इस श्रेणी के बच्चों का पेशीय समन्वय तथा हस्त निपुणता अपेक्षाकृत निम्न श्रेणी का होता है। ये शारीरिक संतुलन का अभाव, दरवाजे को खोलने की कला से अनभिज्ञ, साइकिल चलाने में अक्षम जैसी जानकारियों से दूर होते हैं।
  7. ये अभिभावकों के मौखिक अनुदेशों को समझने और अनुसरण करने में असफल होते हैं।
  8. इन्हें सामाजिक संबंधों का मूल्याकंन करके उचित व्यवहार करने में कठिनाई होती है।
  9. अधिगम अशक्तता वाले बच्चों में प्रात्यहित विकार पाए जाते हैं जिसके कारण ये सुनने, पढ़ने, छूने तथा गति से संबंधित संकेतों के अर्थ नहीं समझ पाते हैं।
  10. अक्षरों को मिलाकर सार्थक शब्द की रचना करने में ये लाचार होते हैं।
  11. इन्हें अक्षरों को पहचानने में भी कठिनाई होती है क्योंकि ये समान रचना वाले अक्षरों (ट-ठ, प-फ) में अन्तर समझने में लाचार बना देते हैं।

उपचार:
अधिगम अशक्तता वाले बच्चों का उपचार संभव है। उपचारी अध्यापन विधि तथा मनोवैज्ञानिक शिक्षण प्रणाली के प्रयोग से उनमें पहले जाने अधिकांश लक्षणों को दूर किए जा सकते हैं। इनके साक्ष सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार तथा क्षमता को प्रोत्साहन देते हुए भरपूर प्यार की स्थिति प्रकट करना हितकर परिणाम देते हैं। इस श्रेणी के बच्चे प्यार और प्रोत्साहन के भूखे होते हैं। इन्हें प्रेरक बल के द्वारा ऊँचाई पर पहुँचाया जा सकता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अधिक लंबे विषय के अधिगम के लिए कौन विधि अधिक उपयुक्त है?
(a) पावलव
(b) थॉर्नडाइक
(c) कोहलर
(d) स्कीनर
उत्तर:
(a) पावलव

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प्रश्न 2.
अधिगम पर कोहलर ने अपना प्रयोग किस पशु पर किया:
(a) चूहा
(b) खरगोश
(c) चिम्पैंजी
(d) कुत्ता
उत्तर:
(c) चिम्पैंजी

प्रश्न 3.
पावलव महोदय ने अधिगम से सम्बन्धित प्रयोग किस जानवर पर किया था?
(a) बिल्ली
(b) कुत्ता
(c) चूहा
(d) वनमानुष
उत्तर:
(b) कुत्ता

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प्रश्न 4.
अधिगम का अध्ययन सर्वप्रथम किसने आरंभ किया?
(a) पावलव
(b) थॉर्नडाईक
(c) कोहलर
(d) स्कीनर
उत्तर:
(a) पावलव

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